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	<title>Himalaya Gaurav Uttarakhand &#187; राजनीति</title>
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		<title>दिल्‍ली की गददी के लिए रणभूमि बनेगी यूपी</title>
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		<pubDate>Mon, 17 Jun 2013 15:37:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>BUREAU</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>

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		<description><![CDATA[यूपी में भिडेगे दो गुजराती प्रभारी, तो वहीं भाजपा के सेनापति मोदी भी यूपी में ब्रहमास्‍त्र रणक्षेत्र में होगे, माना जा रहा है कि दिल्‍ली की गददी के लिए इस बार रणभूमि यूपी बनने जा रही है जहां कांग्रेसं के सर्वेसर्वा गॉधी परिवारभी अपने परम्‍परागत रणक्षेत्र में होगा, तो वहीं भाजपा के अध्‍यक्ष सहित बडे [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://himalayauk.org/wp-content/uploads/2013/06/AMIT-SHAH.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-41508" alt="AMIT SHAH" src="http://himalayauk.org/wp-content/uploads/2013/06/AMIT-SHAH-150x150.jpg" width="150" height="150" /></a><strong>यूपी में भिडेगे दो गुजराती प्रभारी, तो वहीं भाजपा के सेनापति मोदी भी यूपी में ब्रहमास्‍त्र रणक्षेत्र में होगे, माना जा रहा है कि दिल्‍ली की गददी के लिए इस बार रणभूमि यूपी बनने जा रही है जहां कांग्रेसं के सर्वेसर्वा गॉधी परिवारभी अपने परम्‍परागत रणक्षेत्र में होगा, तो वहीं भाजपा के अध्‍यक्ष सहित बडे नेता यूपी में रणभूमि में होगें, तो वही समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह भी अपने मुख्‍य सिपहसालारों व सेना के साथ यूपी में होगें जबकि बहुजन समाज पार्टी की सर्वेसर्वा मायावती भी यूपी की रणभूमि में पूरे दल बल के साथ होगीा इस तरह इस बार दिल्‍ली की गददी का रास्‍ता यूपी से होकर निकलेगा,  चन्‍द्रशेखर जोशी सम्‍पादक की रिपोर्ट के अनुसार दिल्‍ली की गददी प्राप्‍त करने के लिए हर दल के लिए करो या मरो की स्‍थिति होगीा</strong></p>
<p>कांग्रेस एक ओर अगले आम चुनाव की तैयारियां कर रही है तो मुख्य विपक्षी दल बीजेपी बिहार में पैदा हुए हालात के बावजूद नरेंद्र मोदी पर लिए गए अपने फैसले से पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रही है। गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी को उम्मीोद है कि पार्टी यूपी में अपना खोया जनाधार वापस पा सकती है तो दिल्ली का रास्ताद आसान होगा। उन्हों्ने अपने बेहद करीबी और यूपी के प्रभारी बनाए गए अमित शाह और सह प्रभारी रामेश्व र चौरसिया को पिछले दिनों लखनऊ भेजकर बीजेपी नेताओं की तैयारियों की नब्जर टटोलने की कोशिश की। मोदी के लखनऊ, इलाहाबाद या वाराणसी से चुनाव लड़ने की संभावना भी जताई जा रही है।</p>
<p>दूसरी तरफ, कांग्रेस ने भी गुजरात के ही बड़े नेता मधुसूदन मिस्त्री को यूपी का प्रभारी नियुक्तभ कर मोदी को चुनौती देने की कोशिश की है। कांग्रेस के इस ऐलान के बाद अगले चुनाव को लेकर यूपी में दो गुजरातियों की जंग बेहद दिलचस्पै होने की उम्मीदद है। सवाल यह भी है कि मोदी के सिपहसालार अमित शाह बीजेपी के लिए फायदेमंद होंगे या मधुसूदन यूपी में कांग्रेस की सीटें बढ़ाकर मोदी को चुनौती देंगे। ऐसे में इन दोनों दलों के यूपी प्रभारियों की तुलना करना जरूरी हो जाता है।</p>
<p>68 साल के मधुसूदन गुजरात के आदिवासी बहुल साबरकांठा क्षेत्र से सांसद रहे हैं। वह 2014 आम चुनाव के लिए राहुल गांधी की अगुवाई में बनी चुनाव समन्वंय समिति के सदस्यट भी हैं। हालांकि सियासी हलकों में मधुसूदन मिस्त्री का नाम उतना चर्चित नहीं था लेकिन हाल में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की शानदार जीत के बाद मिस्त्री के राजनीतिक कॅरियर को नई उड़ान मिली है। वैसे मिस्त्री एक बार मोदी के हाथों शिकस्तत खा चुके हैं। 2009 में नरेंद्र मोदी ने साबरकांठा लोकसभा सीट पर खास ध्यासन दिया और मिस्त्री को हराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। नतीजा हुआ कि मिस्त्री चुनाव हार गए। मिस्त्री की इस हार के लिए कांग्रेस की गुटबाजी भी जिम्मेहदार रही थी। मार्च 2011 में मिस्त्री को कांग्रेस का महासचिव बना दिया और पार्टी की सबसे पॉवरफुल कांग्रेस वर्किंग कमेटी में जगह दी गई। हाल में उन्हें् लोकसभा चुनाव के लिए बनी राहुल गांधी की पांच सदस्यीकय कोर कमेटी में शामिल किया गया है। कहा जा रहा है कि अगला लोकसभा चुनाव भी वह साबरकांठा से ही लड़ेंगे और पार्टी की अंदरूनी राजनीति का शिकार नहीं हुए तो जीत भी सकते हैं।</p>
<p>नब्बेत के दशक के मध्य में शंकर सिंह वाघेला के साथ कांग्रेस में शामिल होने वाले मिस्त्री ने अपना सियासी कॅरियर अपने बूते बनाया जबकि गुजरात विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष वाघेला प्रदेश कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से जूझ रहे हैं। हालांकि यूपी की जिम्मेतदारी मिस्त्री् के लिए कड़ा इम्तिहान होगा। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री और यूपी प्रभारी अमित शाह गुजरात के गृह राज्य् मंत्री रहे हैं। 45 साल के शाह चार बार विधायक चुने गए और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे करीबी और सबसे ताकतवर राजनेता माने जा रहे है। हालांकि उनके राजनीतिक कॅरियर पर सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले का ग्रहण लग गया है।</p>
<p>गांधीनगर के समीप मनसा के एक बिजनेस फैमिली से ताल्लुेक रखने वाले अमित शाह अहमदाबाद के सरखेज विधानसभा क्षेत्र से लगातार चार बार से विधायक हैं। नब्बेय के दशक के आखिरी दिनों में जब केशुभाई पटेल और नरेंद्र मोदी के बीच जंग शुरू हुई तो शाह ने मोदी का साथ दिया। दिसम्बंर 2002 में मोदी जब दूसरी बार सीएम बने तो शाह को गृह राज्यो मंत्री बनाया गया।. 2002 में जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राज्य की 182 में से 126 सीटें जीतीं तो अमित शाह ने सबसे अधिक (1.58 लाख) वोटों से जीतने का रिकॉर्ड बनाया। अगले चुनाव में उनकी जीत का अंतर बढ़ कर 2.35 लाख वोटों का हो गया।</p>
<p>बायोकेमेस्ट्री में बीएससी करने के बाद एबीवीपी के जरिए बीजेपी में एंट्री पाने वाले शाह को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में विशेष आमंत्रित सदस्य बनाया गया है। हिंदुत्वए विचारधारा के प्रबल समर्थक शाह को मोदी के खासमखास के अलावा आरएसएस का करीबी भी बताया जाता है। वह गुजरात स्टेट चेस एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं और गुजरात राज्य क्रिकेट एसासिएशन के उपाध्यक्ष हैं जबकि अध्यक्ष नरेंद्र मोदी हैं।</p>
<p>गैंगस्टर सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी कौसर बी 2005 में एक पुलिस मुठभेड़ में मारे गए थे। कोर्ट के आदेश पर जांच सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई का आरोप था कि शाह के इशारे पर ही फर्जी मुठभेड़ का नाटक रचा गया। मोबाइल फोन रिकॉर्ड के आधार पर सीबीआई ने पाया कि मुठभेड़ में शामिल शीर्ष पुलिस अधिकारी घटना के दौरान, उससे पहले और उसके फौरन बाद अमित शाह से फोन पर लगातार संपर्क में बने हुए थे। मुठभेड़ में शामिल चार आईपीएस अफसर गिरफ्तार भी हो चुके हैं।</p>
<p>सीबीआई द्वारा आईपीएस अभय चूड़ास्मा को इस मामले में गिरफ्तार किए जाने के बाद से ही शाह लगभग अंडरग्राउंड हो गए थे। वे गुजरात की पचासवीं वर्षगांठ के मौके पर भी नहीं दिखे। सीबीआई द्वारा दो दिनों तक समन भेजने के बावजूद वे पेश नहीं हुए। मीडिया से फोन पर संपर्क कर कहा कि वे भगोड़े नहीं हैं। उन्होंने दावा किया कि वे अदालत के सामने अपना पक्ष रखेंगे क्योंकि सीबीआई तो केंद्र सरकार की कठपुतली है। फिर जुलाई 2010 में अहमदाबाद में अमित शाह नाटकीय तरीके से मीडिया के सामने आए। उन्होंने अहमदाबाद में बीजेपी द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित भी किया। फिर सीबीआई ने उन्हें गांधीनगर में गिरफ्तार कर लिया। अमित शाह को उस वक्त गिरफ्तार किया गया जब वह अपना पक्ष रखने सीबीआई दफ्तर गए।</p>
<p>अक्टूगबर 2010 में अमित शाह को गुजरात हाई कोर्ट ने जमानत दे दी। करीब तीन महीने तक साबरमती जेल में बिताने के बाद शाह आजाद हो गए। बीते अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने शाह को बड़ी राहत देते हुए उनकी जमानत बरकरार रखी। तब से शाह राजनीति में एक बार फिर से पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं। दिसंबर में चुनाव जीतने के बाद अमित शाह को बीजेपी महासचिव बनाया गया।</p>
<p>कांग्रेस महासचिव मिस्त्री 2010 से कर्नाटक, केरल और लक्षद्वीप की जिम्मेतदारी संभाल रहे थे। एक ओर जब बीजेपी भ्रष्टािचार के आरोप में फंसे बीएस येदियुरप्पाी की बगावत से जूझ रही थी तो मिस्त्री बेहद धैर्य से इस मौके का फायदा उठाते हुए पार्टी कैडर को मजबूत करने में जुटे रहे। कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं को एकजुट करने और स्थाहनीय नेताओं की मदद से सही उम्मी दवारों की तलाश करने में मिस्त्री ने अहम योगदान दिया। ऐसे में दक्षिण भारत के कर्नाटक में कांग्रेस की शानदार वापसी का श्रेय मिस्त्रीर को दिया जाता है। अधिकतर जानकार कर्नाटक विधानसभा नतीजों को कांग्रेस की जीत से ज्या दा बीजेपी की हार करार दे रहे हैं लेकिन कांग्रेस के भीतर मिस्त्री के प्रयासों की काफी तारीफ हुई। शायद यही वजह है कि उन्हेंी सियासी तौर पर बेहद अहम माने जाने वाले यूपी जैसे राज्यी का प्रभारी बनाया गया है। हालांकि मिस्त्री पिछले साल गुजरात विधानसभा में भी बेहद सक्रिय रहे। लेकिन बीते दिसम्बबर में गुजरात में चुनाव के दिनों में भी वह कर्नाटक चुनावों की बात करते रहे। वह पिछले कुछ सालों से दक्षिण भारत के इन राज्योंु में हर महीने कम से कम एक हफ्ता जरूर गुजारते थे। जनवरी 2012 में ही उन्होंोने कह दिया था कि कर्नाटक के नतीजे चौंकाने वाले होंगे। मृदुभाषी स्व भाव के मिस्त्री ने 2011 में केरल चुनावों में पहली बार जीत का स्वाेद चखा। हालांकि वह केरल में कांग्रेस पार्टी को मजबूत करने के लिए बहुत कम ही वक्त दे सके थे जहां कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ ने बहुत कम अंतर से सत्ताबरूढ़ एलडीएफ से सूबे में सरकार बनाई।</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>नीतीश कुमार कभी आडवाणी को घोर सांप्रदायिक कहते थे</title>
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		<pubDate>Fri, 14 Jun 2013 05:24:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>BUREAU</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>

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		<description><![CDATA[नीतीश के गुरू जेपी ने 1974 में आरएसएस को धर्मनिरपेक्ष करार दिया था  -   नीतीश कुमार के दोहरे रवैये का एक बड़ा सुबूत 1970 में अटल बिहारी वाजपेयी ने पांचजन्य में एक लेख लिखा था। यह लेख बाद में इंडियन एक्सप्रेस में अंग्रेजी में भी छपा था। इस लेख में अटल बिहारी वाजपेयी ने मुस्लिमों [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://himalayauk.org/wp-content/uploads/2013/06/m_CS-JOSHI-NITISH-SARAD.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-41378" alt="m_CS JOSHI &amp; NITISH &amp; SARAD" src="http://himalayauk.org/wp-content/uploads/2013/06/m_CS-JOSHI-NITISH-SARAD-150x150.jpg" width="150" height="150" /></a></p>
<p><strong>नीतीश के गुरू जेपी ने 1974 में आरएसएस को धर्मनिरपेक्ष करार दिया था  -  </strong></p>
<p><strong>नीतीश कुमार के दोहरे रवैये का एक बड़ा सुबूत </strong></p>
<p><strong>1970 में अटल बिहारी वाजपेयी ने पांचजन्य में एक लेख लिखा था। यह लेख बाद में इंडियन एक्सप्रेस में अंग्रेजी में भी छपा था। इस लेख में अटल बिहारी वाजपेयी ने मुस्लिमों के खिलाफ जहर उगला था।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"> कांग्रेस के बड़े नेता ने भले ही मोदी को चुनौती मानकर उनके द्वारा तीन चुनाव जीतने को अहमियत दी हो, लेकिन जनता दल (यूनाइटेड) के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उन्हेंा लेकर अब भी नरम नहीं पड़े हैं उनका नरेंद्र मोदी से 36 का आंकड़ा जगजाहिर है। जदयू के नेता और कार्यकर्ता पानी पी पीकर नरेंद्र मोदी को उनका नाम लिए बिना कोस रहे हैं। जदयू को इस बात पर ऐतराज है कि बीजेपी ने उस विवादित नेता को अगले लोकसभा चुनाव की कमान सौंप दी, जिसकी छवि सांप्रदायिक है और जिस पर गुजरात दंगों के दाग हैं। इसे लेकर जदयू इतनी खफा है कि वह बीजेपी के साथ अपना 17 साल पुराना गठबंधन भी तोड़ सकती है। आडवाणी के इस्तीफे के बाद जदयू हरकत में आ गई थी और पार्टी के अध्यक्ष शरद यादव ने कहा था कि जदयू एनडीए में तभी आई थी जब अटल और आडवाणी से हमारा समझौता हुआ था। जदयू आडवाणी को कथित तौर पर &#8216;साइडलाइन&#8217; किए जाने और मोदी को &#8216;आगे&#8217; किए जाने से नाराज बताई जाती है। मोदी की तुलना में आडवाणी जदयू को &#8216;सेकुलर&#8217; नजर आते हैं। यही वजह है कि नीतीश जिस मोदी को बिहार की सीमा में फटकने नहीं देते हैं, उन्हीं नीतीश ने आडवाणी की जन चेतना यात्रा को बिहार से ही हरी झंडी दिखाई थी। जबकि मोदी आडवाणी के ही शिष्य माने जाते हैं जिन्हें देश भर में सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत करने वाले राजनेताओं में शुमार किया जाता है। मोदी और बीजेपी को लेकर नीतीश कुमार के दोहरे रवैये का एक बड़ा सुबूत यह भी है कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद भी नीतीश कुमार लंबे समय तक मोदी की पार्टी की सरकार में केंद्र में मंत्री बने रहे।</p>
<p style="text-align: justify;">1990 में जब आडवाणी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए रथ यात्रा निकाल रहे थे, तब नीतीश कुमार विश्वनाथ प्रताप सिंह की केंद्र की राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार में कृषि राज्य मंत्री थे। वीपी सिंह की सरकार ने बिहार के समस्तीपुर में आडवाणी की गिरफ्तारी करवाकर रथ यात्रा को रुकवा दिया था। मोदी ने आडवाणी की इस यात्रा के प्रबंध का काम किया था। इसके बाद बीजेपी ने राष्ट्रीय मोर्चे से समर्थन वापस ले लिया था और नतीजतन वीपी सिंह की सरकार गिर गई थी। उस दौर में नीतीश कुमार आडवाणी के मुखर आलोचक हुआ करते थे और उन्हें घोर सांप्रदायिक कहते थे। समस्तीपुर में आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद नीतीश कुमार बहुत खुश हुए थे और तब के अपने साथी लालू प्रसाद यादव के साथ इस खुशी को उन्होंने साझा भी किया था। लेकिन रथ यात्रा के बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण आंदोलन ने तेजी पकड़ ली और 6 दिसंबर, 1992 में बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया गया। इस मामले में आज भी आडवाणी पर मुकदमा चल रहा है। लेकिन 2013 में वही आडवाणी नीतीश के लिए धार्मिक सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक बन गए हैं। 1970 में अटल बिहारी वाजपेयी ने पांचजन्य में एक लेख लिखा था। यह लेख बाद में इंडियन एक्सप्रेस में अंग्रेजी में भी छपा था। इस लेख में अटल बिहारी वाजपेयी ने मुस्लिमों के खिलाफ जहर उगला था। कई लोग ऐसा मानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी ने उस दौर में जनसंघ के नेता बलराज मधोक के सामने खुद को हिंदू हितों का बड़ा पैरोकार साबित करने के लिए ऐसा लेख लिखा था। उस लेख के प्रकाशन के बाद अटल बिहारी वाजपेयी की जमकर आलोचना हुई थी और उन पर सांप्रदायिक होने का ठप्पा लगा दिया गया था। जीवन भर दक्षिणपंथी राजनीति करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी से जब पत्रकारों ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस से एक दिन पहले पूछा था कि अब क्या होगा, तो वाजपेयी ने बहुत ही सारगर्भित लेकिन द्विअर्थी जवाब दिया था। वाजपेयी ने तब कहा था, &#8216;आशा भी है और आशंका भी।&#8217; वही अटल बिहारी वाजपेयी 1998 में धर्मनिरपेक्ष नेता साबित हुए और प्रधानमंत्री बने। तब पार्टियां आडवाणी की सांप्रदायिक छवि के चलते उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनाना चाहती थीं। इसलिए वाजपेयी के उदार चेहरे पर सहमति बनी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन नेहरू सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था। उस दौर में जयप्रकाश नारायण ने आरएसएस को सांप्रदायिक कहकर उसकी गतिविधियों की आलोचना की थी। लेकिन उन्हीं जेपी ने 1974 में आरएसएस को धर्मनिरपेक्ष करार दिया। जेपी ने तब कहा था कि अगर आरएसएस सांप्रदायिक है तो वह खुद भी सांप्रदायिक हैं। यह गौर करने वाली बात है कि मोदी का विरोध करने वाले नीतीश कुमार खुद को जेपी का शिष्य और जेपी के नेतृत्व में हुए आंदोलन से जन्म लेने वाला नेता बताते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>Rajnath-Modi-Reuters  Will bypoll results buoy Modi to his political goal?</title>
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		<pubDate>Thu, 06 Jun 2013 18:17:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>BUREAU</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[Modi to his political goal?]]></category>

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		<description><![CDATA[Like an aviator who makes the most of a tailwind, Gujarat Chief Minister Narendra Modi is propelling himself towards what he sees as his political destiny. And on Wednesday, he got plenty of aeronautical aid from a string of political developments. First off, the results of the byelections – in Gujarat and elsewhere – have, [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://himalayauk.org/wp-content/uploads/2013/06/Rajnath-Modi-Reuters.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-41194" alt="Rajnath-Modi-Reuters" src="http://himalayauk.org/wp-content/uploads/2013/06/Rajnath-Modi-Reuters-300x225.jpg" width="300" height="225" /></a></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Like an aviator who makes the most of a tailwind, Gujarat Chief Minister Narendra Modi is propelling himself towards what he sees as his political destiny. And on Wednesday, he got plenty of aeronautical aid from a string of political developments. First off, the results of the byelections – in Gujarat and elsewhere – have, going by the near-unanimous verdict of the media, given him much cause for rejoicing.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">The Bharatiya Janata Party made a clean sweep of the two Lok Sabha and four Assembly seats in Gujarat to which byelections were held – in every case wresting the seats from the Congress, and by larger margins than in the December 2012 Assembly elections. Second, in Bihar, the JD(U) under Nitish Kumar – who has arguably been the most vocal critic within the NDA coalition of efforts to project Modi as the BJP’s prime ministerial candidate – suffered the mortification of seeing his hand-picked candidate comprehensively trounced in an election that he had flagged as a referendum on JD(U) rule.</p>
<p style="text-align: justify;">Byelection results in select pockets seldom lend themselves to analytical extrapolation to a pan-Indian landscape, but given the proximity of the general election, analysts have abandoned their customary caution and connected the disparate dots to read a clear political message from the verdict.</p>
<p style="text-align: justify;">In terms of optics too, Modi had a good day at the office. His opposition – at the Delhi meeting of Chief Ministers to discuss national security matters – to the establishment of a National Counter-Terrorism Centre – found resonance among many other Chief Ministers (including from at least two Congress Chief Ministers). In television studios, however, the entire debate was framed, with a bit of over-the-top hyperbole, as a ‘Modi-versus-Centre’ debate, which can only help him in his effort to project himself onto the larger national stage. Additionally, the fact that even Congress Chief Ministers find the “stupid” national security idea disquieting blunts the effort by the Congress to project Modi’s and the BJP’s opposition to it as motivated by partisan politics.</p>
<p style="text-align: justify;">The clincher for Modi came during his meeting with BJP president Rajnath Singh, at which it became manifestly clear (even without it being said explicitly), that the party has more or less made up its mind to anoint Modi as the party’s head of the election panel. According to media accounts, Rajnath Singh will likely make a formal announcement to that effect at the conclusion of the national executive meeting of the BJP late this week in Goa.</p>
<p style="text-align: justify;">Invoking circuitous metaphorical rhetoric, Rajnath Singh noted that since Modi did not want to have lunch with him, “I offered the best fruits, including the sweetest grapes in town, so that he did not leave with a sour aftertaste.”</p>
<p style="text-align: justify;">The “sour aftertaste” was very likely an allusion to the white noise that has been generated in recent days by senior party leader LK Advani’s comments about Modi, which were widely perceived as an articulation of Advani’s effort to check Modi’s meteoric rise within the party leadership in order to project himself or one of his political proteges as a more acceptable candidate in the era of coalition governments.</p>
<p style="text-align: justify;">And although Rajnath Singh’s offer of “sweet fruits” may not quite mean that Modi has surmounted all intra-party hurdles to his becoming the party’s candidate for prime ministership in 2014, the planets seem to be aligning themselves in a pattern that is propitious to just such an outcome.</p>
<p style="text-align: justify;">As The Telegraph observed, “although Modi’s formal declaration as the party’s prime ministerial candidate may wait a bit longer, the new mandate expected to be handed out in Goa will, for all intents and purposes, legitimise his national pre-eminence as the countdown for the next Lok Sabha election begins.”</p>
<p style="text-align: justify;">In fact, Modi appeared to have had a satisfactory meeting with Advani too.. Evidently, he learnt that while he was in Delhi, Advani had been trying to contact him – possibly to congratulate him on the Gujarate byelection results. Seizing the moment, he visited Advani at his residence, which effort served to convey the signal that the patriarch had been persuaded to back the party’s rising star as well.</p>
<p style="text-align: justify;">Even with Modi as its electoral mascot, it is far from clear that the BJP will win enough seats to have a reasonable shot at forming a government. But as political commentator Minhaz Merchant points out, Modi perhaps represents the BJP’s best to get there. In that sense, particularly after the lessons from Wednesday’s byelection results are digested, it seems likely that the party will bow to the inevitable. From there on, however, the outlook is pretty hazy.</p>
<p style="text-align: justify;">Modi’s ascension in the BJP leadership has triggered a revolution of rising expectations from party cadres and supporters, which quite honestly border on the hyperbolic. The reason for the political appeal that he commands among certain constituencies is easy to comprehend, but the over-the-top expectations of him are not. For now, Modi is being buoyed aloft on the tailwind of favourable circumstances, but there may be a case to temper the heightened expectations of his capabilities in order to avert a revolution of rising frustration at a later date.</p>
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]]></content:encoded>
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		<title>5 हजार कार्यकर्ता बीजेपी में शामिल</title>
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		<pubDate>Wed, 05 Jun 2013 07:55:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>BUREAU</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[5 thousand join bjp]]></category>

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		<description><![CDATA[गांधीनगर। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सरखेज हाईवे पर आयोजित एक कार्यक्रम में कांग्रेस व एनएसआईयु के लगभग 5 हजार कार्यकर्ताओं को बीजेपी में शामिल करवाया। इस मौके पर मोदी ने कहा कि इस युवाशक्ति की मेहतन बेकार नहीं जाएगी। इस युवाशक्ति के परिश्रम से आने वाले गुजरात का भविष्य तय होगा। [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://himalayauk.org/wp-content/uploads/2013/06/MODI-JOIN-CONGRESS-WORKERS.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-41104" alt="MODI JOIN CONGRESS WORKERS" src="http://himalayauk.org/wp-content/uploads/2013/06/MODI-JOIN-CONGRESS-WORKERS-300x259.jpg" width="300" height="259" /></a></p>
<p>गांधीनगर। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सरखेज हाईवे पर आयोजित एक कार्यक्रम में कांग्रेस व एनएसआईयु के लगभग 5 हजार कार्यकर्ताओं को बीजेपी में शामिल करवाया। इस मौके पर मोदी ने कहा कि इस युवाशक्ति की मेहतन बेकार नहीं जाएगी।</p>
<p>इस युवाशक्ति के परिश्रम से आने वाले गुजरात का भविष्य तय होगा। भारतीय जनता पार्टी सिर्फ मेंबरशिप आधारित राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि रिलेशनशिप पार्टी है। यह एक परिवार है और सभी का इस पर पूरा हक है।</p>
<p>मोदी ने आगे कहा कि यह गुजरात की पहली घटना है, जिसमें एक पूरा राजनीतिक संगठन एक पार्टी से दूसरी पार्टी में शामिल हुआ। युवा नेता हार्दिक डोडिया के नेतृत्व में भाजपा में शामिल हुए युवाओं का मुख्यमंत्री मोदी ने पूरी गर्मजोशी से स्वागत किया। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सरखेज हाईवे पर आयोजित एक कार्यक्रम में कांग्रेस व एनएसआईयु के लगभग 5 हजार कार्यकर्ताओं को बीजेपी में शामिल करवाया। इस मौके पर मोदी ने कहा कि इस युवाशक्ति की मेहतन बेकार नहीं जाएगी।</p>
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<p>इस युवाशक्ति के परिश्रम से आने वाले गुजरात का भविष्य तय होगा। भारतीय जनता पार्टी सिर्फ मेंबरशिप आधारित राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि रिलेशनशिप पार्टी है। यह एक परिवार है और सभी का इस पर पूरा हक है।</p>
<p>मोदी ने आगे कहा कि यह गुजरात की पहली घटना है, जिसमें एक पूरा राजनीतिक संगठन एक पार्टी से दूसरी पार्टी में शामिल हुआ। युवा नेता हार्दिक डोडिया के नेतृत्व में भाजपा में शामिल हुए युवाओं का मुख्यमंत्री मोदी ने पूरी गर्मजोशी से स्वागत किया। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सरखेज हाईवे पर आयोजित एक कार्यक्रम में कांग्रेस व एनएसआईयु के लगभग 5 हजार कार्यकर्ताओं को बीजेपी में शामिल करवाया। इस मौके पर मोदी ने कहा कि इस युवाशक्ति की मेहतन बेकार नहीं जाएगी।</p>
<p>इस युवाशक्ति के परिश्रम से आने वाले गुजरात का भविष्य तय होगा। भारतीय जनता पार्टी सिर्फ मेंबरशिप आधारित राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि रिलेशनशिप पार्टी है। यह एक परिवार है और सभी का इस पर पूरा हक है।</p>
<p>मोदी ने आगे कहा कि यह गुजरात की पहली घटना है, जिसमें एक पूरा राजनीतिक संगठन एक पार्टी से दूसरी पार्टी में शामिल हुआ। युवा नेता हार्दिक डोडिया के नेतृत्व में भाजपा में शामिल हुए युवाओं का मुख्यमंत्री मोदी ने पूरी गर्मजोशी से स्वागत किया।</p>
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		<title>भाजयुमो की राष्ट्रीय टीम में युवा चेहरों की झलक</title>
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		<pubDate>Tue, 04 Jun 2013 16:44:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>BUREAU</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[BJP YOUTH TEAM]]></category>

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		<description><![CDATA[भाजपा की युवा इकाई भारतीय जनता युवा मोर्चा का दुबारा अध्यक्ष बनने के बाद अनुराग ठाकुर ने अपनी टीम घोषित कर दी है &#124; भाजयुमो की राष्ट्रीय टीम में इस बार नई उम्र के कई चेहरे दिखाई दे रहे हैं &#124; स्टडी सर्किल के प्रभारी बनाये गए जयराम विप्लव और उपाध्यक्ष मधुकेश्वर देसाई टीम में [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">भाजपा की युवा इकाई भारतीय जनता युवा मोर्चा का दुबारा अध्यक्ष बनने के बाद अनुराग ठाकुर ने अपनी टीम घोषित कर दी है | भाजयुमो की राष्ट्रीय टीम में इस बार नई उम्र के कई चेहरे दिखाई दे रहे हैं | स्टडी सर्किल के प्रभारी बनाये गए जयराम विप्लव और उपाध्यक्ष मधुकेश्वर देसाई टीम में सबसे युवा चेहरे हैं | गौरतलब है कि 25 वर्षीय मधुकेश्वर देसाई पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के पोते हैं जबकि 23 साल के जयराम विप्लव विद्यार्थी परिषद से टीम में आये थे | मध्य प्रदेश से युवा चेहरे के तौर पर राहुल कोठारी को महामंत्री बनाया गया है | प्रांशु द्विवेदी, नुपुर शर्मा , सौरभ खत्री , डोनी नीच ,बिल लोथ , महेश गर्ग, अभिषेक मटोरिया, डा.प्रमोद जैसे युवा को भी जिम्मेदारियां दी गयी है |</p>
<p style="text-align: justify;">दरअसल , भाजपा नितिन गडकरी के कार्यकाल से ही 18-25 वर्ष के युवाओं को लुभाने के प्रयास में दिख रही थी | राजनाथ सिंह ने युवाओं को लेकर हाल ही में एक कमिटी भी बनाई है वरुण गांधी, पूनम महाजन, वाणी त्रिपाठी , सुधांशु त्रिवेदी अमित ठाकर ,अनुराग ठाकुर ,कौशलेन्द्र ,राजीब बब्बर आदि को बनाया गया है | इस कमिटी की ओर से भी पार्टी को 18-25 साल के युवाओं के बीच काम करने का सुझाव दिया गया है | भाजयुमो की टीम को देखकर तो ऐसा लगता है कि भाजपा इस सुझाव को गंभीरता से ले रही है | आने वाले चुनाव में युवा वोटरों को लुभाने का यह एक प्रयास कहा जा सकता है | नरेन्द्र मोदी युवाओं की बात करते हैं और उनके पार्टी में युवाओं को अधिक से अधिक महत्व मिले तो संकेत साफ़ समझा जा सकता है |</p>
<p style="text-align: justify;">हाल ही में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के युवाओं को राजनीति से जोड़ने के फार्मूले में सेंध लगाते हुए युवक कांग्रेस व एनएसयूआई के सैंकड़ों कार्यकर्ताओं को भाजपा में शामिल करवाया था | कुलमिलाकर आने वाले चुनाव में युवा मतदाताओं को रिझाने-लुभाने और जोड़ने की कोशिशें हर राजनीतिक दल की ओर से तेज होगी और इस रणनीति का आगाज़ भाजपा ने अपनी युवा इकाई के माध्यम से कर दिया है |</p>
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		<title>2014 में लोकसभा, 2014 तक आपस में ही लडना भाजपा को</title>
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		<pubDate>Mon, 03 Jun 2013 04:03:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>BUREAU</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[BJP]]></category>

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		<description><![CDATA[भाजपा के बारे में फेसबुक में चर्चा है कि 2014 में लोकसभा चुनाव लडना है और 2014 तक उन्हें आपस में ही लडना हैा शायद तभी सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने भाजपा की चुटकी लेते हुए कहा है, &#8216;भाजपा की कथा आडवाणी जी से। चौहान जी बनाम मोदी बनाम राजनाथ जी बनाम सुषमा [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://himalayauk.org/wp-content/uploads/2013/06/m_kamal-chinh.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-41047" alt="m_kamal chinh" src="http://himalayauk.org/wp-content/uploads/2013/06/m_kamal-chinh-150x150.jpg" width="150" height="150" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">भाजपा के बारे में फेसबुक में चर्चा है कि 2014 में लोकसभा चुनाव लडना है और 2014 तक उन्हें आपस में ही लडना हैा शायद तभी सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने भाजपा की चुटकी लेते हुए कहा है, &#8216;भाजपा की कथा आडवाणी जी से। चौहान जी बनाम मोदी बनाम राजनाथ जी बनाम सुषमा जी बनाम जेटली जी बनाम गडकरी जी। आरएसएस बनाम बीजेपी जी। सिविल वार इन परिवार जी।&#8217; वहीं दूसरी ओर आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक व अन्ना हजारे के पूर्व सहयोगी अरविंद केजरीवल ने भाजपा पर प्रहार करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में यह पार्टी कांग्रेस से पीछे नहीं है। यही कारण है कि आज तक इस सीट से भाजपा ने शीला के खिलाफ कोई मजबूत उम्मीदवार नहीं उतारा।</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरी ओर आने वाले विधान सभा चुनाव में शीला दीक्षित की विदाई का सपना देख रही बीजेपी के एक सर्वे ने पार्टी में भूचाल ला दिया है. दिल्ली की 70 सीटों पर किये गए सर्वे में बीजेपी के कई धुरंधर इस बार मुश्किल से चुनाव जीत सकेंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">सर्वे के मुताबिक इस बार चुनाव में जगदीश मुखी, साहिब सिंह चौहान, मोहन सिंह बिस्ट और एससीएल गुप्ता के लिए जीत मुश्किल है. पार्टी को केवल आठ सीटों पर जीत का भरोसा है और इनमें ग्रेटर कैलाश सीट भी है, जहां से मंत्री किरण वालिया को विधायक हैं. इसके अलावा पार्टी वालिया, हारुन युसुफ और नरेन्द्र नाथ को भी हराने का सपना देख रही है.</p>
<p style="text-align: justify;">पार्टी ने जो सर्वे कराया है उसमें दिल्ली की सीटों को तीन अलग अलग कैटेगरी में रखा गया है. पहले कैटेगरी वो जिसमें पार्टी आराम से जीत जाएगी, दूसरी वो जिसमें पार्टी रणनीति और उम्मीदवार में बदलाव करके ही चुनाव जीत सकती है और तीसरी कैटेगरी में पार्टी को जीत की कोई उम्मीद नहीं है. पार्टी ने ए कैटेगरी में सिर्फ 8 सीटों को रखा है यानी वो सीटें जहां से जीत पक्की है. इस सर्वे के मुताबिक जो सीटें पार्टी पक्का जीतेगी उसमें शिक्षा मंत्री किरण वालिया की ग्रेटर कैलाश सीट ही शामिल है. इसके अलावा इस कैटेगरी में सभी वो सीटें वो हैं जो पहले से ही बीजेपी के पास है.</p>
<p style="text-align: justify;">B कैटेगरी में वो सीटें शामिल हैं, जिनपर पार्टी को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी यानी या तो उम्मीदवार बदलने पड़ेंगे या रणनीति. इस कैटेगरी में करीब 32 से 35 सीटें हैं . मजेदार बात ये हैं कि इस कैटेगरी में बीजेपी के अब तक के गढ़ रहे इलाके शामिल हैं. अगर सर्वे सटीक बैठता है तो जनकपुरी से जगदीशमुखी,घोंडा से साहिब सिंह चौहान, बाबरपुर से नरेश गौड़ और करावल नगर से मोहन सिंह बिस्ट का या तो इनका टिकट काटना पडेगा या रणनीति में खासी तब्दीली करनी होगी. इस कैटेगरी में हारुन युसुफ का बल्ली मारान, डॉ ए.के. वालिया का लक्ष्मीं नगर, किरण वालिया का मालवीय नगर, नरेन्दर नाथ का शाहदरा और अनिल कुमार चौधरी का पटपडगंज भी शामिल है. यानी पार्टी मेहनत करे तो इन सीटों को कांग्रेस से छीन सकती है.</p>
<p style="text-align: justify;">तीसरी कैटेगरी में उन सीटों को रखा है जो जीतना नामुमकिन है. इस कैटेगरी में करीब 25 सीटें हैं. इनमें लवली की गांधी नगर, प्रहलाद सिंह साहनी की चांदनी चौक और राजकुमार चौहान की मंगोलपुरी के अलावा शुएब इकवाल की मटिया महल , कंवर करण सिंह की मॉडल टाउन , तरविंदर मारवाह की जंगपुरा, और अमरीश गौतम की कोंडली का नाम है.</p>
<p style="text-align: justify;">कुल मिलाकर पार्टी के इस सर्वे पर अगर भरोसा किया जाए तो दिल्ली का आने वाला चुनाव उलटफेर से भरा होगा. दोनो ही पार्टियों के कई धुरंधर मुश्किल से चुनाव जीतेंगे और कई मंत्री घर जाएंगे. बीजेपी को अपने धुरंधर नेताओं का टिकट काटना पड़ेगा और बीजेपी का सरकार बनाना नामुमकिन नहीं तो बहुत मुश्किल होगा.</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>Defiant Srinivasan lists demands before stepping down from BCCI: Reports</title>
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		<pubDate>Sun, 02 Jun 2013 07:08:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>BUREAU</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[Defiant Srinivasan lists demands before stepping down from BCCI: Reports]]></category>

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		<description><![CDATA[The beleaguered BCCI president N Srinivasan will face the toughest test in his administrative career in tomorrow’s emergent Working Committee meeting where members are likely to push for his ouster in the wake of the spot-fixing scandal that has rocked Indian cricket. While it is all but certain that Srinivasan will have to step down [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">The beleaguered BCCI president N Srinivasan will face the toughest test in his administrative career in tomorrow’s emergent Working Committee meeting where members are likely to push for his ouster in the wake of the spot-fixing scandal that has rocked Indian cricket.</p>
<p style="text-align: justify;">While it is all but certain that Srinivasan will have to step down from the president’s post paying heed to the popular demand from the affiliated units, it is learnt that the Tamil Nadu strongman wants three of his demands to be met before he quits.</p>
<p style="text-align: justify;">Srinivasan’s three demands are that he should be reinstated as BCCI President if he comes out clean after the probe, that he should represent India in ICC meetings and that secretary Sanjay Jagdale and Treasurer Ajay Shirke should not be in the new panel as they had ditched him. Some reports also said that Srinivasan has demanded that a non-board member not be made the new President and that he wanted to appoint his own Treasurer and Secretary.</p>
<p style="text-align: justify;">The BCCI members, it is learnt, are not in favour of ignoring Jagdale and Shirke in the new panel and are unlikely to accept that demand.</p>
<p style="text-align: justify;">Top Board members are working on a strategy to force Srinivasan to step down, at least till investigations against his son-in-law and CSK Team Principal Gurunath Meiyappan were completed.</p>
<p style="text-align: justify;">Srinivasan will be told clearly by the members that his position was “untenable” under the circumstances and it would be in the interest of Indian cricket that he stepped down on moral grounds.</p>
<p style="text-align: justify;">If he continued to remain adamant, most of the Board officials will then to quit and create a constitutional crisis within the Board, leaving him with no option but to step down. The working committee has 24 members and it has been largely summoned to gauge the mood which was heavily against Srinivasan.</p>
<p style="text-align: justify;">Now with both Secretary Jagdale and Treasurer Shirke gone it will be a 22-member forum as both Madhya Pradesh Cricket Association (MPCA) and Maharashtra Cricket Association (MCA) are not part of current working committee.</p>
<p style="text-align: justify;">As per norm, the resignation letters of Shirke and Jagdale will be tabled at the meeting for discussion and the members are likely to vehemently oppose the acceptance of the letter: “Jagdale and Shirke have done nothing wrong and we expect that majority of members to oppose their resignation. It will be interesting to see how Srinivasan reacts in that situation”, “an influential member of the working committee told PTI.</p>
<p style="text-align: justify;">Even if Srinivasan volunteers to step down from post in order to allow free and impartial investigation into the spot-fixing and betting scandal, he may be asked as to why he didn’t keep a tab on the activities of his arrested son-in-law, the tainted former CSK Team Principal Gurunath Meiyappan.</p>
<p style="text-align: justify;">The other important issue that will come up for discussion is the status of the three-member probe panel as one of members — Jagdale has already resigned from his post: “Whether a new member will be added with two retired judges from Tamil Nadu or a fresh panel will be formed will also come up for discussion,” the member said. If one goes by the book, Srinivasan can accept Jagdale and Shirke’s resignation and choose an interim secretary and treasurer.</p>
<p style="text-align: justify;">As of now, Haryana Cricket Association supremo and IPL governing council member Aniruddh Chaudhary’s name is doing rounds as an interim secretary but a lot of associations are averse to taking the plunge right now keeping in mind the far-reaching consequences it can have post-September AGM in case Srinivasan is not there.</p>
<p style="text-align: justify;">The key members like Rajeev Shukla, Anurag Thakur and Arun Jaitley along with Shashank Manohar are also planning an “honourable” exit route for the current president.</p>
<p style="text-align: justify;">Manohar’s name is doing the rounds as the interim president but it remains to be seen if that actually happens since he is not part of any affiliated body right now. Shivlal Yadav, the Vice-President from South, is also seen as a possible candidate.</p>
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		<title>Foreign same sex couples cannot adopt children: Russia</title>
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		<pubDate>Sun, 02 Jun 2013 07:05:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>BUREAU</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[Foreign same sex couples cannot adopt children: Russia]]></category>

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		<description><![CDATA[Moscow: Foreign same-sex couples will be officially banned from adopting Russian children, a top official said.”In accordance with the Russian Family Code, same-sex couples are barred from adopting children,” said Alexei Levchenko, an aide to Russian deputy premier overseeing social issues, Olga Golodets. “Most likely, courts won’t authorise such adoptions without any additional legislative acts. [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>Moscow: Foreign same-sex couples will be officially banned from adopting Russian children, a top official said.”In accordance with the Russian Family Code, same-sex couples are barred from adopting children,” said Alexei Levchenko, an aide to Russian deputy premier overseeing social issues, Olga Golodets. “Most likely, courts won’t authorise such adoptions without any additional legislative acts. However, an additional amendment will be passed, stipulating that adoptions are possible only for two-parent (traditional) foreign couples,” Levchenko said.</p>
<p>Russia’s ombudsman for children’s rights, Pavel Astakhov, earlier said that Moscow should impose a moratorium on adoptions by French citizens now that France allows same-sex couples to marry and adopt children.</p>
<p>He said the Russian-French agreement on adoptions should be reconsidered because France’s endorsement of gay marriage directly contradicts Russian legislation.</p>
<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>CBI autonomy: Vahanvati briefs ministerial panel</title>
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		<pubDate>Fri, 31 May 2013 17:57:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>BUREAU</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[CBI autonomy: Vahanvati briefs ministerial panel]]></category>

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		<description><![CDATA[New Delhi: The Group of Ministers on the empowerment of CBI were today briefed by Attorney General Goolam E Vahanvati on the Supreme Court order asking the government to suggest ways for empowering the agency. Finance Minister P Chidambaram, External Affairs Minister Salman Khurshid and Law Minister Kapil Sibal were briefed by Vahanvati who gave [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>New Delhi: The Group of Ministers on the empowerment of CBI were today briefed by Attorney General Goolam E Vahanvati on the Supreme Court order asking the government to suggest ways for empowering the agency.</p>
<p>Finance Minister P Chidambaram, External Affairs Minister Salman Khurshid and Law Minister Kapil Sibal were briefed by Vahanvati who gave the sense of what Supreme Court had said in its order.</p>
<p>Home Minister Sushilkumar Shinde and Minister of State for Personnel V Narayanasamy who are also part of the group could not attend the meeting due to their outstation engagements, sources privy to the meeting said.</p>
<p>The meeting was aimed at shortlisting issues which need to be addressed while devising ways to empower CBI as desired by the Supreme Court in its order.</p>
<p>During the last meeting, Department of Personnel had expressed its reservations against any proposal to scrap Section 6A of the Delhi Special Police Establishment (DSPE) Act which requires the agency to seek permission of the Centre before initiating a probe against an official of the rank of joint secretary and above in a corruption case.</p>
<p>More financial powers to the CBI director also did not find strong support during the meeting.</p>
<p>The GoM was constituted by Prime Minister Manmohan Singh to prepare a draft law to insulate CBI from external influence and a draft affidavit to be presented in the Supreme Court which had made scathing observations against the agency while hearing the coal blocks allocation scam case.</p>
<p>“…CBI has become a caged parrot. We can’t have CBI a caged parrot speaking in master’s voice. It is a sordid saga where there are many masters and one parrot,” the Supreme Court had said during a hearing on 6 May.</p>
<p>The court’s direction had come following an affidavit from the CBI director who had admitted to have shared a draft coal block allocation probe report with former Law Minister Ashwani Kumar and two joint secretaries—Shatrughan Singh and AK Bhalla—in the Prime Minister’s Office and coal ministry respectively.</p>
<p>The apex court had also asked the government to make an effort to come out with a law to insulate CBI from external influence and intrusion.</p>
<p>The Group will finalise its findings and draft a law which will be submitted to the Supreme Court before 10 July, next date of hearing of the case.</p>
<p>CBI, which is probing irregularities in allocation of coal mine blocks on the direction of CVC, has so far registered 11 FIRs in the matter.</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>अपने ही जाल में उलझी बीजेपी और साख गंवा चुके यूपीए की त्रासद कथा</title>
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		<pubDate>Sat, 25 May 2013 17:51:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>BUREAU</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[BJP & UPA]]></category>

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		<description><![CDATA[कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जिस राज्य ने बीजेपी को दक्षिण में पांव जमाने का ऐतिहासिक अवसर दिया था वहीं उसे इतनी बुरी तरह धूल चाटनी पड़ी. दिल्ली में कांग्रेस कर्नाटक चुनाव में इतनी शानदार जीत का जश्न नहीं मना पाई क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने करोड़ों रु. के कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले में कानून मंत्री अश्विनी [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://himalayauk.org/wp-content/uploads/2013/05/m_gadkari_takesover226.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-40941" alt="m_gadkari_takesover226" src="http://himalayauk.org/wp-content/uploads/2013/05/m_gadkari_takesover226-300x225.jpg" width="300" height="225" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जिस राज्य ने बीजेपी को दक्षिण में पांव जमाने का ऐतिहासिक अवसर दिया था वहीं उसे इतनी बुरी तरह धूल चाटनी पड़ी. दिल्ली में कांग्रेस कर्नाटक चुनाव में इतनी शानदार जीत का जश्न नहीं मना पाई क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने करोड़ों रु. के कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले में कानून मंत्री अश्विनी कुमार के झूठ की पोल खोल दी और प्रधानमंत्री के रक्षा कवच को तार-तार कर दिया. कुल मिलाकर बंगलुरू और दिल्ली ने बुधवार को एक ही खट्ठे-मीठे दिन में अपने ही जाल में उलझी बीजेपी और साख गंवा चुके यूपीए की त्रासद कथा बयान कर दी.</p>
<p style="text-align: justify;">अपने भीतर की मुसीबतों से जूझते भारत के इस दक्षिणपंथी दल में कांग्रेस के सबसे कमजोर पलों से फायदा उठाने की न तो ताकत है और न समझ. उसके पास अगर कुछ है तो बस एक से बढ़कर एक नामवर राष्ट्रीय और कुछ बराएनाम नेताओं की जमात जिनका अहंकार उनके जनाधार से बड़ा है और जिनकी महत्वाकांक्षाएं उनकी उपलब्धियों से कहीं मेल नहीं खातीं. आज के दौर में भारत एक भ्रष्ट सरकार से त्रस्त और ठगा हुआ महसूस कर रहा है और एक विश्वसनीय तथा एकजुट विकल्प के लिए तरस रहा है, कल तक औरों से अलग होने का दावा करने वाली बीजेपी देश की बागडोर थामने के लिए आगे आने की बजाए अपने ही अंतर्विरोधों और भीतरी सत्ता संघर्ष में आकंठ डूबी हुई है.</p>
<p style="text-align: justify;">अगर बीजेपी अब भी खुद को औरों से अलग बताती है तो उसके कारण भी कुछ अलग या गलत हैं. पार्टी के अध्यक्ष कहने को तो देश के हृदय प्रदेश के जुझारू नेता हैं लेकिन अभी तक नेतृत्व क्षमता का कोई संकेत नहीं दे पाए हैं. वे अभी तक कोई ऐसा विचार या नारा नहीं दे पाए हैं जो जनाधार को प्रेरित और विपक्ष को डरा सके. उनकी वरिष्ठता या उनके प्रति सम्मान सिर्फ उनके पद की देन है, व्यक्तित्व की नहीं. दूसरे नेता ज्यादा दिखाई और सुनाई पड़ते हैं. राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली बेशक धुरंधर सांसद हैं जिनके तर्कों के बाण सत्ता पक्ष को निरुत्तर कर देते हैं. लेकिन वे सड़क की राजनीति में पसीना बहाने और धूल फांकने की बजाए परदे के पीछे की चालों में ज्यादा सहज दिखते हैं. लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज जनता की नब्ज पहचानती हैं और तीखे स्वर में जोरदार भाषण देती हैं. लालकृष्ण आडवाणी परिवार के पितामह और सम्माननीय सांसद, संतों जैसे एकांत में जीते हैं और अपनी सूझबूझ की बजाए रूठने के लिए चर्चा में रहते हैं. उन सबके ऊपर मंडराता साया नरेंद्र मोदी का है, जो पार्टी के सबसे ज्यादा बिकाऊ ब्रांड हैं. राष्ट्रवाद और विकास का नशीला मेल-मोदीत्व आज हिंदुत्व से ज्यादा विकराल रूप ले चुका है.</p>
<p style="text-align: justify;">आदर्श स्थिति में ये पंज प्यारे हो सकते हैं. विविध संगठनात्मक क्षमता से लेकर रणनीतिक सोच और सुशासन तक, इनकी सामूहिक प्रतिभा पार्टी के लिए वरदान हो सकती है और इससे विपक्षियों की नींद हराम हो सकती है. पर सच तो यह है कि आम चुनाव की आसन्न छाया में ये पांचों पार्टी के भविष्य के लिए घातक साबित हो रहे हैं. ये सिर्फ महत्वाकांक्षांओं की डोर से बंधे हैं, जो राजनीति में कोई बुरी बात नहीं है. पर मुश्किल यह है कि बीजेपी में किसी एक के सपने सच होने का मतलब दूसरे के सपनों का चूर-चूर होना है.</p>
<p style="text-align: justify;">फिर भी एक आदमी बाकियों पर भारी हो चुका है. मोदी न सिर्फ पहली पंक्ति में सबसे आगे खड़े हैं बल्कि भारत के लिए उनका अभियान ऐसी राजनैतिक ताकत बन चुका है जैसी देश में पहले शायद ही कभी देखी गई है. उन्होंने ठान लिया है कि खुद को भारत के लिए न सही, पार्टी के लिए तो अपरिहार्य बनाना ही है. पार्टी अब भी यह तय नहीं कर पा रही कि इस आंधी का सामना कैसे किया जाए. मोदी के उदय से सबसे ज्यादा बेचैन आडवाणी हैं, जिन्होंने बीजेपी को सत्ता में लाने के लिए सबसे ज्यादा पसीना बहाया और सबसे ज्यादा लंबा फासला तय किया था. सत्ता सुख के उन पांच वर्षों में वे अटल बिहारी वाजपेयी के नंबर दो थे. आज 85 साल की उम्र में वे जीवन में कम से कम एक बार तो नंबर वन बनने को बेताब हैं. लेकिन समस्या यह है कि उनके पुराने चेले उनकी इस पीड़ा को नहीं समझ रहे क्योंकि वे खुद नंबर वन के दावेदार हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">अहम का टकराव</p>
<p style="text-align: justify;">वाजपेयी-आडवाणी की जुगलबंदी से मुक्त होकर बीजेपी अब इन पांच सितारों की टकराती महत्वाकांक्षाओं के प्रपंच राग के शोर में फंस गई है. आडवाणी, जेटली, सुषमा और राजनाथ अच्छी तरह समझते हैं कि पार्टी के कार्यकर्ता मोदी को कप्तान बनाने के लिए बेताब हैं लेकिन वे चाहेंगे कि इसे जितना हो सके, टाला जाए या कम-से-कम प्रचार समिति के अध्यक्ष पद पर मोदी की नियुक्ति को यथासंभव कमजोर किया जाए. वे मोदी की लोकप्रियता को तो भुनाना चाहेंगे लेकिन मोदी की जिस बेरहम और बेलौस कार्यशैली का डर पाले बैठे हैं, उसके सामने घुटने नहीं टेकेंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">सुषमा और जेटली, दोनों को आडवाणी दो दशक से भी पहले से राजनीति का ककहरा सिखा रहे हैं और दोनों की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं. सुषमा आज भी आडवाणी का पूरा सम्मान करती हैं पर आरएसएस की प्रिय पात्र बनने को भी आतुर हैं. आडवाणी के एक करीबी सूत्र की मानें तो आडवाणी इस बात से सबसे अधिक आहत होते हैं पर वे यह भी समझते हैं कि सुषमा को अपने भविष्य की बात भी सोचनी है. लेकिन आडवाणी जेटली को कभी माफ नहीं कर सकते जिन्होंने खुलेआम मोदी का साथ दिया. जेटली मानते हैं कि सुषमा हमेशा आडवाणी की लाडली रही हैं. बीजेपी जब नितिन गडकरी का उत्तराधिकारी तलाश रही थी तब आडवाणी ने सुषमा के नाम का प्रस्ताव रखा था. आडवाणी इस बात से खफा हैं कि जेटली पार्टी अध्यक्ष पद के लिए समर्थन पाने की खातिर आरएसएस नेता सुरेश सोनी की शरण में गए थे.</p>
<p style="text-align: justify;">अविश्वास की खाई बहुत गहरी हो चुकी है. जेटली मीडिया से काफी दूरी रख रहे हैं जो उनका स्वभाव नहीं है. चुनाव प्रभारी के नाते वे सप्ताहांत में कर्नाटक दौरों में व्यस्त रहे. पार्टी के कोर ग्रुप की बैठक में शामिल हुए उन्हें महीना बीत चुका है जिसमें सुषमा, राजनाथ, गडकरी और आरएसएस के नुमाइंदे रामलाल शामिल हैं. पार्टी के सभी अहम फैसले आडवाणी के घर पर कोर ग्रुप की बैठक में होते हैं. कयास लगाया जा रहा है कि अगर मोदी की स्वीकार्यता पर सवाल उठे तो वे प्रधानमंत्री पद के लिए जेटली के नाम का प्रस्ताव रख सकते हैं. और फिर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और बीजू जनता दल के नेता नवीन पटनायक के साथ जेटली के संबंध खासे मधुर हैं. आरएसएस को भले ही पसंद न हो पर अगर कोई विकल्प न हो तो वह भी शायद अरुण जेटली के नाम पर मुहर लगा दे.</p>
<p style="text-align: justify;">सुषमा भी चुपचाप अपनी पैठ बढ़ाने में लगी हैं. जानकार सूत्र बताते हैं कि पिछले कुछ हफ्तों में वे शिवसेना के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के संपर्क में रही हैं. 1 मई को शिवसेना पार्टी बैठक में उद्धव ने कहा भी था कि बीजेपी को प्रधानमंत्री पद के दावेदार की घोषणा करने से पहले सहयोगियों से सलाह करनी चाहिए. उद्धव ने पार्टी को याद दिलाया कि उनके पिता दिवंगत बालासाहेब ठाकरे ने कहा था कि सुषमा में प्रधानमंत्री पद के लिए सभी गुण हैं. एनडीए के प्रमुख सहयोगी जनता दल-यूनाइटेड जेडीयू के प्रति उनका सहज स्नेह है. संसद के केंद्रीय कक्ष में सुषमा अकसर एनडीए के संयोजक और अपने पुराने समाजवादी सहयोगी शरद यादव के साथ दिखती हैं. महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे जान-बूझकर आरएसएस के साथ खड़ी रहती हैं. आरएसएस जब गडकरी को दूसरा कार्यकाल दिलाने में जुटा था तो सुषमा ने बड़ी सफाई से बीच का रास्ता अपनाए रखा. उनकी पूरी कोशिश थी कि अगर कांटा फंस गया तो प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए वे सुरक्षित उम्मीदवार के तौर पर उभर सकती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">नागपुर का खेल</p>
<p style="text-align: justify;">मुश्किल तो यह है कि राजनाथ भी सुरक्षित दावेदारी के जुगाड़ में हैं. जब बाकी सब नेता अध्यक्ष पद की दौड़ से हटा दिए गए तब उनकी ताजपोशी हुई. हकीकत यह है कि आरएसएस उन्हें पसंद करता है और इससे उनका पलड़ा भारी रहा है. राजनाथ को उम्मीद है कि जिस सितारे ने उन्हें पार्टी के अध्यक्ष की कुर्सी दिलाई वही शायद 2014 की दौड़ में भी साथ दे जाए. अब उनकी नजर प्रधानमंत्री की गद्दी पर है और हौसला तो देखिए कि वे खुद को अटल बिहारी वाजपेयी के बाद बताने की जुगत में लगे हैं. जनवरी में उनके अध्यक्ष बनने के बाद से कम से कम उनके वफादार तो यही साबित करने में लगे हैं. एक करीबी का कहना था कि वे भी वाजपेयी की तरह हिंदी प्रदेश यानी उत्तर प्रदेश के हैं, हिंदी भाषा पर उनकी पकड़ और वाक्पटुता भी वाजपेयी जैसे ही है.</p>
<p style="text-align: justify;">नवनियुक्त महासचिव वरुण गांधी ने शायद इसी प्रचार से प्रेरणा लेकर 1 मई को बरेली में एक चुनाव सभा में राजनाथ की तुलना वाजपेयी से की थी. फिलहाल राजनाथ भी वरुण को उत्तर प्रदेश में पार्टी का चेहरा बता रहे हैं. राजनाथ और वरुण का यह परस्पर प्रशंसा अभियान हिंदुत्व के मुद्दे पर पार्टी की दुविधा भी दिखाता है. बीजेपी अब तक यह पूरी तरह तय नहीं कर पाई कि वह हिंदुत्व के साथ खड़ी है या राष्ट्रवाद की आग में तपे प्रशासन के साथ है.</p>
<p style="text-align: justify;">राजनाथ जानते हैं कि मोदी के रथ को घुमाने में ही अकलमंदी है. उत्तर प्रदेश में पार्टी का सर्वे बताता है कि अगर मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया जाए तो पार्टी के 22 प्रतिशत वोट शेयर में 12 प्रतिशत इजाफा हो जाएगा. लेकिन औरों की तरह राजनाथ भी मातृभूमि का कर्ज चुकाने के गुजरात के मुख्यमंत्री के जुनून से घबराते हैं. गुजरात की एक अनकही राजनैतिक सच्चाई यह भी है कि मोदी ने बीजेपी में अपने कद के आसपास का भी कोई नेता नहीं छोड़ा है. संघ परिवार उनसे इसलिए परेशान है कि उन्होंने राज्य में आरएसएस की उपस्थिति बड़ी चतुराई से कम कर दी है. उन्होंने आरएसएस के संजय जोशी को गुजरात से भगाकर ही दम लिया और राज्य में विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगडिय़ा को मानो अवांछित बना दिया. आरएसएस को उनका तानाशाही अंदाज तनिक नहीं सुहाता फिर भी उसने बेमन से मान लिया है कि बीजेपी की सरकार बनने की सबसे ज्यादा उम्मीद तभी है जब नरेंद्र मोदी एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हों.</p>
<p style="text-align: justify;">आरएसएस अगर किसी व्यक्ति को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता तो वे हैं आडवाणी. वे भले ही अपनी उम्मीदवारी खुलेआम पेश न कर रहे हों पर अपने लिए ऐसी हैसियत तो अवश्य चाहते हैं कि इस मामले में उनकी बात सुनी जाए. पार्टी के निर्माता के रूप में अपने कद के मुताबिक रचनात्मक भूमिका निभाने की बजाए वे खुद को ऐसा शहीद साबित करने में जुटे हैं जिसे उसकी सही हैसियत से महरूम किया गया है. वे जेटली को गिराने के लिए सुषमा का नाम उछाल देते हैं और अगर मोदी की उपलब्धियां छोटी करनी हों तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम ले लेते हैं. आरएसएस के एक नेता का कहना है कि उनके कद के नेता को सबको बांटने की बजाए एकजुट करना चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;">आरएसएस से आडवाणी का संघर्ष पुराना है. एक जमाने में हिंदुत्व के प्रतीक आडवाणी ने 2005 में बीजेपी अध्यक्ष के नाते पाकिस्तान यात्रा के दौरान मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ करके आरएसएस का समर्थन खो दिया. उन्हें कुर्सी छोडऩी पड़ी और आरएसएस ने राजनाथ को उनका उत्तराधिकारी चुन लिया. बीजेपी के साथ आरएसएस के रिश्तों में यह अहम मोड़ था. उसने पार्टी के मामलों की लगाम अपने हाथ में ले ली और केंद्रीय स्तर पर संगठन मंत्री के रूप में अपने प्रतिनिधियों की संख्या एक से छह करके पार्टी में अपनी पकड़ मजबूत कर ली.</p>
<p style="text-align: justify;">आरएसएस ने जिला और मंडल स्तर तक पार्टी में अपनी पैठ बना ली है. राजनाथ का कार्यकाल पूरा होने पर आरएसएस ने अपने एक और चहेते गडकरी को चुना. पूर्ति कंपनी समूह पर वित्तीय घोटालों के आरोप लगने के बाद भी गडकरी को एक और बार अध्यक्ष बनाने की आरएसएस की जिद से भ्रष्टाचार से लड़ाई में बीजेपी के नैतिक आधार को बहुत चोट लगी. आडवाणी के नेतृत्व में पार्टी के भीतर मिनी बगावत और गडकरी की कंपनियों पर आयकर के छापों ने आरएसएस को हाथ खींचने पर मजबूर कर दिया. वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने बीजेपी अध्यक्ष के चुनाव में गडकरी के मुकाबले दावेदारी भी पेश कर दी थी.</p>
<p style="text-align: justify;">रणनीतिक गलतियां</p>
<p style="text-align: justify;">संघ राजनाथ सिंह को दोबारा पार्टी का अध्यक्ष बनवाकर आडवाणी का कद छांटने में कामयाब रहा. वह अब भी बीजेपी को राजनाथ और संगठन मंत्रियों के माध्यम से मैनेज कर रहा है. आरएसएस के कुछ लोगों जैसे प्रभात झा और ओम माथुर को तो राज्यसभा में भेजा जा चुका है. बीजेपी के एक नेता चेताते हैं, ‘‘संघ अब पाश्व में रहकर काम करने वाले राष्ट्रवादी संगठन से सक्रिय राजनैतिक संगठन में तब्दील हो रहा है. यह चिंताजनक बदलाव है.” पार्टी के वरिष्ठ नेता अब भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए जूझ रहे हैं, हालांकि इस पर आखिरी फैसला आरएसएस को ही करना है.</p>
<p style="text-align: justify;">बीजेपी के नेताओं को एक-दूसरे को छोटा दिखाने के लिए खुसुर-फसुर करना ज्यादा भाता है बजाय इसके कि एक साथ बैठ कर वे यूपीए को हराने की कोई रणनीति तैयार कर पाते. पार्टी के एक नेता कहते हैं, “बीजेपी इस खामखयाली में है कि यूपीए अपने आप ही हार जाएगी और केंद्र में अगली सरकार तो उसी की बननी है. अगर वे ऐसे ही लड़ते-झगड़ते बिना तैयारी के लोकसभा चुनाव में उतरे तो उन्हें बड़ा झटका लग सकता है.” अब तक पार्टी ने अपना घर दुरुस्त करने की न कोई कवायद की है, न ऐसा कोई संकेत ही दिया है. संसद के भीतर भी उन्हें रोड़ा अटकाने वाला ही माना जाता है. बीजेपी नेता कहते हैं, ‘विधेयकों को पारित होने से रोकना और संसदीय राजनीति को बाधित करने में दिक्कत नहीं है लेकिन उन्हें स्पष्ट तौर पर बताना होगा कि जनता के लिए उनके पास विकल्प के तौर पर क्या है. पार्टी अपने स्वाभाविक समर्थक मध्य वर्ग का भरोसा भी खोने के कगार पर खड़ी है.” इसे दुरुस्त करने के लिए उसके पास कोई योजना नहीं है.</p>
<p style="text-align: justify;">असल मसला अर्थव्यवस्था का है</p>
<p style="text-align: justify;">सत्ता हासिल करने में बीजेपी इतनी ज्यादा उलझ गई है कि उसने नीति तैयार करने का काम तकरीबन भुला ही दिया है. उसका आर्थिक एजेंडा धुंधला है. सरकार में 1998 से 2004 के बीच रहते हुए बीजेपी आर्थिक सुधारों की कट्टर समर्थक थी. वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने ही मल्टीब्रांड रीटेल में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जैसे उपायों का प्रस्ताव किया था. एक दशक बीता नहीं कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने अवसरवादी रुख अपनाते हुए सितंबर 2012 में रीटेल में एफडीआइ का विरोध कर डाला जबकि खुद मोदी जैसे अपने कुछ मुख्यमंत्रियों के साथ वह इस मसले पर टकराव में आ गई. उसके कुछ मुख्यमंत्रियों ने सभी क्षेत्रों में एफडीआइ का स्वागत किया है. अब पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व इंश्योरेंस सेक्टर में एफडीआइ की सीमा को बढ़ाने का विरोध कर रहा है जबकि उसने पारंपरिक रूप से इसका हमेशा समर्थन किया है.</p>
<p style="text-align: justify;">आर्थिक नीतियों पर पार्टी का रूढ़िवादी रवैया कांग्रेस से उसके फर्क को मिटा देता है. जिस वक्त मतदाता एक वैकल्पिक सुधारवादी एजेंडे की तलाश में है, पार्टी सुधारों के विरोध में जा खड़ी हुई है. वह वाजपेयी की एनडीए सरकार ही थी जिसने 1999 में पहली बार विनिवेश के लिए बाकायदा एक मंत्रालय ही खोल दिया था. यूपीए ने बाद में उसे विभाग में तब्दील करते हुए 2004 में वित्त मंत्रालय के अधीन ला दिया, हालांकि एनडीए सरकार के तहत अरुण शौरी के नेतृत्व में 2000 से 2004 के बीच यह मंत्रालय काफी सक्रिय था. इसने कई बड़े विनिवेश किए, जिनमें सबसे ज्यादा मशहूर कदम भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का फैसला था. यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि आज बीजेपी आर्थिक नीतियों पर शौरी से परामर्श करने के बारे में भी नहीं सोचती है. जैसा कि एक विश्लेषक कहते हैं कि बीजेपी ने हिंदुत्व के खांचे के बाहर एक अलग आख्यान गढऩे की दिशा में कम ही काम किया है.</p>
<p style="text-align: justify;">वे कहते हैं, “यदि आप अलग तरह की पार्टी होने का दावा करते हैं तो अलग रह कर दिखाइए भी. जैसे टोनी ब्लेयर ने न्यू लेबर पार्टी बनाई, आप भी नई बीजेपी खड़ी कीजिए.” इसके उलट होता यह है कि जब कभी पार्टी संकटग्रस्त होती है, उसे हिंदुत्व का परचम लहराने के अलावा कोई और उपाय नहीं सूझता. वह एक मामूली सी सच्चाई नहीं समझती है कि भारत अयोध्या को कब का पीछे छोड़ चुका है और पार्टी को आज धार्मिक राष्ट्रवाद की थकी हुई विचारधारा नहीं बल्कि परिवर्तनकारी विचारों की जरूरत है. उसे आरएसएस को प्रिय हिंदुत्ववाद और शहरी महत्वाकांक्षी जनता को प्रिय सुशासन के दो ध्रुवों के बीच संतुलन साधने की जरूरत है.</p>
<p style="text-align: justify;">सिरफुटौवल में लगी पार्टी ने हालांकि रणनीति पर बहुत ध्यान नहीं दिया और इसकी कीमत भी चुकाई है. कर्नाटक की हार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. पार्टी लंबे समय तक भ्रष्टाचार से दागदार बी.एस. येद्दियुरप्पा के खिलाफ कार्रवाई करने में टालमटोल करती रही. आडवाणी चाहते थे कि येद्दियुरप्पा नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री के पद से खुद इस्तीफा दें जबकि पार्टी अध्यक्ष गडकरी ने ज्यादा व्यावहारिक रवैया अपनाते हुए येद्दियुरप्पा का समर्थन किया क्योंकि उन्होंने अपने दम पर 2008 में इकलौते दक्षिण भारतीय राज्य में बीजेपी को विजय दिलाई थी. मोदी और जेटली कहीं ज्यादा महीन रणनीति में भरोसा रखते थे जबकि रेड्डी बंधुओं से अपने करीबी रिश्ते के चलते सुषमा येद्दियुरप्पा के प्रति नरम थीं. गली जनार्दन रेड्डी और सोमशेखर रेड्डी ने सुषमा की मदद की थी जब वे 1999 में बेल्लारी से सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव में खड़ी हुई थीं. वह तो तत्कालीन लोकायुक्त एन. संतोष हेगड़े ने जब जुलाई 2011 में अवैध खनन पर अपनी रिपोर्ट में रेड्डी बंधु और येदियुरप्पा को दोषी ठहराया तब जाकर इन सबको इस्तीफा देना पड़ा था. तब रेड्डी बंधु कर्नाटक सरकार में कैबिनेट मंत्री हुआ करते थे.</p>
<p style="text-align: justify;">कर्नाटक में बीजेपी का गढ़ ढहाने का श्रेय खराब प्रशासन को उतना नहीं जाता जितना इसके लिए खराब राजनैतिक प्रबंधन जिम्मेदार है, बिलकुल हिमाचल और उत्तराखंड की तर्ज पर. उत्तराखंड में केंद्रीय नेतृत्व ने बी.सी. खंडूड़ी को वापस बुलाने में टालमटोल बरता और आखिरकार जब मार्च, 2012 के चुनाव से बमुश्किल छह महीने पहले यह फैसला किया भी गया तब तक काफी देर हो चुकी थी. पार्टी को नहीं बचाया जा सका. हिमाचल प्रदेश के मामले में तो जेटली ने 2012 के चुनाव नतीजों के बाद खुद स्वीकार भी किया था कि बीजेपी की हार के पीछे एक वजह “पार्टी के भीतर हुई बगावत्य” थी.</p>
<p style="text-align: justify;">यह विडंबना ही है कि जो पार्टी केंद्र में लडख़ड़ाई हुई है, वह अब भी देश के कुछ बेहतर प्रशासित राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और गोआ में राज चला रही है तथा पंजाब और बिहार में गठबंधन सरकार का हिस्सा है. इन राज्यों में बीजेपी गुणवत्तापूर्ण राजकाज वाली पार्टी के तौर पर उभरकर सामने आई है. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह का खाद्य सुरक्षा विधेयक सोनिया गांधी के केंद्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के लिए नजीर साबित हुआ जिसे कांग्रेस संसद में पारित करवाने में जुटी है. मध्य प्रदेश ने 2012-13 में अर्थव्यवस्था में तेज वृद्धि दर हासिल की और बिहार को शीर्ष से लुढ़का दिया. मोदी ने रोजगार सृजन और उद्योगीकरण का रास्ता गुजरात में दिखाया है तो गोआ के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर ने अवैध खनन को बंद करने और राजस्व कमाने के कई नए तरीके निकाले हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इन राज्यों में राजकाज के क्षेत्र में सफलता के झ्ंडे गाडऩे के बावजूद बीजेपी को केंद्रीय स्तर पर इनसे कोई लाभ नहीं मिला है. इसके उलट कई क्षेत्रीय क्षत्रप प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए खयाली घोड़े दौड़ाने में जुट गए हैं. पार्टी की प्रवक्ता निर्मला सीतारमन कहती हैं कि इतने सारे नेताओं का होना पार्टी में मजबूत लोकतंत्र को दिखाता है. वे इस बात से इनकार करती हैं कि पार्टी के नेता एक साथ मिलकर काम नहीं कर रहे. वे कहती हैं, “यह कहना अब फैशन हो चला है कि बीजेपी ने संकटग्रस्त यूपीए से उपजे हालात का फायदा नहीं उठाया. अभी वक्त है. हम सही समय आने पर अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित करेंगे.”</p>
<p style="text-align: justify;">पार्टी को ऐसे नेता की जरूरत है जिसके पास विचार हो और जो देश में आधुनिक दक्षिणपंथी पार्टी की खाली जगह को भर सके. उसे 21वीं सदी के भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक महत्वाकांक्षाओं को समझना होगा. लोकसभा चुनाव सिर पर हैं, क्या ऐसे वक्त में बीजेपी हार की हैट्रिक को बरदाश्त कर पाएगी?</p>
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