माता पार्वती के देवी अहोई स्वरूप की पूजा करने का महत्व & समय अनुकूल नहीं होने पर ऊंट में सवार को कुत्ता काट लेता है,,,

12 अक्तूबर 2025 को कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि है। इस तिथि पर म्रृगशीर्षा नक्षत्र और वरीघा योग का संयोग बन रहा है। दिन के शुभ मुहूर्त की बात करें तो रविवार को अभिजीत मुहूर्त 11:41 − 12:26 मिनट तक रहेगाराहुकाल प्रातः 09:14 बजे से प्रातः 10:40 बजे तक तक रहेगा। नक्षत्रों की बात करें तो आज श्रवण नक्षत्र का योग है। चन्द्रमा आज मकर राशि दिन रात में संचार करेंगे। आज सूर्योदय 6:20 और सूर्यास्त 17:53 बजे होगा।

BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI Mob. 9412932030

12 अक्तूबर 2025 को कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि है। इस तिथि पर म्रृगशीर्षा नक्षत्र और वरीघा योग का संयोग बन रहा है।  , 12 अक्टूबर 2025 को कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी और सप्तमी तिथि रहेगी. साथ ही मृगशीर्ष नक्षत्र, आद्रा नक्षत्र, वरीयान योग, परिघ योग, वणिज करण और विष्टि करण का निर्माण हो रहा है. इसके अलावा चंद्र ग्रह मिथुन राशि में गोचर करेंगे, लेकिन अन्य किसी ग्रह का रविवार को राशि गोचर नहीं होगा.

यात्रा शकुन-इलायची खाकर यात्रा प्रारम्भ करें। आज का मंत्र-ॐ घृणि: सूर्याय नम:। उपाय-विष्णु मन्दिर में पीताम्बर चढ़ाएं। वनस्पति तंत्र उपाय-बेल के वृक्ष में जल चढ़ाएं।

अहोई अष्टमी का व्रत महिलाएं संतान की लंबी आयु के लिए रखती है। ये निर्जला व्रत होता है। इसमें तारों को देखकर अर्घ्य दिया जाता है। हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर इसे मनाया जाता है। तो इस साल अहोई अष्टमी कब है,  2025 में अष्टमी तिथि 13 अक्टूबर को दोपहर 12:24 बजे शुरू होगी और 14 अक्टूबर को सुबह 11:09 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार, अहोई अष्टमी 13 अक्टूबर 2025 सोमवार को है। अहोई अष्टमी की पूजा शाम में तारा निकलने पर होती है। इस दिन भी पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:53 बजे से 7:08 बजे तक रहेगा। यानी 1 घंटा 15 मिनट तक पूजा के लिए समय मिलेगा।

अहोई अष्टमी पर माता पार्वती के देवी अहोई स्वरूप की पूजा करने का महत्व है। पूजा के लिए अहोई माता और उनक सात पुत्रों की तस्वीर स्थापित करें। तस्वीर में रोली, अक्षत, फूल, भोग आदि अर्पित कर पूजन करें। फिर अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनें। आखिर में अहोई माता की आरती करें। इस दिन माता पार्वती के साथ भगवान शिव और गणेशजी की भी पूजा की जाती है। कहा जाता है कि संतान सुख की प्राप्ति या जिन महिलाओं के गर्भ में ही बच्चे की मृत्यु हो जाती है। उन्हें यह व्रत जरूर करना चाहिए। मान्यता है कि इस व्रत को करने से अहोई मां गर्भ में भी आपके संतान की रक्षा करती हैं।

मन में कभी संशय नहीं होना चाहिए,, अंगद के मन में संशय आया तो उनको समुद्र पार नहीं भेजा,,,अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा॥

जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सबही कर नायक॥1॥

अंगद ने कहा- मैं पार तो चला जाऊँगा, परंतु लौटते समय के लिए हृदय में कुछ संदेह है। जाम्बवान ने कहा- तुम सब प्रकार से योग्य हो, परंतु तुम सबके नेता हो, तुम्हे कैसे भेजा जाए?॥1॥

कुदरत रोटी पलट करती है” परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है और कोई भी स्थिति स्थायी नहीं होती। केवल मृत व्यक्ति नहीं बदलता: चन्द्रशेखर जोशी बगला मुखी पीठ

कुदरत की बनाई हर चीज़ बदलती है , वक्त, मौसम, इंसान, ख्याल दृष्टिकोण सब बदलता है, बदलाव जीवन का नियम है , जीवन को निरंतर बेहतर से बेहतर करने के उपाय करना इंसान के लिए हितकर है, मृत व्यक्ति कभी नहीं बदलता, इसलिए उठिए, बदलिए, अन्यथा कुदरत ने तो बदलना ही है

महान दार्शनिक अरस्तू ने कहा है, परिवर्तन प्रकृति का नियम है। हम प्रकृति के इस नियम को जब भी मानने से इनकार करने लगते हैं, तब हम दुखी होते हैं, अवसाद से घिर जाते हैं। हमें स्वीकारना होगा कि जब अच्छे दिन स्थायी नहीं रहते, तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे। जो व्यक्ति इस सत्य को जान लेता है, वह कभी निराश-हताश नहीं होता। उसका कर्मशील जीवन मजबूत होकर सामने आता है।

जीवन में स्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। जिस तरह तवे पर रखी रोटी को एक तरफ से पक जाने के बाद पलटना पड़ता है, उसी तरह कुदरत या समय भी स्थितियों को बदलता रहता है।

भाग्य का पलटना: यह दर्शाता है कि किसी व्यक्ति का बुरा समय अच्छे समय में बदल सकता है, या अच्छे समय के बाद बुरा समय आ सकता है। यह तकदीर के उतार-चढ़ाव को व्यक्त करता है।

कुदरत चीजों को संतुलित करती है। यदि कोई चीज़ हद से ज्यादा हो जाती है, तो कुदरत उसमें बदलाव लाकर संतुलन स्थापित करती है। यह जीवन के चक्रीय स्वभाव (cyclical nature) को दिखाता है, जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है।

+ऋग्वेद के अनुसार, सरमा कुत्तों की माता थी। उसे देवशुनी (दिव्य कुतिया) भी कहा जाता है और वह देवताओं के लिए सहायक के रूप में कार्य करती थी। उसकी संताने, जिन्हें सारमेय कहा जाता है, यम के पहरेदार हैं और उनमें से कुछ के पास चार आँखें भी हैं। सरमा ने पणियों द्वारा चुराई गई दिव्य गायों को खोजने में इंद्र की मदद की थी। सरमा के पुत्रों को सारमेय के रूप में जाना जाता है, और वे यम के रक्षक माने जाते है

हिमालयायुके न्यूज के लिए चन्द्रशेखर जोशी की रिपोर्ट

समय अनुकूल नहीं होने पर ऊंट में सवार को कुत्ता काट लेता है,,,

शिवलिंग पर नारियल के आधे टुकड़े चढ़ाने की परंपरा शास्त्रों में भी उल्लेखित है. नारियल को कटे हुए रूप में शिवलिंग पर चढ़ाने से भगवान शिव के नेत्रों का प्रतीक होता है. नारियल का बाहरी भाग, जब उसे आधा काटा जाता है, तो वह भगवान शिव की दृष्टि का प्रतीक बन जाता है, और यह पूजा के दौरान उनकी कृपा को आकर्षित करता है. अगर नारियल के तीन टुकड़े बनते हैं, तो यह भगवान शिव के त्रिनेत्र का प्रतीक होता है, जो असीम शक्ति और दर्शन का संकेत है.

बगला मुखी पीठ बंजारा वाला देहरादून में अलौकिक दिव्य शिवलिंग है जिसमें ज्योति स्वरूप में विराजमान हैं शिव शंकर

चन्द्रशेखर 9412932030

शनि देव का पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में प्रवेश, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र का स्वामी गुरु बृहस्पति, प्रत्येक राशि को कर्मों का गहरा फल देगे, मीन समेत कुछ राशियों को तपस्या, साधना और गहन चिंतन की ओर मोड़ देगे, जबकि कुछ को मिलेगी चुनौतिया

चन्द्रशेखर जोशी संस्थापक अध्यक्ष बगलामुखी पीठ देहरादून

ज्योतिष में न्यायधीश कहलाने वाले शनिदेव जब शुभ फल देते हैं तो आदमी रंक से राजा हो जाता है लेकिन यदि अशुभ स्थिति में आ जाएं तो शनिदेव बड़े कष्ट का कारक बनते हैं. शनि के पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में गोचर करने का प्रभाव होता है.

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शनि देव वक्री होते हुए 3 अक्टूबर को पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में प्रवेश कर गये. ज्योतिष के अनुसार यह घटना केवल एक साधारण परिवर्तन नहीं है, बल्कि कर्मफलदाता ग्रह शनि की गति और शक्ति को और तीव्र बनाने वाली होगी. पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र का स्वामी गुरु बृहस्पति है. जब शनि, जो अनुशासन और न्याय का प्रतीक है, गुरु के नक्षत्र में गोचर करते हैं, तब यह संयोजन गहन आध्यात्मिकता, कर्म का फल और जीवन की दिशा में निर्णायक बदलाव लाता है.

शनि इस समय वक्री रहेंगे, इसलिए यह अवधि प्रत्येक राशि के जातकों को उनके किए गए कर्मों का और भी गहरा फल प्रदान करेगी. अच्छे कर्म करने वालों को उन्नति मिलेगी, जबकि गलत रास्ते पर चलने वालों को चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.

आध्यात्मिक झुकाव – पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र का संबंध तपस्या, साधना और गहन चिंतन से है. शनि की उपस्थिति जातकों को आत्ममंथन और जीवन की सच्चाई को समझने की ओर प्रेरित करेगी.

राशिचक्र पर प्रभाव – सभी 12 राशियों पर इसका असर अलग-अलग ढंग से पड़ेगा. कुछ को करियर और व्यापार में सफलता मिलेगी, जबकि कुछ को स्वास्थ्य व आर्थिक मामलों में सावधानी बरतनी होगी.

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि का 3 अक्टूबर 2025 को पूर्व भाद्रपद नक्षत्र में प्रवेश एक महत्वपूर्ण घटना है, जिसके कई प्रभाव हो सकते हैं।

यह गोचर 20 जनवरी 2026 तक रहेगा। इस दौरान शनि वक्री अवस्था में रहेगा, यानी यह उल्टी दिशा में चलेगा। इस गोचर के कुछ प्रमुख प्रभाव यहाँ दिए गए हैं:

ज्योतिष के अनुसार, वक्री अवस्था में शनि का किसी नक्षत्र में वापस आना, अधूरे कामों को पूरा करने और पिछली गलतियों को सुधारने का मौका देता है।

यह समय आत्मनिरीक्षण और व्यक्तिगत विकास पर ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

यह अवधि आपको अपनी आंतरिक कमजोरियों और रहस्यों को समझने और उन्हें अपनी ताकत में बदलने के लिए प्रेरित कर सकती है।

यह गोचर आध्यात्मिक विकास की ओर ले जा सकता है, जहाँ लोग सतही भक्ति के बजाय व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित विश्वास की ओर बढ़ेंगे।

यह गोचर एक परिवर्तनकारी और महत्वपूर्ण समय है जो हर व्यक्ति को आत्म-मूल्यांकन करने और अपने जीवन में आवश्यक बदलाव लाने का अवसर देगा।

चन्द्रशेखर जोशी

बगला मुखी पीठ देहरादून

Mob 9412932030

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