सुर्खियों में : दुर्दिन : Execlusive Report by Chandra Shekhar Joshi
उत्तराखंड का गौरव रहा पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय : घोर चिंता का विषय : रैंकिंग में अनेक पायदान नीचे चला गया & राजकीय विश्वविद्यालय की सूची से बाहर :

एक्सक्लूसिव रिपोर्ट
आज विचित्र दोराहे पर खड़ा है। नये कुलपति का चुनाव होना है और चर्चा है की पुराने कुलपति को नया कार्यकाल मिलने की संभावना है।
फिर चर्चा छिड़ जाती है कि विगत 2-3 वर्षों में विश्वविद्यालय ने जो-जो देखा वह पिछले पैंसठ साल में नहीं देखा। अपने उत्तराखण्ड के सबसे होनहार बच्चे पंतनगर आते हैं पर वहाँ वे मानसिक उत्पीड़न, अव्यवस्था, दुर्व्यवहार का शिकार हो आत्म-हत्या तक करने लगें तो यह राज्य के लिये घोर चिंता का विषय है ।
विगत कुछ महीनों में देखते-देखते तीन-तीन होनहार छात्रों की आत्महत्या, दो छात्रों की तो चौबीस घण्टे के बीच ही आत्महत्या, विश्वविद्यालय के छात्रावास के छात्रों की बाहरी अपराधी तत्वों द्वारा खदेड़-खदेड़ कर पिटाई, धारदार हथियारों का प्रयोग, गाँधी छात्रावास की छात्राओं द्वारा उनके साथ सड़कों पर खुले दुर्व्यवहार की शिकायत, शिक्षकों और कर्मचारियों के मानसिक उत्पीड़न की पराकाष्ठा, पैंतीस वरिष्ठ वैज्ञानिकों की अचानक अकारण सेवा-समाप्ति जिसे उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने स्टे किया,
शिक्षकों-कर्मचारियों का दूरस्थ केंद्रों पर नियम-विरुद्ध तबादला जिनमें से अनेक को न्यायालय की शरण में जाना पड़ा, नियुक्तियों के लिये नियम-विरुद्ध विज्ञापन जिसपर एक बार राज्यपाल कार्यालय और अगली बार उत्तराखण्ड शासन को रोक लगाना पड़ा,
उल-जुलूल विज्ञापन, नियुक्ति नियमों और रोस्टर में जबरन अवैधानिक बदलाव के कारण आरटीआई और शिकायतों की बाढ़ जिस बीच कुलपति द्वारा एसीपीओ बदलो का खेल चला और थोड़े समय में पाँच-पाँच एसीपीओ बदले गये,
सारे तमाशे से परेशान राज्य प्रशासन से लिख कर पूछा – ये एसीपीओ पद की वैधानिकता क्या है जिसके द्वारा विज्ञापन, नियुक्ति, तबादले, प्रशासनिक आदेश निकाले जा रहे जबकि शासन द्वारा नियुक्त निदेशक प्रशासन वहाँ तैनात है,
गलत निर्णयों के कारण मुकदमेबाजी में जबरदस्त बढ़त, बीसियों मामलों में न्यायालय द्वारा विश्वविद्यालय के अनर्गल निर्णयों पर रोक, विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त वकीलों के खर्चे में अप्रत्याशित वृद्धि, बढ़े दरों पर दिल्ली के खास वकील की घंटेवार सेवा हेतु नियुक्ति, कुलपति की शह पर सुरक्षा अधिकारी द्वारा छात्रों और कर्मचारियों का अमानवीय उत्पीड़न, स्थानीय विधायक के मुखर विरोध और उत्पीड़न के शर्मनाक वीडियो वायरल होने के बाद सुरक्षा अधिकारी को हटा कर नियम विरुद्ध स्टेडियम का प्रशासनिक अधिकारी बनाया गया जिसपर पुनः पीड़ित पक्ष द्वारा लिखित विरोध शुरू,
सारे क्रय नियमावली को ताक पर रख कृषि विज्ञान कांग्रेस के नाम पर करोड़ों रुपयों का बंटाधार और मामला खुलने पर ठेकेदारों का भुगतान ऐसा फँसा की साल भर बाद भी भुगतान नहीं हुआ,
पक्षपात और भाई-भतीजावाद के खेल में छात्रावासों की दुर्दशा, कुलपति द्वारा सारी व्यवस्था भंग कर मेस कांट्रेक्टर नियुक्ति का खेल जिससे गन्दे खाने से प्रभावित छात्रों द्वारा कभी पटेल छात्रावास तो कभी सिल्वर जुबली और अन्य छात्रावासों में विरोध प्रदर्शन होते रहे,
शास्त्री छात्रावास का मेस पूरे साल ही ठप्प और छात्र खाने को दर-दर भटकने को मजबूर, अपने ही खेल में फँसे कुलपति कभी सरकारी मेस तो कभी कोआपरेटिव मेस चलाने की असफल कवायद करते रहे और छात्रों का तमाशा बनता रहा,
विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार पेपर-लीक जिसका खुलासा छात्रों ने ही लिख कर किया, अब मामला खुलने पर उस समय की टेक्नोलॉजी महाविद्यालय की अन्तिम वर्ष की सारी संपन्न परीक्षा महीनों बाद रद्द घोषित हुई जिनके परिणाम भी घोषित हो चुके थे और अब सारे छात्र परेशान जिनमें अनेक परीक्षा उत्तीर्ण कर नौकरियां कर रहे,
ऐसा घोर अव्यव्यस्था का तमाशा कभी देखा न था, परेशान होकर घोर दुर्व्यस्था से सम्बन्धित सोशल मीडिया पोस्ट करने पर कुलपति ने कृषि महाविद्यालय के एक प्रोफेसर को सस्पेंड कर जागधार से अटैच किया जिससे भय व्याप्त हो और दुर्व्यवस्था पर कोई आवाज न उठे,
शासन द्वारा तैनात निदेशक प्रशासन के बार-बार लिखित विरोध के बाद भी सेवानिवृत्त चहेते कर्मचारियों का पुनर्नियोजन और उन्हें मुंहमाँगे वेतन का भुगतान, सारे कुलपति कार्यालय का संचालन कुलपति के खास अवकाश-प्राप्त कर्मचारियों द्वारा, डीन पीजी के पद पर वरिष्ठता को दरकिनार कर मनमानी नियुक्ति जिससे वरिष्ठ प्राध्यापक को मजबूरन हाई कोर्ट से स्टे लाना पड़ा,
निदेशक शोध का कार्यकाल समाप्त होने पर भी नियम-विरुद्ध छह महीनों की सेवा वृद्धि वह भी कृषि विज्ञान कांग्रेस के हिसाब-किताब के नाम पर जबकि यह कार्य लेखा-संवर्गीय अधिकारियों का है ।
सारे मामले का प्रभाव घातक और भीषण था, देश के एनआईआरएफ रैंकिंग में विश्वविद्यालय अनेक पायदान नीचे चला गया और राजकीय विश्वविद्यालयों की सूची से तो बाहर ही हो गया ।
उत्तराखण्ड शासन ने सारी अव्यवस्था और अनियमितता के बारे में विश्वविद्यालय को अनेक पत्र लिख सवाल उठाये पर अधिकांश प्रेक्षा आजतक अनुत्तरित है
विश्वविद्यालय उत्तर देने की स्थिति में ही नहीं है । विश्वविद्यालय फार्म की एकमात्र कमाई जिसे अब तक विश्वविद्यालय धरोहर की तरह संजो कर रखता था, की विगत तीन वर्षों में अंधाधुंध लुटाई हुई है जिसके लिये नियमतः उत्तराखंड शासन से अनुमति की आवश्यकता थी ।
इतने कठिन और घोर अव्यवस्था के दौर से गुजर रहे पंतनगर विश्वविद्यालय को क्या पुराने कुलपति के हाथों फिर से सौंप दिया जाना राज्य के हित में है ? क्या देवभूमि उत्तराखंड राज्य अपने इस धरोहर की रक्षा करने की दिशा में कारगर कदम उठायेगा?
महामहिम के समक्ष न्याय का यक्ष प्रश्न है?
प्रस्तुति
चन्द्रशेखर जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
महामंत्री
स्टेट प्रेस क्लब उत्तराखंड देहरादून