लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू – राजनीतिक पाला बदलने की जुगत

HIGH LIGHT; 2019 के लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद जगदंबिका पाल एक बार फिर राजनीतिक पाला बदलने की जुगत में हैं वही नीतिश कुमार ने कहा है कि वह भी इस महीने के आखिर तक इंतज़ार करने का मन बना चुके हैं ताकि आगे को रणनीति पर विचार कर सके. इस बीच एनडीए की सहयोगी दल आरएलएसपी ने बिहार में सियासी खीर पकाने की बात कह सियासी पारा चढ़ा दिया है, ज्ञात हो कि बिहार में एनडीए के चार घटक दल हैं. रामविलास पासवान ने साफ कहा है कि उनकी पार्टी सात सीटों से कम पर नहीं लड़ेगी वहीं उपेंद्र कुशवाहा भी अपने तेवर से जताते रहे हैं कि उन्हें भी ज़्यादा सीटें चाहिए. जेडीयू के पास फिलहाल दो सांसद हैं और उन्हें भी 15 सीटों से कम मंजूर नहीं. ऐसे में बीजेपी के लिए मुश्किल ये है कि जेडीयू को खुश करने के चक्कर में बाकी को नाराज़ ना कर दे. जेडीयू भी अपने सम्मान के साथ समझौता नहीं करने का फैसला चुकी है. सीट बंटवारे पर रस्सा कस्सी ज़ारी है.

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उत्तर प्रदेश की डुमरियागंज सीट से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद जगदंबिका पाल एक बार फिर राजनीतिक पाला बदलने की जुगत में हैं. ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कमल का साथ छोड़कर वह साइकिल की सवारी करते नजर आ सकते हैं. दरअसल, उत्तर प्रदेश से बीजेपी के कई मौजूदा सांसदों की 2019 में दावेदारी पर तलवार लटक रही है. बीजेपी आलाकमान दोबारा से कई सांसदों को मैदान में उतारने को लेकर तैयार नहीं है. माना जा रहा है कि बीजेपी के दो दर्जन ऐसे लोकसभा सदस्य हैं जिनके टिकट कट सकते हैं.
ऐसे में बीजेपी के ये सांसद नए राजनीतिक ठिकाने की तलाश में जुट गए हैं. 2014 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामने वाले जगदंबिका पाल को बीजेपी दोबारा से टिकट देकर मैदान में उतारे इसे यकीन के साथ कहा नहीं जा सकता है.
इस बीच जगदंबिका पाल की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसमें वह सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ बैठे नजर आ रहे हैं. तस्वीर में दोनों नेताओं के साथ एक और शख्स भी मौजूद है. बंद कमरे की यह मुलाकात राजनीतिक थी या फिर व्यक्तिगत, इस पर तो अभी सार्वजनिक तौर पर कोई जानकारी सामने नहीं आई है. लेकिन चुनावी तैयारियों के बीच यह मुलाकात कई अटकलों को जन्म जरूर दे रही है.

एक और मौके पर ऐसे ही तस्वीर देखने को मिली थी, जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद श्रद्धांजलि देने पंहुचे मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के करीब जगदंबिका पाल नजर आए थे. लेकिन सार्वजनिक जगह होने के चलते इस तस्वीर को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा गया.

हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले दोनों नेताओं के बीच हुई मुलाकात की तस्वीर सामने आने के बाद से सियासी मायने तलाश किए जाने लगे हैं. सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव से उनकी नजदीकियां पहले से जगजाहिर हैं. बता दें कि जगदंबिका पाल का राजनितिक सफर हमेशा से बड़ा उतार-चढ़ाव भरा रहा है. डुमरियागंज संसदीय क्षेत्र में मुस्लिम और यादव मतदाता की संख्या अच्छी खासी है. वहीं, सूबे में बनते राजनीतिक समीकरण में जगदंबिका पाल को एक बार जीत की उम्मीद नजर आ रही है. शायद यही वजह है कि जगदंबिका पाल सपा की ओर झुकते हुए दिखाई दे रहे हैं. जगदंबिका पाल ने अपना सियासी सफर कांग्रेस से शुरू किया था. इसके बाद नरेश अग्रवाल और राजीव शुक्ला के साथ मिलकर कांग्रेस पार्टी को तोड़कर अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस का गठन किया और कल्याण सिंह की सरकार को समर्थन दिया. पाल यूपी के ऐसे नेता हैं जो एक दिन के लिए मुख्यमंत्री भी बने थे. हालांकि, वह फिर कांग्रेस में वापसी कर गए. 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट से डुमरियागंज सीट से सांसद चुने गए थे. 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया. अब नए ठिकाने की तलाश में हैं.
वही दूसरी ओर
2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए 2014 जैसे नतीजे दोहराना मुश्किल नजर आ रहा है. खासकर उत्तर भारत के उन राज्यों में जहां बीजेपी ने पिछले लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों का सफाया कर दिया था. मौजूदा दौर में बीजेपी का समीकरण इन राज्यों में गड़बड़ाता नजर आ रहा है, ऐसे में पार्टी इस नुकसान की भरपाई के लिए ‘मिशन साउथ गठबंधन’ पर जुट गई है. बता दें कि दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडू और केरल ऐसे पांच राज्य हैं जिनमें करीब 130 लोकसभा सीटें हैं. 2014 के संसदीय चुनाव में बीजेपी इन राज्यों से कुल 20 सीटें ही जीत सकी थी. यही वजह है कि बीजेपी ने दक्षिण के इन राज्यों की लोकसभा सीटों पर खास फोकस किया है. इसके लिए वो क्षत्रपों के साथ गठबंधन करके अपनी जड़ों को मजबूत करना चाहती है. बीजेपी दक्षिण भारत की राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन की कवायद शुरू की है. बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह तमिलनाडु में गठबंधन के लिए प्रयास कर रहे हैं. हालांकि पार्टी की कोशिश है कि गठबंधन व्यवाहरिक तौर होना चाहिए. आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के साथ टीडीपी के रिस्ते बनते हुए नजर आ रहे हैं. ऐसे में बीजेपी चुनाव से पहले छोटे दलों के साथ हाथ मिलाने की कोशिशों में जुटी हैं.
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने बीजेपी नेता से हवाले से लिखा है, ‘इन पांच राज्यों में कांग्रेस की कमजोरी ही हमारी संभावनाएं है. हम सहयोगियों को साथ लेकर चलने में कांग्रेस से आगे हैं. बीजेपी बहुत बेहतर स्थिति में है और सहयोगी दलों के साथ टेबल पर बैठकर उनकी बातों पर खास तवज्जो देती है.’

 

बीजेपी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अपने मौजूदा सांसदों की उनके लोकसभा क्षेत्रों में लोकप्रियता जानने के लिए सर्वेक्षण कराएगी। बीजेपी ने 2014 के आम चुनाव में सभी सात सीटों पर जीत दर्ज की थी और 2019 में इस जीत को दोहराने के लिए बीजेपी चुनौतियों का सामना कर रही है। दिल्ली में बीजेपी के एक शीर्ष नेता के अनुसार सितंबर के पहले पखवाड़े में चुनाव पूर्व सर्वेक्षण एक कंसल्टेंसी कंपनी के द्वारा किया जाएगा।  उन्होंने बताया, “ इस सर्वेक्षण से न केवल इन सात सीटों के सांसदों की स्वीकार्यता का पता चलेगा बल्कि इससे उनके द्वारा अपने-अपने क्षेत्रों में किए गए काम के साथ ही पिछले साढ़े चार साल में बीजेपी सरकार की विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन और कार्यक्रमों के प्रभाव का भी पता चलेगा।” इस सर्वेक्षण में बीजेपी सासंदों द्वारा किए गए कामों और लोगों तक उनकी पहुंच के संबंध में सवाल रहेंगे। उन्होंने बताया कि सर्वेक्षण से मिले आंकड़ों को पार्टी की राष्ट्रीय इकाई और दिल्ली इकाई के साथ साझा किया जाएगा। बीजेपी को दिल्ली में मुख्य तौर पर कांग्रेस और आप से चुनौती मिलेगी और इन पार्टियों के आंतरिक सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि वे सात में से ज्यादातर सीटों पर जीत रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में दिल्ली में एक भी सीट नहीं जीत पाने वाली आम आदमी पार्टी ने पांच संसदीय क्षेत्रों के लिए प्रभारियों के नामों की घोषणा कर दी है जिन्होंने चुनाव पूर्व तैयारियां शुरू कर दी हैं।

बीजेपी तेलंगाना में टीआरएस को अपने सहयोगी के तौर पर मानकर चल रही है. दरअसल तेलंगाना में कांग्रेस और टीआरएस आमने-सामने हैं. ऐसे में बीजेपी को टीआरएस से उम्मीद नजर आ रही है. जबकि केरल में आई बाढ़ ने बीजेपी की संभावनाओं को कम कर दिया है.
दरअसल दक्षिणी भारत में बीजेपी के एक मात्र सहयोगी रही टीडीपी अब साथ छोड़ चुकी है. इसके अलावा महाराष्ट्र में शिवसेना और पंजाब में अकाली दल के साथ भी बहुत बेहतर रिश्ते नहीं हैं. जबकि बिहार में आरएलएसपी ने तो महागठबंधन के साथ जाने के संकेत दिए हैं.
उत्तर भारत में कई राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं, वहां सत्ता-विरोधी लहर का उसे सामना करना पड़ रहा है. इसके अलावा कई राज्यों में विपक्षी दलों के एकजुट होने से बीजेपी का समीकरण बिगड़ता नजर आ रहा है. ऐसे में बीजेपी को दक्षिण भारत के राज्यों से कुछ उम्मीदें दिख रही हैं.
बीजेपी इसी रणनीति के तहत तमिलनाडु में एक सहयोगी दल की तलाश में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डीएमके प्रमुख रहे करुणानिधि की बीमारी के दौरान उन्हें देखने पहुंचे और निधन पर चेन्नई पहुंचकर अंतिम संस्कार में भाग लिया. डीएमके ने करुणानिधि के लिए स्मारक बैठक में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को आमंत्रित करके सभी को आश्चर्यचकित कर दिया.
इसके अलावा डीएमके के कार्यकारी अध्यक्ष एमके स्टालिन, सांसद कनिमोझी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की श्रद्धांजलि सभा में दिल्ली पहुंचे. जिसके बाद राजनीतिक कयास लगाए जाने लगे हैं.
वरिष्ठ नेता ने कहा कि इस तरह के संकेत को बीजेपी के साथ गठबंधन बनाने की तैयारी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. हालांकि उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में एआईएडीएमके वैचारिक रूप से बीजेपी विरोधी नहीं है. जबकि डीएमके बीजेपी विरोधी खेमें के साथ है.
तमिलनाडु की 39 सीटों में से बीजेपी 2014 के लोकसभा चुनाव में महज एक सीट ही जीती है. राज्य की एक सामाजिक-राजनीतिक संरचना है. बीजेपी नेताओं ने कहा कि मौजूदा समय में तमिलनाडु एक ऐसी स्थिति का सामना कर रहा है जिसमें एक प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी कमजोर हो गई है और दूसरे के नेतृत्व को अभी तक समर्थन नहीं मिला है.
बीजेपी नेता ने कहा कि ऐसे में मोदी के नाम पर हमें इसका फायदा मिलेगा और लोग हमारे साथ जुड़ेगे. इसके अलावा उन्होंने कहा कि केरल में बीजेपी ने अपना वोट शेयर बढ़ाने में कामयाब रही है. हालांकि अभी तक कोई चुनावी जीत नहीं मिली है.
ओडिशा में पार्टी की मजबूत होती स्थिति के बाद बीजेपी के सत्ता में लौटने के उद्देश्य से दक्षिणी राज्यों की सीट अधिक महत्वपूर्ण हो गई है. बीजेडी के खिलाफ अपने शुरुआती हमले के बाद, मॉनसून सत्र के दौरान दोनों दलों के बीच मामला शांत है. बीजेडी के राज्यसभा उप-सभापति पद के चुनाव में एनडीए के साथ मतदान करने के कदम ने दृष्टिकोण में बदलाव के संकेत दिए हैं. बीजेपी में कई लोग सोचते हैं कि विधानसभा चुनावों पर ध्यान केंद्रित करने वाले क्षेत्रीय दलों के पुराने अभ्यास और संसदीय चुनाव लड़ने के लिए राष्ट्रीय दलों को छोड़कर वापस आ सकते है. जबकि तीसरे मोर्चे के लिए बहुत ज्यादा संभावनाएं नहीं रह गई हैं. ऐसे में टीआरएस और नवीन पटनायक एनडीए के साथ आ सकते हैं.

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