04 नवंबर 2025 को कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि है। इस तिथि पर रेवती नक्षत्र और वज्र योग का संयोग बन रहा है। दिन के शुभ मुहूर्त की बात करें मंगलवार को अभिजीत मुहूर्त 11:39 − 12:22 मिनट तक रहेगा। राहुकाल दोपहर 14:44 − 16:05 मिनट तक रहेगा। & 4 नवंबर 2025 को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि है, जो कि 10:36 पी एम तक जारी रहेगी। इसके बाद पूर्णिमा तिथि लग जाएगी। & बैकुण्ठ चतुर्दशी/सर्वार्थसिद्धि अमृत योग/पंचक समाप्त यात्रा शकुन-दलिया का सेवन कर यात्रा पर निकलें। बैकुण्ठ चतुर्दशी/सर्वार्थसिद्धि अमृत योग/पंचक समाप्त यात्रा शकुन-दलिया का सेवन कर यात्रा पर निकलें। BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI Mob. 9412932030

वैकुंठ चतुर्दशी – वैकुंठ चतुर्दशी एक पावन दिन है जो कार्तिक पूर्णिमा से एक दिन पूर्व मनाया जाता है, जिसमें भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की पूजा की जाती है। इस दिन भगवान विष्णु ने वाराणसी में भगवान शिव की पूजा की थी और अपना एक नेत्र निकालकर उन्हें अर्पित किया था, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें सुदर्शन चक्र दिया था। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा निशीथकाल में की जाती है, जबकि भगवान शिव की पूजा अरुणोदयकाल में की जाती है। वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर स्नान करना और काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान विष्णु की पूजा करना विशेष महत्व रखता है।
मणिकर्णिका स्नान & 4 नवंबर मंगलवार का दिन है। कार्तिक माह (Kartik Month) की कार्तिक शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि 10:36 PM तक उपरांत पूर्णिमा , नक्षत्र रेवती 12:34 PM तक उपरांत अश्विनी ,वज्र योग 03:42 PM तक, उसके बाद सिद्धि योग ,करण गर 12:24 PM तक, बाद वणिज 10:36 PM तक, बाद विष्टि , तिथि-कार्तिक शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, आज का पक्ष-शुक्ल पक्ष आज का वार-मंगलवार
4 नवंबर 2025 से कार्तिक मास का 29वां दिन है। मंगलवार का दिन है। इस दिन सूर्य देव तुला राशि में रहेंगे। वहीं चंद्रमा 12:34 पी एम तक मीन राशि में रहेंगे। इसके बाद मेष राशि में गोचर करेंगे। आपको बता दें, आज के दिन अभिजीत मुहूर्त 11:43 ए एम से 12:26 पी एम बजे तक है। इस दिन राहुकाल 02:49 पी एम से 04:11 पी एम तक रहेगा। आज वैकुण्ठ चतुर्दशी, मणिकर्णिका स्नान और कार्तिक चौमासी चौदस है। साथ ही वार के हिसाब से आप मंगलवार का व्रत रख सकते हैं, जो कि हनुमान जी को समर्पित होता है।
मंगलवार के उपाय – मंगलवार के दिन हनुमान जी की पूजा करने से मंगल ग्रह के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। हनुमान जी को सिंदूर, चमेली का तेल और लाल फूल चढ़ाएं। इसके अलावा, मंगल ग्रह के मंत्र “ॐ अं अंगारकाय नमः” का जाप करने से भी शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं। गुड़, तांबे के बर्तन, लाल वस्त्र आदि दान करने और मूंगे की अंगूठी पहनने से भी मंगल ग्रह के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। भोजन में मसूर की दाल शामिल करने से भी लाभ मिलता है। इन उपायों को करने से मंगल ग्रह के नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है और शुभ परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
वैकुंठ चतुर्दशी के दिन सुबह स्नान करके मंदिर की साफ-सफाई करें और भगवान विष्णु और शिव जी की पूजा करें। शिव जी का पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक करें और उन्हें सफेद चंदन, धतूरा, बिल्व पत्र, भांग और सफेद पुष्प अर्पित करें। विष्णु जी को पीला चंदन और पीले पुष्प अर्पित करें और घी का दीपक जलाएं। पूजा के दौरान ॐ नमः शिवाय और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। अंत में दोनों देवताओं की आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें।
आज का मंत्र-ॐ अं अंगारकाय नम:।
आज का उपाय-हनुमान मन्दिर में शहद चढ़ाएं।
वनस्पति तंत्र उपाय- खैर के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
तुलसीदास ने सुन्दर कांड में जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है | “हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास अट्टहास करि गर्जा कपि ब
तुलसीदास ने सुन्दर कांड में जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है | “हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।”
जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो –वे उनचासों पवन चलने लगे।हनुमान जी अट्ट वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है। ये 7 प्रकार हैं- 1. प्रवह, 2. आवह, 3. उद्वह, 4. संव 1. प्रवह :- पृथ्वी को लांघकर मेघमंडलपर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। इस प्रवह के भी प्रकार हैं। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और वही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली आवह :- आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता उद्वह :- वायु की तीसरी शाखा का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संवह :- वायु की चौथी शाखा का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आ विवह :- पांचवीं शाखा का नाम विवह है और यह ग्रह मंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है।
परिवह :- वायु की छठी शाखा का नाम परिवह है, जो सप्तर्षिमंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तश्रर्षि आकाश में भ्रमण करते हैं।
परावह :- वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष, भूलोक की पूर्व दिशा, भूलोक की पश्चिम दिशा, भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक कि दक्षिण दिशा। इस तरह 7×7=49, कुल 49 मरुत मरुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं।
बैकुण्ठ चतुर्दशी/सर्वार्थसिद्धि अमृत योग/पंचक समाप्त
यात्रा शकुन-दलिया का सेवन कर यात्रा पर निकलें।