न्यूनतम आय योजना (NYAY) – जमीनी रिस्पांस से कांग्रेस गदगद

कांग्रेस ने अपनी खोई हुई सियासी जमीन वापस पाने और बीजेपी को मात देकर सत्ता में वापसी के लिए न्यूनतम आय योजना (NYAY) को मनरेगा के तर्ज पर लागू करने का ऐलान किया है. इस योजना के तहत देश के करीब 5 करोड़ गरीब परिवारों को सालाना 72 हजार रुपये यानी 6 हजार रुपए प्रति माह दिए जाने का वादा है. इस न्याय योजना के जमीनी रिस्पांस से कांग्रेस गदगद है और वो इसे सबसे बड़े चुनावी हथियार के तौर पर अपना रही है. यही वजह है कि कांग्रेस ‘अब होगा न्याय’ के नारे के साथ लोकसभा चुनाव के सियासी संग्राम में उतरी है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 25 मार्च को ऐलान किया कि अगर केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी तो देश के 20 फीसदी सबसे गरीब परिवारों को सालाना 72,000 रुपये यानी हर महीने 6 हजार रुपये बिना शर्त मुहैया कराए जाएंगे. ये रकम सीधे खाते में डालने की बात कही जा रही है. राहुल ने दावा किया कि कांग्रेस की न्यूनतम आय योजना (न्याय) का फायदा 5 करोड़ परिवारों या तकरीबन 25 करोड़ लोगों (प्रति परिवार 5 लोग मानकर) को मिलेगा.

कांग्रेस न्याय योजना को 2019 के लोकसभा चुनाव में अपने सबसे बड़े वादे के तौर पर पेश कर रही है. हालांकि बीजेपी इसे चुनावी प्रोपेगेंडा बताकर खारिज कर रही है. इतना ही नहीं बसपा अध्यक्ष मायावती ने सहारनपुर की रैली में कांग्रेस के 72 हजार सालाना देने के वादे को नरेंद्र मोदी के 15-15 लाख देने वाले वादे की तरह जुमला करार दिया है. लेकिन, जमीन पर न्याय योजना को जिस तरह से रिस्पांस मिल रहा है, उससे कांग्रेस के हौसले बुंलद हैं.

सर्वें में आए ऐसे रुझान

कांग्रेस के न्याय योजना को लेकर इंडिया टुडे के पॉलिटिकल स्टॉक एक्सचेंज (PSE) के लिए एक्सिस-माई-इंडिया ने एक सर्वे किया. योजना के घोषणा के एक हफ्ते से भी कम के वक्त में कांग्रेस शासित राज्यों में 41% वोटरों तक पहुंच गया. मध्य प्रदेश में 45%, छत्तीसगढ़ 33%, राजस्थान 45% और कर्नाटक में 37% वोटर इस योजना से अवगत हैं. चार राज्यों में 26% वोटर आश्वस्त दिखे कि अगर कांग्रेस केंद्र की सत्ता में आती है तो ये पार्टी ‘न्याय’ को अमली जामा पहनाने में कामयाब रहेगी. PSE के मुताबिक 42%  वोटर इस योजना के मूर्त रूप लेने पर आशंकित है. वहीं 29%  वोटर इस सवाल पर स्पष्ट राय नहीं जता सके.

सर्वे को आधार बनाते हुए कांग्रेस का कहना है कि इतने कम दिनों में अगर इन राज्यों की आधी जनता तक न्याय योजना की जानकारी पहुंच चुकी है तो आने वाले दिनों में यह पार्टी के लिए गेमचेंजर साबित होगी. कांग्रेस ने दावा किया कि पार्टी पर युद्ध स्तर पर इस योजना को जनता के बीच ले जा रही है ताकि बीजेपी की जनविरोधी नीतियों का जवाब ‘न्याय’ के जरिए दिया जा सके.

जन-जन तक पहुंचाएंगे न्याय

इंडिया टुडे पत्रिका के मुताबिक इस योजना के विशाल पैमाने को देखते हुए इसे अब तक घोषित इस किस्म की योजनाओं में सबसे महत्वाकांक्षी और व्यापक सामाजिक कल्याण कार्यक्रम कहा जा सकता है. भले ही यह अभी चुनाव घोषणा-पत्र का हिस्सा हो. लोकसभा के मतदान के पहले चरण से महज 17 दिन पहले घोषित न्याय योजना चुनावों में गेमचेंजर साबित हो सकती है. राहुल गांधी, प्रियंका गांधी से लेकर पार्टी के नेता और कार्यकर्ता इस न्याय योजना को गांव-गांव तक पहुंचाने में जुटे हैं.

मनरेगा के जरिए 2009 में लोकसभा चुनाव जीत और पिछले दिसंबर में कांग्रेस ने तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में किसान कर्जमाफी के जरिए बीजेपी को मात दी थी. इस जीत से उत्साहित पार्टी ने बेरोजगारी और कृषि संकट के मुद्दों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपने हमलों को और पैना कर दिया है. इसी तर्ज पर राहुल ने लोकसभा चुनाव में न्याय योजना की घोषणा कर मास्टर स्ट्रोक चला है.

राजनीतिक पंडितों का पक्के तौर पर मानना है कि दिसंबर के विधानसभा चुनावों में किसानों की कर्जमाफी के वादे ने कांग्रेस की संभावनाओं को अच्छा-खासा बढ़ाया था. बीजेपी की ग्रामीण सीटों में मध्य प्रदेश में 31 फीसद, राजस्थान में 57 फीसद और छत्तीसगढ़ में 68 फीसद कमी आई थी. किसान कर्जमाफी की तरह ही कांग्रेस की न्याय योजना सबसे ज्यादा ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण वाली सीटों को प्रभावित कर सकती है.

ग्रामीण इलाकों में असर

लोकसभा के जिन 513 निर्वाचन क्षेत्रों का 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर वर्गीकरण किया गया था, उनमें से कम से कम 290 ग्रामीण और 131 अर्ध-ग्रामीण क्षेत्र वाली सीटे हैं. ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र वे हैं, जहां शहरी आबादी 25 फीसदी से कम है, जबकि अर्ध-ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र वे हैं जहां शहरी आबादी 25 फीसद से ज्यादा मगर 50 फीसद से कम है.

बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 156 ग्रामीण और 69 अर्ध-ग्रामीण सीटें जीती थीं. दूसरे लफ्जों में उसकी जीती 282 सीटों में 80 फीसद ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण इलाकों से आई थीं. जबकि कांग्रेस की जीती हुई कुल 44 सीटों में से 32 ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण वाली सीटें थी.

लोकसभा सीटों की तादाद के लिहाज शीर्ष पांच में से तीन राज्यों में, बहुत बड़ा हिस्सा ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण सीटों का है. उत्तर प्रदेश में 80 में से 74, महाराष्ट्र में 48 में से 33, पश्चिम बंगाल में 42 में से 32, बिहार में 40 में से 39 और तमिलनाडु में 39 में से 23 ऐसी सीटें हैं.

कांग्रेस की यह योजना बीजेपी के लिए राजनीतिक मुश्किलें बढ़ा सकती है. दिलचस्प बात ये है कि ‘न्याय’ का दायरा केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं है बल्कि शहरी और टियर-2 क्षेत्रों में भी यह असर दिखा सकती है. ज़मीन पर इस योजना को लेकर कांग्रेस माहौल बनाने में जुटी है. उसे इसका रिस्पांस भी अच्छा मिल रहा है, जिसके चलते कांग्रेस ने इस योजना के जरिए ‘अब होगा न्याय’ नारा दिया है. इस नारे के जरिए जहां इस योजना का संदेश देना है. वहीं, कांग्रेस ये भी बताने की कोशिश कर रही है कि पिछले पांच साल बीजेपी के राज में देश की जनता के साथ अन्याय हुआ है.

:::::::::::::::::::::

भाजपा व शिवसेना ने दावा किया था कि उनके गठबंधन का आधार हिंदुत्व की साझी विचारधारा में है. इसी दावे के साथ 24 मार्च को कोल्हापुर में रैली से संयुक्त प्रचार अभियान की शुरुआत की गई. लेकिन दोनों पार्टियों के शीर्ष नेताओं के बीच पिछली कड़वाहटों को भुलाकर लोगों के सामने साझी सूरत पेश करने की असहजता साफ दिखी.

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे प्रत्यक्ष तौर पर मतदाताओं को यह समझाने के लिए एक मंच पर साथ आए थे कि साढ़े चार साल तक एक-दूसरे की जमकर आलोचना करने के बाद वे फिर से क्यों इकट्ठे हुए हैं. जब वे फडऩवीस के साथ मंच पर आए तो ठाकरे ने कार्यक्रम का उद्घाटन करने के लिए नारियल फोडऩे में काफी वक्त लिया. हमेशा होशियार रहने वाले ठाकरे को काफी सोच-विचार कर फैसले लेने के लिए जाना जाता रहा है. उन्होंने राम मंदिर व राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर एकजुटता दिखाने की भरसक कोशिश की. लेकिन अपने 20 मिनट के भाषण में इन दोनों विषयों को एक मिनट से ज्यादा का वक्त नहीं दिया.

ठाकरे ने दावा किया कि नवंबर 2018 में उनके अयोध्या की यात्रा पर जाने से ही राम मंदिर आंदोलन को गति मिली. उन्होंने कहा, ”इस मसले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था. मैंने इसे फिर से गति दी. राम मंदिर दरअसल रामराज्य (सुशासन) का प्रतीक है.”

यह संकेत देते हुए कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना नेता मान लिया है, ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से पहली बार उन्हें ‘नरेंद्र भाई’ कहकर संबोधित किया, सामान्य तौर पर वे केवल ‘मोदी’ कहते रहे हैं. उन्होंने कहा, ”हमारा पीएम पद का दावेदार तय है, उन्हें (विपक्ष को) भी अपना नेता घोषित कर देना चाहिए.” यह भी उनके पहले के रुख के उलट था जब उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री पद के दावेदार का फैसला सभी सहयोगी दलों के साथ सलाह-मशविरे के बाद होना चाहिए.

इससे पहले ठाकरे राज्य में किसानों की आत्महत्या की बढ़ती संख्या पर फडऩवीस को निशाने पर लेते रहे हैं. लेकिन रैली में उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने सभी वादों को पूरा किया है, खासतौर पर किसानों के लिए योजनाओं को लागू करके;  हालांकि उन्होंने किसी भी योजना का नाम नहीं लिया.

ठाकरे ने किसी स्कीम का कोई भी द्ब्रयोरा दिए बगैर कहा, ”हम गौरवशाली हिंदू हैं; धर्म की हमारी परिभाषा मानवीय रुख अपनाने में है. हम गरीबों के लाभ के लिए सामाजिक योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करेंगे.” शिवसेना प्रमुख ने पाकिस्तान में बालाकोट में भारतीय वायु सेना के हमलों का कोई जिक्र नहीं किया. यह हैरानी की बात थी क्योंकि भाजपा जोर देती रही है कि इन चुनावों में राष्ट्रीय सुरक्षा बड़ा मुद्दा रहेगा. ठाकरे ने इस बात को भी स्वीकार किया कि भाजपा के साथ गठबंधन से शिवसेना को लाभ होगा. उन्होंने कहा, ”अतीत में जब हमारे (भाजपा व शिवसेना के) बीच दोस्ताना संबंध नहीं थे तो कांग्रेस व एनसीपी ने सरकार के खिलाफ विरोध मार्च आयोजित किया था.” उन्होंने यह भी ऐलान किया कि शिवसेना भारतीय जनता पार्टी की पीठ में छुरा नहीं घोंपेगी.

बदले में फडऩवीस ने ठाकरे को इस ‘गठबंधन का दिशा-निर्देशक’ बताया और उनकी सरकार की अतीत में शिवसेना प्रमुख की ओर से की गई आलोचनाओं का कोई जिक्र नहीं किया. फडऩवीस ने कहा, ”यह गठबंधन जाति, भाषा व धर्म से परे है. यह राष्ट्रवादी पार्टियों का गठबंधन है. हम देशभक्ति के आधार पर साथ आए हैं.” मुख्यमंत्री ने 25 मिनट के भाषण में शिवसेना का और कोई जिक्र नहीं किया. उन्होंने विभिन्न योजनाओं का हवाला देते हुए यह दावा किया कि उनकी सरकार गरीबों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव लेकर आई है.

हालांकि सभा में मौजूद लोग उनकी बातों से ज्यादा प्रभावित नजर नहीं आए. सभा में आए अजित सुतार नामक शख्स का कहना था, ”मैं यहां इस बात की उम्मीद लेकर आया था कि धैर्यशील माने (हटकनंगले से शिवसेना उम्मीदवार) अपनी चुनावी घोषणाओं को सामने रखेंगे. उद्धव व फडऩवीस के भाषणों में मेरी कोई रुचि नहीं थी.”

हालांकि सेना कार्यकर्ता नीलेश चव्हाण ने कहा, ”भले ही भाषण नीरस थे लेकिन हम अब उत्साहित हैं क्योंकि हमारे पास कोल्हापुर में एनसीपी के गढ़ को ध्वस्त करने का मौका है.” भाजपा-शिवसेना ने अपने प्रचार अभियान की शुरुआत के लिए कोल्हापुर को इसलिए चुना क्योंकि उनका मानना था कि पश्चिमी महाराष्ट्र में काम करने की जरूरत है. उन्होंने इस इलाके में 2014 में 10 में से छह लोकसभा सीटें जीती थीं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *