आजादी के बार पहली बार अद्भुत संयोग- 15 अगस्त को नाग पंचमी

HIGH LIGHT; स्वतंत्रता दिवस के साथ नाग पंचमी; सिद्धि योग # श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी यानि 15 अगस्त को नाग पंचमी पर आजादी के बार पहली बार अद्भुत संयोग# स्वतंत्रता दिवस तथा गरुड़ दिवस भी है #काल सर्प योग से निजात पाने के लिए भी शुभ #नागराज को प्रसन्न करने से भगवान शंकर भी प्रसन्न #इस दिन गरुड़ की पूजा भी #इस दिन को गरुड़ पंचमी भी कहा जाता है # इसलिए इस दिन नाग देवता के साथ श्री हरि विष्णु के वाहन गरुड़ की भी पूजा करने का विधान है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार धरती का भार शेषनाग ने अपने सिर पर उठा रखा है # 2018 में 38 सालों बाद नाग पंचमी पर दुर्लभ संयोग बन रहा है। इस दिन सर्वार्थसिद्ध और रवि योग रहेगा  अबूझ मुहूर्त #राहु और केतु का जल्‍द राशि परिवर्तन ; अर्श से फ़र्श पर पटक देगा

# हिमालयायूके- हिमालय गौरव उत्‍तराखण्‍ड- Web & Print Media 

इस हफ्ते सूर्य का राशि परिवर्तन होने जा रहा है। 17 तारीख को सूर्य कर्क राशि से निकलकर अपनी राशि सिंह में आ जाएंगे। इससे राहु, बुध और सूर्य का त्रिग्रही योग समाप्त हो जाएगा। बुध सप्ताह के अंतिम दिन अपनी चाल बदलेंगे। ग्रहों की स्थिति में बदलाव का इस हफ्ते आपकी राशि पर क्या असर होगा

नाग पंचमी (Nag Panchami) का हिन्‍दू धर्म में विशेष महत्‍व है. इस दिन सांप या नाग की पूजा की जाती है और उन्‍हें दूध पिलाने का विधान है. मान्‍यताओं के अनुसार नाग पंचमी के दिन रुद्राभिषेक करने से कालसर्प दोष से मुक्ति मिल जाती है. हिन्‍दू कैलेंडर के अनुसार श्रावण यानी कि सावन मास के शुक्‍ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी का त्‍योहार मनाया जाता है. इस बार नाग पंचमी 15 अगस्‍त (15 August 2018) को मनाई जाएगी. नाग पंचमी के दिन सिद्धि योग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ये योग नक्षत्रों और ग्रहों की स्थिति के कारण बन बनता है और बहुत ही शुभ माना जाता है। इसी योग की वजह से नागपंचमी के दिन 5 राशियों पर विशेष प्रभाव पड रहा है।
” ऊँ कुरुकुल्ये हुं फट स्वाहा”!!

राहु और केतु परस्पर एक दूसरे से 180 अंश पर रहते हैं , यानी एक दूसरे से सप्तम भाव में. राहु और केतु को सर्प का प्रतीक मानते हैं, राहु को सर और केतु को पूँछ माना जाता है. सर्प के समान होने के कारण राहु और केतु से सम्बंधित समस्याओं के लिए नाग पंचमी का दिन सर्वश्रेष्ठ है. इस दिन दोपहर को राहु केतु सम्बन्धी उपाय करने से इनसे सम्बंधित समस्याएँ समाप्त होती हैं. इस बार नागपंचमी का पर्व 15 अगस्त को है.

राहु को सर्प का मुख और केतु को उसकी पूंछ माना जाता है। जब भी समस्त ग्रह इन दोनों ग्रहों के मध्य में आते है तो वह कालसर्प योग कहलाता है। कालसर्प योग शुभ व अशुभ दोनों प्रकार के होते हैं। यह ग्रहों के योग पर निर्भर करता है।

http://himalayauk.org/rahu-ketu-change-position/ 

राहु और केतु का जल्‍द राशि परिवर्तन ; अर्श से फ़र्श पर पटक देगा

भविष्य पुराण के अनुसार, नागों को पंचमी तिथि बहुत प्रिय है. इस तिथि पर नागलोक में उत्सव मनाया जाता है. इस तिथि को जो भी व्यक्ति नागों को दूध से स्नान कराता है, उसके कुल को सांपों से भय नहीं रहता और वासुकि, तक्षक, कालिय, मणिभद्र, ऐरावत, धृतराष्ट्र, ककोंटक तथा धनंजय जैसे नाग उनकी रक्षा करते हैं.नाग पंचमी के दिन जमीन की खुदाई नहीं करनी चाहिए. नागपंचमी पर तुलसी का पौधा लगाएं और उसकी उपासना करें हिंदू पुराणों में नागों को पाताल लोक या फिर नाग लोक का स्‍वामी माना जाता है. नागपंचमी के दिन सर्पों की देवी मनसा देवी की विशेष पूजा की जाती है. दक्षिण भारत में हिमालय श्रृंखला के शिवालिक पर्वत पर मनसा देवी का विशाल मंदिर स्थित है. मान्‍यता है कि भगवान शिव के अंश से ही मनसा देवी की उत्‍पत्ति हुई थी. इन्‍हें नाग समुदाय की देवी और नागराज वासुकी की बहन भी माना जाता है. मान्‍यता है कि नागपंचमी के दिन मनसा देवी की आराधना करने से भक्‍तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और नाग दंश का भय दूर होता है.

हिन्‍दुओं में नाग को देवता की संज्ञा दी जाती है और उनकी पूजा के कई कारण हैं. दरअसल, नाग को आदि देव भगवान शिव शंकर के गले का हार और सृष्टि के पालनकर्ता श्री हरि विष्‍णु की शैय्या माना जाता है. इसके अलावा नागों का लोकजीवन से भी गहरा नाता है. सावन के महीने में जमकर वर्षा होती है जिस वजह से नाग जमीन के अंदर से निकलकर बाहर आ जाते हैं. ऐसे में माना जाता है कि अगर नाग देवता को दूध पिलाया जाए और उनकी पूजा-अर्चना की जाए तो वे किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं. यही नहीं कुंडली दोष को दूर करने के लिए भी इस दिन का विशेष महत्‍व है. ज्‍योतिष शास्‍त्र के अनुसार कुंडली में अगर काल सर्प दोष हो तो नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा और रुद्राभिषेक करना चाहिए. मान्‍यता है कि ऐसा करने से इस दोष से मुक्ति मिल जाती है.

कालिया नाग का थल तहसील में पिथौरागढ जनपद में अलौकिक मंदिर;
नाग पंचमी की पूजा को भगवान कृष्‍ण से भी जोड़कर देखा जाता है. लोक कथाओं के अनुसार भगवान कृष्‍ण के मामा ने उन्हें मारने के लिए कालिया नाम का नाग भेजा. एक दिन जब श्री कृष्ण अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे तो उनकी गेंद नदी में गिर गई. जब वे उसे लाने के लिए नदी में उतरे तो कालिया ने उन पर आक्रमण कर दिया. कृष्‍ण के आगे नाग की एक न चली. उसने भगवान श्री कृष्ण से माफी मांगते हुए वचन दिया कि वो गांव वालों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा और वहां से हमेशा-हमेशा के लिए चला जाएगा. कालिया नाग पर श्री कृष्ण की विजय को भी नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है.

सावन माह में भगवान शंकर के पूजन का अधिक महत्व माना जाता है। इस माह में लोग बढ़ चढ़कर शिव जी की पूजा में शामिल होते हैं। लेकिन सावन का माह हो या कोई अन्य त्योहार भोलेनाथ की अाराधना करने से पहले हर किसी को यह पता होना चाहिए कि आख़िर उन्हें देवाधिदेव महादेव क्यों कहा जाता है। जब हम इस बात पर गरहाई से सोच-विचार करेंगे, तब ही हम भगवान शंकर के सहज और सरल स्वभाव को समझ पाएंगे कि उनकी पूजा केवल स्थाई सुख के लिए ही नहीं बल्कि आंतरिक सुख के लिए की जाए तो श्रेष्ठ होता है। मस्त देवी-देवताओं में से सिर्फ भगवान शंकर ही ऐसे देवता हैं, जो अपने भक्तों को सिर पर बैठाते हैं। इसकी उदाहरण है भगवान का शिवलिंग स्वरूप। जिसके ऊपर जल, अक्षत, फूल और बिल्प पत्र आदि चढ़ाए जाते हैं।

शिव पुराण के अनुसार महादेव एक मात्र एेसे देव हैं जो थोड़े से जल और बेलपत्र आदि से प्रसन्न हो जाते हैं। कहा जाता है कि जल चढ़ाने का आशय मन की तरलता से भी लिया जाना चाहिए। महादेव के पुत्र भगवान गणेश भी इन्हीं गुणों की वजह से प्रथम देव बन गए। भारी-भरकम व्यक्तित्व के बावजूद उन्होंने अपना वाहन एक चूहे को बनाया। जबकि सामाजिक जीवन में भारी-भरकम ओहदे वाला व्यक्ति भारी-भरकम वाहन और काफिले के साथ आता जाता है। गणेश जी भी सिर्फ दूध चढ़ाने से प्रसन्न होते हैं। महादेव की अर्धांगिनी माता पार्वती भी स्तुति में दो अच्छे शब्द बोलने से ही प्रसन्न होती हैं। अमरकथा सुनाने की जब बारी आई, तो महादेव ने सब कुछ त्याग दिया। इसका निहतार्थ यही है कि रसमय जीवन के लिए त्याग भी जरूरी है। भौतिक वस्तुओं के संग्रह में प्रायः जीवन का रस रिक्त हो जाता है।

वाराणसी, काशी विश्‍वनाथ मंदिर
पिछले कई हजारों से वाराणसी में स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। वाराणसी के इस मंदिर को देखने और भगवान शिव के दर्शन करने के लिए पर्यटक दूर-दूर से आते हैं।
2. उत्तराखंड, केदारनाथ मंदिर
केदारनाथ मंदिर भी भारत के सबसे प्रसिद्ध शिव मंदिरों में से एक हैं। मगर इस खास मंदिर के द्वार सिर्फ अप्रैल से लेकर नवंबर महीने में ही खोले जाते हैं। आपको बता दें कि यहां पर मौजूद शिवलिंग काफी प्राचीन है।
3. जम्मू कश्मीर, अमरनाथ गुफा
भारत के और भगवान शिव के मुख्य धार्मिक स्थलों में से एक अमरनाथ के दर्शन करने के लिए भी पर्यटक दूर-दूर से आते हैं।
4. ओड़ीसा, लिंगराज मंदिर
ओड़ीसा में स्थित भगवान शिव का लिंगराज मंदिर भी सबसे प्राचीन और खूबसूरत मंदिरों में से एक है। इस विशाल मंदिर को देखने और भगवान शिव के दर्शन करने के लिए टूरिस्ट सिर्फ देश से ही नहीं बल्कि विदेश से भी आते हैं।
5. कर्नाटक, मुरुदेश्वर शिव मंदिर
अरब सागर के तट पर स्थित इस मंदिर में भगवान शिव की दूसरी सबसे बड़ी मूर्ति स्थापित है। सुदंर और शांत वातावरण से घिरे इस मंदिर में एक बार आने के बाद आपका यहां से जाने का मन नहीं करेगा।
6. आंध्र प्रदेश , मल्लिकार्जुन
आंध्र प्रदेश के कुरनूल इलाके में स्थित भगवान शिव का यह मंदिर भी बहुत प्रचीन है। इस मंदिर में की गई तरह-तरह की नक्काशी टूरिस्ट को अपनी तरफ अट्रैक्ट करती है।
7. तमिलनाडु, रामेश्वरम
तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित शिव का यह मंदिर चारों धामों की यात्रा में से एक है। इसके अलावा यहां स्थापित शिवलिंग बारह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है।

सावन का आया भक्‍तों महीना है,
नाग पंचमी का त्‍योहार है,
जो दिल से बाबा का नाम जपे हरदम,
उसका होता हमेशा बेड़ापार है!!!
नाग पंचमी की शुभकामनाएं
Presented by- हिमालयायूके- हिमालय गौरव उत्‍तराखण्‍ड

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