श्री बगलामुखी (पीताम्बरा माई) विश्व की रक्षा करने वाली हैं,

भगवती बगलामुखी को स्तम्भन की देवी कहा गया है। स्तम्भनकारिणी शक्ति नाम रूप से व्यक्त एवं अव्यक्त सभी पदार्थो की स्थिति का आधार पृथ्वी के रूप में शक्ति ही है, और बगलामुखी उसी स्तम्भन शक्ति की अधिस्ठात्री देवी हैं। इसी स्तम्भन शक्ति से ही सूर्यमण्डल स्थित है, सभी लोक इसी शक्ति के प्रभाव से ही स्तंभित है। महाविद्या की साधना योग्‍य गुरू के बिना पूर्ण नही है, देहरादून बंजारावाला में माई का मंदिर बनना तय हुआ है, परम पूज्‍य साधक पं0 बिजेन्‍द्र पाण्‍डे जी ने चन्‍द्रशेखर जोशी को मंदिर के कार्य को आगे बढाने के लिए आशीर्वाद देते हुए कहा कि माई के सच्‍चे उपासक ही बडे कार्य को करने में सक्षम होते हैं। www.himalayauk.org (Leading Digital Newsportal: CS JOSHI- EDITOR) 

बगलामुखी देवी को प्रसन्न करने के लिए 36 अक्षरों का बगलामुखी महामंत्र

‘ऊं हल्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय, जिहवां कीलय बुद्धिं विनाशय हल्रीं ऊं स्वाहा’ का जप करें। हल्दी की माला पर करना चाहिए।

श्री बगलामुखी (पीताम्बरा माई)
विश्व की रक्षा करने वाली हैं,साथ जीव की जो रक्षा करती हैं,वही बगलामुखी हैं।स्तम्भन शक्ति के साथ ये त्रिशक्ति भी हैं।अभाव को दूर कर,शत्रु से अपने भक्त की हमेशा जो रक्षा करती हैं।दुष्ट जन,ग्रह,भूत पिशाच सभी को ये तत्क्षण रोक देती हैं।आकाश को जो पी जाती हैं,ये विष्णु द्वारा उपासिता श्री महा त्रिपुर सुन्दरी हैं। ये पीत वस्त्र वाली,अमृत के सागर मे दिव्य रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान हैं।ये शिव मृत्युञ्जय की शक्ति हैं।ये अपने भक्तों के कष्ट पहुँचाने वाले को बाँध देती हैं,रोक देती है।ये उग्र शक्ति के साथ,बहुत भक्त वत्सला भी हैं,परम करूणा के साथ भक्त के प्रत्यक्ष या गुप्त शत्रु को रोक देती हैं।ये वैष्णवी शक्ति हैं,ये शीघ्र प्रभाव दिखाती है,इस लिए इन्हें सिद्ध विद्या भी कहा जाता हैं।गुरू,शिव जब कृपा करते है तो ही इनकी साधना करने का सौभाग्य प्राप्त हो पाता हैं।वाम,दक्षिण दोनो आचार से इनकी पूजा होती हैं परन्तु दक्षिण मार्ग से इनकी पूजा शीघ्र फलीभूत होती हैं।ये काली,श्यामा के ही सुन्दरी,ललिता की एक दिव्य मूर्ति हैं।इनकी उपासना में अनुशासन,शुद्धता,के साथ गुरू की कृपा ही सर्वोपरि हैं।इनकी उपासना से साधक त्रिकालदर्शी होकर भोग के साथ मोक्ष भी प्राप्त कर लेता है,इनके कई मंत्र के जप के बाद मूल मंत्र का जप किया जाता है,कवच,न्यास,स्तोत्र पाठ के साथ अर्चन भी किया जाता हैं,इनका ३६ अक्षर मंत्र ही मूल मंत्र कहलाता हैं।इनकी साधना के अंग पूजा में प्रथम गुरू,गणेश,गायत्री,शिव,वटुक के साथ विडालिका यक्षिणी,योगिनी का पूजा अनिवार्य माना जाता हैं।ये विश्व की वह शक्ति हैं,जिनके कृपा से,चराचर जगत स्थिर रहता हैं। ये ब्रह्म विद्या है इनकी साधना में शुद्धता के साथ जप,ध्यान के साथ गुरू कृपा मुख्य हैं।इनके जप से कुन्डलिनी शक्ति जाग्रत हो जाती है,इनके साधक कोई भी आसुरी शक्ति एक साथ मिलकर भी परास्त नहीं कर सकता,ये अपने भक्तों की सदा रक्षा करती है।विश्व की सारी शक्ति मिलकर भी इनकी बराबरी नहीं कर सकते हैं। कई जन्म के पुण्य प्रभाव से इनकी साधना करने का सौभाग्य प्राप्त होता हैं।पुस्तक से देखकर या कही से सुनकर इनका मंत्र जप करने से कभी कभी जीवन मे उपद्रव शुरू हो जाता है।इसलिए बिना गूरू कृपा के इनकी साधना न करें।भारत में इनके मंदिर तो कितने है,परन्तु इनका विशेष साधना पीठ श्री पीताम्बरा पीठ,दतिया मध्य प्रदेश हैं।ये शुद्ध विद्या है,इनकी महिमा जगत में विख्यात हैं।इनकी कृपा से चराचर जगत वश में रहता है,इनकी साधना करने से ये अपने भक्त को सभी प्रकार से देखभाल करती है।ये परम दयामयी तथा करूणा रखती है।

1 ) कुल : – महाविद्या बगलामुखी “श्री कुल” से सम्बंधित है।

2 ) नाम : – बगलामुखी, पीताम्बरा , बगला , वल्गामुखी , वगलामुखी , ब्रह्मास्त्र विद्या

3 ) कुल्लुका : – मंत्र जाप से पूर्व उस मंत्र कि कुल्लुका का न्यास सिर में किया जाता है। इस विद्या की कुल्लुका “ॐ हूं छ्रौम्” (OM HOOM Chraum)

4) महासेतु : – साधन काल में जप से पूर्व ‘महासेतु’ का जप किया जाता है। ऐसा करने से लाभ यह होता है कि साधक प्रत्येक समय, प्रत्येक स्थिति में जप कर सकता है। इस महाविद्या का महासेतु “स्त्रीं” (Streem) है। इसका जाप कंठ स्थित विशुद्धि चक्र में दस बार किया जाता है।

5) कवचसेतु :- इसे मंत्रसेतु भी कहा जाता है। जप प्रारम्भ करने से पूर्व इसका जप एक हजार बार किया जाता है। ब्राह्मण व छत्रियों के लिए “प्रणव “, वैश्यों के लिए “फट” तथा शूद्रों के लिए “ह्रीं” कवचसेतु है।

6 ) निर्वाण :- “ह्रूं ह्रीं श्रीं” (Hroom Hreem Shreem) से सम्पुटित मूल मंत्र का जाप ही इसकी निर्वाण विद्या है। इसकी दूसरी विधि यह है कि पहले प्रणव कर, अ , आ , आदि स्वर तथा क, ख , आदि व्यंजन पढ़कर मूल मंत्र पढ़ें और अंत में “ऐं” लगाएं और फिर विलोम गति से पुनरावृत्ति करें।

7 ) बंधन :- किसी विपरीत या आसुरी बाधा को रोकने के लिए इस मंत्र का एक हजार बार जाप किया जाता है। मंत्र इस प्रकार है ” ऐं ह्रीं ह्रीं ऐं ” (Aim Hreem Hreem Aim)

8) मुद्रा :- इस विद्या में योनि मुद्रा का प्रयोग किया जाता है।

9) प्राणायाम : – साधना से पूर्व दो मूल मंत्रो से रेचक, चार मूल मंत्रो से पूरक तथा दो मूल मंत्रो से कुम्भक करना चाहिए। दो मूल मंत्रो से रेचक, आठ मूल मंत्रो से पूरक तथा चार मूल मंत्रो से कुम्भक करना और भी अधिक लाभ कारी है।

10 ) दीपन :- दीपक जलने से जैसे रोशनी हो जाती है, उसी प्रकार दीपन से मंत्र प्रकाशवान हो जाता है। दीपन करने हेतु मूल मंत्र को योनि बीज ” ईं ” ( EEM ) से संपुटित कर सात बार जप करें

11) जीवन अथवा प्राण योग : – बिना प्राण अथवा जीवन के मन्त्र निष्क्रिय होता है, अतः मूल मन्त्र के आदि और अन्त में माया बीज “ह्रीं” (Hreem) से संपुट लगाकर सात बार जप करें ।

12 ) मुख शोधन : – हमारी जिह्वा अशुद्ध रहती है, जिस कारण उससे जप करने पर लाभ के स्थान पर हानि ही होती है। अतः “ऐं ह्रीं ऐं ” मंत्र से दस बार जाप कर मुखशोधन करें

13 ) मध्य दृस्टि : – साधना के लिए मध्य दृस्टि आवश्यक है। अतः मूल मंत्र के प्रत्येक अक्षर के आगे पीछे “यं” (Yam) बीज का अवगुण्ठन कर मूल मंत्र का पाँच बार जप करना चाहिए।

14 ) शापोद्धार : – मूल मंत्र के जपने से पूर्व दस बार इस मंत्र का जप करें –
” ॐ हलीं बगले ! रूद्र शापं विमोचय विमोचय ॐ ह्लीं स्वाहा “

15 ) उत्कीलन : – मूल मंत्र के आरम्भ में ” ॐ ह्रीं स्वाहा ” मंत्र का दस बार जप करें।

16 ) आचार :- इस विद्या के दोनों आचार हैं, वाम भी और दक्षिण भी ।

17 ) साधना में सिद्धि प्राप्त न होने पर उपाय : – कभी कभी ऐसा देखने में आता हैं कि बार बार साधना करने पर भी सफलता हाथ नहीं आती है। इसके लिए आप निम्न वर्णित उपाय करें –

a) कर्पूर, रोली, खास और चन्दन की स्याही से, अनार की कलम से भोजपत्र पर वायु बीज “यं” (Yam) से मूल मंत्र को अवगुण्ठित कर, उसका षोडशोपचार पूजन करें। निश्चय ही सफलता मिलेगी।

b) सरस्वती बीज “ऐं” (Aim) से मूल मंत्र को संपुटित कर एक हजार जप करें।

c) भोजपत्र पर गौदुग्ध से मूल मंत्र लिखकर उसे दाहिनी भुजा पर बांध लें। साथ ही मूल मंत्र को “स्त्रीं” (Steem) से सम्पुटित कर उसका एक हजार जप करें

18 ) विशेष : – गंध,पुष्प, आभूषण, भगवती के सामने रखें। दीपक देवता के दायीं ओर व धूपबत्ती बायीं ओर रखनी चाहिए। नैवेद्य (Sweets, Dry Fruits ) भी देवता के दायीं ओर ही रखें। जप के उपरान्त आसन से उठने से पूर्व ही अपने द्वारा किया जाप भगवती के बायें हाथ में समर्पित कर दें।

अतः ऐसे साधक गण जो किन्ही भी कारणो से यदि अभी तक साधना में सफलता प्राप्त नहीं कर सकें हैं, उपर्युक्त निर्देशों का पालन करते हुए पुनः एक बार फिर संकल्प लें, तो निश्चय ही पराम्बा पीताम्बरा की कृपा दृस्टि उन्हें प्राप्त होगी – ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है।

श्री बगलामुखी माता की आरती

जय पीताम्बरधारिणी जय सुखदे वरदे, देवी जय सुखदे वरदे।

भक्तजनानां क्लेशं भक्तजनानां क्लेशं सततं दूर करें।। ऊॅं जय बगलामुखी माता….

असुरैः पीडि़तदेवास्तव शरणं प्राप्ताः, देवीस्तव शरणं प्राप्ताः।

धृत्वा कौर्मशरीरं धृत्वा कौर्मशरीरं दूरीकृतदुःखम् ।। ऊॅं जय बगलामुखी माता….

मुनिजनवन्दितचरणे जय विमले बगले, देवी जय विमले बगले।

संसारार्णवभीतिं संसारार्णवभीतिं नित्यं शान्तकरे ।। ऊॅं जय बगलामुखी माता….

नारदसनकमुनीन्द्रै ध्यातं पदकमलं देवीध्यातं पदकमलं।

हरिहरद्रुहिणसुरेन्द्रैः हरिहरदु्रुहिणसुरेन्द्रैः सेवितपदयुगलम् ।। ऊॅं जय बगलामुखी माता….

कांचनपीठनिविष्टे मुद्गरपाशयुते, देवी मुद्गरपाशयुते।

जिव्हावज्रसुशोभित जिव्हावज्रसुशोभित पीतांशुकलसिते ।। ऊॅं जय बगलामुखी माता….

बिन्दु त्रिकोण षडस्त्रै अष्टदलोपरिते, देवी अष्टदलोपरिते।

षोडशदलगतपीठं षोडशदलगतपीठं भूपुरवृŸायुतम् ।। ऊॅं जय बगलामुखी माता….

इत्थं साधकवृन्दं चिन्तयते रूपं देवी चिन्तयते रूपं।

शत्रुविनाशकबीजं शत्रुविनाशकबीजं धृत्वा हृत्कमले ।। ऊॅं जय बगलामुखी माता….

अणिमादिकबहसिद्धिं लभते सौख्ययुतां, देवी लभते सौख्ययुतां।
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आरती (2)

पीताम्बरि रवि कोटि, ज्योति परा-माया,
माँ ज्योति परा माया ।
बक-मुख ज्योति महा-मुख, बहु कर पर छाया ।।
वर कर अष्टादश भुज, शत भुज शत काया ।
माँ शत भुज शत काया ।
द्वि-भुज चतुर्भुज बहु-भुज, भुज-मय जग माया ।।
जय देवि, जय देवि ! मणि-मण्डप वेदी,
माँ, मणिपुर मणि-वेदी ।
चिनतामणि सिंहासन, चिन्तामणि सिंहासन,
सुर तरु-वर वेदी । जय देवि, जय देवि ! ।। १
तीम नयन रवि-शशि-वसु, इन्दीवर-दल से,
मां इन्दीवर-दल से ।
खचिता कर्ण हरण छवि, खंजन-मृग छल से ।
अत्याकृति छवि पर छवि, भय-हर भय कर से,
माँ, भय-हर भय पर से ।
मोहन मुक्ति-विधायन, कोर कृपा परसे ।
जय देवि, जय देवि ! ।। २
मुकुट महा-मणि शशि-पर, कच विलिखित मोती,
माँ, कच विलिखित मोती ।
नखत जटित बैंदी सिर, भाल-भरित जोती ।
नक-बेसर तर लटकत, गज-मुक्ता मोती ,
माँ, गज-मुक्ता मोती ।
जन भव-भय वारत नित, पुण्य सदन स्रोती ।
जय वेदि, जय देवि ! ।। ३
चिबुक अधर बिम्बाधर, दाड़िम दन्त-कली,
माँ, दाड़िम दन्त-कली ।
रस-मय गन्ध सुमन पर, श्वासन्ह प्रति निकली ।
करण अतीव मनोहर, ताटंकित घुँघुरी,
माँ, ताटंकित घुँघुरी ।
रत्नादिक सुर सम हिल, सुर पर मधु सुर री ।
जय देवि, जय देवि ! ।। ४
मदन महा-छवि रति-छवि, छवि पर छवि शोभा,
माँ छवि पर मुख-शोभा ।
मदन-दहन मन-मोहनि, रुप-अवधि ओभा ।
मणिपुर अमरित सर वर, कम्बु-छटा ग्रीवा,
माँ, कम्बु-छटा ग्रीवा ।
रुप-सुधा सर रस कर, सार सुमुख ग्रीवा ।
जय देवि, जय देवि ! ।। ५
सुर-तरु कुसुम सफल तर, बगल भुजग दोनों,
माँ बगल भुजग दोनों ।
लटकत फण नीचे कर, भुज कर मणि दोनों ।
फणि-मणि भुज कर कंकण, रत्न-जटित ज्योती,
माँ रत्न-जटित ज्योति ।
भुवन-भुवन निज जन मन, पथ-दर्शन स्रोती ।
जय देवि, जय देवि ! ।।६
मध्य महा-द्युति द्योतित, कैलाशो मेरुः,
माँ, कैलाशो मेरुः ।
तेज महा-तप सुर-मुनि, रक्त-शिखर गेरु ।
सत-लर गज-मुक्ता कर द्वय गिरि बिच गंगा,
माँ, द्वय गिरि बिच गंगा ।
तारन भक्त-उधारन, पय सुख मुख संगा ।
जय देवि, जय देवि ! ।।७
नाभि गँभीर विशोधन, यन्त्र-कला कलसी,
माँ, यन्त्र कला कलसी ।
कज्जल गिरि कल्मष मन, जन फट कट मलसी,
सोमल रोमावलि-मिस, छटक बिखर दीखे,
माँ, छटक-बिखर दीखे ।
मणिपुर तेज बनत मणि, पारस गुण सीखे ।
जय देवि, जय देवि ! ।। ८
बिन्दु त्रिकोण निवासिनि, शक्ति जगज्जननी,
माँ शक्ति जगज्जननी ।
जंघोरु-धर पोषिणि, पद निज जन तरिणी ।।
माया-बीज-विलासिनि, प्रणवार्चित रमिणी,
माँ, प्रणवार्चित रमिणी ।
अनघ अमोघ महा-शिव, सह शिर मोति मणी ।
जय देवि, जय देवि ! ।। ९
त्र्यस्र षडस्र सु-वृतं, चाष्ट-दलं पद्मं ।
पीयूषोदधि बिच रुच, शुच पद्मं रक्तं,
माँ, शुच पद्मं रक्तं ।
सिंहासन प्रेतासन, मणि पर मणि मुक्तं ।
जय देवि, जय देवि ! ।। १०
कामिक कर्म स्वजन-पन-पालिनि पर-विद्या,
माँ, पालिनि पर-विद्या ।
सिद्धा सिद्धि सनातनि, सिद्धि-प्रदा विद्या ।
सिद्धि-सदनि, सिद्धेश्वरि सरमा,
माँ, सिद्धेश्वरि सरमा ।
मुक्त विलासिनि ‘मोती’, मुक्ति-प्रदा परमा ।
जय देवि, जय देवि ! ।
मणि मण्डप वेदी, माँ मणिपुर मणि-वेदी ।
चिन्तामणि सिंहासन, चिन्तामणि सिंहासन,
सुर-तरु वर वेदी ।जय देवि, जय देवि ! ।। ११
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ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै सर्व दुष्टानाम वाचं मुखं पदम् स्तम्भय जिह्वाम कीलय-कीलय बुद्धिम विनाशाय ह्लीं ॐ नम: इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं जैसे…

मधु. शर्करा युक्त तिलों से होम करने पर मनुष्य वश में होते है।
मधु. घृत तथा शर्करा युक्त लवण से होम करने पर आकर्षण होता है।
तेल युक्त नीम के पत्तों से होम करने पर विद्वेषण होता है।
हरिताल, नमक तथा हल्दी से होम करने पर शत्रुओं का स्तम्भन होता है।
भय नाशक मंत्र

अगर आप किसी भी व्यक्ति वस्तु परिस्थिति से डरते है और अज्ञात डर सदा आप पर हावी रहता है तो देवी के भय नाशक मंत्र का जाप करना चाहिए…

ॐ ह्लीं ह्लीं ह्लीं बगले सर्व भयं हन

पीले रंग के वस्त्र और हल्दी की गांठें देवी को अर्पित करें।

पुष्प,अक्षत,धूप दीप से पूजन करें।

रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें।

दक्षिण दिशा की और मुख रखें।

पढ़ें : जानिए मां बगलामुखी की कथा

शत्रु नाशक मंत्र

अगर शत्रुओं नें जीना दूभर कर रखा हो, कोर्ट कचहरी पुलिस के चक्करों से तंग हो गए हों, शत्रु चैन से जीने नहीं दे रहे, प्रतिस्पर्धी आपको परेशान कर रहे हैं तो देवी के शत्रु नाशक मंत्र का जाप करना चाहिए।

ॐ बगलामुखी देव्यै ह्लीं ह्रीं क्लीं शत्रु नाशं कुरु

नारियल काले वस्त्र में लपेट कर बगलामुखी देवी को अर्पित करें

मूर्ती या चित्र के सम्मुख गुगुल की धूनी जलाये

रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करे

मंत्र जाप के समय पश्चिम कि ओर मुख रखें

प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता का मंत्र

आपने कई बार इंटरव्‍यू या प्रतियोगिताओं को जीतने की कोशिश की होगी और आप सदा पहुँच कर हार जाते हैं, आपको मेहनत के मुताबिक फल नहीं मिलता, किसी क्षेत्र में भी सफल नहीं हो पा रहे, तो देवी के साफल्य मंत्र का जाप करें

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं बगामुखी देव्यै ह्लीं साफल्यं देहि देहि स्वाहा:

बेसन का हलवा प्रसाद रूप में बना कर चढ़ाएं।

देवी की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख एक अखंड दीपक जला कर रखें।

रुद्राक्ष की माला से 8 माला का मंत्र जप करें।

मंत्र जाप के समय पूर्व की और मुख रखें।

बच्चों की रक्षा का मंत्र

यदि आप बच्चों की सुरक्षा को ले कर सदा चिंतित रहते हैं, बच्चों को रोगों से, दुर्घटनाओं से, ग्रह दशा से और बुरी संगत से बचाना चाहते हैं तो देवी के रक्षा मंत्र का जाप करना चाहिए।

ॐ हं ह्लीं बगलामुखी देव्यै कुमारं रक्ष रक्ष

देवी माँ को मीठी रोटी का भोग लगायें।

दो नारियल देवी माँ को अर्पित करें।

रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें।

मंत्र जाप के समय पश्चिम की ओर मुख रखें।

लम्बी आयु का मंत्र

यदि आपकी कुंडली कहती है कि अकाल मृत्यु का योग है, या आप सदा बीमार ही रहते हों, अपनी आयु को ले कर परेशान हों तो देवी के ब्रह्म विद्या मंत्र का जाप करना चाहिए…

ॐ ह्लीं ह्लीं ह्लीं ब्रह्मविद्या स्वरूपिणी स्वाहा:

पीले कपडे व भोजन सामग्री आता दाल चावल आदि का दान करें।

मजदूरों, साधुओं,ब्राह्मणों व गरीबों को भोजन खिलायें।

प्रसाद पूरे परिवार में बाँटे।

रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें।

मंत्र जाप के समय पूर्व की ओर मुख रखें।

बल प्रदाता मंत्र

यदि आप बलशाली बनने के इच्छुक हो अर्थात चाहे देहिक रूप से, या सामाजिक या राजनैतिक रूप से या फिर आर्थिक रूप से बल प्राप्त करना चाहते हैं तो देवी के बल प्रदाता मंत्र का जाप करना चाहिए…

ॐ हुं हां ह्लीं देव्यै शौर्यं प्रयच्छ

पक्षियों को व मीन अर्थात मछलियों को भोजन देने से देवी प्रसन्न होती है

पुष्प सुगंधी हल्दी केसर चन्दन मिला पीला जल देवी को को अर्पित करना चाहिए

पीले कम्बल के आसन पर इस मंत्र को जपें.

रुद्राक्ष की माला से 7 माला मंत्र जप करें

मंत्र जाप के समय उत्तर की ओर मुख रखें

सुरक्षा कवच का मंत्र

प्रतिदिन प्रस्तुत मंत्र का जाप करने से आपकी सब ओर रक्षा होती है, त्रिलोकी में कोई आपको हानि नहीं पहुंचा सकता ।

ॐ हां हां हां ह्लीं बज्र कवचाय हुम

देवी माँ को पान मिठाई फल सहित पञ्च मेवा अर्पित करें

छोटी छोटी कन्याओं को प्रसाद व दक्षिणा दे

रुद्राक्ष की माला से 1 माला का मंत्र जप करें

मंत्र जाप के समय पूर्व की ओर मुख रखें

ये स्तम्भन की देवी भी हैं। कहा जाता है कि सारे ब्रह्मांड की शक्ति मिलकर भी इनका मुकाबला नहीं कर सकती। शत्रु नाश, वाक सिद्धि, वाद-विवाद में विजय के लिए देवी बगलामुखी की उपासना की जाती है।

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