25 से 69 वर्ष उम्र वाले लोगों में करीब 25 प्रतिशत मौत हृदय रोग के कारण

ईश्वर ने हमारे दिल में सैकड़ों कैपीलरी बनायी हैं जो मुख्य धमनियों के ब्लॉक होने पर काम करने लगती हैं लेकिन ये केवल खिलाड़ियों में ही खुली रहती हैं क्योंकि लगातार कसरत करने से कैपीलरी अच्छी तरह विकसित हो जाती हैं।  www.himalayauk.org (Leading Newsportal). 

   दिल की बीमारी होने के बाद अमूमन डॉक्टर एंजियोप्लास्टी करवाने की सलाह देते हैं, लेकिन ध्यान रहे कि इसमें खूब लूट मची हुई है और ऐसे मरीजों को बुरी तरह से ठगा जा रहा है. एक अंग्रेजी अखबार का कहना है कि एंजियोप्लास्टी के लिए इस्तेमाल होने वाले स्टेंट की कीमत कुल मिलाकर 40,000 रुपये होती है. इसमें कस्‍टम और सभी तरह के शुल्क शामिल हैं. यह इससे भी कम यानी 20,000 रुपये में भी मिल सकता है, लेकिन अस्पताल और कई डॉक्टर इसके लिए मरीजों से सवा लाख रुपये तक वसूल लेते हैं.

तेजी से बदल रहे लाइफ स्टाइल के कारण हृदय रोगों में भी लगातार वृद्धि हो रही है। देश में हर साल 18 से 20 प्रतिशत लोग हृदय रोग के कारण मौत के मुंह में जा रहे है।  हृदय को रक्त की आपूर्ति करने वाली धमनियां ब्लाक होने के बाद संकुचित हो जाती हैं तो कोरोनरी धमनियों में स्काफोल्ड को कैथेटर आधारित प्रक्रिया के माध्यम से लगाया जाता है। जिसके तहत बंद धमनी तक पहुंचने के लिए जांघ या कलाई में एक छोटा चीरा लगाया जाता है।   भारत में हर साल दो लाख एंजियोप्लास्टी की जाती है और हर साल इसमें 20 प्रतिशत की दर से वृद्धि हो रही है। जिसमें तीन लाख से अधिक स्टेट प्रत्यारोपित किए जाते है। सर्वे के आधार पर बताया कि भारत में होने वाली सभी मौतों में 19 प्रतिशत के लिए हृदय रोग जिम्मेदार है। अध्ययन में पाया गया है कि 25 से 69 वर्ष उम्र वाले लोगों में करीब 25 प्रतिशत मौत हृदय रोग के कारण होती है। दुनिया भर के हृदय रोगियों में से करीब 60 फीसद भारत में है। अनुवांशिक गड़बड़ी और धूम्रपान, शारीरिक श्रम का अभाव, उच्च रक्तचाप और उच्च कोलेस्ट्राल जैसे जोखिम कारक लोगों में हृदय रोगों के लिए अधिक खतरा पैदा करते है।

तेल के स्थान पर पानी से स्वादिष्ट भोजन बनाया जाता है क्योंकि स्वाद तेल का नहीं मसालों का होता है। कोई भी तेल हमारे दिल के लिए ठीक नहीं है। बादाम एवं काजू में 50 प्रतिशत तेल होता है, इसलिए दिल के मरीजों को इससे दूरी बनाये रहने की सलाह दी जाती है। सभी प्रकार के एनिमल प्रोडक्ट दिल के लिए हानिकारक हैं और इसमें दूध भी शामिल है। लेकिन एक गिलास डबल टोंड दूध लिया जा सकता है। आनुवंशिक कारणों से भी खून में ज्यादा कोलेस्ट्राल बनने लगता है और उम्र बढ़ने के साथ धमनियों में 20 से 30 प्रतिशत चर्बी जमना आम बात है। समय से परीक्षण कराना हर हाल में सही बचाव है। डॉ छाजेड़ ने मजाकिया लहजे में कहा, आपने क्या जानवरों को तेल खरीदते देखा है? तेल के बिना क्या वे मर रहे हैं या हम तेल का इस्तेमाल करके स्वस्थ हो रहे हैं? ईश्वर ने हमें पहले बनाया है कि तेल की फैक्टरियां पहले लगीं हैं? हम जो संतुलित भोजन लेते हैं उसमें उतना तेल होता है जितना हमारे शरीर के लिए आवश्यक है। दिल, मधुमेह, उच्च रक्तताप, जीरो तेल भोजन आदि विषयों पर सैकड़ों पुस्तकें लिखने वाले डॉ छाजेड़ ने कहा कि उनका उद्देश्य हर घर में ‘दिल का वैक्सीन’यानी दिल के बारे जागरुकता फैलाना है और इसके लिए 38 मिनट की एक डाक्यूमेंट्री भी बनायी है।

डॉ छाजेड़ ने कहा, हम देश में जगह-जगह तीन दिनों का शिविर लगाकर लोगों को दिल और जीरो तेल वाले भोजन के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं और उत्तम जीवन शैली से स्वस्थ दिल के साथ जीने की कला सिखाते हैं। उन्होंने कहा कि ईश्वर ने हमारे दिल में सैकड़ों कैपीलरी बनायी हैं जो मुख्य धमनियों के ब्लॉक होने पर काम करने लगती हैं लेकिन ये केवल खिलाड़ियों में ही खुली रहती हैं क्योंकि लगातार कसरत करने से कैपीलरी अच्छी तरह विकसित हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि हम जरूरत पड़ने पर छाती को चीर कर नहीं बल्कि बाहर से ही मशीन लगाकर नेचुरल बाईपास सर्जरी करते हैं। इसे विज्ञान की भाषा में ‘नुमैटिक एसिस्टेंड नेचुरल बाईपास ’कहा जाता है। इसमें मशीन से कोरोनरी चैनल्स में रक्त के संचार को कृतिम रूप से बढ़ाया जाता है। इसे दिल के साथ सिंक्रोनाइज करके सीधे कोरोनरी आर्टरीज रूट में दबाव बढ़ाया जाता है। इस दौरान पैरेलल आर्टरी/कैपीलरी सिस्टम को खोलने लगता है और हृदय की मांसपेशियों को ज्यादा खून की आपूर्ति करता है। अमेरिका में करीब 200 मेडिकल केन्द्रों में इसका उपयोग हो रहा है। चीन में बाईपास सर्जरी और एंजियोप्लास्टी की जगह नेचुरल सर्जरी को प्राथमिकता दी जा रही है। भारत में भी बड़े अस्पतालों में यह मशीन उपलब्ध है लेकिन इसका प्रयोग कम किया जाता। डॉ छाजेड़ ने कहा कि हमारे यहां एंजियोप्लास्टी और बाईपास सर्जरी को ही प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि यह प्रक्रिया महंगी है। उन्होंने कहा कि साओल के रेफरेंस से देश के किसी भी कोने में सीटी एंजियोग्राफी छह से सात हजार रूपये में करायी जा सकती है। 

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के कार्डियोलॉजी विमाग के पूर्व असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ़ बिमल छाजेड़ ने दावा किया कि समय रहते ‘दिल का हाल’ जान लेने और सही जीवन शैली एवं खानपान पर नियंत्रण रखकर हार्ट अटैक के खतरे को 90 प्रतिशत तक टाला जा सकता है। डॉ़ छाजेड़ ने कहा, दिल की धमनियों पर खतरनाक परतों का जमना उसी समय से शुरू होने लगता है जब हमारा शारीरिक विकास बंद हो जाता है। यानी 18-20 की उम्र के बाद हम जो भी खाते हैं उसका सीधा संबंध दिल से जुड़ जाता है। अगर हम वसायुक्त यानी तला हुआ भोज्य पदार्थ और जंक फूड पसंद करते हैं तो यह मानकर चलें की उम्र बढ़ने के साथ-साथ दिल की धमनियों पर दोनों वसा-कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स की परतें जमने लगती हैं। ऐसी धमनियों की तुलना हम अपनी रसोई की चिमनी और एग्जॉस्ट फैन से कर सकते हैं। 

उन्होंने कहा कि खिलाड़ी, शारीरिक मेहनत करने वाले और नियमित योग एवं अन्य तरह के व्यायाम करने वाले लोगों में यह शिकायत कम होती क्योंकि जीवन शैली के अनुरूप ही भोजन में कार्बोहाइड्रेट एवं प्रोटीन की मात्रा तय होती है। डॉ़ छाजेड़ ने कहा, आम तौर पर 80 प्रतिशत तक ब्लॉकेज हो जाने के बाद ही इसके बारे में पता चल पाता है क्योंकि 20 प्रतिशत तक ब्लॉकेज बचा रहता है तो हमें चलने में कोई तकलीफ नहीं होती है और 10 प्रतिशत ब्लॉकेज खुला रहने पर बैठे रहने के दौरान किसी प्रकार की समस्या नहीं होती है। दौड़ने की स्थिति में 30 प्रतिशत ब्लॉकेज खुला रहना आवश्यक है। लेकिन सभी लोगों की धमनियों की झिल्ली की बनावट एक जैसी नहीं होती इसलिए कई लोग 60 प्रतिशत तक के ब्लॉकेज में ही हार्टअटैक के शिकार हो सकते हैं क्योंकि ब्लॉकेज की कमजोर झिल्लियां फट जाती हैं। डॉ छाजेड़ ने कहा कि 80 प्रतिशत तक के ब्लॉकेज में सभी आवश्यक जांच सामान्य आती हैं क्योंकि खून के बहाव में किसी तरह की रुकावट नहीं आती लेकिन सब कुछ ‘सामान्य’रहने के बीच 100 प्रतिशत का ब्लॉकेज कभी भी अपना ‘खेल’ खेल जाता है और हम सभी परीक्षणों को दोष देते हैं। इसलिए ऐसी स्थिति आने ही क्यों दी जाये। क्यों न 30 वर्ष की आयु में ही एक बार अपने दिल का हाल जान लिया जाये, वह भी सुरक्षित तरीके से।

उन्होंने कहा कि एनजाइना यानी चलने-फिरने एवं दौड़ने में छाती में दर्द होने पर लोग डॉक्टर की शरण में जाते हैं। ब्लॉकेज का पता लगाने के लिए डॉक्टर एंजियोग्राफी की सलाह देते हैं जो एक खतरनाक और खर्चीली प्रक्रिया है। कई बार मरीज की इसमें जान भी चली जाती है इसलिए इस प्रक्रिया को करने से पहले हस्ताक्षर भी करवा लिया जाता है। डॉ़ छाजेड़ ने कहा, मैं शरीर के साथ चीर-फाड़ करने के पक्ष में नहीं हूं क्योंकि हमारे पास बढ़िया विकल्प मौजूद है। सीटी एंजियोग्रापी से दो मिनट के अंदर में ब्लॉकेज के बारे में जाना जा सकता है और वह भी सटीक ढंग से। आज कल बेहद उन्नत किस्म की मशीन आ गयी है जो एक सेकेंड में दिल के अंदर की सैकड़ों फोटो ले सकती है। लेकिन कुछ‘स्वार्थी तत्वों ’की वजह से यह मशीन लोकप्रिय नहीं हो पा रही है । उन्होंने कहा कि इसके नतीजों के बारे में भ्रामक जानकारी फैलाकर मरीजों को एक तरह से लूटा जा रहा है और उनकी जिन्दगी से खिलवाड़ किया जा रहा है। कई मामलों में इस प्रक्रिया में मरीज को डरा दिया जाता है और कहा जाता है कि 80 प्रतिशत ब्लॉकेज है और एंजियोप्लास्टी नहीं कराने पर जान का खतरा है। परिजन इतने डरे होते हैं कि वे इसके लिए राजी हो जाते हैं और मरीज के दिल में स्टेंट डाल दिया जाता है। चूंकि हमारा शरीर बाहर की चीज को आसानी से स्वीकार नहीं करता है इसलिए इस स्टेंट की सफलता की कोई गारंटी नहीं हाेती और इस पर भी जल्द ही ब्लॉकेज बनने लगता है। यह सिलसिला मल्टी स्टेंट डालने तक पहुंच सकता है। कई बार ऐसे लोगों की बाईपास सर्जरी तक करनी पड़ती और यह भी बेहद खतरनाक और कीमती प्रक्रिया है।

 डॉ छाजेड़ ने कहा, यह गंभीर विषय है कि एक दो हजार रुपये की कीमत वाले कलम के स्प्रिंग के बारबर स्टेंट के लिए लाखों रूपये वसूले जाते हैं। हमारे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने स्टेंट बनाया था जिसकी कीमत करीब छह हजार है लेकिन विदेशी कंपनियों के हस्तक्षेप और भारी कमीशन के कारण‘अब्दुल स्टेंट’प्रचलन में नहीं है। समय रहते दिल की सही जानकारी नहीं होने के कारण हर वर्ष लाखों लोगों की जान जा रही है। आम लोगों को दिल की वास्तविक स्थिति से अवगत कराने के लिए मुहिम छेड़ने वाले डॉ़ छाजेड़ ने वर्ष 1995 में एम्स से इस्तीफा देकर साइंस एडं आर्ट ऑफ लिविंग (साओल) केन्द्र खोला जो देश भर में 52 स्थानों पर चल रहा है। इन केन्द्रों में मेडिकल साइंस की अच्छाइयों को अपना कर और जीवन शैली में बदलाव लाकर लोगों का इलाज किया जाता है। उन्होंने कहा, उस स्थिति में जहां ब्लॉकेज 80-90 प्रतिशत होता है ऐसे में दवाइयों से इसे नियंत्रित किया जाता है और खान-पान के तरीके को बदल दिया जाता है । यानी भोजन से चर्बी और तेल को बिलकुल हटा दिया जाता है। योग, प्राणायाम एवं अन्य प्रकार की गतिविधियां करायी जाती हैं।

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