हिंदू पंचांग के अनुसार, हर वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के साथ परशुराम जयंती
कलयुग में उपस्थित 8 चिरंजीवी में से एक परशुराम जी हैं, जो आज भी पृथ्वी पर विद्यमान हैं.
साधक योग और ध्यान के माध्यम से परशुराम जी का आवाहन करते हैं, जिससे उन्हें पराक्रम, साहस और आत्मबल की प्राप्ति होती है.
परशुराम का असली नाम क्या ; हिन्दु मान्यताओं के अनुसार, परशुराम जी वर्तमान में भी पृथ्वी पर निवास करते हैं। उनकी पूजा नहीं की जाती है,
महाभारत और विष्णुपुराण के अनुसार परशुराम का मूल नाम राम था किन्तु जब भगवान शिव ने उन्हें अपना परशु नामक अस्त्र प्रदान किया तभी से उनका नाम परशुराम हो गया।
परशुराम जी के मुख्य गुरु भगवान शिव थे, जिनसे उन्होंने दिव्य शस्त्र और ज्ञान प्राप्त किया था. इसके अलावा, परशुराम जी को महर्षि विश्वामित्र और महर्षि जमदग्नि से भी शिक्षा प्राप्त हुई थी.
उनकी पारंपरिक पूजा नहीं की जाती, बल्कि उनका आवाहन किया जाता है. परशुराम सहित जमदग्नि के 5 पुत्र थे- रुमण्वान, सुषेण, वसु, विश्वावसु तथा पांचवें पुत्र का नाम परशुराम था। परशुराम सबसे छोटे हैं।
परशुराम जयंती 2025 के शुभ अवसर पर सौभाग्य योग समेत अनेक शुभ योग का निर्माण हो रहा है. यह योग दोपहर 03 बजकर 54 मिनट तक रहेगा. इसके साथ त्रिपुष्कर योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का भी संयोग बन रहा है. इन योगों में भगवान परशुराम की पूजा करने से सभी इच्छाएं पूर्ण होंगी. इसके अतिरिक्त, साधक पर मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करेंगे.
भगवान परशुराम ने अपनी माता रेणुका का शिरच्छेद, अपने पिता ऋषि जमदग्नि के आदेश पर किया था।
कथा के अनुसार, जब ऋषी जमदग्नी यज्ञ कार्य कर रहे थे, तब उन्होंने रेणुका देवी को जल लेने के लिए भेजा था। लेकिन माता रेणुका, जलक्रीड़ा कर रहे गंधर्व को देख मोहित हो गई और जिस कार्य के लिए गई थी वह भूल गई। जब ऋषी जमदग्नी को यह पता चला, तब वे क्रोधित हो उठे और जब माता रेणुका आश्रम पहुंची तब उन्होंने अपने पांचों पुत्रों को माता रेणुका का शिर धड से अलग करने को कहा। यह सुनकर चार पुत्रों ने आज्ञा मानने से मना कर दिया, इसपर क्रोधित ऋषी जमदग्नी ने चार पुत्रों को भस्म कर दिया।
पांचवे पुत्र भगवान परशुराम, ने पिता के आज्ञा को मानते हुए, माता रेणुका के शिर को धड से अलग कर दिया। इसके पश्चात उन्होंने परशुराम से वर मांगने को कहा, तब परशुराम ने सभी चारो भाई एवम् माता रेणुका को पुनः जीवित करने को कहा। तब ऋषी जमदग्नी ने सभी चार पुत्रों समेत माता रेणुका को पुनः जीवित किया।
ऋषी जमदग्नी में क्रोध देवी का वास था। इस घटना के पश्चात उन्होंने क्रोध देवी से अनुरोध किया के वे उन्हें मुक्त करें। क्रोध देवी ही, ऋषी जमदग्नी के क्रोध का कारण थी।
त्रिवन्त परशुराम ने केरल में जहां तपस्या की थी वहीं त्रिवन्तपुर की स्थापना की थी। आज त्रिवन्तपुरम् केरल प्रदेश की राजधानी है।
केरल में इसीलिए की में लगभग 16000 हजार स्वयंभू शिवलिंग हैं। इन सबका जीर्णोद्वार इन्होंने ही कराया।
गोवा का ताम्बदेश्वर शिवालय में त्वचा रोग मिट जाता है। केवल जलहरी का जल लगाकर।
हस्त नक्षत्र, कन्या राशि, धनु लग्न में जन्मे परशुरामजी धुन के पक्के और जिद्दी स्वभाव के थे। अक्षय तृतीया तिथि को इनका जन्मदिवस दुनिया मनाती है।
तेतरीय उपनिषद के हिसाब से श्री प्रशुराम की भक्ति, ध्यान करने से मनोबल मजबूत होता है। स्वास्थ्य अच्छा रहता है। इन्हे शक्ति का देवता बताया है।
भारतीय वाग्डमय में तीन ‘राम’ प्रसिद्ध हुए हैं- प्रथम राम परशुराम, द्वितीय राम राघव राम, और तृतीय राम बासुदेव राम अर्थात ‘बलराम’ इन तीनों में परशुराम सबसे बड़े थे।
उन्होंने धर्मात्मा सूर्यवंशी क्षत्रिय दशरथी राम को नारायणी धनुष दिया था। चंद्रवंशी क्षत्रिय कृष्ण और बलराम को सुदर्शन चक्र और धनुषं दिया था, भीष्म को अपना शिष्य बनाया था।
जब भार्गव राम ने राघव राम की विन्रमतापूर्ण शक्ति की हर प्रकार से परीक्षा लेकर उन्हें योग्य पाया और कहो, राम हम दोनों ही राम हैं। जो तुम हो वही मैं हूं वही तुम हो ।
संसार में विधाता ने परशुराम जैसा चरित्र सृजित ही नहीं किया। वह राज्य जीतता है, किन्तु राज्य नहीं करता। उसे पत्नी चाह, सन्तति, माया, धन-संपदा का, मोह- यश का आर्कषण कभी नहीं व्याप्तता।
उन्होंने समुद्र से अपने प्रयत्न द्वारा भूमि लेकर केरल प्रदेश को बसाया।
आज का गोवा यानि गौकर्ण तीर्थ की समुद्र से रक्षा की। केरल को अभी भी परशुराम क्षेत्र कहा जाता है। वहां पर परशुराम संवत् भी चलता है।
परशुराम की संहारक, सृजन और पालन तीनों शक्तियों के कारण ही उन्हें त्रिवन्त कहा जाता है।
परशुराम की सदैव यह रीति थी कि जहां भी कोई विजय प्राप्त करते थे, तपस्यायज्ञानुष्ठान आदि का आयोजन करते थे तो वहीं विजय स्तंभ के रूप में अपने आराध्य शिवलिंग की स्थापना कर देते थे।
भगवान परशुराम द्वारा स्थापित प्रमुख १२ ज्योतिर्लिंग सोमनाथ, महाकलेश्वर, रामेश्वरम, वैद्यनाथ, केदार नाथ, अमरनाथ, विश्वनाथ, ओंकारेश्वर और परशुरामेश्वर (पुरा महादेव) आदि हैं।
भिन्न-भिन्न देशों में जो विशाल शिवलिंग पाये जाते हैं, उनकी स्थापना भगवान परशुराम द्वारा ही की गई है।
चन्द्रशेखर जोशी
मुख्य संपादक
हिमालया यूके न्यूज
देहरादून