सिद्धपीठ में साफ मन से आने वाले व्यक्ति को भगवान भद्राज अवश्य ही वर देते है। भगवान भद्राज मंदिर में लगने वाले भोगों में दूध, दही, मक्खन, आटे का रोट आदि प्रमुख है। इस मंदिर में आने वाले सभी भक्तों को स्वच्छ तन और मन से आना चाहिए। FOR STAY CONTACT; Mob. 9719833000 उत्तराखंड में भगवान बलराम का एकमात्र मंदिर मसूरी से 15 किमी की दूरी पर दुधली भद्रराज पहाड़ी पर स्थित है. यह मंदिर साढ़े सात हजार फीट की ऊंचाई पर है. द्वापर युग में बलराम जी ने यहाँ तपस्या की थी और बाद में स्थानीय लोगों की रक्षा के लिए एक पत्थर के रूप में यहीं रहने का वचन दिया बलभद्र जी का “भद्रराज मंदिर”जहां हर याचक की मनोकामना पूरी होती है । यह मंदिर मसूरी क्षेत्र के सबसे पुराने मंदिरों में से एक * पत्थर के रूप में यहीं रहने का वचन दिया
Execlusive Report by Chandra Shekhar Joshi Chief Editor; Himalayauk News (Leading Newsportal & youtube Chennel & Daily Newspaper) Mob. 9412932030 & SADHAK : MAHA MAI BAGULA MUKHI ; Banjara wala Dehradun

इस सिद्धपीठ में मांगी गई हर मुराद पूरी होती है
भद्राज मंदिर में दीपक जलाना और श्रद्धा से पूजा करना, मनोकामना पूर्ति और आध्यात्मिक लाभ के लिए एक शक्तिशाली माध्यम माना जाता है। चन्द्रशेखर जोशी
भद्राज मंदिर (भगवान बलराम को समर्पित) में दीपक जलाने और सच्चे मन से प्रार्थना करने पर मनोकामनाएं पूरी होती हैं, क्योंकि यह मंदिर शक्ति, साहस और आध्यात्मिक शांति प्रदान करने वाला माना जाता है; भक्त दूध, दही, मक्खन जैसे भोग चढ़ाते हैं यह मंदिर भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम को समर्पित है, जो स्थानीय रूप से ‘भद्राज देवता’ के रूप में पूजे जाते हैं

. बलराम जी ने कहा था कि वे कलयुग में भद्राज के नाम से इसी स्थान पर मूर्ति रूप में रहेंगे. बाद में, एक स्थानीय व्यक्ति को आयुर्वेदिक औषधि ढूंढते समय यह मूर्ति मिली. द्वापर युग से संबंध: माना जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद, भगवान बलराम तपस्या के लिए हिमालय आए और यहीं ध्यान किया. उन्होंने चरवाहों को युद्ध कौशल सिखाया और उनकी रक्षा का वचन दिया. बलराम जी ने कहा था कि वे कलयुग में भद्राज के नाम से इसी स्थान पर मूर्ति रूप में रहेंगे. बाद में, एक स्थानीय व्यक्ति को आयुर्वेदिक औषधि ढूंढते समय यह मूर्ति मिली. देवता के रूप में पूजा: आज भी, लोग फसल और पशुधन की समृद्धि के लिए यहाँ पूजा करते हैं और आशीर्वाद लेते हैं. न मंदिर का निर्माण हुआ, जो अब एक महत्वपूर्ण धार्मिक और ट्रेकिंग स्थल है. यह मंदिर मसूरी के पास, समुद्र तल से लगभग 1802 मीटर की ऊंचाई पर भद्रराज पहाड़ी की चोटी पर स्थित है, जो मनोरम दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है धार्मिक और प्राकृतिक स्थल: अपने धार्मिक महत्व के साथ-साथ, यह ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए भी एक लोकप्रिय स्थान है, जो “मिल्कमैन ट्रेल” (Milkmans Trail) के रूप में जाना जाता है.
भद्रराज मंदिर भगवान कृष्ण के छोटे भाई बलभद्र को समर्पित है. मान्यता है कि भगवान बलराम ने यहां पर राक्षस का वध किया. साथ ही चरवाहों के साथ पशुओं को भी चराया था. यह मंदिर भगवान कृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम को समर्पित है. यहां भद्रराज के रूप में बलराम जी की पूजा होती है. भगवान भद्रराज को पछवादून, मसूरी और जौनसार क्षेत्र के पशुपालकों का देवता माना जाता है.
सतयुग में भगवान बलराम यहां साधू के भेष में आये थे। उस समय यहां लोगों के पशुओं को गंम्भीर बीमारी के कारण काफी हानी हो गई थी । यहां के लोगों दुखी मन से बलराम जी के सरण में गए और अपना दुख उन्हे सुनाया, तब भगवान बलभद्र जी ने उन्हे उपाय बताए और साथ ही साथ आशीर्वाद भी दिया, उनके आशीर्वाद से सारे पशु ठीक हो गये। पूरा गाँव दूध और मक्खन से परिपूर्ण हो गया ।
जब बलराम जी उस स्थान को छोड़ कर भगवान श्री केदार नाथ की तरफ जाने की बात वहाँ के लोगों को बताई। लोगों ने उनसे यहां से न जाने की प्रार्थना की, तब बलराम जी मान गये और इसी स्थान पर रहने का निर्णय लिया। उन्होने समझाया कि वे अब यहीं मूर्ति स्वरूप रहेंगे तथा बताया कि कलयुग में उनकी पूजा “भद्राज’ के नाम से मूर्ति के रूप से होगी ।
लोककथाओं के अनुसार कलयुग काल में ‘नंन्दू मेहर‘ नाम का एक व्यक्ति उनकी स्थापना स्थापित किया था। नंन्दू मेहर के नाम पर यहाँ एक झोपड़ी बनायी है जो “सत्योंथात” के नाम से आज भी प्रसिद्ध है।
जौनसार, पछवादून, जौनपुर, मसूरी, विकासनगर, देहरादून समेत समीपवर्ती ग्रामीण इलाकों से हजारों श्रद्धालुओं ने शिरकत की. इस दौरान श्रद्धालुओं ने भगवान बलभद्र का दुग्धाभिषेक किया. साथ ही दूध, मक्खन और घी से पूजा अर्चना कर अपने परिवार की खुशहाली, पशुधन और फसलों की रक्षा की मनौतियां मांगी.
भद्राज मंदिर पहुचंने के लिए मसूरी से दूधली (10-15 किलोमीटर की दूरी) तय करनी पड़ती है, सहसपुर-लांधा मदोगी तक (5-7 किलोमीटर)।
मान्यता है कि दुधली पहाड़ी पर पछवादून व जौनपुर की सिलगांव पट्टी के ग्रामीण चौमासा के दिनों में अपने पशुओं को लेकर उक्त पहाड़ी पर चले जाते थे, लेकिन पहाड़ी पर एक राक्षस उनके पशुओं को खा जाता था. मवेशी पालकों को भी परेशान करता था, जिस पर ग्रामीण भगवान बलराम के पास सहायता के लिए पहुंचे. भगवान बलराम ने ग्रामीणों को मायूस नहीं किया और पहाड़ी पर जाकर राक्षस का अंत कर दिया. इतना ही नहीं चरवाहों के साथ लंबे समय तक पशुओं को भी चराया था. यही वजह है कि ग्रामीणों ने यहां पर भगवान बलराम का मंदिर बनाया और उनकी पूजा शुरू की. जो आज भी जारी है. ऐसी मान्यता है कि भगवान बलभद्र आज भी उनके पशुओं की रक्षा करते हैं.
द्वापर युग में जब भगवान बलराम, ऋषि वेश में इस क्षेत्र से निकल रहे थे, तब उस समय इस क्षेत्र में पशुओं की भयानक बीमारी फैली हुई थी. ऋषि मुनि को आपने क्षेत्र से निकलता देख लोगों ने उन्हें रोक लिया और पशुओं को ठीक करने का निवेदन किया. तब बलराम जी ने उनके पशुओं को ठीक कर दिया. लोगों ने उनकी जय जयकार की और यही रहने की विनती की. तब बाबा कुछ समय उनके पास रुक गए. उनको आशीर्वाद दिया कि कलयुग में वो यहां मंदिर में भद्रराज देवता (Bhadraj temple in Mussoorie) के नाम से रहेंगे.
भद्राज मंदिर उत्तराखंड, भारत में मसूरी के पास स्थित एक पूजनीय पहाड़ी तीर्थस्थल है। भगवान कृष्ण के बड़े भाई भगवान बल भद्र (बलराम) को समर्पित यह मंदिर न केवल एक आध्यात्मिक स्थल है, बल्कि एक लोकप्रिय ट्रेकिंग स्थल भी है, जहाँ से दून घाटी, शिवालिक पर्वतमाला और हिमालय की चोटियों भद्राज मंदिर भगवान बल भद्र (बलराम) को समर्पित एक प्राचीन पहाड़ी तीर्थस्थल है। बल भद्र भगवान कृष्ण के बड़े भाई हैं और शेषनाग के अवतार के रूप में पूजे जाते हैं। स्थानीय कथाओं के अनुसार, भगवान बलराम ने हिमालय की यात्रा के दौरान यहाँ ध्यान किया था, और उनकी दिव्य उपस्थिति का सम्मान करने के लिए इस मंदिर का निर्माण किया गया था। यह मंदिर मसूरी क्षेत्र के सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है, जिसकी उत्पत्ति पौराणिक कथाओं और क्षेत्रीय लोककथाओं से जुड़ी है। लोगों के लिए भक्ति का केंद्र रहा है। चरवाहे और ग्रामीण अक्सर दूध और दही का प्रसाद लेकर मंदिर तक पैदल जाते थे, जो उनकी गहरी कृषि और पशुपालन परंपराओं को दर्शाता है। के मनोरम दृश्य दिखाई देते हैं।
भद्राज मंदिर का इतिहास मुख्य रूप से भगवान बलराम (बलभद्र) से जुड़ा है, जिन्हें भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई और शेषनाग का अवतार माना जाता है, और यह मंदिर मसूरी के पास स्थित है; पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में बलराम जी ने यहाँ तपस्या की थी और बाद में स्थानीय लोगों की रक्षा के लिए एक पत्थर के रूप में यहीं रहने का वचन दिया, जिसके बाद उनके सम्मान में इस प्राची भगवान बलराम को समर्पित: यह मंदिर विशेष रूप से भगवान बलराम को समर्पित है, जो , द्वापर युग में बलराम जी ने यहाँ तपस्या की थी और बाद में स्थानीय लोगों की रक्षा के लिए एक पत्थर के रूप में यहीं रहने का वचन दिया हैं. , द्वापर युग में बलराम जी ने यहाँ तपस्या की थी और बाद में स्थानीय लोगों की रक्षा के लिए एक पत्थर के रूप में यहीं रहने का वचन दिया
भद्राज मंदिर उत्तराखंड के मसूरी से लगभग 15 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक शांत और पवित्र पहाड़ी तीर्थस्थल है। भगवान कृष्ण के बड़े भाई, भगवान बालभद्र को समर्पित यह मंदिर न केवल दिव्य वातावरण प्रदान करता है, बल्कि एक मनोरम ट्रेकिंग अनुभव भी प्रदान करता है। लगभग 2,200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर दून घाटी, चकराता पर्वतमाला और दूर स्थित बर्फ से ढके हिमालय की चोटियों के मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करता है।
यह शांत स्थान प्रकृति प्रेमियों, पर्वतारोहियों और आध्यात्मिक साधकों के बीच लोकप्रिय है। भद्राज मंदिर का मार्ग क्लाउड्स एंड से शुरू होने वाला एक मनोरम पहाड़ी मार्ग है, जो घने ओक और देवदार के जंगलों, घास के मैदानों और पर्वत श्रृंखलाओं से होकर गुजरता है, जहाँ शानदार तस्वीरें लेने और पक्षी देखने के अवसर मिलते हैं।
सड़क मार्ग से: देहरादून होते हुए मसूरी पहुंचें (35 किमी)। मसूरी लाइब्रेरी चौक से क्लाउड्स एंड तक गाड़ी चलाकर या टैक्सी लेकर जाएं (लगभग 7 किमी)। यहां से भद्राज मंदिर के लिए पैदल यात्रा शुरू होती है, जो 7-8 किमी की है। रेल मार्ग से: निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून रेलवे स्टेशन है (मसूरी से लगभग 35 किमी)। मसूरी जाने के लिए टैक्सी किराए पर लें या बस लें। हवाई मार्ग से: निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट हवाई अड्डा, देहरादून है (लगभग 60 किमी)। हवाई अड्डे से मसूरी के लिए टैक्सी आसानी से उपलब्ध हैं।