पर्वतीय हितों का असली रक्षक; राजेन टोडरिया

m_RANEN TODERIA

m_RANEN TODERIA

प्रस्‍तुति चन्‍द्रशेखर जोशी

मुझे अनाडी मत समझो, मै ठेंठ पहाडी हूं, रग रग मे मेरे जोश भरा, मै खतरों का खिलाडी हूं, यह पंक्‍तियां मैं ऐसे लेखक के लिए उचित मानता हूं जो आज पर्वतीय हितों का असली रक्षक बन कर उभरा है, उनकी असली चिंता आज केवल पर्वतीय हितों का संरक्षण मात्र है, पर्वतीय हितों के खिलाफ कुछ भी मामला होने पर वह आज न केवल उसे बेनकाब कर रहे हैं अपितु उसके खिलाफ जमकर सघर्ष भी कर रहे हैं,पर्वतीय हितों के इस असली रणबांकुरे का नाम है राजेन टोडरिया, उत्‍तराखण्‍ड में यूं तो वह अनेक समस्‍या उठा चुके हैं परन्‍तु मैं इस समय उनके द्वारा उठाये गये दो मामले प्रकाशित कर रहा हूं-

राजेन टोडरिया लिखते हैं कि मेरे सामने हल्द्वानी के मुक्त विवि के कागजात हैं और मैं हैरत में हूं कि इतने बड़े पैमाने पर क्या कहीं भ्रष्टाचार संभव है। लेकिन इससे भी ज्यादा हैरत अंगेज ही नही बल्कि शर्मनाक बात यह है कि इस विवि में ड्राइवर से लेकर कुलपति तक यूपी के लोग नियुक्त होते रहे और हल्द्वानी में पत्ता तक नहीं खड़का? पहाड़ के संजना रौतेला,बालम दफौटी,अंजना जोशी, नेहा चैहान, पवन उप्रेती, प्रीति बोरा, अनिल टम्टा, सिद्धार्थ पोखरियाल, भगवती पंत, वीना जोशी, सुभाष भट्ट,शीला रजवार, ललित मोहन भट्ट, उदित पांडे राघवेंद्र, कविता कुमारी,राजेंद्र गोस्वामी और आकांक्षा जोशी ,ये 18 लोग हैं जिन्हे किसी न किसी बहाने महज इसलिए हटा दिया गया कि ये पहाड़ी थे तब भी किसी का स्वाभिमान नहीं जगा। समूचा मीडिया मुंह सी कर चुप बैठा रहा क्योंकि ओपन विवि ने नोटों से मीडिया के मुंह भर दिए थे। एक महिला कर्मी की जासूसी करने के लिए कुलपति कानपुर और बाराणसी के दो कर्मचारियों को लगाते हैं पर न तो हल्द्वानी को गुस्सा आता है और राज्य का महिला आयोग कुछ करता है। एकाध दिन हल्ला और आंदोलन होता है पर दोषी गिरफ्तार नहीं होते और आज तक छुट्टे घूम रहे हैं। विवि के कुलपति के संरक्षण में कानपुर और बनारस के गुंडे हल्द्वानी में पनप रहे हैं। अब जरा ओपन विवि की तस्वीर देखिये। कुलपति,रजिष्ट्रार,उपकुल सचिव,सहायक कुलपति, परीक्षा नियंत्रक,सहायक प्राध्यापक से लेकर वाहन चालक तक के पदों पर कानपुर,झांसी,बनारस और बिहार के लोगों की नियुक्ति से जाहिर है कि विवि में खुलेआम नंगा पहाड़ विरोधी क्षेत्रवाद चल रहा है।विवि को आपूर्ति करने वाली सारी फर्में या कंपनियां कानपुर की हैं और निर्माण एजेंसी यूपी निर्माण निगम है। धंधे में भी क्षेत्रवाद! कमीष्शन भी उ त्तराखंड के व्यवसायियों से नहीं खायेेंगे। उसके लिए भी आदमी कानपूुर से ही लायेंगे।गजब यह है कि योग्यता सूची में जो व्यक्ति सबसे निचले पायदान पर था उसे राजनाथ सिंह के दबाव में सन् 2006 में कुलपति बना दिया गया। यह भी ध्यान नहीं रखा गया कि उस व्यक्ति ने सन्2004 में ही पीएचडी की है और एक भी छात्र को पीएचडी नहीं कराई। जिस व्यक्ति को कुलपति जैसे गरिमा के पद के लिए आवेदन में फर्जी दस्तावेज बनाने और प्रस्तुत करने के आरोप में जेल में होना चाहिए था उसे पांच साल तक कुलपति बनाए रखा गया और पूरे प्रदेश के राजनीतिक नेता नपुंसकों की तरह यह सब होते देखते रहे। विधानसभा में एक भी सवाल किसी ने नहीं पूछा,किसी नेता ने बयान तक नहीं दिया। यह कैसे राज्य में रह रहे हैं हम लोग, क्या यह उन्ही लोगों का राज्य है जिन्होने 1994 जैसा आंदोलन किया था? जो लोग हम पर क्षेत्रवाद फैलाने का आरोप लगा रहे हैं उनकी जानकारी के लिए हम इतना बता देना चाहते हैं कि अपने घर में अपने युवाओं और बेरोजगार भाईयों के साथ ऐसी बेइंसाफी तो हम बर्दाश्त नहीं करेंगे, इसके लिए चाहे कितने बलिदान क्यों न देने पड़ें। कितने ही भरत झुनझुनवालाओं के मुंह पर कालिख पोतनी पड़े, हम यह करेंगे और पहाड़ के हर आदमी से भी कहेंगे कि वो अपने बेटे,बेटियों, भाई बहनों के भविष्य को बचाने के लिए यही करे। यदि यही भाषा ओपन विवि के कुलपति से लेकर भरत झुनझुनवाला तक मौजूद पहाड़ विरोधी क्षेत्रवादियों को समझ में आती है तो हम यही भाषा बोलेंगे

इसके अलावा राजेन टोडरिया की चिंता यहां भी झलकी जब उन्‍होंने लिखा कि मुझे यह जानकर अचरज हुआ है कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि राज्य के गठन के समय जो भी लोग उ त्तराखं डमें रह रहे थे वे उत्तराखंड के मूल निवासी हैं। हालांकि मूल निवास से मतलब होता है कि उस इलाके में जो लोग तीन पीढ़ियों से रह रहे हों उन्हे मूल निवासी माना जाता है। मूल निवासी का खाता खतौनी,परिवार रजिस्टर में नाम होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट 26 जनवरी 1950 तक जो नागरिक जिस राज्य में रह रहा

था  उसे वहां का मूल नागरिक मानता है। इसके बावजूद यदि उच्च न्यायालय ने विवाद के इस पिटारे को खोल ही दिया है तो उत्तराखंड सरकार को तत्काल सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर कर इस आदेश पर स्टे लेना चाहिए। हाईकोर्ट के इस आदेष पर पूरे देश में प्रतिक्रिया होनी तय है। इसके विरुद्ध सारे दक्षिण भारतीय राज्यों, महाराष्ट्र ,पंजाब, हिमाचल, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर राज्यों के मूल निवासी समाजों के संगठनों को भी सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी दायर कर उन्हे भी पक्ष बनाने का आग्रह करना चाहिए ताकि सर्वोच्च न्यायालय मूल निवास से जुड़े सारे सवालों पर विचार कर सके और देश में ऐसा कानून बन सके जिससे मूल निवासी समाजों की पहचान की रक्षा हो सके। केंद्र सरकार भी यदि इस मामले को यदि राष्ट्रीय विवाद नहीं बनाना चाहता है तो उसे मूल निवास के मामले पर एक विधेयक संसद में लाना चाहिए ताकि विभिन्न राज्यों के मूल निवासी समाजों और क्षेत्रीय अस्मिताओं की रक्षा हो सके। मूल निवास के सवाल पर थोड़ी सी असावधानी देष के लिए बोडो जैसे संक्टों की श्रृंखला तैयार कर सकती है। लेकिन इस मामले को राष्ट्रीय स्तर पर बहस का मुद्दा बनाने के लिए उंताखंड के मूल निवासी समाज को ही आगे आना होगा। इस पर जनमत तैयार करना होगा और इस निर्णय से पैदा होने वाले नतीजों पर पूरे समाज में व्यापक बहस होनी चाहिए। इन बहसों और जनमत के जरिये राज्य सरकार पर दबाव डालने के लिए राज्यभर में एक अभियान चलाया जाना चाहिए। सरकार पर दबाव डालने के लिए उत्तराखंड आंदोलन की तर्ज पर एक बड़ा आंदोलन करना होगा जब तक सर्वोच्च न्यायालय इस आदेश पर रोक नहीं लगाता तब तक सारी नियुक्तियों पर रोक लगाई जानी चाहिए। मुझे लगता है कि उत्तराखंड के मूल निवासी समाज इस समय इतिहास के सबसे बड़े संकट से गुजर रहे हैं। इस संकट से लड़ने के लिए बहुत ही तीव्र आंदोलन चाहिए। मुझे पूरा यकीन है कि हाईकोर्ट का यह आदेश पूरे राज्य में जनजागृति और जनमत का एक तूफान खड़ा करेगा और इस तूफान में कई कश्तियां डूबेंगी। हमें उत्तराखंड उच्च न्यायालय का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने 1994 की तरह पहाड़ के लोगों को जगाने का काम किया है। अब हर इंटर काॅलेज, डिग्री काॅलेज,हर सरकारी कार्यालय,पहाड़ के हर कस्बे के चैराहों और गांव की चाय की दुकानों पर यह बहस छिड़ जानी चाहिए कि मूल निवासी होने का अर्थ और उसका गौरव क्या होता है। बार एशोसियेशनों,वकीलों,न्यायविदों को भी इस फैसले के दूरगामी परिणामों पर बहस के लिए आगे आना होगा। उत्तराखंड के भविष्य के लिए यह पूरा घटनाक्रम ऐतिहासिक होने वाला है।

7 Responses to पर्वतीय हितों का असली रक्षक; राजेन टोडरिया

  1. चन्द्रशेखर करगेती Reply

    August 21, 2012 at 4:19 PM

    जोशी जी, मैं आपके पोर्टल का नियमित पाठक हूँ तथा मेरे द्वारा लिखे गये दो-चार लेख भी आपने आपके पोर्टल पर साझा किये है, मैं आपके पोर्टल से राज्य में होने वाली राजनैतिक और सामाजिक गतिविधियों से अवगत होता रहा हूँ, लेकिन आज आपके पोर्टल पर राज्य के वरिष्ठ पत्रकार श्री राजेन टोडरिया जी के बारे में लिखा लेख पढ़ा l मैं राज्य के एक जागरूक नागरिक होने के नाते हप्रभ हूँ कि इस पर किस तरह से अपनी प्रतिक्रया दूँ…खैर जैसा भी हो मुझे लिखना तो पड़ेगा ही, अब यह आपको पसंद आये या नागवार लगे पर मैं मेरे धर्म से पीछे नहीं हट सकता……..

    आपके माध्यम से बहुत ही चतुराई भरे शब्दों में श्री राजेन टोडरिया जी ने अपनी बात कही है, वे जानते है किन अवसरों पर किन मुद्दों को हवा दी जानी चाहिये …और उससे कैसे फायदे लिये जाने है l राजेन जी को दूर की चीजें बहुत फायदेमंद लगती है…..उन्होंने आपके माध्यम से बाताया कि उनके पास उत्तराखण्ड मुक्त विश्विद्यालय के कुलपति द्वारा बरती जा रही अनियमितता से सम्बन्धित पुख्ता कागजात हैं, तो राजेन जी अब तक कोर्ट क्यों नहीं गये ? क्या टोडरिया जी अपने आप को राज्य प्रशासन या न्यायपालिका से भी बड़ा मानने लग गये है ? या राज्य के इन संस्थानों पर से भी भरोषा खत्म हो गया या इनमें भी वे बहारी-पहाड़ी ढूँढ रहे थे ? एक भरत झुनझुनवाला को बेइज्जत करके अपने आप को बड़ा तीस मारखां समझने लगे है l बाहरी पहाड़ी का राग अलाप कर क्या साबित करना चाहते है राजेन जी ?

    अगर पहाड़ीवाद इतना ही सर पर सवार है तो फिर अपने घर से जिस शहर में ये रहते है वहाँ से शुरुआत करते ? जब एक योग्य पहाड़ी आईएएस अधिकारी को राज्य प्रशासन के सर्वोच्च पद से वंचित किया जा रहा था, और वह अपने साथ हुए अन्याय को गला फाड़ फाड कर राज्य के हर अखबार और टीवी मीडिया को बता रहा था, तब क्या टोडरिया जी का पहादीवाद भांग खाकर सो रहा था ? तब इनका पहाड़ीवाद और पहाड़ प्रेम कहाँ चला गया था ? तब क्यों नहीं उन लोगो के मुँह कालिख पोती जो एक बाहरी व्यक्ति को प्रमुख सचिव बनाने का खेल, खेल रहे थे ?
    एक निरीह, अक्षम और वृद्ध आदमी को घेर कर मारपीट करने वालो को खुलेआम सम्मनित करना और बड़ी बहादुरी से उसे भुनाना, इस प्रकार की हरकतों से उत्तराखण्ड के समाज को क्या सन्देश देना चाहते है ?

    उत्तराखण्ड मुक्त विश्विद्यालय में जो अनियमितताएं हो रही है या अन्य विश्विद्यालयों में जो अनियमितताएं हो रही है, उनका भान हमें भी है और सीमीत संसाधनों में इसके विरुद्ध एक जागरूक नागरिक द्वारा जो उचित कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए, मेरे अलावा और बहुत से जागरूक लोग उसकी तैयारी भी कर रहे हैं, लेकिन हम हल्द्वानी निवासी इस तरह का कोई काम नहीं करना चाहते जिससे राज्य का माहौल खराब हो और ना ही हम इस तरह के लोगो का समर्थन ही करते है…..ना दिल से ना दिमाग से…..अपनी टूटी-फूटी लेखनी से तो कतई नहीं l

    जो राग टोडरिया जी अलाप रहे है यही राग अगर उन राज्यों के लोगो ने भी अलापना शुरू कर दिया जहाँ हमारे प्रदेश के भाई लोग रोजी रोटी कमाने को गये है, तो देश के विभन्न राज्यों में रह रहे लगभग १ करोड़ प्रवासियों को संभाल पाओगे इस राज्य में ?

    क्या उत्तर पूर्व के हालत आप नहीं देख रहे हो……आप उन हालातो से अनजान तो कतई नहीं हो सकते, फिर इस तरह की स्टोरी से आप क्या साबित करना चाहते है ?

    आज से पहले तक मैं मानता था कि आप एक निष्पक्ष समाचार पोर्टल चलाते है, लेकिन आप एक दकियानुसी और उन्मादी सोच को इस तरह प्रचारित करेंगे इसका भान न था. ……..

    उम्मीद करता हूँ पाठकों को आपके पोर्टल पर भविष्य में इस तरह के उन्मादी पोस्ट के बजाय कुछ सकारात्मक और रचनातमक पढ़ने को मिलेगा……

    • Anjali Mehra Reply

      August 21, 2012 at 11:55 PM

      राजन जी को मैं बहुत पहले से पढ़ती आ रही हूँ..
      इनके मुद्दे जैसे भी हों पर उसमे कहीं न कहीं मैदानी-पहाड़ी वाद जरुर होता है..
      मैं भी उत्तराखंडी हूँ..शरीर से भी और आत्मा से भी…
      पर मैं दो साल से दिल्ली में जॉब कर रही हूँ….मेरे जैसे न जाने कितने लाखों उत्तराखंडी दिल्ली,मुम्बई,गुजरात,पंजाब आदि जगह नोकरी कर रहे हैं….
      अब हम लोग शायद तभी वापस आयेंगे जब यहाँ पहाड़ी-मैदानी करके हमको यहाँ से भगाया न जाये…
      आज देश कितने बड़े खतरे से गुजर रहा है..अगर आज भी हम लोग एक नहीं हुवे तो…न ये देश अपना रहेगा न ये प्रदेश..
      दूसरा आजकल बरसात से उत्तराखंड में भरी तबाही हो रही है…इसलिए ये बांधों को लेकर चुप हैं…नहीं तो इनकी नजर में विकास तभी होगा जब बांध बनेंगे…

  2. prayag pande Reply

    August 22, 2012 at 10:26 AM

    मित्रवर , श्रीमान जोशी जी ! आपकी प्राथमिकताओं में पहाड़ और पहाड़ के आम लोगों के दुःख – दर्द प्रमुखता के साथ शामिल हैं , इसमें कोई दो राय नहीं है | आज पहाड़ के भीतर अनगिनत लोग पहाड़ की समस्याओं को अपने – अपने तरीकों से उनके पास उपलब्ध मंच और संसाधनों के अनुसार उठा रहे हैं और लड़ रहे हैं | मैं, ऐसे सभी लोगों का सम्मान करता हूँ | किसी को कमतर या श्रेष्ट मानना या बताना मेरे बूते से बाहर है | मेरी दृष्टि में पहाड़ के लिए चिंतित और पहाड़ हितैषी सभी लोगों के प्रति सम्मान और श्रद्धा है | लिहाजा , पहाड़ और पहाड़वासियों के व्यापक हितों के लिए अपने – अपने तरीकों से लड़ रहे सभी पर्वतापुत्रों को नमन करता हूँ | इसके साथ ही पिछले कई वर्षों से मेरे मन – मानस को कचोट रहे कुछ सवाल भी यहाँ पर प्रस्तुत करने की जुर्रत कर रहा हूँ |
    दरअसल बात यह है कि पत्रकारिता के विद्यार्थी के २८-२९ सालों के बाद प्रौढ़ावस्था की दहलीज में जाकर मुझे भी चीजों की मामूली परख होने लगी है | आम लोगों के बीच वैचारिक प्रतिबद्धता का लवादा ओडे और व्यवस्था परिवर्तन का झंडा उठाए लोग कई मौकों पर परदे के पीछे सत्ता के सबसे बड़े चाटुकार की भूमिका में नजर आए | इनकी निष्ठाएं और वैचारिक प्रतिबद्धता सुविधानुसार अक्सर बदलती दिखाई देती है | यही कारण है कि आज पहाड़ के भीतर भा.ज.पा. और कांग्रेस के मुकाबले के लिए कोई तीसरा सियासी विकल्प नहीं उभर सका है |
    यह सच है कि पहाड़ के भीतर बाँधों का निर्माण एक ज्वलंत मुद्दा था और है | लेकिन पहाड़ और यहाँ के पर्यावरण को महज बाधों से ही खतरा नहीं है | और भी इससे बड़े खतरे हैं |मसलन पहाड़ से बढ़ता पलायन और यहाँ जमीनों के बिकने का तेज होता सिलसिला | इस निर्विवाद सत्य से कौन नावाकिफ है कि १९८० के दशक के बाद कुमांऊ में , खासकर नैनीताल जिले की रामगढ़ फल पट्टी में जमीनों के बिकने का सिलसिला प्रारम्भ हुआ था | अलग राज्य बनने के बाद यह प्रक्रिया और तेज हो गई | जमीनों के दलाल रातों – रात मालामाल होते चले गए और हो रहे हैं | इस राज्य में आज लोकतंत्र के सभी स्तंभों में इन जमीन दलालों की सबसे मजबूत पैंठ है | इन्हें सियासी दलों के बड़े नेताओं का संरक्षण हासिल है | जमीन लाबी पूरे राज्य की सियासत को संचालित कर रही है | जमीनों के बिकने का सिलसिला दिन प्रति दिन तेज होता जा रहा है | नतीजन आज पहाड़ का समूचा सामाजिक , सांस्कृतिक वातावरण विकृत हो गया है | पहाड़ और यहाँ के निवासियों की अस्मिता खतरे में है | पहाड़ में सभी प्रकार के अपराध बढ़ रहे हैं | प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट हो रही है | पहाड़ के स्थापत्य और कलात्मक एतिहासिक वस्तुओं और वन्य उपज की जमकर तस्करी हो रही है | लेकिन सवाल यह है कि ऐसे हालातों का जनक कौन लोग हैं |जाहिर है -पहाड़ के सियासी हालत इस सबके लिए जिम्मेदार हैं |सियासत नहीं चाहती कि पहाड़ में ऐसे हालत बनें कि यहाँ के लोगों को पलायन के लिए मजबूर न होना पड़े |पहाड़ में बेहतर जीवन यापन की क्षीण होती सम्भावनाओं के मद्देनजर लोग अलाभकारी कृषि भूमि को बेचने के लिए मजबूर कर दिए गए हैं |जमीन के दलालों की बन आई है |साथ में उनके आका नेता और अफसरों की भी |
    दूसरा सवाल यह है कि पहाड़ की दुर्दशा को लेकर कई दशकों से दुबले हुए जा रहे हैं कतिपय प्रगतिशील विचारधारा के झंडावरदारों की जुवान इन मुद्दों पर क्यों खामोश है ?| जल , जंगल और जमीन के बहाने अपनी सियासी रोटियां सकने वालों से पूछा जाना चाहिए कि आज पहाड़ की इन तीनों प्राकृतिक संसाधनों की असली हालत क्या है ?| आज तक किसी संस्था या पहाड़ हितैषी व्यक्ति अथवा संगठन ने पहाड़ के जल , जंगल और जमीन का कोई अध्ययन किया है |
    यह कटु सत्य है कि पहाड़ के माँ – बाप पिछले कई दशकों से धान की फसल बो रहे हैं | धान की पौंध कहीं और तैयार की जाती है ,उसे रोपा कहीं और जाता है | जहाँ पौंध रोपी गई , वहां धान पैदा होता है |.पौंध तैयार करने वाले के हाथ कुछ नहीं आता | उन्हें तो उस पौंध को बढते और धान की सुन्दर बालियों से लहलहाते देख पाना भी नसीब नहीं होता | यह पहाड़ और पहाड़ियों का दुर्भाग्य है | आज उत्तराखंड भा.ज.पा. और कांग्रेस के लिए महज एक खुला चारागाह बन कर रह गया है | इस राज्य के मुख्यमंत्री अपने – अपने आलाकमानों के संतरी मात्र हैं | इनका एकमात्र काम अपने आलाकमानों को खुश रखना है | उत्तराखंड के बुनियादी मसले और यहाँ की आम जनता की दुख – तकलीफों से किसी भी दल के किसी भी नेता और संगठन को कोई सरोकार नहीं है | सब लोग अपनी – अपनी दुकानें चला रहे हैं |
    आज पहाड़ के पर्यावरण के साथ पहाड़ के लोग और उनकी संस्कृति को बचाने की जरूरत है | पहाड़ के वाशिंदों के बुनियादी हक़ – हकूकों की हिफाजत किये बिना फकत पर्यावरण की बात करना बेमानी है |

  3. सलीम मलिक Reply

    August 23, 2012 at 9:27 AM

    कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के सवाल पर। कभी क्षेत्रवाद के नाम पर तो कभी लिंग-भेद करके……, जिनहे अपनी दलाली की दुकान चलानी होती हे वो किसी भी बहाने से चला ही लेते हें। लगे रहो तोड़रिया सर….. इतिहास पुरुष बनने के लिए छोटी-मोटी बाटो की परवाह न करना न ही होनी चाहिए।

  4. Dev Singh Rawat Reply

    August 23, 2012 at 10:21 AM

    वक्त के मोहरे है यहां सभी अण्णा हो या रामदेव

    वक्त के मोहरे है यहां सभी ं अण्णा हो या रामदेव
    सबको जमीन सुंघाता है सिकंदर हो या जार्ज बुश
    इतना न गिरो साथी जग में दो कदम चलने पर
    तुम्हारी तस्वीर ही तुमको उजाले में भी डराने लगे
    तुम्हारे शब्द ही तुम्हारी राह के कांटे बन कर डसे
    आरती जिनकी उतारने चले वे कहां थे कहां खडे
    स्वार्थ के पुतलों को न मशीहा बताओ तुम तो जरा
    यहां काल पल में इन पुतलों को बेनकाब करता है
    देवसिंह रावत
    (23 अगस्त 2012 प्रातः 9.47)

  5. Vishal Sharma Reply

    August 24, 2012 at 4:42 PM

    i grossly disapprove of this article and the contents… division of nationon one pretext or the other is a ploy against the nation !!!

  6. Bhoopal singh mehta Reply

    September 7, 2012 at 3:42 PM

    recent uttrakhand high court judgement regarding domicile was really very disturbing . it hammer hill people very badly. but in uttrakhand our people are not aware about the consquence of the order of high court. it really very sad that our political party did not give it much weight. i really appreciate your effort for fighting aganist this order.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>

*