मायावती में किसी तरह का आत्मविश्वास नहीं दिख रहा
अभय कुमार दुबे
चार चरणों में आधे से ज्यादा सीटों पर रिकॉर्ड मतदान करने के बावजूद ऐसा लग रहा है कि उत्तर प्रदेश के वोटर इस चुनाव में राजनीतिक अनिश्चितता का सामना करने के लिए अभिशप्त रहेंगे। लेकिन मतदाताओं को निराश नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रदेश के इस राजनीतिक दुर्भाग्य का जिम्मा उनका न हो कर उन राजनीतिक दलों का है जो इस निर्वाचन में सत्ता के लिए प्रतियोगिता कर रहे हैं। अभी तक मतदाताओं ने लोकतंत्र के प्रति अपनी बढ़ी हुई निष्ठाओं का ही प्रदर्शन किया है, पर राजनीतिक दलों को यह दिखाना अभी बाकी है कि वे देश के सबसे बड़े मतदातामंडल द्वारा स्थापित कसौटियों पर खरे उतरने के काबिल हैं। मुझे लगता है कि इस इम्तहान में फिलहाल हर राजनीतिक दल नाकाम है। मतदाता लोकतंत्र से जो चाहते हैं, वह उन्हें राजनीतिक दलों के जरिए ही मिलता है। अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है जिससे यह पता लगता हो कि इन दलों में वोटरों को वह देने की क्षमता है। चुनावी होड़ में जुटे चार प्रमुख राजनीतिक दलों की कारगुजारियों और उनके अनिवार्य नतीजों पर नजर डालने से यही स्थिति स्पष्ट होकर सामने आती है।
चारों राजनीतिक दलों में से किसी के पास भी मतदाताओं से कहने के लिए ऐसा कुछ नहीं है जो सकारात्मक हो। पांच साल तक बहुमत की हुकूमत करने के बाद बहुजन समाज पार्टी यह नहीं कह सकती कि उसके हाथ किसी भी तरह से बंधे हुए थे। बजाय इसके कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विकास का तखमीना लगाने वाले विशेषज्ञ मायावती के शासन को अच्छे नंबर देते, उन्हें भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप देने और अपनी ही नौकरशाही को खसोटने के आरोप का सामना करना पड़ रहा है। नेताओं और सरकारों पर भ्रष्टाचार के आरोप अक्सर लगते रहते हैं, पर मायावती पर लगने वाला आरोप खास तरह का है। कहा यह जा रहा है कि उनके मुख्यमंत्रित्व में एक ऐसी विकट प्रक्रिया को योजनाबद्ध तरीके से प्रोत्साहित किया गया जिसके कारण छोटे से लेकर बड़े स्तर के अफसरों को किसी एक जगह टिक कर काम करते रहने का भी ‘शुल्क’ अदा करना पड़ा। चूंकि अधिकारियों और मंत्रियों पर फंड के लिए लगातार दबाव रहा, इसलिए वे अपना ज्यादातर वक्त इसी फंड को जनता और व्यापारियों से वसूलने में लगाते रहे।
पूरा उत्तर प्रदेश ‘शुल्क’ की जुगाड़ करता रहा और पांच साल इसी में निकल गए। चूंकि ये आरोप चुनाव से तीन महीने पहले ही लगने शुरू हो गए थे, इसलिए इन्हीं का प्रभाव कम करने के लिए मायावती ने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की शिकायतों के आधार पर मंत्रिमंडल और प्रशासन की सफाई भी की। लेकिन, उनकी ये कोशिशें देर से की गई साबित हुईं। आज मतदान के चौथे दौर के बाद जब मायावती अपना खुद का वोट डाल चुकी हैं, मतदाताओं से संवाद करने की उनकी भाषा में किसी तरह का आत्मविश्वास नहीं दिख रहा है। उन्होंने मतदाताओं से यहां तक कहा है कि अगर आपने वोट डालने में गलती कर दी है तो फिर अपमान और गुंडागर्दी झेलने के लिए तैयार रहिए। क्या यह वक्तव्य नहीं बताता कि इस बार उन्हें अपने दलित मतदाताओं के रुझानों पर भी शक है? इन समस्याओं के बावजूद मायावती और बसपा के राजनीतिक प्रभाव को कम करके आंकना गलत होगा। बहुमत तो मिलने से रहा, पर उनकी पार्टी को स?मानजनक सीटें जरूर मिलेंगी। लेकिन उस सुनहरे अवसर को वे कहां से प्राप्त करेंगी जो पांच साल पहले प्रदेश की जनता ने ऐतिहासिक रूप से उन्हें थमाया था?
मायावती की इस नाकामी का सबसे ज्यादा लाभ प्रमुख प्रतिद्विंद्वी के रूप में समाजवादी पार्टी को मिल रहा है। समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पिछले पांच वर्षों में माया सरकार के खिलाफ सड़कों पर संघर्ष भी किया है। लेकिन नाकामी के आधार पर मिलने वाले नकारात्मक समर्थन से किसी नेता या पार्टी को नैतिक जनादेश नहीं मिलता। समाजवादी पार्टी कितनी भी संतुष्ट क्यों न दिखे, उसकी चुनावी मुहिम इस नकारात्मकता के फेर में फंसी हुई लगती है। सबसे पहले तो उसे अपने पिछले शासन की सफाई देनी पड़ती है जिसके कारण मायावती को कुल 46 फीसदी वोटों में ही पूर्ण बहुमत मिल गया था। इसके बाद उसे अपने फिसलते हुए अल्पसंख्यक जनाधार को थामने की कवायद करनी पड़ती है। उसे पता है कि यादव वोटों को छोड़ कर ऐसा कोई भी वोट नहीं है जिसे वह अपना वोट मानकर आश्वस्त हो सके। अगर चुनाव के बाद किसी तरह जोड़-तोड़ करके उसे सत्ता प्राप्त हो भी गई, तो उसे अपने गवर्नेंस संबंधी दृष्टिकोण और मुख्य सामुदायिक जनाधार के परे व्यापक समाज से अपने संबंधों के पुनॢवन्यास पर खास ध्यान देना होगा। वरना जो लोग उसे नाक बंद करके वोट दे चुके हैं या देने जा रहे हैं, उनकी तरफ से उसे बहुत जल्दी उतने ही कड़े विरोध का सामना करना पड़ेगा। केवल एक ही बात इस पार्टी क लिए उम्मीद जगाती है कि उसके भीतर नेतृत्व की बागडोर अखिलेश यादव के रूप में नए तरीके से सोचने और नियोजन करने वाले हाथों में जा चुकी है। यह पीढ़ी इस स्थापित राजनीतिक शक्ति के साथ जुड़ी नकारात्मकताओं का शमन कर सकती है, पर यह होते हुए देखने के लिए हमें इस चुनाव के परे जा कर इंतजार करना होगा।
कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव को 2014 के लोकसभा चुनाव की पेशबंदी के तौर पर देख रही हैं। दोनों को पता है कि वे सत्ता में नहीं आ सकतीं। दरअसल, दोनों अपने-अपने खोए हुए जनाधार और प्रतिष्ठा की तलाश में हैं। उत्तर प्रदेश उनके लिए पिछले कई वर्षों से एक बहुत बड़ा गड्ढा है जिसमें गिर जाने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रभुत्व का क्षय हो जाता है। दिक्कत यह है कि दोनों ही पार्टियों के पास स्थानीय स्तर पर दिखाने लायक नेतृत्व का भी अभाव है। राहुल गांधी ने अपनी कोशिशों से कांग्रेस को धक्का मार कर भाजपा से आगे जरूर कर दिया है, पर इसका मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि स्थानीय नेतृत्व की कमी की भरपाई हो गई है। न कांग्रेस के पास संभावित मुख्यमंत्री है और न ही भाजपा के पास। यह चुनाव इन दोनों पाॢटयों के लिए ज्यादा से ज्यादा यह बता सकता है कि लोकसभा के चुनाव में वे किन समुदायों से समर्थन की अपेक्षा कर सकती हैं। कांग्रेस समाजवादी पार्टी से मुसलमान, भाजपा से द्विज और बसपा से गैर जाटव दलित वोट छीनने की उम्मीद रखती है। इसी तरह भाजपा एक बार फिर अपने द्विज वोटों को बचाती हुई गैरयादव पिछड़े वोटों के साथ संबंध सुधारना चाहती है।
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