चंद्रशेखर जोशी संस्थापक अध्यक्ष बगलामुखी पीठ 9412932030
देवशयनी एकादशी 6 जुलाई से भगवान विष्णु के साथ समस्त देवतागण योग निद्रा में, चार महीनों में सृष्टि का संचलान भगवान शिव के हाथों में : यह अवधि आध्यात्मिक रूप से निष्क्रिय—
वेद और उपनिषद के अनुसार रुद्र कौन है ? निरुक्त और निघंट के अनुसार रूद्र का अर्थ दुष्टों का नाश करने वाला है। परमपिता परमात्मा के जब इस गुण की व्याख्या की गयी है तो उन्हें ही रूद्र कहा गया है।
2025 में चातुर्मास 6 जुलाई से शुरू होकर 1 नवंबर को समाप्त होगा। यह आत्म-चिंतन और आध्यात्मिक विकास का समय होगा जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं, तो भगवान शिव और ब्रह्मा जी सृष्टि का कार्यभार संभालते हैं. चातुर्मास के दौरान, भगवान शिव पृथ्वी पर निवास करते हैं और सृष्टि के संचालन का कार्य करते हैं
रुद्र असल में भगवान शिव के विनाशक अवतार को कहा जाता है। दरअसल पुराणों के अनुसार जब सृजन अर्थात सृष्टि रचना करते समय जब ब्रह्मा जी अपने कार्य की शुरुवात करते हैं तो सर्वप्रथम भगवान शिव की आराधना करते हैं।
शिव जी प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी को यह वरदान देते हैं कि उनके द्वारा रचित सृष्टि में जब भी अस्थिरता आएगी तब शिव जी स्वयं उनकी सहायता के लिए अवतरित होंगे। उनका यह अवतार रुद्र कहलाएगा और इस रुद्र से अनेक रुद्र उत्पन्न होंगे जो सृष्टि को संतुलित रखने के लिए विनाश करेंगे।
आगे शंकर भगवान स्वयं ब्रह्मा जी कहते हैं कि जिस प्रकार ब्रह्मा सृष्टि की रचना करेंगे, विष्णु जी सृष्टि को संचालन करेंगे, ठीक उसी प्रकार शंकर जी दो रूपों में प्रकट होंगे– रुद्र और महेश्वर। जो संहार और तिरोभाव करने का कार्य करेंगे।
शिव जी के ये दो रूप रुद्र और महेश्वर, उनके उस दिव्य सदाशिव रूप से शक्तियां प्राप्त करते हैं जो अनुग्रह का कार्य करता है। भगवान शिव के विनाशक रूप को रुद्र कहते हैं। शिव जी का नाम रुद्र इसलिए है क्योंकि वे रुद अर्थात दुख, समस्या आदि का विनाश करते हैं, इतना ही नहीं, वे अज्ञान और बुराई का भी विनाश करते हैं। शिव के रुद्रांश भी हैं, 11 रुद्र एक ही महारुद्र अर्थात महादेव में समाए हैं। वेदों में शिव का नाम ‘रुद्र’ रूप में आया है। रुद्र का अर्थ होता है भयानक। रुद्र संहार के देवता हैं और रुद्र का सदाशिव रूप होने के कारण वे शिव कहलाए सदाशिव के रौद्र भाव के रूप को रुद्र कहा गया है और जैसे ही वो शांत हो जाते हैं, ध्यानमग्न शांतचित्त स्वरूप में वो देवों के देव महेश्वर है — ईश्वरों में महान महेश्वर नाम दो शब्दों से बना है, महा और ईश्वर। भगवान शिव ईश्वर हैं, ईश्वर महान हैं। इसलिए शिव जी को महेश्वर कहा जाता है।
चातुर्मास आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से होता है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी कि देवशयनी एकादशी 6 जुलाई को है। इसी दिन से चातुर्मास आरंभ होगा और कार्तिक मास की देवउठानी एकादशी पर खत्म होता है। ऐसी मान्यता है कि इन 4 महीनों के लिए भगवान विष्णु के साथ समस्त देवतागण योग निद्रा में चले जाते हैं और इन चार महीनों में सृष्टि का संचलान भगवान शिव के हाथों में आ जाता है।
चातुर्मास का मतलब है चार महीने। इसमें श्रावण, भाद्रपद, अश्विन और कार्तिक के महीने आते हैं। इस दौरान भगवान विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में रहते हैं।
चातुर्मास में भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी, भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करना बहुत अच्छा माना जाता है। यह समय भक्ति के लिए होता है। इन चार महीनों में कथा करवाना और भागवत कथा सुनना बहुत ही शुभ माना जाता है।
चातुर्मास 2025 में कुछ खास योग बन रहे हैं, जैसे कि सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग। मिथुन राशि में सूर्य, बुध, गुरु और चंद्रमा मिलकर एक चतुर्ग्रही योग बनाएंगे। शास्त्रों में लिखा है कि इन योगों में भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी, भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करने से बहुत फायदा होता है। इस अवधि को आध्यात्मिक रूप से निष्क्रिय माना जाता है।
भगवान विष्णु को पान और सुपारी अर्पित करने के बाद धूप, दीप और पुष्प चढ़ाकर आरती उतारें और इस मंत्र द्वारा भगवान विष्णु की स्तुति करेंः-
मंत्र: ‘सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्व चराचरम्।।’
अर्थः हे जगन्नाथ जी! आपके निद्रित हो जाने पर संपूर्ण विश्व निद्रित हो जाता है और आपके जाग जाने पर संपूर्ण विश्व तथा चराचर भी जाग्रत हो जाते हैं।
मानव शरीर में तीन ग्रंथियां होती हैं, ऊर्जा प्रवाह में रुकावट पैदा करती हैं। ये तीन ग्रंथियां हैं ब्रह्मा ग्रंथि, विष्णु ग्रंथि और रुद्र ग्रंथि। ये ग्रंथियां सीधे हमारे भौतिक शरीर से नहीं जुड़ी होती, बल्कि हमारे सूक्ष्म शरीर से जुड़ी होती हैं। ये तीन ग्रंथियां हमारे शरीर में अलग अलग प्रकार काम करती है।

योग में, मानव शरीर के विभिन्न ऊर्जा केंद्र होते हैं, जिन्हें चक्र कहा जाता है और इन चक्रों के बीच की जगह को ग्रंथि कहा जाता है। ब्रह्मा ग्रंथि, विष्णु ग्रंथि और रुद्र ग्रंथि तीन महत्वपूर्ण ऊर्जा बिंदु हैं, जो एक गाँठ की तरह है और चक्रों की ऊर्जा को अवरुद्ध करती है। इससे कुण्डलिनी जागरण में समस्या पैदा होती है। इन ग्रंथियों को खोलने के लिए कई तंत्र विद्याओं और योग अभ्यासों की आवश्यकता होती है। ब्रह्मा ग्रंथि, विष्णु ग्रंथि और रुद्र ग्रंथि न केवल हमारे शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं, बल्कि हमारे मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन ग्रंथियों की सक्रियता से हम एक संतुलित, सकारात्मक और आध्यात्मिक जीवन जी सकते हैं।
ब्रह्मा ग्रंथि
यह ग्रंथि मूलाधार चक्र के पास स्थित होती है। ब्रह्मा ग्रंथि का संबंध हमारी प्रारंभिक जीवन ऊर्जा स्रोत से है, जो हमें भौतिक और मानसिक स्थिरता प्रदान करता है। ब्रह्मा ग्रंथि की सक्रियता से व्यक्ति में जीवन शक्ति का संचार होता है। ब्रह्मा ग्रंथि हमें भोजन, आश्रय, संतानोत्पत्ति और कामुक सुख जैसी बुनियादी ज़रूरतों और अन्य भौतिक स्वार्थों से जोड़े रखती है। हठ योग में, इस गाँठ को खोलने के लिए मूलबंध और प्राणायाम का अभ्यास किया जाता है। इस ग्रंथि के खुलते ही व्यक्ति को सहज प्रवृत्ति, भय और स्वार्थ से मुक्ति महसूस होती है।
विष्णु ग्रंथि
यह ग्रंथि अनाहत चक्र के पास स्थित होती है, जिसे तीसरी आँख भी कहा जाता है। अनाहत चक्र के पास होने कारण विष्णु ग्रंथि का संबंध हमारी भावनाओं और मानसिक संतुलन से होता है। यह हमारे प्रेम, करुणा, मानसिक क्षमता और सहानुभूति के केंद्र के रूप में कार्य करती है। हठ योग में, विष्णु ग्रंथि को खोलने के लिए उड्डियान बंध का उपयोग किया जाता है। यह प्राण, अपान और समान वायु को एक साथ जोड़ता है। यह कुंडलिनी ऊर्जा को चेतना के अगले स्तर और अनाहत चक्र में जाने की अनुमति देता है।
रुद्र ग्रंथि
यह ग्रंथि आज्ञा चक्र के पास स्थित होती है। रुद्र ग्रंथि का संबंध हमारी आध्यात्मिक जागरूकता, बुद्धि, शुद्धता, संतुलन, सद्भाव, रचनात्मकता और सकारात्मकता से होता है। यह ग्रंथि हमारे आंतरिक दृष्टिकोण और आत्मज्ञान के केंद्र के रूप में कार्य करती है। यह हमारी सूक्ष्म दृष्टि और उच्चतम चेतना को जागृत करने में मदद करती है। रुद्र की गाँठ एक योगी के लिए अंतिम बाधा है क्योंकि ये गाँठ उसे सर्वोच्चता से जुड़ने से रोकता है। रुद्र ग्रंथि की सक्रियता से व्यक्ति में आत्मज्ञान और आध्यात्मिक जागरूकता बढ़ती है। यह हमें हमारी वास्तविकता के गहरे सत्य को समझने में मदद करती है और आत्म-साक्षात्कार की दिशा में अग्रसर करती है।
ये ग्रंथियाँ हमारे शरीर की एक सूक्ष्म ऊर्जा प्रणाली है, जिसे समझने और सक्रिय करने के लिए योग और ध्यान का अभ्यास करना चाहिए। इन ग्रंथियों के माध्यम से हम अपने आंतरिक ऊर्जा स्रोत को जागृत कर सकते हैं और आत्मज्ञान की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं।