17 जनवरी 2026 को माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है। इस तिथि पर मूल नक्षत्र और व्याघात योग का संयोग बन रहा है। दिन के शुभ मुहूर्त की बात करें तो शनिवार को अभिजीत मुहूर्त 12:10-12:52 मिनट तक रहेगा। राहुकाल सुबह 09:53-11:12 मिनट तक रहेगा। हिन्दू पंचांग के अनुसार जनवरी 17, 2026, शनिवार माघ माह के कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि है & गुप्त नवरात्रि का पावन पर्व तंत्र, मंत्र और यंत्र को सिद्ध करने के लिए अत्यंत ही शुभ और फलदायी
चतुर्दशी (रात्रि 11:36 तक), उसके बाद अमावस्या प्रारंभ। BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI BAGLA MUKHI PEETH DEHRADUN गुप्त नवरात्रि 19 जनवरी 2026, सोमवार से प्रारंभ होगी और 27 जनवरी 2026 को समाप्त & शक्ति की साधना के लिए माघ मास की गुप्त नवरात्रि का बहुत ज्यादा महत्व

माघ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी, कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), पौष | चतुर्दशी तिथि 12:04 AM तक उपरांत अमावस्या | नक्षत्र मूल 08:12 AM तक उपरांत पूर्वाषाढ़ा | व्याघात योग 09:17 PM तक, उसके बाद हर्षण योग | करण विष्टि 11:16 AM तक, बाद शकुनि 12:04 AM तक, बाद चतुष्पद |
10 महाविद्या की साधना से जुड़ा गुप्त नवरात्रि का पर्व साल में दो बार ऋतुओं के संधिकाल के दौरान आता है. आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि का पर्व जहां ग्रीष्म ऋतु के समाप्ति के बाद वर्षा की शुरुआत के दौरान मनाया जाता है तो वहीं माघ मास की गुप्त नवरात्रि का पावन पर्व शीत ऋतु के बाद बसंत ऋतु के आगमन के दौरान मनाया जाता है. गुप्त नवरात्रि का पावन पर्व तंत्र, मंत्र और यंत्र को सिद्ध करने के लिए अत्यंत ही शुभ और फलदायी माना जाता है. यही कारण है कि लोग अपनी कामनाओं को पूरा करने के लिए देवी 10 अलग-अलग स्वरूपों की विशेष पूजा करते हैं. मान्यता है कि गुप्त नवरात्रि में जितने गुप्त रूप से देवी की साधना की जाती है, वह उतनी ही ज्यादा सफल होती है.
शक्ति की साधना के लिए माघ मास की गुप्त नवरात्रि का बहुत ज्यादा महत्व & माघ महीने की गुप्त नवरात्रि 19 जनवरी 2026, सोमवार से प्रारंभ होगी और 27 जनवरी 2026 को समाप्त होगी. सनातन परंपरा में शक्ति की साधना का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. जिस शक्ति के बगैर शिव और दूसरे देवता अधूरे माने जाते हैं, उसकी पूजा के लिए हर साल चार बार नवरात्रि का महापर्व मनाया जाता है. इसमें से दो नवरात्रि – चैत्र और शारदीय पर जहां शक्ति की साधना-आराधना खूब धूम-धाम से की जाती है तो वहीं दो नवरात्रि – माघ और आषाढ़ मास की नवरात्रि पर में माता के दिव्य स्वरूप की पूजा गुप्त रूप से की जाती है. माघ मास की नवरात्रि का महापर्व
राहु काल वेला (मध्यमान से) दिन 9.00 से 10.30 तक; राहु काल में शुभ कार्यों का प्रारंभ नहीं करना चाहिए। यदि कार्य को टाला जाना संभव ना हो तो तले हुए या कुरकुरे, चटपटे भोज्य पदार्थ का सेवन करके ही कार्य प्रारंभ करें। इससे राहुकाल का दुष्प्रभाव कम होगा।
17 जनवरी, शनिवार का दिन है. आज माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है और आज भद्रा काल भी रहेगा. जो कि सुबह 7 बजकर 15 मिनट पर शुरू होगा और सुबह 11 बजकर 15 मिनट पर समाप्त होगा. भद्रा काल को अशुभ मुहूर्त माना जाता है और इस दौरान कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य नहीं किया जाता. कहते हैं कि भद्रा में किया गया अशुभ फल प्रदान करता है. राहुकाल को भी अशुभ मुहूर्त माना जाता है
चैत्र और शारदीय नवरात्रि के 09 दिनों में जहां प्रत्येक दिन एक देवी की पूजा के लिए समर्पित होता है और कुल 09 देवियों – शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा होती है, तो वहीं माघ और आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि में 10 महाविद्या – काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला की गुप्त रूप से साधना-आराधना की जाती है. माघ मास की गुप्त नवरात्रि के पांचवें दिन बसंत पंचमी का महापर्व भी मनाया जाता है, जिसमें माता सरस्वती की भी विशेष पूजा की जाती है.
आज मासिक शिवरात्रि का विशेष पर्व है और पितृ कार्यों के लिए भी महत्वपूर्ण दिन है। मासिक शिवरात्रि पूजा मुहूर्त: रात्रि 12:04 से 12:58 तक (18 जनवरी की मध्यरात्रि) ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 05:27 से 06:21 तक & माघ कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि रात्रि तक रहेगी, इसके पश्चात अमावस्या प्रारंभ होगी। दिनभर चंद्रमा धनु राशि में विराजमान रहेगा। मूल एवं पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का संयोग बन रहा है। आज भद्रा, गंडमूल, रटंती कालिका पूजन तथा शब्बे मिराज जैसे विशेष योग भी हैं।
वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा के उत्तरी और दक्षिणी नोड्स को राहु और केतु के नाम से जाना जाता है और इन्हें बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। हर राशि पर एक खास ग्रह का राज होता है। उदाहरण के लिए, मंगल मेष और वृश्चिक राशि के स्वामी हैं, शुक्र वृषभ और तुला राशि के, बृहस्पति धनु और मीन राशि के, सूर्य सिंह राशि के और चंद्रमा कर्क राशि के स्वामी हैं। शनि मकर और कुंभ राशि के स्वामी हैं, जबकि बुध मिथुन और कन्या राशि के स्वामी हैं।
हालांकि ज्योतिष में यह कहा जाता है कि हर ग्रह उस राशि में ज्यादा प्रभावित करता है जिससे वह गुज़रता है या कहें कि गोचर करता है। ज्योतिषाचार्य ग्रहों की स्थितियों के कई अलग-अलग संयोजन का अध्ययन करते हैं, और उनकी व्याख्या सदियों अवलोकन से आती है।
ज्योतिष में यह देखा जाता है कि ग्रह कैसे अपनी चाल बदलते हैं और ये चालें लोगों के जीवन को कैसे प्रभावित करती हैं। ग्रह का गोचर दूसरे ग्रहों की स्थिति पर भी निर्भर करता है और गोचर के चलते हैं जीवन में प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि ज्योतिषी भविष्यवाणी करने से पहले कई कारकों पर विचार करते हैं।
ज्योतिषीय परिवर्तनों को समझने के लिए ग्रहों की गति महत्वपूर्ण है। हर ग्रह अपनी गति से चलता है, एक राशि से दूसरी राशि में जाता है। जब कोई ग्रह किसी नई राशि में प्रवेश करता है, तो इसे ग्रहों का गोचर कहा जाता है, जिसके चलते जीवन में बदलाव देखने को मिलता है।
अक्सर कुछ ग्रह चंद्रमा, सूर्य, बुध और शुक्र की तरह तेज़ी से चलते हैं, इसलिए उनके प्रभाव अधिक बार बदलते हैं। मंगल, बृहस्पति, शनि, राहु और केतु जैसे अन्य ग्रह धीरे-धीरे चलते हैं, जिससे लंबे समय तक चलने वाले प्रभाव पैदा होते हैं। क्योंकि ये चालें जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों को प्रभावित कर सकती हैं, इसलिए बहुत से लोग आने वाले गोचरों के बारे में अपडेट रहना पसंद करते हैं।