वर्ष 2000 में उत्तराखंड के साथ दो अन्य राज्यों, छत्तीसगढ़ और झारखंड का भी गठन किया गया था। इन तीनों राज्यों का गठन नवंबर 2000 में अलग-अलग तारीखों पर हुआ था: * 9 नवंबर: उत्तराखंड राज्य गठन वर्ष गांठ पर विशेष आलेख & उत्तराखंड राज्य का गठन 9 नवंबर 2000 को हुआ, सत्तारूढ़ दलों ने इसको गहरे कर्ज की दलदल में डूबो दिया,
उत्तराखंड पर ₹85,486 करोड़ का कर्ज है, जो लगातार बढ़ रहा है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में, प्रति व्यक्ति औसत कर्ज लगभग ₹74,000 था, और यह ₹1 लाख तक पहुँचने का अनुमान है,
मुख्यमंत्री ने एक हजार करोड़ रुपए तो सिर्फ प्रचार प्रसार मे व्यय कर दिए
छत्तीसगढ़: 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर बना। उत्तराखंड (मूल रूप से उत्तरांचल कहा जाता था): 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर बना।
झारखंड: 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर बना।
इस प्रकार, ये तीनों राज्य एक ही वर्ष (2000) में अस्तित्व में आए।
छत्तीसगढ़ का ऋण: राज्य 2025-26 में ₹11,337 करोड़ का ऋण चुकाने का भी अनुमान है। शुद्ध उधारी (Net Borrowing): 2024-25 के बजट में ₹19,750 करोड़ की शुद्ध उधारी (Net Public Debt) का अनुमान लगाया गया था।
झारखंड का ऋण
2025-26 में ₹11,253 करोड़ की शुद्ध उधारी के माध्यम से व्यय को पूरा करने का प्रस्ताव है। ऋण चुकौती (Debt Repayment): राज्य 2025-26 में ₹8,747 करोड़ का ऋण चुकाने का अनुमान है।
उत्तराखंड: वर्ष 2033 तक ब्याज में ही चले जाएंगे 19 हजार करोड़, उत्तराखंड: कर्ज में डूबा राज्य, मुख्यमंत्री ने विज्ञापन पर ही 1,001.07 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जब उत्तराखंड राज्य बना तब 4,500 करोड़ का कर्ज था, आज 80,000 करोड़ है कर्ज, वहीं बेरोजगारी दर भी उत्तराखंड में भयावह है. उत्तराखंड पर ₹85,486 करोड़ से अधिक का कर्ज है, जिससे प्रति व्यक्ति पर लगभग ₹74,000 का कर्ज है।
चन्द्रशेखर जोशी
9 नवंबर: उत्तराखंड राज्य गठन वर्ष गांठ पर विशेष आलेख : चन्द्रशेखर जोशी: वरिष्ठ पत्रकार हिमालयायूके न्यूज

सिक्किम और उत्तराखंड के भू कानूनों के बीच मुख्य अंतर उनके कानूनी आधार और बाहरी व्यक्तियों के लिए भूमि खरीद पर प्रतिबंधों की सीमा में है।
सिक्किम का भू कानून भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371एफ द्वारा शासित होता है, जो राज्य को विशेष प्रावधान और अद्वितीय विशेषाधिकार देता है।
सिक्किम का भू कानून
संवैधानिक संरक्षण: सिक्किम का भू कानून भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371एफ द्वारा शासित होता है, जो राज्य को विशेष प्रावधान और अद्वितीय विशेषाधिकार देता है।
पूर्ण प्रतिबंध: यह अनुच्छेद गैर-निवासियों (बाहरी लोगों) द्वारा सिक्किम में जमीन की खरीद और बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है। केवल सिक्किम के निवासी ही राज्य में संपत्ति खरीद सकते हैं।
आदिवासी क्षेत्र: आदिवासी क्षेत्रों में, केवल अधिसूचित आदिवासी समुदायों के सदस्य ही जमीन खरीद या बेच सकते हैं।
उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य राज्य की अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत और जनसांख्यिकी को बनाए रखना है।
उत्तराखंड का भू कानून
कानूनी आधार: उत्तराखंड का भू कानून राज्य सरकार द्वारा अधिनियमित विधानों पर आधारित है (जैसे हाल ही में संशोधित उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश और भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950) (संशोधन) विधेयक, 2025)।
आंशिक प्रतिबंध: सिक्किम के पूर्ण प्रतिबंध के विपरीत, उत्तराखंड का कानून कुछ शर्तों के साथ आंशिक प्रतिबंध लगाता है।
कृषि/बागवानी भूमि: राज्य के 13 में से 11 पहाड़ी जिलों में बाहरी लोगों द्वारा कृषि और बागवानी भूमि की खरीद पर पूरी तरह से रोक है।
आवासीय/व्यावसायिक भूमि: बाहरी व्यक्ति कुछ शर्तों और उचित सरकारी अनुमति के साथ गैर-कृषि भूमि (जैसे आवासीय या व्यावसायिक उपयोग) खरीद सकते हैं। नगर निकाय सीमा से बाहर, वे अधिकतम 250 वर्ग मीटर तक जमीन खरीद सकते हैं, जिसके लिए उन्हें हलफनामा देना होता है कि उनके पास राज्य में कहीं और इस सीमा से अधिक जमीन नहीं है।
छूट प्राप्त जिले: हरिद्वार और उधम सिंह नगर जिलों को इन प्रतिबंधों से छूट दी गई है।
उद्देश्य: इसका उद्देश्य कृषि योग्य भूमि के दुरुपयोग को रोकना, स्थानीय आबादी के हितों की रक्षा करना और राज्य की जनसांख्यिकी को संतुलित करना है, साथ ही व्यावसायिक निवेश को भी प्रोत्साहित करना है।
संक्षेप में, सिक्किम में संवैधानिक प्रावधानों के कारण बाहरी लोगों के लिए भूमि खरीद पर लगभग पूर्ण प्रतिबंध है, जबकि उत्तराखंड में यह प्रतिबंध मुख्य रूप से कृषि भूमि तक सीमित है और गैर-कृषि भूमि की खरीद के लिए विशिष्ट शर्तें और सीमाएं हैं।
9 नवंबर: उत्तराखंड राज्य गठन पर विशेष
चन्द्रशेखर जोशी
उत्तराखंड का नया भू-कानून अब पहाड़ी जिलों (हरिद्वार और उधम सिंह नगर को छोड़कर) में बाहरी लोगों द्वारा कृषि भूमि की खरीद पर रोक लगाता है। यह कानून राज्य की सांस्कृतिक विरासत, पर्यावरण और स्थानीय पहचान की रक्षा करने के लिए लाया गया है, और यह बाहरी लोगों को व्यावसायिक निवेश के लिए भी कड़े शर्तों के साथ जमीन खरीदने की अनुमति देता है।
मुख्य प्रावधान
कृषि भूमि पर रोक: हरिद्वार और उधम सिंह नगर को छोड़कर, उत्तराखंड के अन्य 11 जिलों में बाहरी व्यक्ति कृषि या बागवानी के लिए जमीन नहीं खरीद सकते हैं।
व्यावसायिक निवेश: व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए जमीन खरीदी जा सकती है, लेकिन इसके लिए कई शर्तें पूरी करनी होंगी।
आवासीय भूमि की सीमा: नगर निकाय सीमा के बाहर, दूसरे राज्य के लोग केवल 250 वर्ग मीटर तक की ही आवासीय भूमि खरीद सकते हैं।
एफिडेविट: राज्य के बाहर के लोगों को जमीन खरीदने से पहले यह पुष्टि करते हुए एक हलफनामा देना होगा कि उन्होंने राज्य में कहीं और 250 वर्ग मीटर से अधिक जमीन नहीं खरीदी है।
उल्लंघन पर कार्रवाई: यदि भूमि का उपयोग तय उद्देश्य के लिए नहीं किया जाता है या बिना अनुमति के बेची जाती है, तो सरकार उसे जब्त कर सकती है।
लीज नीति: स्वास्थ्य, शिक्षा, होटल और उद्योग जैसे क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा देने के लिए जमीन 30 साल के लीज पर दी जा सकती है।
ऑनलाइन पोर्टल: भूमि की खरीद-बिक्री का रिकॉर्ड रखने और गड़बड़ियों का पता लगाने के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल तैयार किया जाएगा।
उत्तराखंड और सिक्किम दोनों ही हिमालयी राज्य हैं, और दोनों ने अपने भू कानूनों में बदलाव किए हैं ताकि स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा की जा सके।
उत्तराखंड में, नए भू कानून के तहत, 11 जिलों में बाहरी लोगों के लिए कृषि और उद्यान भूमि खरीदना प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस कानून का उद्देश्य स्थानीय लोगों की जमीन को बचाना और राज्य की डेमोग्राफी को सुरक्षित रखना है
सिक्किम में, सिक्किम हिमालयी राज्य क्षेत्र संरक्षण और विकास बोर्ड अधिनियम, 1996 के तहत, बाहरी लोगों के लिए जमीन खरीदना और व्यवसाय करना प्रतिबंधित है। इस कानून का उद्देश्य राज्य की प्राकृतिक संसाधनों और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना है।
दोनों राज्यों के भू कानूनों में लचीलापन है, लेकिन उनका उद्देश्य स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा करना और राज्य की पहचान को बनाए रखना है।