28 अक्तूबर,उपाय & देवउठनी एकादशी 1 नवंबर, तुलसी विवाह 2 नवंबर,हर दिन के शुभ और अशुभ समय

28 अक्तूबर 2025 को कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि & पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र और सुकर्माण योग का संयोग & मंगलवार को अभिजीत मुहूर्त 11:39 − 12:23 मिनट तक & राहुकाल दोपहर 14:47 − 16:09 मिनट तक & ॐ अं अंगारकाय नम:। आज का उपाय-हनुमान मन्दिर में सवाकिलो बूंदी के लड्डू भेंट करें। वनस्पति तंत्र उपाय- खैर के वृक्ष में जल चढ़ाएं। दलिया का सेवन कर यात्रा पर निकलें

BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI CHIEF EDITOR; HIMALAYAUK.ORG (Leading Newsportal & youtube Channel & Daily Newspaper) Yr Contribution

कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि & सूर्योदय का समय : 06: 30 ए एम & सूर्यास्त का समय : 05: 39 पी एम & चंद्रोदय का समय: 12:22 ए एम & चंद्रास्त का समय : 10:41 पी एम

28 अक्टूबर 2025 से कार्तिक मास का 22वां दिन है। साथ ही आज पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि है, जो कि 07:59 ए एम तक जारी रहेगी। इसके बाद सप्तमी तिथि लग जाएगी। बता दें कि आज मंगलवार का दिन है। इस दिन सूर्य देव तुला राशि में रहेंगे। वहीं चंद्रमा 10:14 पी एम तक धनु राशि में रहेंगे। इसके बाद मकर राशि में गोचर करेंगे। आपको बता दें, आज मंगलवार के दिन अभिजीत मुहूर्त 11:42 ए एम से 12:27 पी एम तक है। इस दिन राहुकाल 02:52 पी एम से 04:15 पी एम तक रहेगा। आज कोई विशेष त्योहार नहीं है, लेकिन वार के हिसाब से आप मंगलवार का व्रत रख सकते हैं, जो हनुमान जी को समर्पित होता है।

कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहते हैं और हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व माना गया है. देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु योग निद्रा से जागते हैं और इसके बाद ही शुभ व मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है. जो कि पिछले चार महीने यानि देवशयनी एकादशी के बाद वर्जित हो गए थे.

कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहते हैं. पंचांग के अनुसार इस साल यह तिथि 1 नवंबर को सुबह 9 बजकर 11 मिनट पर शुरू होगी और 2 नवंबर को सुबह 7 बजकर 31 मिनट पर समाप्त होगी. इस साल देवउठनी एकादशी 1 नवंबर 2025 को मनाई जाएगी.

तुलसी विवाह 2 नवंबर 2025 को होगा. इस दिन माता तुलसी का विवाह शालीग्राम के साथ होता है. शालीग्राम भगवान विष्णु का ही विग्रह रूप हैं. इस विवाह के बाद ही हिंदू धर्म में शादी-विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश व मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है.

हिंदू धर्म में हनुमान जी की पूजा का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि प्रभु की पूजा-अर्चना करने से भक्तों को बल, बुद्धि और विद्या की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलयुग में हनुमान जी धरती पर विराजमान हैं और अपने भक्तों की हर तरह से रक्षा करते हैं। श्रीमद् भागवत के अनुसार, वे गंधमादन पर्वत पर रहते हैं, जो कैलाश पर्वत के उत्तर में स्थित है। हनुमान जी को हिंदू धर्म में कई अलग नामों से जाना जाता है, जैसे की बजरंगबली, मारुति, पवनपुत्र, अंजनीसुत, संकटमोचन, केसरीनंदन, महावीर, कपीश आदि। संकटमोचन की आराधना से न केवल भक्तों को सभी संकटों से मुक्ति मिलती है, बल्कि उनकी सभी मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं। ऐसे में अगर आप भी प्रभु की कृपा पाना चाहते हैं तो मंगलवार के दिन उनकी पूजा के साथ-साथ इस आरती को जरूर पढ़ें। ऐसा करने से वह बेहद प्रसन्न होंगे और आपकी सभी इच्छा पूरी करेंगे। 

हनुमान जी की आरती (Hanuman Ji Ki Aarti Lyrics)

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके।।

अंजनि पुत्र महाबलदायी। संतान के प्रभु सदा सहाई।।

दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारी सिया सुध लाए।।

लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई।।

लंका जारी असुर संहारे। सियारामजी के काज संवारे।।

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आणि संजीवन प्राण उबारे।।

पैठि पताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखाड़े।।

बाएं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे।।

सुर-नर-मुनि जन आरती उतारे। जै जै जै हनुमान उचारे।।

कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई।।

लंकविध्वंस कीन्ह रघुराई। तुलसीदास प्रभु कीरति गाई।।

हनुमान जी के मंत्र (Hanuman Ji Ke Mantra)

ऊँ नमो हनुमते रुद्रावताराय अक्षिशूलपक्षशूल शिरोऽभ्यन्तर

शूलपित्तशूलब्रह्मराक्षसशूलपिशाचकुलच्छेदनं निवारय निवारय स्वाहा।

ओम नमो हनुमते रूद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय

सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा।

ऊँ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसंहरणाय

सर्वरोगहराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा।

 हिंदू धर्म में मंगलवार का दिन भगवान हनुमान जी को समर्पित माना गया है। इस दिन भक्त बड़े ही श्रद्धा और भक्ति भाव से हनुमान जी की पूजा करते हैं। माना जाता है कि हनुमान जी को प्रसन्न करना ज्यादा कठिन नहीं है। अगर कोई व्यक्ति सच्चे दिल और पूरी निष्ठा से उनकी भक्ति करता है, तो वे जल्दी प्रसन्न होकर भक्तों पर अपनी विशेष कृपा बरसाते हैं। कहा जाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी परेशानियां क्यों न आ जाएं, अगर इंसान पूरी श्रद्धा से हनुमान चालीसा का पाठ करता है, तो भगवान उसके सारे दुख और संकट दूर कर देते हैं। अगर आप भी चाहते हैं कि हनुमान जी की विशेष कृपा आप पर बनी रहे, तो हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य करें। हालांकि इस बात का ध्यान रखें कि हनुमान चालीसा का पाठ करते समय दिल से हर शब्द का उच्चारण करें और भगवान से अपने दुखों को दूर करने की प्रार्थना करें।

हनुमान चालीसा का पाठ 

दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधार।

बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।

बल बुद्धि बिद्या देहु मोहि, हरहु कलेस बिकार॥

चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर,

जय कपीस तिहुं लोक उजागर।

रामदूत अतुलित बल धामा,

अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।

महाबीर बिक्रम बजरंगी,

कुमति निवार सुमति के संगी।

कंचन बरन बिराज सुबेसा,

कानन कुंडल कुंचित केसा।।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै,

कांधे मूंज जनेऊ साजै।

संकर सुवन केसरीनंदन,

तेज प्रताप महा जग बंदन।।

विद्यावान गुनी अति चातुर,

राम काज करिबे को आतुर।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया,

राम लखन सीता मन बसिया।।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा,

बिकट रूप धरि लंक जरावा।

भीम रूप धरि असुर संहारे,

रामचंद्र के काज संवारे।।

लाय सजीवन लखन जियाये,

श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई,

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं,

अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा,

नारद सारद सहित अहीसा।।

जम कुबेर दिगपाल जहां ते,

कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा,

राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना,

लंकेश्वर भए सब जग जाना।

जुग सहस्र जोजन पर भानू,

लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं,

जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।

दुर्गम काज जगत के जेते,

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

राम दुआरे तुम रखवारे,

होत न आज्ञा बिनु पैसारे।

सब सुख लहै तुम्हारी सरना,

तुम रक्षक काहू को डर ना।।

आपन तेज सम्हारो आपै,

तीनों लोक हांक तें कांपै।

भूत पिसाच निकट नहिं आवै,

महाबीर जब नाम सुनावै।।

नासै रोग हरै सब पीरा,

जपत निरंतर हनुमत बीरा।

संकट तें हनुमान छुड़ावै,

मन, क्रम, बचन ध्यान जो लावै।।

सब पर राम तपस्वी राजा,

तिन के काज सकल तुम साजा।

और मनोरथ जो कोई लावै,

सोई अमित जीवन फल पावै।।

चारों जुग परताप तुम्हारा,

है परसिद्ध जगत उजियारा।

साधु संत के तुम रखवारे,

असुर निकंदन राम दुलारे।।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता,

अस वर दीन जानकी माता।

राम रसायन तुम्हरे पासा,

सदा रहो रघुपति के दासा।।

तुम्हरे भजन राम को पावै,

जनम-जनम के दुख बिसरावै।

अंतकाल रघुबर पुर जाई,

जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।।

और देवता चित्त न धरई,

हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।

संकट कटै मिटै सब पीरा,

जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

जै जै जै हनुमान गोसाईं,

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।

जो सत बार पाठ कर कोई,

छूटहि बंदि महा सुख होई।।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा,

होय सिद्धि साखी गौरीसा।

तुलसीदास सदा हरि चेरा,

कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।।

दोहा

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

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