भाजपा शासित राज्‍यो में बढती एंटी इनकंबेंसी की चुनौती -बीजेपी दबाव में

मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का गृह राज्य होने के कारण बीजेपी दबाव में #गुजरात विधानसभा चुनाव दो चरणों में कराए जाएंगे। पहले चरण का चुनाव 9 दिसंबर जबकि दूसरे चरण का चुनाव 14 दिसंबर को होगा। पिछले 22 साल से गुजरात की सत्ता पर काबिज भाजपा एक बार फिर जनादेश लेने के लिए नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जनता के सामने है वहीं काग्रेस सत्ता के सूखे को खत्म करने के लिए राहुल गांधी के नेतृत्व में बिगुल फूंक चुकी है। 2012 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को 115 सीटों पर जीत मिली जबकि कांग्रेस को 61 सीटों से संतोष करना पड़ा था। 2017 गुजरात विधानसभा चुनाव राहुल आक्रामक तेवर अपनाएं हुए हैं। वहीं पीएम मोदी भी एक के बाद एक दनादन दौरे करके चुनावी मैदान में ताल ठोंक चुके हैं। 

 Nobody is happy with the ruling party… there are no jobs for youth, farmers are crying, says the young Patidar leader 

 अगर बीजेपी इस बार 90-95 सीटों पर सिमट जाए, तब भी ये भाजपा की हार तथा कांग्रेस की जीत होगी। भाजपा के गढ में इतने जल्‍दी यह हालात होना किसी दूरगामी संकेत की ओर इशारा है,   मिशन गुजरात पर भरूच पहुंचे राहुल गांधी ने जीएसटी पर फिर मोदी सरकार को घेरा….कहा ये टैक्स गब्बर सिंह जैसा है जो गरीबों की पसीने की कमाई को लूट लेता है….इसलिए इसका नाम गब्बर सिंह टैक्स रखा है…नोटबंदी पर भी राहुल ने किया मोदी सरकार पर प्रहार – कहा ….देश रो रहा है और मोदी सरकार 8 तारीख को जश्न की तैयारी में जुटी है. 

 गुजरात का चुनावी रण अब अपने आखिरी दौर में चल रहा है. आज पहले चरण के लिए चुनाव प्रसार थम जाएगा. राजनीतिक दल अपनी जीत को सुनिश्चित करने के लिए पूरा जोर लगा रही हैं. कांग्रेस ने इस बार आक्रामक रुख में प्रचार किया है, राहुल गांधी पूरे एक्शन में दिख रहे हैं. तो वहीं राज्य में 22 साल से सत्ता में विराजमान भारतीय जनता पार्टी के सामने एंटी इनकंबेंसी को दूर करने की चुनौती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का गृह राज्य होने के कारण बीजेपी दबाव में भी है. 

प्रायोजित ओपिनियन पोल सर्वे सच्चाई में परिवर्तित हो पाएंगे.

 प्रायोजित ओपिनियन पोल में बीजेपी को बढ़त दिखाई जा रही है. लेकिन बीजेपी के लिए खतरे की बात यह है कि कांग्रेस की सीटों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. और बीजेपी का जीत का आंकड़ा कम हो रहा है. सर्वे दिखा रहे हैं कि बीजेपी अपना गढ़ बचाने में कामयाब तो होगी, लेकिन उसे कई सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है. चूंकि हर सर्वे में लगातार बीजेपी की सीटें घट रही हैं और कांग्रेस की बढ़ रही हैं. बीजेपी के लिए हार्दिक पटेल का फैक्टर भी भारी पड़ सकता है क्योंकि हार्दिक की हर रैली में लगातार भीड़ उमड़ रही है. देखना होगा प्रायोजित ओपिनियन पोल सर्वे सच्चाई में परिवर्तित हो पाएंगे.

 

गुजरात में 9 दिसंबर को पहले चरण के वोट जाएंगे. इसके लिए चुनाव प्रचार आज गुरुवार की शाम को खत्म हो जाएगा. पिछले दो दशकों से गुजरात की सत्ता पर काबिज बीजेपी के लिए इस बार चुनाव में कई बड़ी चुनौतियों की सामना करना पड़ रहा है. अब इन चुनौतियों में यहां पहली बार इस्तेमाल हो रहे विकल्प ‘नोटा’ ने भी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं. हालांकि पार्टी इसे चुनौती मानने से इनकार कर रही है. गुजरात विधानसभा चुनाव में पहली बार नोटा (उपर्युक्त में से कोई नहीं) विकल्प उपलब्ध होने से राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुछ जातीय समूह और छोटे तथा मध्यम व्यवसायी भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं जो जीएसटी को लेकर भाजपा से नाखुश हैं. बहरहाल, भाजपा ने यह कहते हुए इन विचारों को खारिज कर दिया कि नोटा खेल बिगाड़ सकता है, क्योंकि पार्टी को अपनी नीतियों की लोकप्रिय अपील पर विश्वास है जो हाल के पंचायत चुनाव परिणामों में दिखा.
वर्ष 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में ईवीएम मशीनों में नोटा का विकल्प नहीं था. बहरहाल इस बार मतदाता इसका इस्तेमाल कर सकेंगे. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनावों में जब नोटा का विकल्प दिया गया तो गुजरात में चार लाख, 20 हजार से ज्यादा मतदाताओं ने इसका इस्तेमाल किया. www.himalayauk.org (HIMALAYA GAURAV UTTRAKHAND) Execlusive 

 

 भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पीएम मोदी इस बार सीएम का चेहरा नहीं है और अब तक एक मुश्त वोट देते आ रहे पाटीदारों के तेवर तीखे हैं। कई जगह पिटाई की खबरों के बाद दलित सामाज भी नाराज़ है। चौथी चुनौती है तीन साल में तीन सीएम की। पहले मोदी फिर आनंदी बेन पटेल और अब विजय रूपाणी। पाचंवी चुनौती है, पिछले 22 साल का एंटी इनकंबेंसी फैक्टर, इसके साथ साथ पटेल, दलित और अल्पसंख्यक अगर एकजुट हो जाते हैं तो चुनौती बढ़ जाएगी और सबसे बड़ी चुनौती जीएसटी की है जिससे व्यापारी वर्ग नाराज़ हैं।

 

विश्लेषक ने कह कि उस वक्त कांग्रेस अपने सबसे खराब राजनीतिक दौर से गुजर रही थी और मध्य तथा पश्चित भारत में सत्ताविरोधी लहर थी. फिर भी 4.20 लाख मतदाताओं (गुजरात में) ने नोटा का इस्तेमाल किया. इस बार कुछ सामाजिक-आर्थिक वर्ग सत्तारूढ़ भाजपा से निराश है. कुछ जातियां भगवा दल का पुरजोर विरोध कर रही हैं जबकि छोटे और मध्यम स्तर के उद्योगों जैसे कुछ सेक्टर जीएसटी लागू करने के लिए इसकी काफी आलोचना कर रहे हैं. नोटा का विकल्प वे लोग अपना सकते हैं जिन्होंने पहले भजापा नेताओं का विरोध किया था. सत्तारूढ़ भाजपा ने दावा किया कि नोटा विकल्प से इस पर ज्यादा असर नहीं होगा और हाल के ग्राम पंचायत चुनावों में इसे काफी समर्थन मिला.
यह पूछने पर कि 2014 के आम चुनावों में चार लाख से ज्यादा मतदाताओं ने नोटा विकल्प अपनाया था तो नेता ने कहा कि 2014 के चुनावों में भाजपा का कुल वोट बढ़ा था. हाल में हुए ग्राम पंचायत चुनावों में भी भाजपा को मजबूत समर्थन दिखा. उन्होंने कहा, ‘‘मेरा मानना है कि नोटा से हमारा खेल खराब नहीं होगा. अगर कुछ मतदाता नोटा का इस्तेमाल करेंगे तो दोनों बड़ी पार्टियां प्रभावित होंगी न कि सिर्फ भाजपा.’’ बहरहाल नोटा के प्रति कांग्रेस ने अपना रूख बदला है, खासकर तब जब चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में 182 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी के लिए 78 सीटों पर जीत की संभावना बताई गई है. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘‘पहले नोटा से भाजपा की जीत का अंतर कम होने की संभावना थी. अब नोटा और कुछ गैर भाजपा और भाजपा विरोधी मतदाताओं के एकजुट होने से हम कुछ और सीटों पर जीत हासिल कर सकेंगे.’’

गुजरात के कई हिस्सों में मोदी का जादू फीका पड़ता दिख रहा है। खास तौर पर दक्षिण गुजरात और सौराष्ट्र में। औद्योगिक नगरी सूरत में नरेंद्र मोदी के लिए 2007 जैसा उत्साह नजर नहीं आ रहा। इसके अलावा गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में पानी का संकट इस बार मुख्य मुद्दा है। लोग पिछले 10 साल से कुछ नहीं किए जाने से मोदी सरकार से नाराज हैं। सौराष्ट्र क्षेत्र के शहरों और गांवों में रहने वाले बहुत लोगों का मानना है कि जल संकट के स्थायी समाधान को लेकर राज्य सरकार ने कुछ नहीं किया। राज्य के दूसरे हिस्सों में भी अमूमन ऐसी ही स्थिति है। अब गुजरात में मोदी के समर्थक नजर आते हैं या विरोधी। जबकि पहले मोदी के समर्थकों की तादाद नजर आती थी और हर कोई मोदी का गुणगान ही करता दिखाई देता था।  अब स्‍थिति बदल गयी है, लोग निराश है 

 अगर बीजेपी इस बार 90-95 सीटों पर सिमट जाए, तब भी ये भाजपा की हार तथा कांग्रेस की जीत होगी। भाजपा के गढ में इतने जल्‍दी यह हालात होना किसी दूरगामी संकेत की ओर इशारा है,  गुजरात जैसे हालात भाजपा शासित अन्‍य राज्‍यो के भी हो सकते है, जहां प्रादेशिक क्षत्रप कमजोर होने पर हालात कठिन होते जाते है,

 Nobody is happy with the ruling party… there are no jobs for youth, farmers are crying, says the young Patidar leader

In the 2017 Gujarat Assembly poll campaign, if there is one crowd puller, it’s not Prime Minister Narendra Modi or Congress vice-president Rahul Gandhi. It’s 24-year-old Hardik Patel, spearheading the Patidar quota agitation under the banner of the Patidar Anamat Andolan Samiti (PAAS). Mr. Patel is in the thick of things, traversing the State, crisscrossing one district after another, holding road shows, rallies and meetings targeting the BJP. In this interview with The Hindu, Mr. Patel talks about the coming Assembly elections and the present mood in the State.

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