2 सितंबर को भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की दशमी और एकादशी तिथि & मंगलवार को ज्येष्ठ गौरी पूजा का विसर्जन & साल 2025 का दूसरा और आखिरी चंद्र ग्रहण 7 सितंबर को लगने वाला है। & भाद्रपद शुक्ल पक्ष दशमी तिथि 03:53 AM तक उपरांत एकादशी & त्यौहार और व्रत रामदेव जयंती & त्यौहार और व्रत रामदेव जयंती & पार्श्व एकादशी, साल 2025 में 3 सितंबर, बुधवार & दान करना परम कल्याणकारी माना जाता है। परिवर्तिनी एकादशी 3 सितंबर & एकादशी तिथि की शुरुआत 03 सितंबर को देर रात 03 बजकर 53 मिनट पर होगी। वहीं, एकादशी तिथि का समापन 04 सितंबर को सुबह 04 बजकर 21 मिनट पर होगा। सनातन धर्म में उदया तिथि का महत्व है। इसलिए 03 सितंबर को परिवर्तिनी एकादशी मनाई जाएगी।

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02 सितंबर 2025 को भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि है। इस तिथि पर मूल नक्षत्र और प्रीति योग का संयोग बन रहा है। मंगलवार को अभिजीत मुहूर्त 11:55 − 12:45 मिनट तक रहेगा। राहुकाल शाम 15:28 − 17:02 मिनट तक रहेगा।
7 सितंबर 2025 को देर रात 11:38 मिनट तक भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि रहेगी, जिसके बाद प्रतिपदा तिथि का आरंभ हो रहा है। ऐसे में इस दिन भाद्रपद पूर्णिमा भी मनाई जाएगी। भाद्रपद पूर्णिमा के दिन लगने वाला चंद्र ग्रहण कुंभ राशि व पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में लगेगा। दरअसल, चंद्र देव 6 सितंबर 2025 को सुबह 11 बजकर 21 मिनट पर शनि की राशि कुंभ में गोचर करेंगे, जहां पर वह 8 सितंबर की दोपहर 2 बजकर 28 मिनट तक रहेंगे। इस बीच 7 सितंबर की रात 9 बजकर 40 मिनट पर चंद्र देव गुरु के नक्षत्र पूर्वाभाद्रपद में गोचर करेंगे, जहां पर वह 8 सितंबर 2025 की रात 8 बजकर 2 मिनट तक रहेंगे।
हिंदू धर्म में परिवर्तिनी एकादशी का व्रत बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और उनके वामन रूप की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पार्श्व एकादशी कथा (Parivartini Ekadashi Vrat Katha)

त्रेतायुग युग में बलि नाम का एक दैत्य राजा था। वह भगवान श्री कृष्ण का परम भक्त था। बलि हमेशा कई प्रकार के वेद सूक्तों से भगवान श्री कृष्ण की पूजा अर्चना किया करता था। वह हमेशा ब्राह्मणों का पूजन और बड़े-बड़े यज्ञ किया करता था। लेकिन इंद्र से दुश्मनी होने के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया था। इस कारण से सभी देवता नाराज होकर भगवान के पास आए। वहां वृहस्पति सहित इंद्र देवता भगवान के पास नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा पूजन एंवम् स्तुति करने लगें। उसी वक्त भगवान श्री कृष्ण वामन रूप धारण करके पांचवा अवतार लिए। भगवान श्री कृष्ण ने अपने इस रूप के तेज से राजा बलि को जीत लिया। तब यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से बोले, हे जनार्दन आपने वामन रूप धारण करके महाबली दायित्व को किस प्रकार जीत लिया। तब भगवान श्रीकृष्ण कहें, कि मैंने राजा बलि से वामन रूप धारण कर तीन पग भूमि की याचना की। तब राजा बलि ब्राह्मण की तुच्छ याचना समझकर इस वचन को पूरा करने के लिए तैयार हो गया। यह देख भगवान श्रीकृष्ण ने त्रिविक्रम रूप को बढ़ाकर भूलोक में पद, भुवर्लोक में जंघा, स्वर्गलोक में कमर, मह:लोक में पेट, जनलोक में हृदय, यमलोक में कंठ की स्थापना कर दिया। यह देख कर सभी देवतागण भगवान श्री कृष्ण की वेद शब्दों से प्रार्थना करने लगें। तब भगवान श्री कृष्ण ने राजा बलि का हाथ पकड़कर कहा हे राजन एक पग से पृथ्वी दूसरे पग से स्वर्गलोक पूरा हो गया, अब मैं तीसरा पग कहां रखूं। यह सुनकर राजा बलि भगवान को तीसरा पग रखने के लिए अपना सिर दे दिया। जिस वजह से राजा बलि पताल लोक को चला गया। बाद में बिनती और प्रार्थना कर राजा बलि ने देवताओं से क्षमा मांंगी। यह देखकर भगवान श्री कृष्ण प्रसन्न होकर उसे वचन दिए कि मैं सदैव तुम्हारे पास ही रहूंगा।
इस दौरान 7 सितंबर की रात 09:58 मिनट से लेकर अगले दिन की सुबह 01:26 मिनट तक चंद्र ग्रहण लगेगा। ये ग्रहण कुल 03 घंटे 28 मिनट 02 सेकंड यानी 12482 सेकंड तक भारत में दिखाई देगा, जिसका सूतक काल मान्य होगा।
परिवर्तिनी एकादशी का हिंदु धर्म में बहुत महत्व है. इस साल परिवर्तिनी एकादशी पर आयुष्मान और सौभाग्य योग समेत कई संयोग बन रहे हैं. इन योगों में देवी लक्ष्मी और भगवान नारायण की पूजा करने का विशेष महत्व है. एकादशी तिथि पर पूजा अर्चना करने से व्यक्ति की सभी इच्छाओं की पूर्ति हो सकती है.
परिवर्तिनी एकादशी को पार्श्व एकादशी के अलावा वामन एकादशी (Vaman Ekadashi), जयझूलनी एकादशी (Jai Jhulni Ekadashi), डोल ग्यारस (Dol Gyaras)और जयंती एकादशी (Jayanti Ekadashi) जैसे कई नामों से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस एकादशी के दिन व्रत करने से वाजपेय यज्ञ जितना पुण्य मिलता है। शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि जो व्यक्ति एकादशी व्रत रखता है, उन्हें जीवन में कई प्रकार के संकटों से मुक्ति प्राप्त हो जाती है
पार्श्व एकादशी मंत्र (Parsva Ekadashi Mantra)
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे।
हे नाथ नारायण वासुदेवाय।।
ॐ नारायणाय विद्महे।
वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।
पार्श्व एकादशी कथा
त्रेतायुग युग में बलि नाम का एक दैत्य राजा था। वह भगवान श्री कृष्ण का परम भक्त था। बलि हमेशा कई प्रकार के वेद सूक्तों से भगवान श्री कृष्ण की पूजा अर्चना किया करता था। वह हमेशा ब्राह्मणों का पूजन और बड़े-बड़े यज्ञ किया करता था। लेकिन इंद्र से दुश्मनी होने के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया था। इस कारण से सभी देवता नाराज होकर भगवान के पास आए। वहां वृहस्पति सहित इंद्र देवता भगवान के पास नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा पूजन एंवम् स्तुति करने लगें। उसी वक्त भगवान श्री कृष्ण वामन रूप धारण करके पांचवा अवतार लिए। भगवान श्री कृष्ण ने अपने इस रूप के तेज से राजा बलि को जीत लिया। तब यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से बोले, हे जनार्दन आपने वामन रूप धारण करके महाबली दायित्व को किस प्रकार जीत लिया। तब भगवान श्रीकृष्ण कहें, कि मैंने राजा बलि से वामन रूप धारण कर तीन पग भूमि की याचना की। तब राजा बलि ब्राह्मण की तुच्छ याचना समझकर इस वचन को पूरा करने के लिए तैयार हो गया। यह देख भगवान श्रीकृष्ण ने त्रिविक्रम रूप को बढ़ाकर भूलोक में पद, भुवर्लोक में जंघा, स्वर्गलोक में कमर, मह:लोक में पेट, जनलोक में हृदय, यमलोक में कंठ की स्थापना कर दिया। यह देख कर सभी देवतागण भगवान श्री कृष्ण की वेद शब्दों से प्रार्थना करने लगें। तब भगवान श्री कृष्ण ने राजा बलि का हाथ पकड़कर कहा हे राजन एक पग से पृथ्वी दूसरे पग से स्वर्गलोक पूरा हो गया, अब मैं तीसरा पग कहां रखूं। यह सुनकर राजा बलि भगवान को तीसरा पग रखने के लिए अपना सिर दे दिया। जिस वजह से राजा बलि पताल लोक को चला गया। बाद में बिनती और प्रार्थना कर राजा बलि ने देवताओं से क्षमा मांंगी। यह देखकर भगवान श्री कृष्ण प्रसन्न होकर उसे वचन दिए कि मैं सदैव तुम्हारे पास ही रहूंगा।
भगवान विष्णु को पीला रंग बहुत प्रिय है। इसलिए परिवर्तिनी एकादशी के दिन पीले वस्त्रों का दान करना बहुत अच्छा होता है। ऐसा करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता आती है और आर्थिक संकट दूर होते हैं। मौसमी फल का दान करना भी बहुत लाभकारी होता है। इस दान से अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि का वरदान मिलता है। परिवर्तिनी एकादशी पर घी और शहद का दान करने से घर में खुशहाली आती है और जीवन में मिठास बनी रहती है।
युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए। तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करने वाली, उत्तम वामन एकादशी का माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूं तुम ध्यानपूर्वक सुनो।
यह पद्मा/परिवर्तिनी एकादशी जयंती एकादशी भी कहलाती है। इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी (वामन रूप की) पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें।
जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया। अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।
भगवान के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले कि भगवान! मुझे अतिसंदेह हो रहा है कि आप किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं तथा किस तरह राजा बलि को बांधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएं कीं? चातुर्मास के व्रत की क्या विधि है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है। सो आप मुझसे विस्तार से बताइए।
श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें। त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था। वह मेरा परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तों से मेरा पूजन किया करता था और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था, लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया।
इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच-विचारकर भगवान के पास गए। बृहस्पति सहित इंद्रादिक देवता प्रभु के निकट जाकर और नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा भगवान का पूजन और स्तुति करने लगे। अत: मैंने वामन रूप धारण करके पांचवां अवतार लिया और फिर अत्यंत तेजस्वी रूप से राजा बलि को जीत लिया।
इतनी वार्ता सुनकर राजा युधिष्ठिर बोले कि हे जनार्दन! आपने वामन रूप धारण करके उस महाबली दैत्य को किस प्रकार जीता?
श्रीकृष्ण कहने लगे- मैंने (वामन रूपधारी ब्रह्मचारी) बलि से तीन पग भूमि की याचना करते हुए कहा- ये मुझको तीन लोक के समान है और हे राजन यह तुमको अवश्य ही देनी होगी।
राजा बलि ने इसे तुच्छ याचना समझकर तीन पग भूमि का संकल्प मुझको दे दिया और मैंने अपने त्रिविक्रम रूप को बढ़ाकर यहां तक कि भूलोक में पद, भुवर्लोक में जंघा, स्वर्गलोक में कमर, मह:लोक में पेट, जनलोक में हृदय, यमलोक में कंठ की स्थापना कर सत्यलोक में मुख, उसके ऊपर मस्तक स्थापित किया।
सूर्य, चंद्रमा आदि सब ग्रह गण, योग, नक्षत्र, इंद्रादिक देवता और शेष आदि सब नागगणों ने विविध प्रकार से वेद सूक्तों से प्रार्थना की। तब मैंने राजा बलि का हाथ पकड़कर कहा कि हे राजन! एक पद से पृथ्वी, दूसरे से स्वर्गलोक पूर्ण हो गए। अब तीसरा पग कहां रखूं?
तब बलि ने अपना सिर झुका लिया और मैंने अपना पैर उसके मस्तक पर रख दिया जिससे मेरा वह भक्त पाताल को चला गया। फिर उसकी विनती और नम्रता को देखकर मैंने कहा कि हे बलि! मैं सदैव तुम्हारे निकट ही रहूंगा। विरोचन पुत्र बलि से कहने पर भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बलि के आश्रम पर मेरी मूर्ति स्थापित हुई।
इसी प्रकार दूसरी क्षीरसागर में शेषनाग के पष्ठ पर हुई! हे राजन! इस एकादशी को भगवान शयन करते हुए करवट लेते हैं, इसलिए तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु का उस दिन पूजन करना चाहिए। इस दिन तांबा, चांदी, चावल और दही का दान करना उचित है। रात्रि को जागरण अवश्य करना चाहिए।
जो विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाकर चंद्रमा के समान प्रकाशित होते हैं और यश पाते हैं। जो पापनाशक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उनको हजार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।