राजा या संत का योग था कुंडली में- मोदी जी के जन्म दिवस पर विशेष

modi-kundaliदो सालों तक उन्होंने हिमालय की खाक छानी तथा अज्ञातवास में रहकर घनघोर तपस्या की;  17 सितंबर जन्‍मदिवस पर विशेष 

चन्‍द्रशेखर जोशी सम्‍पादक की विशेष रिपोर्ट- नरेंद्र मोदी जी के जन्म दिवस पर विशेष- हिमालयायूके न्‍यूज पोर्टल को वह गौरव हासिल है- जिसने  नरेन्‍द्र मोदी पर सबसे ज्‍यादा खबर, आलेख सबसे ज्‍यादा कवरेज प्रकाशित की थी- परन्‍तु जैसा कि सत्‍ताधीशों का स्‍वभाव होता है, वह इस बात को समय के हिसाब से भूल जाते हैं, परन्‍तु “समय” ने अनायास ही चन्‍द्रशेखर जोशी चन्‍द्रशेखर जोशी की उन महान योगी से मुलाकात करा दी, जिन्‍होंने योग के क्षेत्र में 1990 में गुजरात में डंका बजाया- और योगी जी ने गुजरात में लम्‍बा प्रवास किया- जिसमें मोदी जी के उनके करीब रहे- प्रख्यात योगसंत योगमूर्ति महाराजजी जी के साथ श्री नरेन्द्र मोदी जी तब जुडे थे जब गुजरात में अमर सिंह सरकार थी, और अहमदाबाद में खचाखच स्टेडियम में योगसंत जी योगमाया का दिव्य प्रदर्शन करते थे। गुजरात के लीडिंग समाचार पत्र उनको प्रथम पृष्ठ पर स्थान देते थे। योग संत योगमूर्ति जी ने  मोदी जी को अनन्‍य भक्‍त की उपमा दी थी-
अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त तथा योग के क्षेत्र में विगत ४० वर्षो से गहन साधना में जुटे योग संत श्री योगमूर्ति जी महाराज जो १९९० के दशक में श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी के साथ अहमदाबाद, गुजरात में काफी लम्बे समय तक योग पर कार्य कर चुके हैं। अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त योगसंत श्री योगमूर्ति जी समय समय पर ”जीधाम“ आश्रम,  चित्रशीला घाट, रानीबाग, निकट काठगोदाम, जनपद नैनीताल, उत्तराखण्ड में भी साधनारत रहें। अनेक दिव्य साधनाओं से परिपूर्ण योग संत जी ने चन्द्रशेखर जोशी को अपने अनन्य भक्त की उपमा दी है।    फाइल फोटो- योग संत योगमूर्ति जी 

योग संत के बारे में  मोदी जी के संज्ञान में आनेे पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने चन्‍द्रशेखर जोशी सम्‍पादक को फोन कर योगसंत जी की कुशल क्षेम पूछी थी-

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वही छह भाई-बहनों के मध्यमवर्गीय परिवार में 17 सितंबर 1950 को जन्मे नरेंद्र मोदी का जब जन्म हुआ, तब उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इस समय उनके पिता के पास अनाज पीसने की चक्की थी। इसके बाद उन्होंने रेलवे स्टेशन पर चाय की दुकान खोली थी, जहां मोदी भी चाय की केतली लेकर ग्राहकों को चाय बांटा करते थे। मध्यम वर्गीय परिवार में जन्म के बाद भी मोदी व उनके भाई-बहन सुशिक्षित हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति passport-2अच्छी न होने पर भी पिता ने बच्चों की पढ़ाई में किसी तरह की कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांक मोदी के पिता दामोदर दास मोदी अब जीवित नहीं हैं। मोदी की माता हीरा बा पहले पहले वडनगर स्थित अपने पुराने मकान में अकेली ही रहा करती थीं, लेकिन पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य खराब रहने के कारण अब वे मोदी के सबसे छोटे भाई पंकजभाई के घर गांधीनगर में एक छोटे से सरकारी क्वार्टर में रहती हैं। स्वच्छ, साफ-सुथरी छवि के धनी तथा कर्मठ जुझारू नेता नरेंद्र मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को मेहसाना में वृश्चिक लग्न कर्क नवांश वृश्चिक राशि में हुआ। आपकी छवि ईमानदार होने के साथ-साथ कट्टर हिन्दूवादी नेता के रूप में है।

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एसएससी करने के बाद ही मोदी घर छोड़कर साधू बनने हिमालय की कंदराओं में चले गए थे। लगभग दो साल बाद वे वापस आए और फिर अहमदाबाद स्थित गुजरात युनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस की डिग्री ली। नरेंद्र मोदी जब 12 साल के थे, तब वे परिवार के साथ महेसाणा जिले के वडनगर में रहते थे। इसी दौरान एक साधू वडनगर आया। मोदी की मां हीराबा से उस साधू ने बेटों की कुंडली मांगी। हीराबा ने मोदी के साथ उनके बड़े भाई सोमभाई की भी कुंडली दिखाई। साधू ने सोमभाई की कुंडली देखकर कहा… इसका जीवन तो सामान्य ही रहेगा, लेकिन तुम्हारे छोटे बेटे मोदी का जीवन उथल-पुथल भरा रहेगा। इसकी कुंडली में ऐसा योग है कि यह या तो एक दिन राजा बनेगा या फिर शंकराचार्य की तरह एक महान संत की सिद्धि हासिल करेगा।

इसी बीच मोदी की पूजा-पाठ में भी बहुत रुचि हो गई। वे अधिकतर समय पूजा-पाठ में ही व्यतीत करने लगे तो परिजन को चिंता होने लगी कि कहीं ये सचमुच में ही साधू न बन जाए। मोदी को सभी ने बहुत समझाया, लेकिन उनके दिमाग से साधू बनने की बात निकल ही नहीं रही थी। इसी के चलते परिवार ने मोदी की शादी करवा देने का फैसला लिया। उन्हें लगा कि शादी हो जाने के बाद वह परिवार में व्यस्त हो जाएगा। परिवार ने आनन-फानन में न सिर्फ मोदी की शादी के लिए वधु जशोदाबेन की तलाश कर ली, बल्कि उनके ही गांव जाकर मोदी की शादी भी कर दी। यह वह समय था, जब बड़ों के फैसलों का छोटे विरोध नहीं कर सकते थे और इस समय बाल विवाह प्रचलित था। शादी के बाद मोदी ने मैट्रिक की परीक्षा पास की। अब वे बड़े हो चुके थे और परिवार ने तय किया कि अब मोदी की पत्नी को घर बुला लेना चाहिए। अभी तक जशोदाबेन का गौना नहीं हुआ था और वे अपने माता-पिता के साथ ही रहा करती थीं। यह बात सुनते ही मोदी ने न कह दिया और कहा कि उन्हें वैवाहिक जीवन में कोई रुचि नहीं। वे साधू बनना चाहते हैं और इसके लिए हिमालय पर जाने की तैयारी कर रहे हैं। परिजन मोदी को मनाते रहे, लेकिन मोदी अपनी जिद पर ही अड़े रहे। हालांकि मोदी मां हीराबेन का बहुत सम्मान करते थे। वे उनका आदेश नहीं टाल सकते थे। इसलिए उन्होंने मां से कहा कि मैं तुम्हारी मर्जी और आशीर्वाद के बगैर नहीं जा सकूंगा, लेकिन फिर भी मैं आपसे कहना चाहता हूं कि मुझे साधू बनना है। मोदी की जिद के आगे खुद मां हीराबा झुक गईं और उन्होंने मोदी को वैवाहिक बंधन से मुक्ति पाने और साधू बनने का आशीर्वाद दे दिया।

मां से कहा, मैं हिमालय पर जाना चाहता हूं : इसके बाद मोदी हिमालय की कंदराओं में जा पहुंचे और साधुओं के साथ रहने लगे। साधुओं के साथ वे ईश्वर की तलाश में दर-दर भटकते रहे। हालांकि उनकी उम्र अब भी बहुत छोटी थी, लेकिन फिर भी वे जीवन के वास्तविक अर्थ की तलाश में निकल पड़े थे। उनकी छोटी सी उम्र को देखते हुए एक साधू ने उन्हें समझाया कि ईश्वर की तलाश समाज की सेवा करके भी की जा सकती है। इसके लिए साधू बने रहने की कोई जरूरत नहीं।  इसके बाद मोदी हिमालय से वडनगर वापस आ गए। लेकिन फिर भी उन्होंने अपना वैवाहिक जीवन शुरू नहीं किया। दरअसल वे अपने घर सिर्फ एक दिन के ही लिए आए थे। परिवार भी अब पूरी तरह समझ चुका था कि मोदी को सांसारिक जीवन में रुचि नहीं थी। परिजन ने उनकी पत्नी जशोदाबेन के परिजन को भी सूचना दे दी थी कि वे मोदी को वैवाहिक बंधन से मुक्ति दे दें। इसके लिए पूरे परिवार ने जशोदाबेन के परिवार से माफी मांगी। मोदी के परिजन को इस फैसले का दुख था, लेकिन मोदी अपनी जिद पर अडिग थे।

इन सभी के बीच मोदी पर किताब लिखने वाली लेखिका कालिंदी रांदेरी ने यह पर्दा उठाया था।
मोदी नवरात्रि के 9 दिनों का व्रत रखते हैं। इस दौरान सिर्फ नींबू पानी का सेवन करते हैं। नरेंद्र मोदी का दावा है कि हर रोज दिन भर का काम खत्म होने के बाद उनका देवी दुर्गा से संवाद होता है। मीडिया में आईं रिपोर्ट में यह कहा गया है कि अपनी पुस्तक ‘साक्षीभाव’ के विमोचन के मौके पर मोदी ने यह दावा किया था। गौरतलब है कि मोदी कई मौकों पर बता चुके हैं कि वह देवी दुर्गा के भक्त हैं।  जम्मू-कश्मीर स्थित वैष्णो देवी ने भी उनको  दर्शन दिये हैं।

लेखिका कालिंदी रांदेरी के शब्दों में.. मैं जब मोदी की मां हीराबा से मिली तो उनकी आंखों में आंसू ही थे। उनका कहना था कि मोदी के मर्जी के खिलाफ उनकी शादी कराना जीवन की सबसे बड़ी भूल थी। हीराबा ने बताया कि मोदी के पिता को तो अंतिम समय तक इस बात का रंज रहा कि उन्होंने जबर्दस्ती मोदी पर शादी थोप दी थी।

मोदी की बारात बैलगाड़ी में गई थी। विवाह के बाद मोदी अपने परिवार के साथ वापस घर आ गए थे। परिवार ने निश्चय किया था कि मोदी की मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद बहू का गौना करवा लिया जाएगा। लेकिन इसके बाद ही मोदी वैवाहिक बंधनों से अपने आपको मुक्त कर हिमालय की कंदराओं में जा पहुंचे। वे हिमालय से वापस आए भी तो सिर्फ एक दिन के लिए ही।
सन् 2009 में पत्रकार एमवी कामत के साथ मिलकर ‘नरेंद्र मोदी, द आर्किटेक्ट ऑफ मॉडर्न स्टेट’ नामक किताब लिखने वाली कालिंदी रांदेरी बताती हैं कि जब मैंने मोदी से उनकी किताब लिखने के बारे में बात की तो मोदी ने इच्छा जाहिर की थी कि किताब में उनके बचपन के साथ उनकी शादी के बारे में भी लिखा जाए।

कालिंदी बताती हैं कि जब मैंने मोदी से उनकी शादी के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि इस बारे में आप मेरे बड़े भाई सोमभाई से बात कीजिए। वे आपको इस बारे में विस्तार से पूरी बात बताएंगे। इसके बाद कालिंदी ने सोमभाई से बात की उन्होंने खुलकर पूरी बात बताई और इस तरह यह जानकारी सामने आई।

कालिंदी बताती हैं कि मोदी का पूरा परिवार उनकी शादी के बारे में खुलकर बात करता है। हालांकि सभी का यही कहना है कि मोदी पर जबर्दस्ती शादी थोपकर परिवार ने बहुत बड़ी गल्ती की थी।
नरेंद्र मोदी 18 साल की उम्र में मोदी घर छोड़कर चले गए थे। दो सालों तक उन्होंने हिमालय की खाक छानी तथा अज्ञातवास में रहकर घनघोर तपस्या की। पूरा परिवार परेशान रहा कि मोदी कहां गायब हो गये,

नरेंद्र मोदी के बड़े भाई सोमभाई बताते हैं कि 18 साल की उम्र में मोदी घर छोड़कर चले गए थे। वे करीब दो साल तक ‘अज्ञातवास’ में रहे। बताया जाता है कि इन दो सालों में वे हिमालय की खाक छानते रहे। हालांकि, किसी को भी अच्छी तरह से यह नहीं मालूम कि इस दौरान मोदी कहां-कहां गए और क्या-क्या किया। नरेंद्र मोदी के बड़े भाई सोमभाई ने एक इंटरव्यू में बताया, ‘मोदी 18 साल की उम्र में दो सालों के लिए गायब हो गए थे। मां और हम सभी इस बात को लेकर परेशान थे कि नरेंद्र कहां चला गया। लेकिन दो साल बाद एक दिन वह घर लौट आया। उसने हमें बताया कि वह अहमदाबाद जाकर हमारे चाचा बाबूभाई की कैंटीन में काम करेगा।’
वडनगर में मोदी के परिवार के पड़ोसी रहे एक शख्स के मुताबिक, ‘नरेंद्र के अज्ञातवास से लौट आने पर घर में उनके निजी जीवन को लेकर कलह होने लगी। इससे नाराज होकर नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर घर छोड़ दिया।’ इसके बाद मोदी अहमदाबाद पहुंचे जहां उनके चाचा बाबूभाई सिटी बस स्टैंड पर कैंटीन चलाते थे। मोदी ने कुछ दिन वहां काम किया। इसके बाद गीता मंदिर के नजदीक चाय का ठेला लगाने लगे। संघ के प्रचारक के मुताबिक, ‘कुछ प्रचारक सुबह की शाखा से लौटते समय मोदी के ठेले पर चाय पीने आते थे।’ धीरे-धीरे मोदी की बातों ने उन पर असर किया। चूंकि, मोदी वडनगर में आरएसएस से जुड़े रह चुके थे, इसलिए संघ के प्रचारकों ने उन्हें संघ के राज्य मुख्यालय में असिस्टेंट के तौर पर काम करने के लिए बुला लिया। यहीं पर मोदी की मुलाकात एक बार फिर से वकील साहब से हुई थी।

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बचपन में नरेंद्र मोदी को साधु संतों को देखना बहुत अच्छा लगता था. मोदी खुद संन्यासी बनना चाहते थे. संन्यासी बनने के लिए नरेंद्र मोदी स्कूल की पढ़ाई के बाद घर से भाग गए थे और इस दौरान मोदी पश्चिम बंगाल के रामकृष्ण आश्रम सहित कई जगहों पर घूमते रहे और आखिर में हिमालय पहुंच गए और कई महीनों तक साधुओं के साथ घूमते रहे.
नरेंद्र मोदी बहुत मेहनती कार्यकर्ता थे. आरएसएस के बड़े शिविरों के आयोजन में वो अपने मैनेजमेंट का कमाल भी दिखाते थे. आरएसएस नेताओं का ट्रेन और बस में रिजर्वेशन का जिम्मा उन्हीं के पास होता था. इतना ही नहीं गुजरात के हेडगेवार भवन में आने वाली हर चिट्ठी को खोलने का काम भी नरेंद्र मोदी को ही करना होता था. नरेंद्र मोदी का मैनेजमेंट और उनके काम करने के तरीके को देखने के बाद आरएसएस में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देने का फैसला लिया गया. इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय कार्यालय नागपुर में एक महीने के विशेष ट्रेनिंग कैंप में बुलाया गया. 90 के दशक में नरेंद्र मोदी ने आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा में बड़ी भूमिका निभाई थी. नरेंद्र मोदी की स्टाइल सारे प्रचारकों से जुदा थी. वो दाढ़ी रखते थे और ट्रिम भी करवाते थे. 90 के दशक में नरेंद्र मोदी ने आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा में बड़ी भूमिका निभाई थी. इसके बाद उन्हें उस वक्त के बीजेपी अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा का संयोजक बनाया गया. ये यात्रा दक्षिण में तमिलनाडु से शुरू होकर श्रीनगर में तिरंगा लहराकर खत्म होनी थी.
2001 में जब गुजरात में भूकंप के आने से 20,000 लोग मारे गए तब राज्य में राजनीतिक सत्ता में भी बदलाव हुआ. दबाव के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल को अपना पद छोड़ना पड़ा. पटेल की जगह नरेंद्र मोदी को राज्य की कमान सौंपी गई और इसके बाद मोदी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
वर्ष 2002 में गुजरात ही नहीं पूरे देश के इतिहास में वो काला अध्याय जुड़ गया जिसके बारे में किसी ने सोचा नहीं था. मोदी ने कहा, ‘किसी से माफी मांगने के लिए तब कहना चाहिए जब वह किसी अपराध के लिए दोषी हो। यदि आपको लगता है कि यह कोई बड़ा अपराध है तो दोषी को क्यों छोड़ दिया जाए?’
उन्होंने वाल स्ट्रीट जर्नल से कहा, ‘केवल इसलिए कि मोदी मुख्यमंत्री हैं। उन्हें क्यों छोड़ा जाना चाहिए। मुझे लगता है कि यदि मैं दोषी हूं तो मुझे अधिकतम सजा मिलनी चाहिए। दुनिया को जानना चाहिए कि इस तरह के नेता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।’ मुख्यमंत्री से पूछा गया था कि क्या उन्हें दंगे के लिए माफी मांगनी चाहिए, जैसा कि उनके आलोचक मांग कर रहे हैं।
दंगों में धूमिल हुई छवि के बावजूद वर्ष 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में भी मोदी की जीत हुई.  मोदी पर आरोप ये भी लगा कि वह चाहते तो दंगे रोक सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. 2012 में उन्हीं की मंत्री माया कोडनानी समेत 30 अन्य को 28 साल जेल की सजा सुनाई गई.
वर्ष 2005 में मोदी को अमेरिका ने वीजा देने से इनकार कर दिया. हालांकि नरेंद्र मोदी इससे बिलकुल भी विचलित नहीं हुए. नरेंद्र मोदी की राजनीतिक ताकत में लगातार इजाफा होता रहा. बीजेपी के अग्रणी नेताओं में नरेंद्र मोदी की गिनती लंबे समय से होती रही है. मोदी ने सत्ता संभालने के साथ ही खुद को राजनीतिक संगठन मजबूत करने और राज्यक के विकास के कामों में लगा दिया. उद्योग की बात हो या कृषि की, मोदी ने लोगों के सामने एक बेहतर विकल्प देने की कोशिश की. नतीजा यह रहा कि कई सरकारी और गैर-सरकारी संस्थांओं ने उनके काम की तारीफ की.

नरेंद्र मोदी बचपन से ही आरएसएस से जुड़े हुए थे. 1958 में दीपावली के दिन गुजरात आरएसएस के पहले प्रांत प्रचारक लक्ष्मण राव इनामदार उर्फ वकील साहब ने नरेंद्र मोदी को बाल स्वयंसेवक की शपथ दिलवाई थी. मोदी आरएसएस की शाखाओं में जाने लगे. लेकिन जब मोदी ने चाय की दुकान खोली तो शाखाओं में उनका आना जाना कम हो गया. 2007 में विधानसभा चुनाव में फिर मोदी की जीत हुई और वह दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने. नरेंद्र मोदी काम करना जानते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि उस काम की पूरी कीमत वसूल करना भी उन्हेंक बखूबी आता है. गुजरातियों को उसकी अस्मिता से जोड़ने की बात हो या फिर विकास को महिमामंडित करने की बात, उन्‍होने हर जगह सफलता का झण्‍डा गाडा.
नरेंद्र मोदी शाकाहारी हैं. सिगरेट, शराब को कभी हाथ नहीं लगाया. वो आम तौर पर अपने आधी बाजू के कुर्ते में नजर आते हैं, लेकिन जब मौज में आते हैं तो सूट बूट में निकलते हैं किसी हीरो की तरह. नरेंद्र मोदी तकनीक का इस्तेबमाल भी बखूबी करते हैं. अगर आज फेसबुक और ट्विटर पर देखें तो सबसे ज्यादा उनके फॉलोअर्स मिल जाएंगे. इंटरनेट पर पॉपुलर नेताओं की सूची में वो अव्वतल हैं. वर्ष 2008 में मोदी ने टाटा को नैनो कार संयंत्र खोलने के लिए आमंत्रित किया. अब तक गुजरात बिजली, सड़क के मामले में काफी विकसित हो चुका था. वर्ष 2008 में मोदी ने टाटा को नैनो कार संयंत्र खोलने के लिए आमंत्रित किया. अब तक गुजरात बिजली, सड़क के मामले में काफी विकसित हो चुका था. देश के धनी और विकसित राज्यों में उसकी गिनती होने लगी थी. मोदी ने अधिक से अधिक निवेश को राज्य में आमंत्रित किया नरेंद्र मोदी को पतंगबाजी का भी शौक है. सियासत के मैदान की ही तरह वो पतंगबाजी के खेल में भी अच्छे-अच्छे पतंगबाजों की कन्नियां काट डालते हैं.

नरेंद्र मोदी की सियासी शालीनता का भी कोई जवाब नहीं… वर्ष 2012 तक मोदी का बीजेपी में कद इतना बड़ा हो गया कि उन्हें पार्टी के पीएम उम्मीदवार के रूप में देखा जाने लगा. जब नरेंद्र मोदी ने एक खास तरह की टोपी पहनने से इनकार कर दिया, तो यह चर्चा का विषय बन गया. 31 अगस्त, 2012 को मोदी ने ऑनलाइन तरीके से वैब कैम के जरिए जनता के सवालों के जवाब दिए. ये सवाल देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी पूछे गए. 22 अक्टूबर, 2012 को ब्रिटिश उच्चायुक्त ने मोदी से मिलकर गुजरात की तारीफ की और वहां निवेश किए जाने की बात की. इसके साथ दंगों के बाद बाधित हुए ब्रिटेन और गुजरात के संबंध फिर से बहाल हो गए. नरेंद्र मो्दी ने विवेकानंद युवा विकास यात्रा के जरिए अपने लिए काफी जनसमर्थन जुटाया. 20 दिसंबर, 2012 को मोदी ने फिर बहुमत हासिल किया और राज्य में तीसरी बार अपनी सत्ता का डंका बजाया.

वह सिर्फ काम के प्रति समर्पित है, तभी आज उनके साथ जनमत है,  आरएसएस में जाने से पहले भी वह बहुत अनुशासित दिनचर्या का पालन करते थे। बच्चे के रूप में भी वह निडर थे। उनके भाई ने बताया कि जब वह छोटे थे, तब एक बार तालाब से एक छोटा मगरमच्छ उठा लाए थे। लेकिन मां के ऐतराज के बाद नरेंद्र को मगरमच्छ छोड़ना पड़ा था।’

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