तंत्र साधना में, “देवी के साधक विकराल” साधक भयंकर शक्तिशाली

देवी की शक्तियों को प्राप्त करने वाले भयंकर और शक्तिशाली साधक, जो दस महाविद्याओं के माध्यम से शक्ति प्राप्त करते हैं, वे हैं: काली, भैरवी, छिन्नमस्ता, बगलामुखी और मातंगीये देवी शक्तियां विभिन्न प्रकार की सिद्धियां और क्षमताओं का आशीर्वाद प्रदान करती हैं, महाविद्याएं अपने साधक को चुनती हैं, साधक उन्हें नहीं चुनते.
कोई भी देव या देवी हंमेशा मंत्री शक्ति को आधीन होते हैं , चाहे वो मंत्र तंत्र शास्त्र यानी तांत्रिक उपाय से जुड़े क्यों नहीं है । मंत्र जाप से दिव्य शक्ति या आसुरी शक्तियों को आवाहन करते हो तो उन्हें अवश्य प्रगट होना पड़ता है और साधक की मंनसा पुर्ति करनी पड़ती है ।
BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI EDITOR; HIMALAYAUK NEWS (Leading Newesportal & youtube Channel & Daily Newspaper)
मंदिर की जगह को सिद्ध करना एक जटिल प्रक्रिया है, जो समय और प्रयास की आवश्यकता होती है। इसे करने के लिए धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का ज्ञान होना भी आवश्यक है. चंद्रशेखर जोशी ने महामाई पीतांबरा श्री बगलामुखी को प्राण प्रतिष्ठित कर ब्रह्म मुहूर्त में और गोधूली में और विशाल यज्ञ से उस स्थान को सिद्ध कर दिया, जिससे अदभुत चमत्कार हो रहे है
चंद्रशेखर की एक रिपोर्ट
मंदिर की जगह को सिद्ध करना आसान नहीं होता, इसके लिए विशेष प्रक्रियाएं और पूजा-अर्चना की जाती है। यह प्रक्रिया विभिन्न धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार की जाती है.
मील दूर के व्यक्ति को देख लेना व बात कर लेना जैसे अनेक कार्य ये सभी तंत्र की बदौलत ही संभव हैं।
तंत्र के प्रथम उपदेशक भगवान शंकर और उसके बाद भगवान दत्तात्रेय हुए हैं। बाद में सिद्ध, योगी, शाक्त और नाथ परंपरा का प्रचलन रहा है। तंत्र साधना के प्रणेता, शिव, दत्तात्रेय के अलावा नारद, परशुराम, पिप्पलादि, वसिष्ठ, सनक, शुक, सन्दन, सनतकुमार, भैरव, भैरवी, काली आदि कई ऋषि मुनि इस साधना के उपासक रहे हैं।
तंत्र साधना में, “देवी के साधक विकराल” का अर्थ है देवी की शक्तियों को प्राप्त करने वाले साधक जो भयंकर और शक्तिशाली होते हैं। तंत्र साधना में, देवी के विभिन्न रूप और शक्तियों का प्रयोग किया जाता है, और इन शक्तियों को प्राप्त करने वाले साधक को “विकराल” या भयंकर माना जाता है.
तंत्र साधना में विकराल साधक:
साधक की शक्ति:
तंत्र साधना में देवी की शक्तियों को प्राप्त करने वाले साधक को शक्तिशाली माना जाता है, और वह भयंकर रूप में प्रकट हो सकता है.
भयंकर रूप:
तंत्र साधना में देवी के कुछ रूप भयंकर और उग्र होते हैं, जैसे कि काली, तारा, छिन्नमस्ता, धूमावती आदि. इन देवी की साधना करने वाले साधक को भी भयंकर या विकराल माना जाता है।
साधक की साधना:
तंत्र साधना में, साधक देवी के विभिन्न मंत्रों और योगों का उपयोग करके उनकी शक्तियों को प्राप्त करता है। साधना के दौरान, साधक को कुछ भयंकर और उग्र शक्तियों का सामना करना पड़ सकता है.
देवी के स्वरूप:
देवी के विभिन्न स्वरूपों की साधना करने वाले साधक को भी उस देवी के स्वरूप के अनुसार विकराल या भयंकर माना जाता है.
उदाहरण:
देवी काली:
देवी काली को भयंकर और उग्र रूप में माना जाता है, और उनके साधक को भी विकराल माना जाता है, क्योंकि वह काली की शक्ति से युक्त होता है.
देवी तारा:
देवी तारा को भी भयंकर और शक्तिशाली माना जाता है, और उनके साधक को भी विकराल माना जाता है.
निष्कर्ष:
तंत्र साधना में, देवी की शक्तियों को प्राप्त करने वाले साधक को “विकराल” या भयंकर माना जाता है, क्योंकि वह देवी के शक्तिशाली और भयंकर स्वरूपों से जुड़ा होता है.
जिस भगवान की पूजा करते समय धूप नहीं दिखाई जाती है, उसे “धूप-दोष” कहा जाता है। यह एक ऐसा दोष है जो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा में बाधा डाल सकता है।
चंद्रशेखर जोशी की विशेष रिपोर्ट:;
धार्मिक परंपराओं में, धूप को भगवान के सामने जलाने का एक विशेष महत्व है। धूप जलाने से भगवान प्रसन्न होते हैं पूजा करते समय धूप नहीं जलाते हैं, तो यह “धूप-दोष” माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, धूप-दोष के कारण पूजा का फल नहीं मिलता और भगवान नाराज हो सकते हैं।
धूप-दोष से बचने के लिए, पूजा के दौरान धूप जरूर जलाएं। धूप जलाने से न केवल भगवान प्रसन्न होते हैं, बल्कि यह पूजा के दौरान वातावरण को भी शुद्ध करता है। धूप जलाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। धूप जलाने से पूजा का प्रभाव अधिक होता है और भगवान की कृपा प्राप्त होने की संभावना बढ़ जाती है।
चंद्रशेखर जोशी
संस्थापक अध्यक्ष
बगलामुखी पीठ देहरादून

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