अमावस्या तिथि की शुरुआत 16 फरवरी 2026 की शाम 05:34 से, अमावस्या तिथि फाल्गुन अमावस्या का विशेष धार्मिक महत्व 

 16 फरवरी को फाल्गुन कृष्ण पक्ष की उदया तिथि चतुर्दशी और सोमवार का दिन है। चतुर्दशी तिथि सोमवार शाम 5 बजकर 35 मिनट तक रहेगी। 16 फरवरी को देर रात 1 बजकर 50 मिनट तक वरियान योग रहेगा। साथ ही सोमवार रात 8 बजकर 48 मिनट तक श्रवण नक्षत्र रहेगा & सूर्योदय- सुबह 6:58 am सूर्यास्त- शाम 6:11 pm & 16 फरवरी को फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि & सोमवार को अभिजीत मुहूर्त 12:12 − 12:57 मिनट तक रहेगा। 

17 फरवरी 2026 को अमावस्या तिथि की शुरुआत 16 फरवरी 2026 की शाम 05:34 से होगी और इसका समापन 17 फरवरी 2026 की शाम 05:30 बजे होगा। अमावस्या तिथि v फाल्गुन अमावस्या का विशेष धार्मिक महत्व  ये दिन पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने के लिए भी उत्तम माना जाता है।

दुनियाभर में भगवान शिव के मंदिर हैं, जहां लोगों ने अपनी श्रद्धा से शिवलिंग को स्थापित किया और उन्हें पूजा, लेकिन कुछ ऐसे भी शिवलिंग हैं जो स्वयंभू हैं उज्जैन का महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग अपने आप में आस्था और पवित्रता का प्रतीक है. 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक यह लिंग दक्षिण दिशा की ओर मुख किए हुए है, जो शिव के जीवन और नश्वरता पर प्रभुत्व को दर्शाता है. माना जाता है कि यह ज्योतिर्लिंग स्वयं प्रकट हुआ था, और इसकी ऊर्जा इतनी गहरी है कि, इसे शब्दों में बयां कर पाना आसान नहीं है. भक्तों को यहां आकर आमतौर पर एक ऐसी शांति की अनुभूति होती है, जिसे वे शब्दों में जाहिर नहीं कर पाते हैं.

16 फरवरी को फाल्गुन कृष्ण पक्ष की उदया तिथि चतुर्दशी और सोमवार का दिन है। चतुर्दशी तिथि सोमवार शाम 5 बजकर 35 मिनट तक रहेगी। 16 फरवरी को देर रात 1 बजकर 50 मिनट तक वरियान योग रहेगा। साथ ही सोमवार रात 8 बजकर 48 मिनट तक श्रवण नक्षत्र रहेगा। 

16 फरवरी को में फाल्गुन अमावस्या मनाई जाएगी। जो 17 फरवरी 2026 को पड़ रही है। अमावस्या तिथि की शुरुआत 16 फरवरी 2026 की शाम 05:34 से होगी और इसका समापन 17 फरवरी 2026 की शाम 05:30 बजे होगा।

क्या फाल्गुन अमावस्या पर सूर्य ग्रहण लग रहा है?

बार फाल्गुन अमावस्या के दिन साल का पहला सूर्य ग्रहण लगेगा। यह एक वलयाकार सूर्य ग्रहण होगा, जिसमें सूर्य आग की चमकती अंगूठी जैसा दिखाई देगा। हालांकि ये नजारा क्षण भर के लिए ही दिखेगा। बता दें ये सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिख रहा है।

फाल्गुन अमावस्या का धार्मिक महत्व (Falgun Amavasya Mahatva)

फाल्गुन अमावस्या का दिन पितृ तर्पण और पिंडदान के लिए उत्तम माना जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और जरूरतमंदों को भोजन कराने से खूब पुण्य फल मिलता है। माना जाता है कि इस दिन किए गए पुण्य कर्मों से  जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस अमावस्या पर दीपदान का भी विशेष महत्व माना जाता है।

महाशिवरात्रि व्रत का पारण 16 फरवरी 2026 किया जाएगा। पारण के लिए शुभ समय सुबह 7 बजकर 6 मिनट से दोपहर 3 बजकर 46 मिनट तक रहेगा। पारण के दिन सुबह स्नान के बाद भगवान शिव की पूजा और अभिषेक करें। इसके बाद भोलेनाथ को बेर और फल का भोग लगाएं। पूजा के बाद बेर का प्रसाद ग्रहण कर के अपना व्रत खोलें। पारण के दिन सात्विक आहार ही ग्रहण करें। व्रत का पारण करने से पहले आप किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को अन्न, धन और वस्त्र का दान भी कर सकते हैं। ऐसा करना शुभ माना जाता है।

वैदिक ज्योतिष में पंचांग को समय का प्रतिनिधि माना जाता है। जहाँ आधुनिक युग में लोग समय जानने के लिए कैलेंडर और घड़ी का सहारा लेते हैं, वहीं हिंदू धर्म के अनुयायी समय की गणना और शुभ-अशुभ मुहूर्त जानने के लिए पंचांग का प्रयोग करते हैं। पंचांग के माध्यम से केवल सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय और चंद्रास्त की जानकारी ही नहीं मिलती, बल्कि दिनभर के सभी शुभ और अशुभ मुहूर्तों का भी विवरण प्राप्त होता है।

हिमालय की ऊंचाइयों पर स्थित बाबा अमरनाथ की गुफा में बर्फ से बना एक रहस्यमय लिंग, जो चंद्रमा की कलाओं के साथ बढ़ता है और घटता रहता है. तीर्थयात्रियों के मुताबिक यह शिव की ब्रह्मांडीय लय को दिखाता है. अमरनाथ यात्रा बेहद मुश्किल भरी होती है, जिसमें जमा देने वाली ठंड और खड़ी चढ़ाई वाले मार्ग हैं, फिर भी गुफा तक पहुंचने पर भक्तों को एक अद्वितीय शांति का एहसास होता है.

  • फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि- 16 फरवरी 2026 को शाम 5 बजकर 35 मिनट तक 
  • वरियान योग- 16 फरवरी 2026 को देर रात 1 बजकर 50 मिनट तक
  • श्रवण नक्षत्र- 16 फरवरी 2026 को रात 8 बजकर 48 मिनट तक
  • 16 फरवरी 2026 का व्रत-त्यौहार- महाशिवरात्रि व्रत पारण
  • पवित्र नर्मदा नदी के किनारे सालों से नदी द्वारा तराशे गए चिकने पत्थरों से प्राकृतिक रूप से पॉलिश किए बाणलिंग निर्मित होते हैं. इन्हें मनुष्य नहीं, बल्कि प्रकृति अपने करिश्मे से निर्मित करती है. बाणलिंग को धारण करने पर अनंत काल की अनुभूति होती है. दिखने में यह लिंग शीतल, चिकना और शाश्वत है. भक्त इन्हें अपने घरों में बिना प्राण प्रतिष्ठा के पूजा कर सकते हैं.
  • नालास के बेहद शांत गांव में एक शनालेश्वर स्वयंभू लिंगम विराजमान हैं, जिसको लेकर मान्यता है कि, वह मनोकामनाएं पूर्ण करता है. यहां आने वाले भक्तों के अनुसार उनकी प्रार्थनाएं पूरी हुई है, जिनमें स्वास्थ्य, सफलता, शांति और स्पष्टता शामिल है.मंदिर में घंटियों की ध्वनि और अगरबत्ती व धूप की सुगंध मंत्रमुग्ध कर देती है.
  • केदारनाथ मंदिर, जिसे जुड़ी एक लोकप्रिय कथा है कि, कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद भगवान शिव से क्षमा मांगने के लिए पांडवों ने एक शिवलिंग को स्थापित किया था. साल 2013 में आई भीषण बाढ़ में भी यह पवित्र स्थल अछूता रहा, जिससे यह विश्वास और पक्का हो जाता है कि, शिव इसकी रक्षा करते हैं. तीर्थयात्री केदारनाथ की यात्रा को केवल एक शारीरिक यात्रा ही नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जागृति मानते हैं.

कांचीपुरम में एक पवित्र आम के पेड़ के नीचे देवी पार्वती ने शिवजी की पूजा करने के लिए मिट्टी का एक शिवलिंग स्थापित कियाथा, जो उनकी आस्था और भक्ति का प्रतीक है. एकंबरेश्वर मंदिर अपने विशाल गोपुरम और जटिल नक्काशी के लिए काफी प्रसिद्ध है. मिट्टी के इस लिंग की पूजा करने से मन को शांति मिलती है.

बेंगलुरु की एक गुफा में स्थित गावी गंगाधरेश्वर मंदिर मकर संक्रांति के हर दिन एक असामान्य घटना का आयोजन करता है. ढलते सूरज की किरणें शिवलिंग को पूरी तरह से रोशन करती है. ठंडी पत्थर की दीवारें, टिमटिमाते तेल के दीपक और गूंजते मंत्र एक पवित्र वातावरण का माहौल बनाते हैं.

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