नाइट्रोफ्यूरान अंडा उत्पादन में प्रतिबंधित; सुरक्षा कारणों से नियंत्रण;भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने सभी राज्यों में अंडों में नाइट्रोफ्यूरान की जांच के लिए नमूने एकत्र करने के निर्देश, कैंसर होने का खतरा

22 DEC. 2025 (HIMALAYAUK NEWS; Leading Newspaper & youtube Channel & Daily Newspaper) सोशल मीडिया पर अंडों को लेकर तमाम खबरें चल रही हैं. इनमें दावा किया जा रहा है कि कुछ ब्रांड के अंडों में नाइट्रोफ्यूरान नाम का बैन एंटीबायोटिक के ट्रेस होते हैं, जिससे कैंसर होने का खतरा रहता है.  खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने अपने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे ब्रांडेड और बिना ब्रांड वाले दोनों प्रकार के अंडों के नमूने एकत्र करें।

प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने संसद में जानकारी देते हुए कहा है कि अगर मौजूदा हालात ऐसे ही रहे, तो साल 2040 तक भारत में कैंसर मरीजों की संख्या 20 लाख तक पहुंच सकती है.

Execlusive Report by Chandra Shekhar Joshi Chief Editor Mob. 9412932030

FSSAI के मुताबिक, नाइट्रोफ्यूरान का इस्तेमाल पोल्ट्री और अंडा उत्पादन में पूरी तरह प्रतिबंधित है. अगर कहीं ट्रेस मिले भी तो वह अलग-थलग मामला है, सभी अंडों पर लागू नहीं होता है. वैज्ञानिक प्रमाणों के अनुसार, इतनी कम मात्रा से कैंसर या कोई स्वास्थ्य समस्या नहीं होती है. 

नाइट्रोफुरन एक दवा वर्ग है जो चिकित्सा और पशुपालन में उपयोगी है, लेकिन सुरक्षा कारणों से इसके उपयोग पर सख्त नियंत्रण है, खासकर खाद्य श्रृंखला में, जबकि नाइट्रोफ्यूरेंटोइन अभी भी मनुष्यों के लिए एक महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक है। 

नाइट्रोफुरन (Nitrofuran) एक प्रकार के सिंथेटिक एंटीबायोटिक (जीवाणुरोधी) यौगिकों का समूह है, जिसका उपयोग पहले जानवरों में बैक्टीरियल इन्फेक्शन के इलाज और ग्रोथ प्रमोटर (विकास प्रमोटर) के रूप में किया जाता था, लेकिन कार्सिनोजेनिक (कैंसरकारी) अवशेषों की चिंताओं के कारण कई देशों में प्रतिबंधित कर दिया गया है, हालांकि इसका एक रूप नाइट्रोफ्यूरेंटोइन (Nitrofurantoin) अभी भी मनुष्यों में मूत्र पथ के संक्रमण (UTI) के इलाज के लिए इस्तेमाल होता है। 

अब तक खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) की ओर से कोई आधिकारिक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। प्राधिकरण ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल केवल नमूना संग्रह और परीक्षण की प्रक्रिया चल रही है। अंतिम परिणाम आने के बाद ही यह तय किया जाएगा कि अंडों में नाइट्रोफ्यूराॅन या उससे जुड़े अवशेष पाए गए हैं या नहीं। नाइट्रोफ्यूराॅन से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में सीमित साक्ष्य हैं, लेकिन पशुओं के अध्ययन और मनुष्यों में दवा के रूप में उपयोग से जुड़े संभावित जोखिमों में शामिल हैं: 

  • कैंसर का खतरा: सबसे बड़ी चिंता संभावित कैंसरजन्य प्रभाव है, हालांकि यह दीर्घकालिक और उच्चस्तरीय जोखिम से जुड़ा है।
  • एलर्जी और श्वसन संबंधी समस्याएं: कुछ व्यक्तियों में, विशेष रूप से जब दवा के रूप में उपयोग किया जाता है, तो इससे बुखार, ठंड लगना, खांसी, सीने में दर्द और सांस लेने में तकलीफ जैसी तीव्र फुफ्फुसीय (फेफड़ों से संबंधित) प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं।
  • पाचन संबंधी समस्याएं: मतली, उल्टी, भूख न लगना, पेट दर्द और दस्त सबसे आम दुष्प्रभाव हैं, जो आमतौर पर दवा लेने के पहले सप्ताह के दौरान होते हैं।
  • लीवर और गुर्दे की समस्याएं: नाइट्रोफ्यूरान का उपयोग लीवर को नुकसान पहुंचा सकता है, जिसमें तीव्र हेपेटोसेलुलर (hepatocellular) और कोलेस्टेटिक चोट (cholestatic injury) शामिल है। किडनी की गंभीर समस्या वाले मरीजों के लिए इसका सेवन विशेष रूप से खतरनाक हो सकता है।
  • तंत्रिका क्षति: हाथों और पैरों में सुन्नपन, झुनझुनी या जलन (परिधीय न्यूरोपैथी) जैसे तंत्रिका संबंधी प्रभाव भी संभव हैं। 

राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि कैंसर के मामलों में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है, चीन और अमेरिका के बाद भारत में सबसे ज्यादा कैंसर मरीज हैं. उन्होंने कहा कि बीमारियों का स्वरूप बदल रहा है, पहले जो बीमारियां बुजुर्गों में होती थीं, वे अब कम उम्र में ही दिखने लगी हैं. कैंसर भी इन्हीं बीमारियों में से एक है.

2040 तक कैंसर मरीज क्यों बढ़ सकते हैं?

1. बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है – भारत में 60 साल से अधिक उम्र के लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। चूंकि कैंसर का खतरा उम्र के साथ बढ़ता है, इसलिए जैसे-जैसे बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी, कैंसर के मरीज भी बढ़ेंगे. अध्ययनों के अनुसार., 60 से 74 वर्ष की आयु के लोगों में कैंसर सबसे ज्यादा पाया जाता है. जनसंख्या का आकार और उम्र की संरचना बदलने से कुल मामलों में भारी वृद्धि हो रही है.

2. लाइफस्टाइल से जुड़ी आदतें – आज की लाइफस्टाइल कैंसर को न्योता दे रही है. मेडिकल रिसर्च के अनुसार भारत में करीब 70 प्रतिशत कैंसर के मामले रोके जा सकते हैं, लेकिन इसके लिए आदतों में बदलाव जरूरी है. इसके मुख्य कारण तंबाकू और गुटखा सेवन, शराब का ज्यादा यूज, जंक फूड और इन बैलेंस्ड डाइट और फिजिकल एक्टिविटी की कमी और मोटापा हैं. इनमें से तंबाकू आज भी भारत में कैंसर का सबसे बड़ा कारण है. 

प्रदूषण भी बन रहा है बड़ा खतरा

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने वायु प्रदूषण को कैंसर फैलाने वाला कारण माना है. भारत के कई शहरों में PM2.5 का स्तर सुरक्षित सीमा से बहुत ज्यादा है, लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है. यह खतरा उन लोगों में भी है, जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया है. 

भारत में कौन-कौन से कैंसर तेजी से बढ़ रहे हैं?

भारत में कैंसर का स्वरूप हर क्षेत्र में अलग-अलग है.महिलाओं में स्तन कैंसर सबसे आम है. इसके बाद सर्वाइकल कैंसर है. HPV टीकाकरण और समय पर जांच से इसमें सुधार दिखा है. पुरुषों में मुंह का कैंसर, फेफड़ों का कैंसर, जो अब महिलाओं में भी बढ़ रहा है. शहरी क्षेत्रों में कोलोरेक्टल (आंतों का) कैंसर तेजी से बढ़ रहा है. यह तंबाकू से जुड़ा न होने वाला कैंसर है. पूर्वोत्तर राज्यों में सिर और गर्दन के कैंसर ज्यादा देखने को मिलते हैं. सरकारी और स्वास्थ्य एजेंसियों के अनुमान बताते हैं कि हर 9 में से 1 भारतीय को जीवन में कभी न कभी कैंसर हो सकता है. यह आंकड़ा बताता है कि कैंसर अब किसी एक वर्ग या उम्र की बीमारी नहीं रह गई है. 

राज्य मंत्री ने बताया कि देश के लगभग हर जिला अस्पताल में कैंसर इलाज की सुविधा विकसित की जा रही है. सरकार की कोशिश है कि इलाज कम कीमत या मुफ्त में लोगों तक पहुंचे. स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ मिलकर एक व्यापक योजना पर काम चल रहा है. 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *