23 सितंबर 2025) अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की द्वितिया तिथि & मां की मूर्ति या तस्वीर के सामने सुबह या संध्या के समय & आश्विन मास के नवरात्र को शारदीय नवरात्र भी कहा जाता है। 22 सितंबर से सोमवार के दिन से शारदीय नवरात्र 2025 आरंभ & BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI EDITOR Mob. 9412932030
भारत की धरती पर अनेक शक्तिपीठ हैं, लेकिन उनमें से एक ऐसा स्थल है जिसे श्रद्धालु ‘माताबाड़ी’ कहकर पुकारते हैं। त्रिपुरा के गोमती जिले में स्थित त्रिपुरा सुंदरी मंदिर न केवल 524 साल पुराना एक पवित्र धाम है, बल्कि यह देवी शक्ति का जीवंत प्रतीक भी माना जाता है। मान्यता है कि यहां माता सती का दाहिना पैर गिरा था, इसी कारण इसे शक्तिपीठ का दर्जा प्राप्त हुआ। यहां पहुंचने वाला हर भक्त एक अद्भुत दिव्य शांति और ऊर्जा का अनुभव करता है। 22 सितम्बर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मंदिर के पुनर्विकसित स्वरूप का उद्घाटन कर पूजा-अर्चना की। यह क्षण न केवल राजनीतिक दृष्टि से, बल्कि अध्यात्मिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि आज के समय में यह मंदिर फिर से भक्ति और साधना का केंद्र बन रहा है।

यह मंदिर वह स्थान है, जहां देवी सती के दाहिने पैर का एक भाग गिरा था. श्री विद्या परंपरा में मां त्रिपुर सुंदरी, जिन्हें षोडशी और ललिता भी कहा जाता है, को सर्वोच्च देवी और तीनों लोकों में सबसे सुंदर के रूप में पूजा जाता है. 15वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में त्रिपुरा पर शासन करने वाले राजा को एक रात स्वप्न में देवी त्रिपुरेश्वरी ने दर्शन दिए और उन्हें राज्य की तत्कालीन राजधानी उदयपुर के निकट एक पहाड़ी की चोटी पर अपनी पूजा आरंभ करने का निर्देश दिया. बार-बार इसी प्रकार के स्वप्न आने पर महाराजा ने मंदिर में त्रिपुर सुंदरी की मूर्ति स्थापित की
यहां भगवान विष्णु की पूजा शालग्राम शिला या काले रंग की शिला के रूप में की जाती है. काली मंदिर या किसी शक्तिपीठ में शक्ति देवी के साथ विष्णु की पूजा का ऐसा उदाहरण न सिर्फ दुर्लभ है, बल्कि इस मंदिर की एक अनूठी विशेषता भी है. यह शिव और शक्ति के मिलन का एक दिव्य स्थल भी है, जो विश्व में कहीं और नहीं मिलता.
महाराजा धन्य माणिक्य ने 1501 ई. में इस मंदिर का निर्माण कराया था। तब से लेकर आज तक यह जगह साधकों, तांत्रिकों और भक्तों की साधना स्थली रही है। त्रिपुरा सुंदरी महाविद्या में से एक मानी जाती हैं, और यह मंदिर श्रीविद्या परंपरा का प्रमुख केंद्र है। यहां देवी के दर्शन मात्र से भक्त मानते हैं कि उनके जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और आत्मा को गहन शांति का अनुभव मिलता है। देवी त्रिपुरा सुंदरी को ब्रह्मांड की आदिशक्ति माना जाता है। कहा जाता है कि वे त्रिकोणमयी शक्ति का प्रतीक हैं, जो सृष्टि, पालन और संहार तीनों का संचालन करती हैं। भक्तों का विश्वास है कि यहां आकर साधक अपनी इच्छाओं की सिद्धि और आत्मिक जागरण प्राप्त करते हैं।
त्रिपुरा सुंदरी मंदिर सदियों से साधकों के लिए एक शक्तिस्थल रहा है। यहां की तांत्रिक परंपरा और देवी की उपासना जीवन में संतुलन, आत्मज्ञान और दिव्यता को जगाने का मार्ग बताती है। भक्त मानते हैं कि यहां दीप जलाने से अंधकार मिटता है, और आशीर्वाद से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। यही कारण है कि यह स्थान केवल त्रिपुरा ही नहीं, पूरे भारत के लिए आध्यात्मिक धरोहर है।
एक रहस्यमय जियोमेट्रिक मंडल है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड व पुरुष और स्त्री ऊर्जाओं के दिव्य मिलन का प्रतीक
यहां देवी शक्ति की पूजा मां त्रिपुरसुंदरी के रूप में की जाती है और उनके साथ स्थित भैरव को त्रिपुरेश कहा जाता है. मंदिर में चौकोर आकार का गर्भगृह है, जिसे विशिष्ट बंगाली एक-रत्न शैली में डिजाइन किया गया है, जो एक छोटी पहाड़ी पर स्थापित है, जो कछुए (कूर्म) के कूबड़ जैसा दिखता है, जिससे इसे कूर्म पीठ का नाम मिला है. मूर्ति के पैरों के नीचे एक श्री यंत्र उत्कीर्ण है. यह श्री यंत्र कोई साधारण डिजाइन नहीं है, बल्कि एक रहस्यमय जियोमेट्रिक मंडल है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड व पुरुष और स्त्री ऊर्जाओं के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि इस श्री यंत्र के दर्शन या पूजा कई शुभ अनुष्ठान करने के बराबर है, जो भक्तों को आध्यात्मिक और भौतिक आशीर्वाद प्रदान करता है. देवी को अर्पित किए जाने वाले लाल गुड़हल के फूल को बहुत सम्मान दिया जाता है और आम प्रसाद में पेड़ा मिठाई शामिल है.
मां दुर्गा के 108 नामों का जप करने से साधक को मानसिक, शारीरिक और आत्मिक तीनों स्तरों पर लाभ मिलता है. मन की चिंता, भय और तनाव कम होते हैं, आत्मा में शांति, स्थिरता और ऊर्जा का संचार होता है, जीवन की बाधाएं और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं, साधक को ईश्वरीय अनुभूति और अलौकिक अनुभव होते हैं, शरीर की ऊर्जा संतुलित होती है और आरोग्यता बढ़ती है. नवरात्रि के दिनों में इन नामों का जाप करने से मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है.
सितंबर 2025 की नवरात्र 10 दिन की है। ऐसा एक ज्योतिषीय समायोजन की वजह से हो रहा है। सितंबर 2025 की नवरात्र में अतिरिक्त चतुर्थी तिथि जुड़ रही है। इस तरह 25 सितंबर, गुरुवार और 26 सितंबर, शुक्रवार को दोनों दिन ही चतुर्थी तिथि का नवरात्र व्रत रखा जाएगा।
- दिन 1: 22 सितंबर, सोमवार, मां शैलपुत्री – सफेद
- दिन 2: 23 सितंबर, मंगलवार, मां ब्रह्मचारिणी – लाल
- दिन 3: 24 सितंबर, बुधवार, मां चंद्रघंटा – शाही नीला
- दिन 4: 25 सितंबर, गुरुवार, मां कूष्माण्डा – पीला
- दिन 5: 26 सितंबर, शुक्रवार, मां कूष्माण्डा – पीला
- दिन 6: 27 सितंबर, शनिवार, मां स्कंदमाता – हरा
- दिन 7: 28 सितंबर, रविवार, मां कात्यायनी – ग्रे या स्लेटी
- दिन 8: 29 सितंबर, सोमवार, मां कालरात्रि – नारंगी
- दिन 9: 30 सितंबर, मंगलवार, मां महागौरी- मोर हरा
- दिन 10: 01 अक्टूबर, बुधवार, मां सिद्धिदात्री- गुलाबी
माता के इन नामों का करें जप
सती, भवप्रीता, साध्वी, भवमोचनी, भवानी, आर्या, दुर्गा, जया, आद्या, त्रिनेत्रा, शूलधारिणी, पिनाकधारिणी, चित्रा, चंद्रघंटा, महातपा, बुद्धि, अहंकारा, चित्तरूपा, चिता, चिति, सर्वमंत्रमयी, सत्ता, सत्यानंदस्वरुपिणी, अनंता, भाविनी, भव्या, अभव्या, सदागति, शाम्भवी, देवमाता, चिंता, रत्नप्रिया, सर्वविद्या, दक्षकन्या, दक्षयज्ञविनाशिनी, अपर्णा, अनेकवर्णा, पाटला, पाटलावती, पट्टाम्बरपरिधाना, कलमंजरीरंजिनी, अमेयविक्रमा, क्रूरा, सुन्दरी, सुरसुन्दरी, वनदुर्गा, मातंगी, मतंगमुनिपूजिता, ब्राह्मी, माहेश्वरी, एंद्री, कौमारी, वैष्णवी, चामुंडा, वाराही, लक्ष्मी, पुरुषाकृति, विमला, उत्कर्षिनी, ज्ञाना, क्रिया, नित्या, बुद्धिदा, बहुला, बहुलप्रिया, सर्ववाहनवाहना, निशुंभशुंभहननी, महिषासुरमर्दिनी, मधुकैटभहंत्री, चंडमुंडविनाशिनी, सर्वसुरविनाशा, सर्वदानवघातिनी, सर्वशास्त्रमयी, सत्य, सर्वास्त्रधारिनी, अनेकशस्त्रहस्ता, अनेकास्त्रधारिणी, कुमारी, एककन्या, कैशोरी, युवती, यति, अप्रौढ़ा, प्रौढ़ा, वृद्धमाता, बलप्रदा, महोदरी, मुक्तकेशी, घोररूपा, महाबला, अग्निज्वाला, रौद्रमुखी, कालरात्रि, तपस्विनी, नारायणी, भद्रकाली, विष्णुमाया, जलोदरी, शिवदुती, कराली, अनंता, परमेश्वरी, कात्यायनी, सावित्री, प्रत्यक्षा, ब्रह्मावादिनी, कमला, शिवानी.