25 अक्टूबर 2026, रविवार & 25 अक्टूबर 2026 को शरद पूर्णिमा का व्रत रखा जाएगा। इस दिन चंद्रमा के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा करने से भी शुभ फलों की प्राप्ति भक्तों को होती है। 25 अक्टूबर को पूर्णिमा तिथि सुबह 11 बजकर 57 मिनट पर शुरू होगी इसलिए रात्रि कालीन पूर्णिमा तिथि होने के चलते व्रत रखा 25 अक्टूबर को ही शुभ & सूर्योदय- सुबह 06:27 बजे सूर्यास्त- शाम 05:42 बजे & आश्विन मास की पूर्णिमा का चांद 25 अक्टूबर, रविवार के दिन शाम को 5 बजे दिखाई देगा। BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI Mob. 9412932030

पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 55 मिनट से लेकर 26 अक्टूबर को सुबह 9 बजकर 41 मिनट तक रहेगी. भगवान सत्यनारायण की कथा सुनें और मां लक्ष्मी की आराधना करें. चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है और खीर में भी उसका प्रभाव आता है. अगले दिन खीर को भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है. चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है और खीर में भी उसका प्रभाव आता है.

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है. ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना जाता है. इस कारण इस रात चंद्रमा की पूजा पूजा, मंत्र जाप, भजन और जागरण का विशेष महत्व बताया जाता है. मान्यता है कि इससे मन को शांति मिलती है और सकारात्मकता बढ़ती है.
शास्त्रों में शाम को प्रदोष काल की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के दिन देवी लक्ष्मी धरती पर आकर भ्रमण करती हैं। ऐसे में जो व्यक्ति इस दिन विधिपूर्वक श्रद्धा भाव से माता लक्ष्मी की पूजा करता है उसकी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं। बता दें कि 25 अक्टूबर को शाम के 4 बजकर 42 मिनट से लेकर 6 बजकर 42 मिनट तक का समय पूजा के लिए उत्तम रहेगा।
आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को शरद पूर्णिमा का व्रत रखा जाता है। इसे कोजागरी पूजा भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस तिथि पर चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होता है। ऐसे में चांद अपनी किरणों से अमृत बरसाता है। कहते हैं कि आश्विन पूर्णिमा पर चंद्रमा की किरणें जिस भी वस्तु पर पड़े उसमें अमृत का संचार होता है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन मां लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था और माता पूर्णिमा के दिन सबसे प्रसन्न मुद्रा में रहती हैं। इसलिए इस दिन विधि-विधान से माता लक्ष्मी की पूजा अवश्य करनी चाहिए।
रेवती नक्षत्र- 25 अक्टूबर को शाम 7 बजकर 22 मिनट तक : शरद पूर्णिमा की रात को चांद की रोशनी बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। कहते हैं शरद पूर्णिमा की रात को चांद की रोशनी में कुछ ऐसे तत्व मौजूद होते हैं, जो हमारे शरीर और मन को शुद्ध करके एक पॉजिटिव ऊर्जा प्रदान करते हैं। इस दिन चंद्रमा 16 कलाओं से परिपूर्ण माना जाता है। दरअसल इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के काफी नजदीक भी होता है, जिसके चलते चंद्रमा की रोशनी का और उसमें मौजूद तत्वों का सीधा और पॉजिटिव असर पृथ्वी पर पड़ता है और ये तो आप जानते ही हैं- ‘चन्द्रमा मनसो जातः’ चन्द्रमा मन का कारक है। जब चन्द्रमा पृथ्वी के नजदीक होगा, तो जाहिर सी बात है कि ये हमारे मन पर और भी अधिक प्रभाव डालेगा। ऐसे में इस दिन व्रत रखने से चंद्रमा और माता लक्ष्मी की पूजा करने से भक्तों को शुभ फलों की प्राप्ति हो सकती है।
आश्विन पूर्णिमा का स्नान-दान 26 अक्टूबर की सुबह 9 बजकर 42 मिनट से पहले करना उत्तम रहेगा। इसी दिन वाल्मीकी जयंती मनाई जाएगी और कार्तिक माह का भी आरंभ हो जाएगा।
- ब्रह्म मुहूर्त- 04:56 ए एम से 05:46 ए एम
- प्रातः सन्ध्या- 05:21 ए एम से 06:36 ए एम
- अभिजित मुहूर्त- 11:59 ए एम से 12:45 पी एम
- विजय मुहूर्त- 02:18 पी एम से 03:04 पी एम
- गोधूलि मुहूर्त- 06:09 पी एम से 06:34 पी एम
- सायाह्न सन्ध्या- 06:09 पी एम से 07:24 पी एम
- अमृत काल- 05:05 पी एम से 06:36 पी एम
- निशिता मुहूर्त-11:58 पी एम से 12:47 ए एम, अक्टूबर 26
पंचांग के अनुसार, 25 अक्टूबर, रविवार के दिन सुबह 11 बजकर 57 मिनट तक चतुर्दशी तिथि रहेगी और इसके पश्चात पूर्णिमा तिथि लग जाएगी। वहीं, अगले दिन यानी 26 अक्टूबर, सोमवार को सुबह 9 बजकर 42 मिनट तक आश्विन पूर्णिमा व्याप्त रहेगी। शास्त्र विधान है कि जिस दिन प्रदोष काल से लेकर निशीथ काल में पूर्णिमा तिथि व्याप्त हो उसी दिन व्रत करन सर्व रूप से मान्य होता है। इसके अनुसार, 25 तारीख को पूर्णिमा तिथि पूरे दिन और मध्य रात्रि में भी व्याप्त रहेगी। ऐसे में 25 अक्टूबर को ही शरद पूर्णिमा का व्रत, लक्ष्मी मां और इंद्रदेव की पूजा करना शास्त्र सम्मत होगा।
पञ्चाङ्ग एक वैदिक समय सूचक अर्थात् घड़ी है, जो केवल उस भौगोलिक स्थान के लिये मान्य होती है, जिसके लिये इसे बनाया जाता है। इसीलिये, विश्व के प्रत्येक नगर के लिये भिन्न-भिन्न पञ्चाङ्ग निर्मित किये जाते हैं।
तिथि, नक्षत्र, योग, करण तथा वार, यह पञ्चाङ्ग के पाँच मूलभूत तत्व होते हैं। पञ्चाङ्गकर्ताओं द्वारा इन पाँच अङ्गों तथा इनके अतिरिक्त लग्न, सूर्योदय, सूर्यास्त, चन्द्रोदय, दिवस तथा रात्रि की अवधि, चन्द्र एवं सूर्य की राशि स्थितियों आदि के संयोग से अनेक शुभ एवं अशुभ योगों का विश्लेषण किया जाता है।
पञ्चाङ्ग में कुछ ऐसे योगों को भी सम्मिलित किया गया है जिनका संयोग प्रतिदिन नहीं अपितु यदा-कदा होता है। द्रिक पञ्चाङ्ग के अन्तर्गत भद्रा, पंचक, गण्ड मूल, विंछुड़ो, द्विपुष्कर योग, त्रिपुष्कर योग, रवि पुष्य योग, गुरु पुष्य योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग, रवि योग, ज्वालामुखी योग, आडल योग तथा विडाल योग आदि योगों को भी सम्मिलित किया गया है। ये सभी दैनिक पञ्चाङ्ग के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण शुभ एवं अशुभ योग हैं, जिनका संयोग किसी भी दिन यादृच्छिक रूप से निर्मित होता रहता है।
पञ्चाङ्ग एक वैदिक घड़ी के समान है जिसका अवलोकन मुहूर्त गणना हेतु पूरे दिन किया जा सकता है। निम्नोक्त महत्त्वपूर्ण क्रियाकलापों के लिये निरन्तर रूप से पञ्चाङ्ग की आवश्यकता होती है –
- गतिविधियाँ आरम्भ करने के लिये इस शुभ मुहूर्त में उठने का सुझाव दिया जाता है।
- प्रातः सन्ध्या – यह हिन्दु धर्म के अनुयायियों के लिये एक अति महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान एवं दैनिक रूप से की जाने वाली तीन सन्ध्याओं में से एक है।
- मध्याह्न सन्ध्या – यह तीन दैनिक सन्ध्याओं में से एक है जो मध्याह्न काल में की जाती है। मध्याह्न सन्ध्या, अभिजित मुहूर्त के समय की जाती है, जो एक शुभ मुहूर्त है।
- सायाह्न सन्ध्या – यह हिन्दुओं के लिये एक आवश्यक अनुष्ठान है, जो दैनिक रूप से की जाने वाली तीन सन्ध्याओं में से एक है।
- राहु काल – यह एक अशुभ समयावधि है। राहु काल में किसी भी प्रकार का शुभ कार्य आरम्भ नहीं करना चाहिये। राहु काल भारत के दक्षिणी राज्यों में अधिक प्रचलित है।
- अभिजित मुहूर्त – यह दिन के मध्य में एक शुभ समयावधि है। यदि कोई शुभ मुहूर्त उपलब्ध नहीं है तो उस स्थिति में अभिजित मुहूर्त में सभी प्रकार के शुभ कार्य किये जा सकते हैं।
- विजय मुहूर्त – यह एक शुभ मुहूर्त है। विजय मुहूर्त यात्रा आरम्भ करने हेतु शुभ माना जाता है। इस मुहूर्त में यात्रा आरम्भ करने से यात्रा सफल होती है तथा यात्रा का उद्देश्य पूर्ण होता है।
- सङ्कल्प – यह पूजन अनुष्ठान का एक अभिन्न अङ्ग है। सङ्कल्प के द्वारा कालचक्र के एक निश्चित क्षण में पूर्ण इच्छाशक्ति द्वारा देश, काल, समय आदि के उच्चारण सहित अनुष्ठान सम्बन्धित प्रतिज्ञा को दृढ़ एवं पुष्ट किया जाता है। सङ्कल्प हेतु पञ्चाङ्ग के सभी पाँच तत्वों की आवश्यकता होती है। इन पाँच तत्वों के अतिरिक्त सङ्कल्प में राशिमण्डल के नव ग्रहों, मुख्यतः चन्द्र, सूर्य एवं बृहस्पति की स्थिति भी सम्मिलित होती है।
- सूर्योदय – सूर्य नमस्कार करने एवं उदीयमान सूर्य को अर्घ्य अर्पण करने हेतु सूर्योदय का उचित समय ज्ञात होना आवश्यक है। अतः पञ्चाङ्ग की आवश्यकता प्रतिदिन होती है, क्योंकि सूर्योदय का समय वर्ष पर्यन्त परिवर्तित होता रहता है।
- चन्द्रोदय – चन्द्र देव से सम्बन्धित भी अनेक अनुष्ठान होते हैं। संकष्टी चतुर्थी तथा कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर भी उदीयमान चन्द्र की पूजा-अर्चना की जाती है।