श्री दुर्गा चालीसा : नमो नमो दुर्गे सुख करनी… 12 मार्च 2026 गुरुवार मूल नक्षत्र + केतु का खतरनाक संयोग, मूल नक्षत्रों में क्या करना चाहिए? 12 मार्च 2026 का दिन धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से शुभ 

12 मार्च 2026 का दिन धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से शुभ है। नवमी व्रत और पूजा जीवन में सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि लाने में मदद करते हैं। श्रद्धा, संयम और दान के साथ किया गया व्रत सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

12 मार्च 2026, गुरुवार के दिन चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि रहेगी फिर इसके बाद दशमी तिथि लगेगी। इस तिथि पर मूल नक्षत्र रात 10 बजकर 52 मिनट तक रहेगी फिर इसके बाद पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र रहेगा। इस दिन सिद्धि योग रहेगा और चंद्रमा धनु राशि में रहेंगे। अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:07 से 12:54 तक (सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त) ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:57 से 05:47 तक राहुकाल: दोपहर 01:55 से 03:20 तक (इस समय कोई भी शुभ कार्य न करें) by Chandra Shekhar Joshi Chief Editor Mob. 9412932030

 12 मार्च 2026 की तिथि हिंदू पंचांग में क्यों खास मानी जाती है? फाल्गुन मास में आने वाला यह दिन धार्मिक आस्था, व्रत और पूजा-पाठ से जुड़ा माना जाता है। यही कारण है कि कई लोग इस दिन के व्रत, तिथि और धार्मिक महत्व के बारे में जानना चाहते हैं। इस दिन की पूजा और व्रत करने से परिवार में स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस तिथि पर माता देवियों की विशेष पूजा की जाती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

12 मार्च का दिन है और चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि है। 12 मार्च 2026, गुरुवार के दिन चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि रहेगी फिर इसके बाद दशमी तिथि लगेगी। इस तिथि पर मूल नक्षत्र रात 10 बजकर 52 मिनट तक रहेगी फिर इसके बाद पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र रहेगा। इस दिन सिद्धि योग रहेगा और चंद्रमा धनु राशि में रहेंगे। 

12 मार्च 2026 गुरुवार | मूल नक्षत्र + केतु का खतरनाक संयोग – आज हनुमान जी के दर्शन का वो विश्वास रहस्य जो एक संत ने बताया, 99% लोग नहीं जानते। मेष से मीन तक संपूर्ण राशिफल। आज चैत्र कृष्ण नवमी, मूल नक्षत्र, सिद्धि योग और तैतिल करण है। चंद्रमा धनु राशि में केतु के नक्षत्रों में प्रभाव डाल रहे हैं। गुरुवार का दिन और केतु के मूल नक्षत्रों का उदय – यह दुर्लभ संयोग, पुरातन परंपरा, नए निर्माण का संकेत देता है। इस वीडियो में एक वाराणसी के संत से प्राप्त हनुमान दर्शन का अत्यंत गोपनीय सूक्ष्म रहस्य साझा किया गया है – हनुमान जी के तीसरे कंधे का दर्शन कैसे आपका आह्वान सीधे प्रभु श्री राम तक पहुंच सकता है। साथ ही आज का संपूर्ण पंचांग, ​​अभिजित मासिक ( 11:4412:31 ), राहुकाल ( himalayauk.org3:00 ), शेयर बाजार ज्योतिषीय संकेत, और मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, धनु, धनु, मकर, कुंभ, मीन – सभी 12 लग्न का दैनिक विस्तृत राशिफल, उपाय, लकी अंक लक और रंग।

नवरात्रि देवी आराधना का विशेष पर्व है। वैसे तो मां की ममता सदैव अपने भक्तों के साथ होती है, लेकिन नवरात्रि में  मां अपने साधकों के अधिक करीब होती है, और उनके दुख दूर कर अपनी दया दृष्ट‍ि से उन्हें परिपूर्ण करती हैं। मां को प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग तरह से उनकी आराधना की जाती है, जिनमें सहस्रनाम का अपना महत्व है। 

मां की प्रसन्नता के लिए कभी भी उपासना की जा सकती है, क्योंकि शास्त्राज्ञा में चंडी हवन के लिए किसी भी मुहूर्त की अनिवार्यता नहीं है। नवरात्रि में इस आराधना का विशेष महत्व है। इस समय के तप का फल कई गुना व शीघ्र मिलता है। इस फल के कारण ही इसे कामदूधा काल भी कहा जाता है। देवी या देवता की प्रसन्नता के लिए पंचांग साधन का प्रयोग करना चाहिए। पंचांग साधन में पटल, पद्धति, कवच, सहस्रनाम और स्रोत हैं। पटल का शरीर, पद्धति को शिर, कवच को नेत्र, सहस्रनाम को मुख तथा स्रोत को जिह्वा कहा जाता है।

इन सब की साधना से साधक देव तुल्य हो जाता है। सहस्रनाम में देवी के एक हजार नामों की सूची है। इसमें उनके गुण हैं व कार्य के अनुसार नाम दिए गए हैं। सहस्रनाम के पाठ करने का फल भी महत्वपूर्ण है। इन नामों से हवन करने का भी विधान है। इसके अंतर्गत नाम के पश्चात नमः लगाकर स्वाहा लगाया जाता है।

दुर्गा चालीसा

नमो नमो दुर्गे सुख करनी।

नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी।

तिहूं लोक फैली उजियारी॥

शशि ललाट मुख महाविशाला।

नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥

रूप मातु को अधिक सुहावे।

दरश करत जन अति सुख पावे॥

तुम संसार शक्ति लै कीना।

पालन हेतु अन्न धन दीना॥

अन्नपूर्णा हुई जग पाला।

तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी।

तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।

ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा।

दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।

परगट भई फाड़कर खम्बा॥

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।

हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।

श्री नारायण अंग समाहीं॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा।

दयासिन्धु दीजै मन आसा॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।

महिमा अमित न जात बखानी॥

मातंगी अरु धूमावति माता।

भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी।

छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोह भवानी।

लांगुर वीर चलत अगवानी॥

कर में खप्पर खड्ग विराजै।

जाको देख काल डर भाजै॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला।

जाते उठत शत्रु हिय शूला॥

नगरकोट में तुम्हीं विराजत।

तिहुंलोक में डंका बाजत॥

शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे।

रक्तबीज शंखन संहारे॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी।

जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

रूप कराल कालिका धारा।

सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

परी गाढ़ संतन पर जब जब।

भई सहाय मातु तुम तब तब॥

अमरपुरी अरु बासव लोका।

तब महिमा सब रहें अशोका॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।

तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावें।

दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।

जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।

योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

शंकर आचारज तप कीनो।

काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।

काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥

शक्ति रूप का मरम न पायो।

शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी।

जय जय जय जगदम्ब भवानी॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।

दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो।

तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥

आशा तृष्णा निपट सतावें।

रिपू मुरख मौही डरपावे॥

शत्रु नाश कीजै महारानी।

सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥

करो कृपा हे मातु दयाला।

ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला।

जब लगि जिऊं दया फल पाऊं ।

तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं ॥

दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।

सब सुख भोग परमपद पावै॥

देवीदास शरण निज जानी।

करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

॥ इति श्री दुर्गा चालीसा सम्पूर्ण ॥

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