नवंबर 2025 में शुक्र ग्रह तीन बार नक्षत्र परिवर्तन & 31 अक्टूबर 2025 से कार्तिक मास का 24वां दिन,अक्षय नवमी और जगद्धात्री पूजा & 5 नवंबर 2025 देव दीपावली

31 अक्टूबर 2025 से कार्तिक मास का 24वां दिन

31 अक्टूबर 2025 से कार्तिक मास का 24वां दिन है। साथ ही आज पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि है, जो कि10:03 ए एम तक जारी रहेगी। इसके बाद दशमी तिथि लग जाएगी। आज शुक्रवार का दिन है। इस दिन सूर्य देव तुला राशि में रहेंगे। वहीं चंद्रमा 06:48 ए एम तक मकर राशि में रहेंगे। इसके बाद कुंभ राशि में गोचर करेंगे। आपको बता दें, आज शुक्रवार के दिन अभिजीत मुहूर्त 11:42 ए एम से 12:27 पी एम बजे तक है। इस दिन राहुकाल 10:41 ए एम से 12:04 पी एम तक रहेगा। आज अक्षय नवमी और जगद्धात्री पूजा है। साथ ही वार के हिसाब से आप शुक्रवार का व्रत रख सकते हैं, जो माता लक्ष्मी को समर्पित होता है।

शुक्रवार के उपाय – मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए उन्हें सफेद और लाल रंग के फूल जैसे कमल या गुलाब अर्पित करना लाभदायक होता है। कुंडली में शुक्र को मजबूत करने के लिए शुक्रवार को श्वेत वस्त्र धारण करना और चावल, आटा, दूध जैसी सफेद चीजों का दान करना मददगार होता है। आर्थिक तंगी से मुक्ति पाने के लिए मां लक्ष्मी की पूजा में चावल की खीर और श्रीफल अर्पित करना और कमलगट्टे की माला से उनके नामों का जप करना भी लाभकारी होता है। लक्ष्मी वैभव व्रत करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है और सभी दुख दूर हो जाते हैं

देव दीपावली यानी ‘देवताओं की दिवाली’ के दिन देवता स्वर्ग से उतरकर धरती पर आते हैं और दिवाली का उत्सव मनाते हैं। यह उत्सव हर साल कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है, जो इस बार 5 नवंबर 2025 को को पड़ रही है। व दीपावली को त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इसके पीछे एक प्राचीन कथा है, जिसमें सभी देवी-देवता और ऋषि त्रिपुरासुर नामक राक्षस से परेशान थे। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध कर सभी देवताओं और संसार की रक्षा की थी। इस विजय की खुशी में देवताओं ने दिवाली मनाई थी, इसलिए यह पर्व ‘देव दीपावली’ के नाम से जाना जाता है। मान्यता है इस दिन पवित्र नदियों के किनारे दीपदान करने से भगवान का विशेष आशीर्वाद मिलता है, पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष के द्वार खुलते हैं। इसके अलावा, इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने पर मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं। पुराणों के अनुसार, त्रिपुरासुर के वध होने की खुशी में देवताओं ने काशी में दिवाली मनाई थी। तब से काशी के घाटों पर देव दीपावली का त्योहार सबसे भव्य रूप से मनाया जाता है। कहते हैं, इस दिन सभी देवता भी स्वर्ग से उतरकर काशी आ जाते हैं और यहां के मंदिरों में दीये जलाते हैं। इस दिन न केवल काशी के लोग बल्कि दूर-दूर से लोग घाटों पर लाखों दीये जलाते हैं, जिसकी रोशनी पूरे शहर को जगमगाती है।

आंवले के पेड़ से जुड़ी दो मुख्य कथाएँ प्रचलित हैं, जो आंवला नवमी (कार्तिक शुक्ल नवमी) के अवसर पर सुनाई जाती हैं। इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा करना और उसके नीचे भोजन करना शुभ माना जाता है, क्योंकि माना जाता है कि इस वृक्ष में भगवान विष्णु और शिव का वास होता है। 

आंवला नवमी की कथाएँ

1. माँ लक्ष्मी और आंवले का वृक्ष:
एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवी लक्ष्मी ने पृथ्वी पर आकर भगवान विष्णु और शिव की एक साथ पूजा करने का विचार किया। उन्हें एहसास हुआ कि तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है और बेल भगवान शिव को, इसलिए उन्होंने आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु और शिव प्रकट हुए। तब माँ लक्ष्मी ने आंवले के पेड़ के नीचे भोजन तैयार करके उन्हें अर्पित किया और फिर स्वयं भोजन किया। जिस दिन यह हुआ, वह कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि थी। तभी से इस तिथि को आंवला नवमी के नाम से जाना जाने लगा। 

2. राजा और रानी की कथा:
एक अन्य कथा एक धर्मात्मा राजा की है, जिसने यह प्रण लिया था कि वह प्रतिदिन सवा मन (लगभग 50 किलो) सोने के आंवले दान करने के बाद ही भोजन करेगा। उसके बेटों को यह दान पसंद नहीं आया और उन्होंने सोचा कि इससे सारा धन खत्म हो जाएगा। बेटों की बातों से दुखी होकर राजा और रानी सब कुछ छोड़कर जंगल में चले गए। उस दिन उन्होंने आंवला दान नहीं किया था, इसलिए उन्होंने कुछ खाया भी नहीं। 

तब भगवान ने राजा के सपने में आकर कहा कि तुम उठो और जंगल के बीच में एक आंवले के वृक्ष के पास जाओ, वहां तुम्हें सोने के आंवले मिलेंगे, उन्हें दान करके भोजन करो। राजा ने ऐसा ही किया और भगवान की कृपा से उसके पास फिर से धन-दौलत आ गई और राजपाट मिल गया। उधर, राजा के बेटों का कार्य ठप हो गया और उन्हें दरिद्रता का सामना करना पड़ा। बाद में उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने राजा से माफ़ी मांगी, जिसके बाद वे फिर से मिल-जुलकर रहने लगे। 

इन कथाओं के अनुसार, आंवले के पेड़ की पूजा और दान का विशेष महत्व है, जिससे सुख, समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

31 अक्तूबर 2025 को कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि है। इस तिथि पर धनिष्ठा नक्षत्र और वृद्धि योग का संयोग बन रहा है। दिन के शुभ मुहूर्त की बात करें तो शुक्रवार को अभिजीत मुहूर्त 11:39 − 12:23 मिनट तक रहेगा। राहुकाल सुबह 10:38 − 12:01 मिनट तक रहेगा। 

31 अक्टूबर 2025 को कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी और दशमी तिथि रहेगी. साथ ही धनिष्ठा नक्षत्र, शतभिषा नक्षत्र, वृद्धि योग, ध्रुव योग, रवि योग, विडाल योग, कौलव करण, तैतिल करण और गर करण का निर्माण हो रहा है. इसके अलावा चंद्र देव कुंभ राशि में गोचर

 नवंबर 2025 में शुक्र ग्रह तीन बार नक्षत्र परिवर्तन करेंगे, जो हमारे जीवन में महत्वपूर्ण प्रभाव लाएंगे & 7 नवंबर की शाम 9:13 बजे शुक्र चित्रा नक्षत्र से स्वाति नक्षत्र में प्रवेश करेंगे।  &  18 नवंबर को दोपहर 12:24 बजे शुक्र स्वाति नक्षत्र से विशाखा नक्षत्र में प्रवेश करेंगे। इस समय जातकों की नई योजनाएं सफल होंगी और करियर में लाभ के अवसर बढ़ेंगे। & 29 नवंबर की सुबह 3:06 बजे शुक्र विशाखा से अनुराधा नक्षत्र में प्रवेश करेंगे। यह गोचर रिश्तों और करियर दोनों के लिए सकारात्मक और फलदायक साबित होगा।

  • ब्रह्म मुहूर्त – 04:49 ए एम से 05:41 ए एम
  • अभिजीत मुहूर्त – 11:42 ए एम से 12:27 पी एम
  • विजय मुहूर्त – 01:55 पी एम से 02:39 पी एम
  • गोधूलि मुहूर्त – 05:37 पी एम से 06:03 पी एम
  • संध्या मुहूर्त – 05:37 पी एम से 06:54 पी एम
  • अमृत काल – 08:19 ए एम से 09:56 ए एम
  • रवि योग – पूरे दिन
  • शुक्रवार का व्रत – आज आप शुक्रवार का व्रत रख सकते हैं, जो माता लक्ष्मी को समर्पित है।
  • अक्षय नवमी – अक्षय नवमी कार्तिक शुक्ल नवमी को मनाया जाता है, जो देवउठनी एकादशी से दो दिन पहले आता है। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन सत्ययुग का आरंभ हुआ था, इसलिए इसे सत्य युगादि भी कहा जाता है। इस दिन दान-पुण्य के कार्यों का अत्यधिक महत्व है, क्योंकि इसका पुण्यफल कभी कम नहीं होता और अगले जन्मों में भी प्राप्त होता है। अक्षय नवमी का महत्व अक्षय तृतीया के समान है, जो त्रेतायुग का आरंभ है। इस दिन मथुरा-वृन्दावन की परिक्रमा करना विशेष रूप से पुण्यदायी माना जाता है। अक्षय नवमी को आंवला नवमी भी कहा जाता है, जिसमें आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। पश्चिम बंगाल में इसे जगद्धात्री पूजा के रूप में मनाया जाता है, जिसमें सत्ता की देवी जगद्धात्री की पूजा की जाती है।
  • जगद्धात्री पूजा – कार्तिक शुक्ल पक्ष नवमी को देवी जगद्धात्री की पूजा की जाती है, जो मां दुर्गा का एक रूप हैं। उनकी पूजा विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, बिहार और अन्य पूर्वी क्षेत्रों में बड़े उत्साह से की जाती है। देवी जगद्धात्री का अर्थ है “जगत की माता” या “संसार का पालन करने वाली”। उन्हें इस सृष्टि का पालन करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। उनका स्वरूप शान्त, उदार और सशक्त है। साथ ही उन्हें सिंह पर आरूढ़, लाल वस्त्रों में, शंख, चक्र, धनुष और बाण धारण किए हुए दर्शाया जाता है। देवी जगद्धात्री की उपासना भारत के पूर्वी भागों में बहुत प्रचलित है और उनकी पूजा से भक्तों को शक्ति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
  • YR. CONTRIBUTION;

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