उत्तराखण्ड राज्य की मांग बेरोजगारी को लेकर शुरु हुई थी

१९९४ में  उत्तराखण्ड के छात्रों ने आंदोलन प्रारम्‍भ कर राज्‍य आंदोलन की नींव रखी थी-  कांग्रेस आज १6 साल बाद भी क्यों सुसुप्त अवस्था में है।हर संग हरदा  के तहत रोजगार गारंटी कार्ड लांच करने तक सीमित होकर रह गयी- वह भूल गयी कि राज्‍य गठन के बाद बेरोजगारों से क्‍या वादा किया था-   

उत्‍तराखण्‍ड में कांग्रेस का आरोप- भाजपा द्वारा प्रत्येक वर्ष 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वादा किया था, अबतक 1लाख 35हजार को ही रोजगार मिला।
वही उत्‍तराखण्‍ड में कांग्रेस नेता कुमारी शैलजा ने रोजगार गारंटी कार्ड लांच किया – हर संग हरदा के तहत यह लांच किया गया
परन्‍तु राजनीतिक दलों के लिए बेरोजगार चुनाव के दौरान उनके अस्‍थाई श्रमिक मात्र है- क्‍यों है ऐसा- उत्‍तराखण्‍ड में बेरोजगारी पर चन्‍द्र शेखर जोशी सम्‍पादक का एक्‍सक्‍लूसिव आलेख- 
”जो भूखा प्यासा है उससे प्रजातंत्र की बात करना बेहूदगी“
Execlusve STORY; by CHANDRA SHEKHAR JOSHI –Dehradun
High Lights; UKराज्‍य आंदोलन में ४२ शहीदों ने जान दी #स्वतंत्रता संग्राम में भी इतना बलिदान देने की जरुरत नहीं पडी   #उत्तराखण्ड नये राज्य की मांग बेरोजगारी को लेकर #४८ घण्टे में विकल्पधारियों को उ०प्र० भेजने का नारा दिया था कांग्रेस ने #परन्‍तु हुआ क्‍या- यूपी से कार्यमुक्त उत्तराखंड में ज्वाइनिंग देने आये #वही उत्‍तराखण्‍ड में उपनल से अस्‍थाई, तदर्थ, गेस्ट टीचर, अंशकालिक, शिक्षा बंधु, शिक्षा मित्र भी बडी मुश्‍किल से नियुक्‍त किये जाते रहे #बेरोजगारों के प्रति उपेक्षात्मक नीति #”जो भूखा प्यासा है उससे प्रजातंत्र की बात करना बेहूदगी है“ ;प्रसिद्ध राजनीति विशेषज्ञ काबल बैकर #उत्तरांचल राज्य गठन में बेरोजगारी भी एक महत्वपूर्ण कारण #कांग्रेस ने राज्य में बेरोजगारों की इस भावना को महसूस कर प्रत्येक वर्ष दो लाख बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने की घोषणा अपने चुनावी घोषणा पत्र में कर राज्‍य गठन के बाद सत्ता में आयी थी #बेरोजगारों ने राज्य बनने पर रोजगार का सपना संजोया #राज्‍य में सत्‍तासीन रही पार्टियों ने बेरोजगार युवाओं को अवैध शराब, जुआ, अवैध खनन, सरकारी धन का दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, अपराध का बोलबाला, आये दिन के राज्य व्यापी बंद मे धकेल दिया #और नौकरशाही व राजनीतिज्ञों ने उत्‍तराखण्‍ड के संसाधनों को लूटने में रिकार्ड बना दिया#एक्‍सक्‍लुसिव रिपोर्ट- चन्‍द्रशेखर जोशी – csjoshi_editor@yahoo.in
क्या इसी उत्तराखण्ड राज्य के निर्माण के लिए राज्य के ४२ शहीदों ने जान दी थी, महिलाओं तथा युवकों ने बलिदान दिया था। स्वतंत्रता संग्राम में भी इतना बलिदान देने की जरुरत नहीं पडी थी।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ पहुंचे रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने ९ जुलाई १५ को कहा कि आर्थिक पिछडेपन और बेरोजगारी की वजह से आतंकवाद को बढावा मिलता है। भाजपा सरकार ने उत्‍तराखण्‍ड के बेरोजगारों को नौकरी से भर दया क्‍या- यह सवाल उठ रहा है- 

 उत्तराखण्ड नये राज्य की मांग बेरोजगारी को लेकर शुरु हुई थी। राज्य गठन के १6 साल बाद भी बेरोजगारों की ओर प्रदेश सरकार उदासीन नही ठगने वाला रवैया अपनाती रही है। राज्‍य गठन के बाद सत्‍ता में आने के लियेे ४८ घण्टे में विकल्पधारियों को उ०प्र० भेजने की बात कांग्रेस ने कही थी, परन्‍तु  कांग्रेस आज १6 साल बाद भी क्यों सुसुप्त अवस्था में है।हर संग हरदा  के तहत रोजगार गारंटी कार्ड लांच करने तक सीमित होकर रह गयी- वह भूल गयी कि राज्‍य गठन के बाद बेरोजगारों से क्‍या वादा किया था-   

राज्य के विद्यालयों में पद रिक्त होने के बाद भी उत्‍तराखण्‍ड के बेरोजगार तदर्थ, गेस्ट टीचर, अंशकालिक, शिक्षा बंधु, शिक्षा मित्र तक ही सीमित होकर रह गये हैं। इनके लियेे  सरकार चाहे भाजपा या कांग्रेस, वह नीतिगत  निर्णयों में असफल साबित हुई।
वही उत्तराखण्ड राज्य सरकार की बेरोजगारों के प्रति उपेक्षात्मक नीति के कारण राज्य का बेरोजगार नौजवान हिंसात्मक रास्ते पर चला जाये और शांत उत्तराखण्ड कल को दहकने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं। बेरोजगारी के कारण माओवादी पहाड के बेरोजगारों को अपना हथियार बना सकते हैं। प्रसिद्ध राजनीति विशेषज्ञ काबल बैकर के शब्दों को उद्धत करना भी सटीक होगा- ”जहां चप्पे-चप्पे पर गरीबी हो, वहां तो यह संसदीय प्रजातंत्र सफल हो ही नहीं सकता। जो भूखा प्यासा है उससे प्रजातंत्र की बात करना बेहूदगी है।“
उत्तरांचल राज्य गठन में बेरोजगारी भी एक महत्वपूर्ण कारण था। कांग्रेस ने राज्य में बेरोजगारों की इस भावना को महसूस कर प्रत्येक वर्ष दो लाख बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने की घोषणा अपने चुनावी घोषणा पत्र में कर सत्ता में आयी थी परन्तु कांग्रेस सत्ता में लगातार रहने के पश्चात भी रोजगार उपलब्ध कराने में खरी नहीं उतरी वही राज्य में बेरोजगारों की बढती तादाद ने ठगी के धंधे को राज्य में जरुर बढावा दिया है। राज्य में अनेक प्रमुख शहरों में बेरोजगार युवा ठगी का शिकार बन रहे हैं। वही उत्तराखण्ड में सत्ता पर काबिज रहे नेताओं की भावना समाज सेवा नहीं रह गयी है बस किसी तरह मुख्यमंत्री के लगातार इर्द गिर्द बने रहे, और किसी विभाग में दायित्व मिल जाए, मात्र यह भावना रह गयी है।
ज्ञात हो कि राज्य गठन के पश्चात सरकार ने अपने नीतिगत निर्णयों में दो महत्वपूर्ण ऐलान किये थे। पहला तो दो साल में दो लाख लोगों को सरकारी व गैर सरकारी और स्वरोजगार के क्षेत्र में रोजगार मुहैया करना। विकल्पधारी वापस भेजे जाने में असफल हो जाने पर राज्य सरकार अपने नीतिगत निर्णय में ही असफल साबित हुई है।
बेरोजगारों ने राज्य बनने पर रोजगार का सपना संजोया था लेकिन सरकार ने रोजगार की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया। सरकार द्वारा बेरोजगारों को बहकाने का प्रयास होता रहा। सबसे पहले  राज्य सचिवालय में उ०प्र० के कर्मचारियों का ढेर लगा दिया गया। पिछले तीन सालों के दौरान अनेक विभागों, निगमों, संस्थानों में पिछले दरवाजे से नियुक्तियां होती रही। विगत वर्ष 2016 में विधानसभा में ही 100 से ज्‍यादा नियुक्‍तियां सिर्फ अपनी विधानसभा क्षेत्र से पिछले दरवाजे से गुपचुप ढंग से कर ली गयी,  विधानसभा अध्‍यक्ष से जब मीडिया ने सवाल पूछा तो वह कन्‍नियां काटते नजर आये- 

यह रवैया राज्‍य गठन के बाद से चल रहा है, विधानसभा और सचिवालय में काम की अधिकता और कर्मचारियों की कमी का बहाना बनाकर सुनियोजित तरीके से बडे पैमाने पर गोपनीय रूप से बाबुओं और चतुर्थ श्रेणी कर्मियों की मनमाने ढंग से नियुक्तियां होती रही हैं, इसे  शासन स्तर कभी घोषित नहीं किया गया। हजारों नियुक्तियां भाई-भतीजावाद व मोटे नोट लेकर की गयी। यद्यपि दिखावे के तौर पर ये सभी नियुक्तियां अस्थायी या संविदा के आधार पर दिखाकर की जाती रही है , पर एक बार नियुक्त होने पर नियमित तो होना ही है, इसके पीछे यह सिद्धांत कार्य कर रहा है। उत्तरांखण्‍ड  शासन के किसी भी विभाग ने तृतीय या चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को रखने का विज्ञापन प्रकाशित नहीं किया।

बेरोजगारों के प्रति उपेक्षात्मक नीति के कारण राज्य का बेरोजगार नौजवान हिंसात्मक रास्ते पर चला जाये और शांत भारत कल को दहकने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं। बेरोजगारी के कारण माओवादी उत्तरांचल के बेरोजगारों को अपना हथियार बना सकते हैं। प्रसिद्ध राजनीति विशेषज्ञ ने काबल बैकर के शब्दों को उद्धत करना भी सटीक होगा- ”जहां चप्पे-चप्पे पर गरीबी हो, वहां तो यह संसदीय प्रजातंत्र सफल हो ही नहीं सकता। जो भूखा प्यासा है उससे प्रजातंत्र की बात करना बेहूदगी है।“
पर्वतीय राज्य की जनता दुखी हैं। पहाड में बेरोजगारी की भयंकर स्थिति है। पहाड के नौजवान युवक क्या करें? राज्य में नौकरशाह व मंत्रियों का विकास होता रहा है। सम्पूर्ण राज्य अवैध शराब, जुआ, अवैध खनन, सरकारी धन का दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, अपराध का बोलबाला, आये दिन के राज्य व्यापी बंद तक सीमित होकर रह गया है। स्थानीय विधायक जनता की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे। विभिन्न मदों के लिए करोडों रुपए व्यय किये जा रहे हैं, पर इसके बावजूद भी विकास कार्य दिख नहीं रहे हैं। राजनैतिक हस्तक्षेप से भ्रष्टाचार किस कदर फैला है, हमारे न्‍यूज पोर्टल www.himalayauk.org ने समय-समय पर इसको स्वयं जनता के सामने रखा है।

१९९४ में  उत्तराखण्ड के छात्रों ने आंदोलन प्रारम्‍भ कर राज्‍य आंदोलन की नींव रखी थी- 

ज्ञात हो कि १९९४ में उ०प्र० सरकार ने शिक्षण संस्थाओं में २७ प्रतिशत ओ०बी०सी० के लिए आरक्षण का आदेश जारी किया तो इसके विरोध में उत्तराखण्ड के छात्रों ने आंदोलन प्रारम्भ कर दिया। इस आंदोलन का उत्तराखण्ड क्रांति दल ने समर्थन किया। दिनक २-८-९४ को पौडी में उत्तराखण्ड क्रांति दल के नेताओं द्वारा समर्थित छात्रों और जनता की रैली के पश्चात उत्तराखण्ड क्रांति दल के वयोवृद्ध नेता इन्द्रमणी बडोनी, बाबा मथुरा प्रसाद बमराडा आदि भूख हडताल पर बैठ गये थे । ७-८-९४ को भूख हडतालियों को हास्पिटल में स्थानान्तरित कर दिया गया और पुनः उन्हें ८-८-९४ को मेरठ भेज दिया गया। सरकार की कार्यवाही और पुलिस के क्रूर व्यवहार के कारण सारे जिले गढवाल और अल्मोडा, नैनीताल तक आंदोलन उग्र हो गया और छात्रों द्वारा प्रारम्भ किया हुआ आंदोलन जनता का आंदोलन बन गया। आंदोलन जब तीव्र हो गया तो उत्तराखण्ड क्रांति दल ने अपने साथ अन्य दलों के कार्यकर्ताओं को मिलाकर आंदोलन के संचालन के लिए २९-८-९४ और ३०-८-९४ को मीटिंग में निश्चय कर उत्तराखण्ड संयुक्त संघर्ष समिति बनाई और सितम्बर से बहुत बडे पैमाने पर आंदोलन चलाने की योजना बनाई। काशी सिंह ऐरी इसके अध्यक्ष और इन्द्रमणी बडोनी संरक्षक निर्वाचित किये गये।
दिनांक १-९-९४ को खटीमा में करीब १२ हजार जन समूह के जुलूस पर पुलिस द्वारा गोली चलाने के कारण १२ व्यक्ति मारे गये और २०० घायल हुए।
दिनांक २-९-९४ को पुलिस की गोलियों से सर्व श्री धर्मपाल सिंह, मदन मोहन ममगाई, राय सिंह बंगारी, बलवीर सिंह नेगी, श्रीमती हंसा देवी और श्रीमती बेलमती चौहान मारे मारे गये। सैकडों लोग घायल हुए और कई जेल भेज दिये गये।
मुजफ्फरनगर क्षेत्र के रामपुर तिराहा काण्ड में दिल्ली जा रहे उत्तराखण्डी राज्य समर्थकों के बसों पर हमला कर १-१०-९४ की रात और २-१०-९४ की सुबह पुलिस की गोलियों से १६ व्यक्ति हताहत हुए और १४५० व्यक्ति घायल हुए। कई पकड कर जेल भेजे गयें, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हुआ। १० नवम्बर १९९५ को श्री यंत्र टाूप काण्ड में योगेश्वर बेंजवाल और राजेश रावत हताहत हुए।
इस तरह उत्तराखण्ड क्रांति दल के लम्बे संघर्ष के बाद ९ नवम्बर २००० को उत्तरांचल का स्वप्न साकार तो हुआ पर सन् २००४ तक यह साफ हो गया कि यह लडाई अभी अधूरी है।
बेरोजगारी का आलम यह है कि जितने उत्तराखण्डी उत्तराखण्ड के भीतर रहते हैं, उतने ही रोजगार के लिए बाहर जाते हैं। रानीबाग की एच.एम.टी. फैक्ट्री तथा काशीपुर व जसपुर की कताई मिल में हजारों श्रमिक काम करते थे, इन्‍हें भूखमरी के कगार पर छोड दिया गया, इसके अलावा सलोरा तथा अनेक तमाम फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं क्योंकि कांग्रेस इनको सब्सिडी का लालच देकर लायी थी न कि फैक्ट्रियां चलाकर श्रमिकों को रोजगार देने। उ०प्र० के बेरोजगारों को भी भारी राशि खर्च कर उत्तरांखण्‍ड  स्थाई निवासी प्रमाण पत्र बनवाया गया, जिससे आज इस नवगठित राज्य के बेरोजगार ठगे से खडे हैं। जमीन, रोजगार, विकास, शिक्षा आदि के मुद्दे हल न होने पर जनता के समक्ष अभी भी आन्दोलन या अपनी मौत स्‍वयं मरने के सिवाय कुछ नहीं बचा है। राज्य का औद्योगिक विकास निगम सिडकुल भ्रष्ट अधिकारियों का अड्डा बनता गया  है, जहां मुख्‍यमत्री के सलाहकारों की यह ऐशगाह जरूर बन गया है,  जबकि इससे पूर्व जिला उद्योग केन्‍द्र बेरोजगारों के लिए काफी कार्य करता था, उसको तो मानो समाप्‍तप्राय ही कर दिया गया।

वही प्रदेश में भूमिहीन की आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। ऊधम सिंह नगर में भूमिहीन आन्दोलित रहे हैं, आज तक सूबे में किसी भी भूमिहीन को भूमि आवंटित नही हुई जबकि पूंजीपतियों को लगातार जमीन आवंटित होती रही, वहीं कोटाबाग (नैनीताल) में १९५० से भूमि के एलाटमेन्टि स्वतंत्रता सेनानियों को आज तक पट्टा नहीं मिल पाया है।
राज्‍य गठन के बाद सत्‍ता में आई पूर्ववर्ती कांग्रेस की तिवारी सरकार ने रामनगर में ५०० करोड की भूमि हयात रिजेंसी होटल कम्पनी को कौडयों के भाव देकर अरबों का भूमि घोटाला किया था । नैनीताल जिले में कार्बेट नेशनल पार्क से जुडी हुई ३२५ हैक्टेयर जमीन बिना कैबिनेट की स्वीकृति के ईको टूरिज्म के नाम पर रामनगर ईको पार्क प्राइवेट लिमिटेड को सौंप दी गयी थी । इन सबसे राज्य को कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई लाभ नहीं मिला।
राज्‍य बनने के बाद लगातार भूमि घोटाला होता रहा, देहरादून में जी यूनिवर्सिटी को सैकडो बीघा जमीन फ्री में दे दी गयी, इस यूनिवर्सिटी में राज्‍य के किसी गरीब छात्र/छात्रा की कभी कोई फीस माफ नही हुई, राज्‍य के कितने बेरोजगारों को रोजगार दिया गया, यह सवाल कभी इन सत्‍ताधीशों को पूछने की जरूरत ही महसूस नही हुई, कारण – इनका पेट लगातार भरते रहे- फ्री में जमीन पाने वाले सफेदपोश  ।

यह हाल कांग्रेस सरकार के समय भी तथा भाजपा सरकार के समय भी होता रहा।
राज्य गठन के बाद भी बेरोजगारो  बुनियादी समस्याएं ज्यों की त्यों रह गयी हैं। तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री तिवारी ने मंत्री कम करने वाला संविधान संशोधन को ही बेमानी सिद्ध कर दिया था, उन्होंने २०० लालबत्तियां बंटी थी, रही सही कसर अब सूबे की हरीश रावत सरकार ने पूरी कर दी। ,
वही अतिवृष्टि से, सूखे से राज्य का किसान बर्बाद हो गया पर पर्याप्त मुआवजा कभी नहीं मिल पाता। राज्य में आपदा प्रबन्धन से कोई सहायता नहीं मिल पाती, जिला प्रशासन को आवंटित धन भी आखिर में लैप्स हो जाता है। वही इस राज्य की यह विडम्बना है कि कैसा भी घोटाला हो जाए, जांच समिति बनती है, करोडों रूपये समिति में व्यय होते हैं, परन्तु उसे दबा दिया जाता है, कांग्रेस तथा भाजपा आज तक कभी एक दूसरे केे घोटालेे को  मीडिया की सुर्खिया तो जरूर बनवाते हैं पर क्‍या मजाल कि एक दूसरे के घोटाले को लेकर कार्यवाही करें- 

विधानसभा में अग्निकाण्ड व राजधानी खरीद में हुए घोटाले की जांच गठित समिति के निष्कर्ष कहां दबा दिये गये? कुला मिलाकर उत्‍तराखण्‍ड में सत्‍ता में सेवा भाव के लिए इस पर्वतीय राज्य को लूटना मुख्‍य उददेश्‍य रह गया हैं।

मेल- himalayauk@gmail.com (HIMALAYA GAURAV UTTRAKHAND) WEB & PRINT MEDIA

 

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