22 अक्टूबर 2025, बुधवार का दिन है और कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि है. इस दिन गोवर्धन पूजा की जाती है और हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व बताया है. कार्तिक मास की प्रतिपदा तिथि के दिन अन्नकूट महोत्सव और गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है। अन्नकूट का अर्थ है -‘अन्न का ढेर’। आज ही के दिन योगेश्वर भगवान कृष्ण ने इन्द्र का मान-मर्दन करते हुए अपने वाम हस्त की कनिष्ठा अंगुली के नख पर गोवर्धन पर्वत उठाकर इन्द्र के कोप से ब्रजवासियों की रक्षा की थी। इसी की याद में यह महोत्सव मनाते हैं।
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22 अक्टूबर 2025 दिन बुधवार कार्तिक माह, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि & गोवर्धन पूजा, अन्नकूट , बलि प्रतिपदा
बलि प्रतिपदा, जिसे दिवाली पड़वा या गोवर्धन पूजा के नाम से भी जाना जाता है, दिवाली का चौथा दिन है, जो हिंदू कैलेंडर के कार्तिक महीने के पहले दिन मनाया जाता है। यह दैत्य राजा बलि के पृथ्वी पर आगमन की याद में मनाया जाता है, जिसे भगवान विष्णु के वामन अवतार ने पाताल लोक में भेज दिया था
22 अक्टूबर दिन बुधवार कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि शाम 08:17 तक रहेगा इसके उपरांत द्वितीया तिथि शुरू हो जाएगी । नक्षत्र स्वाति 01:51 AM तक उपरांत विशाखा , प्रीति योग 04:05 AM तक, उसके बाद आयुष्मान योग ,करण किस्तुघन 07:04 AM तक, बाद बव 08:17 PM तक, बाद बालव रहेगा । यम गण्ड – 7:56 AM – 9:21 AM कुलिक – 10:46 AM – 12:11 PM दुर्मुहूर्त – 11:48 AM – 12:34 PM वर्ज्यम् – 05:14 AM – 07:01 AM तक रहेगा । आज अभिजित मुहुर्त नहीं है
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भाईदूज, चित्रिगुप्त पूजा और यम द्वितीया का पर्व मनाया जाता है। इस बार उदयातिथि के अनुसार यह पर्व 23 अक्टूबर 2025 गुरुवार को मनाया जाएगा।
23 अक्टूबर 2025 को भाई दूज तिलक लगाने का शुभ मुहूर्त:
द्वितीया तिथि प्रारम्भ- 22 अक्टूबर 2025 को रात्रि 08:16 बजे से। द्वितीया तिथि समाप्त- 23 अक्टूबर 2025 को रात्रि 10:46 बजे तक। भाई दूज अपराह्न समय- 01:13 से 03:28 के बीच।

22 अक्टूबर 2025 गोवर्धन एवं अन्नकूट पूजा के शुभ मुहूर्त
प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ- 21 अक्टूबर 2025 को शाम 05:54 बजे से प्रारंभ।
प्रतिपदा तिथि समाप्त- 22 अक्टूबर 2025 को रात्रि 08:16 बजे समाप्त।
नोट: उदयातिथि के अनुसार 22 अक्टूबर 2025 को होगी गोवर्धन एवं अन्नकूट पूजा।
आज के व्रत, त्योहार और विशेष घटनाएं अन्नकूट/श्रीगोवर्धन पूजा & यात्रा शकुन-हरे फ़ल खाकर अथवा दूध पीकर यात्रा पर निकले।
आज का मंत्र-ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:। आज का उपाय-विष्णु मन्दिर में अन्नकूट का भोग लगाएं। वनस्पति तंत्र उपाय-अपामार्ग के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
यह पर्व भगवान कृष्ण की उस लीला को समर्पित है, जब उन्होंने अपनी कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर इंद्र का अहंकार तोड़ा था. इसलिए इस दिन गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की प्रतीकात्मक आकृति बनाकर उनकी पूजा करने का विधान है. कार्तिक शुक्ल द्वादशी को गोवर्धन पूजा का त्योहार मनाया जाता है. इस साल यह पर्व 22 अक्टूबर दिन बुधवार यानी कल मनाया जाएगा. यह पर्व भगवान कृष्ण की उस लीला को समर्पित है, जब उन्होंने अपनी कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर इंद्र का अहंकार तोड़ा था. इसलिए इस दिन गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की प्रतीकात्मक आकृति बनाकर उनकी पूजा करने का विधान है.
दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। लोग इसे अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। इस त्यौहार का भारतीय लोकजीवन में बहुत महत्व है। इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा सम्बन्ध दिखाई देता है। इस पर्व की अपनी मान्यता और लोककथा है। गोवर्धन पूजा में गोधन अर्थात गायों की पूजा की जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि गाय उसी प्रकार पवित्र होती है जैसे नदियों में गङ्गा। गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती हैं उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं। इनका बछड़ा खेतों में अनाज उगाता है। ऐसे गौ सम्पूर्ण मानव जाति के लिए पूजनीय और आदरणीय है। गौ के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोर्वधन की पूजा की जाती है और इसके प्रतीक के रूप में गाय की।जब कृष्ण ने ब्रजवासियों को मूसलधार वर्षा से बचाने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उँगली पर उठाकर रखा और गोप-गोपिकाएँ उसकी छाया में सुखपूर्वक रहे। सातवें दिन भगवान ने गोवर्धन को नीचे रखा और प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तभी से यह उत्सव अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा।
देवराज इन्द्र को अभिमान हो गया था। इन्द्र का अभिमान चूर करने हेतु भगवान श्री कृष्ण जो स्वयं लीलाधारी श्री हरि विष्णु के अवतार हैं ने एक लीला रची। प्रभु की इस लीला में यूं हुआ कि एक दिन उन्होंने देखा के सभी बृजवासी उत्तम पकवान बना रहे हैं और किसी पूजा की तैयारी में जुटे। श्री कृष्ण ने बड़े भोलेपन से मईया यशोदा से प्रश्न किया ” मईया ये आप लोग किनकी पूजा की तैयारी कर रहे हैं” कृष्ण की बातें सुनकर मैया बोली लल्ला हम देवराज इन्द्र की पूजा के लिए अन्नकूट की तैयारी कर रहे हैं। मैया के ऐसा कहने पर श्री कृष्ण बोले मैया हम इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं? मैईया ने कहा वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की उपज होती है उनसे हमारी गायों को चारा मिलता है। भगवान श्री कृष्ण बोले हमें तो गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गाये वहीं चरती हैं, इस दृष्टि से गोर्वधन पर्वत ही पूजनीय है और इन्द्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते व पूजा न करने पर क्रोधित भी होते हैं अत: ऐसे अहँकारी की पूजा नहीं करनी चाहिए।
लीलाधारी की लीला और माया से सभी ने इन्द्र के स्थान पर गोवर्घन पर्वत की पूजा की। देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और मूसलाधार वर्षा आरम्भ कर दी। प्रलय के समान वर्षा देखकर सभी बृजवासी भगवान कृष्ण को कोसने लगे कि, सब इनका कहा मानने से हुआ है। तब मुरलीधर ने मुरली कमर में डाली और अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्घन पर्वत उठा लिया और सभी बृजवासियों को उसमें अपने गाय और बछडे़ समेत शरण लेने के लिए बुलाया। इन्द्र कृष्ण की यह लीला देखकर और क्रोधित हुए फलत: वर्षा और तेज हो गयी। इन्द्र का मान मर्दन के लिए तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि आप पर्वत के ऊपर रहकर वर्षा की गति को नियन्त्रित करें और शेषनाग से कहा आप मेड़ बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोकें।
इन्द्र निरन्तर सात दिन तक मूसलाधार वर्षा करते रहे तब उन्हे लगा कि उनका सामना करने वाला कोई आम मनुष्य नहीं हो सकता अत: वे ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और सब वृतान्त कह सुनाया। ब्रह्मा जी ने इन्द्र से कहा कि आप जिस कृष्ण की बात कर रहे हैं वह भगवान विष्णु के साक्षात अंश हैं और पूर्ण पुरूषोत्तम नारायण हैं। ब्रह्मा जी के मुख से यह सुनकर इन्द्र अत्यन्त लज्जित हुए और श्री कृष्ण से कहा कि प्रभु मैं आपको पहचान न सका इसलिए अहँकारवश भूल कर बैठा। आप दयालु हैं और कृपालु भी इसलिए मेरी भूल क्षमा करें। इसके पश्चात देवराज इन्द्र ने मुरलीधर की पूजा कर उन्हें भोग लगाया।
इस पौराणिक घटना के बाद से ही गोवर्धन पूजा की जाने लगी। बृजवासी इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं। गाय बैल को इस दिन स्नान कराकर उन्हें रङ्ग लगाया जाता है व उनके गले में नई रस्सी डाली जाती है। गाय और बैलों को गुड़ और चावल मिलाकर खिलाया जाता है।