28 सितंबर 2025 को अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि & ज्येष्ठा नक्षत्र और आयुष्मान योग का संयोग & अभिजीत मुहूर्त 11:44 − 12:31 मिनट तक & राहुकाल शाम 16:34 − 18:03 मिनट तक रहेगा। षष्ठी – 02:27 पी एम तक
सप्तमी & माता कात्यायनी साहस, शक्ति और सौंदर्य की देवी & शारदीय नवरात्रि 2025 का छठा दिन 28 सितंबर & या देवी सर्वभूतेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
ऋषि कात्यायन की तपस्या से प्रकट होने के कारण माता का नाम कात्यायनी पड़ा था। माता का पीला रंगा काफी अधिक प्रिय है और देवी को शहद भोग लगाया जाता है। इन चीजों को माता की पूजा में अर्पित करने से देवी की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। आप इस दिन तीन आसान से उपायों को कर सकते हैं। मान्यता है कि इन उपायों को करने से देवी तुरंत प्रसन्न होती हैं।
माता कात्यायनी को शहद और पीले फूल अत्यंत प्रिय ; षष्ठी तिथि दोपहर 12:06 बजे से शुरू होकर 28 सितंबर की दोपहर 2:28 बजे तक रहेगी। पूजा के लिए प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:36 से 5:24 बजे या अभिजित मुहूर्त सुबह 11:48 से 12:35 बजे सर्वोत्तम है।
माता कात्यायनी को शहद और पीले फूल अत्यंत प्रिय हैं। इस उपाय से माता शीघ्र प्रसन्न होती हैं और भक्त की मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। सुबह स्नान के बाद पीले वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल पर माता कात्यायनी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। एक लाल कपड़े पर माता की प्रतिमा रखें और गंगाजल से शुद्ध करें। इसके बाद माता को पीले फूल जैसे गेंदा या सूरजमुखी और शहद या शहद से बनी खीर का भोग लगाएं। इसके साथ ही माता के मंत्र ‘ॐ देवी कात्यायन्यै नमः’ का कम से कम 108 बार जाप करें। इस उपाय से नौकरी, व्यापार और दांपत्य जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। यह उपाय आर्थिक समृद्धि और मानसिक शांति के लिए प्रभावी है। पूजा के बाद भोग को प्रसाद के रूप में बांटें और स्वयं भी ग्रहण करें।
पान के पत्तों का करें उपाय
ज्योतिष शास्त्र में माता कात्यायनी को प्रसन्न करने के लिए पान के पत्तों का उपाय अत्यंत प्रभावी माना जाता है। इस उपाय के लिए नवरात्रि के छठवें दिन सुबह पांच साफ पान के पत्ते लें। प्रत्येक पत्ते पर लाल चंदन से माता का बीज मंत्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ लिखें। इन पत्तों को माता के चरणों में अर्पित करें और मंत्र ‘चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी।’ का 108 बार जाप करें। पूजा के बाद इन पत्तों को लाल कपड़े में लपेटकर अपनी तिजोरी या धन रखने वाले स्थान पर रख दें। अगले दिन यानी सप्तमी तिथि को इन पत्तों को किसी नदी में प्रवाहित करें। यह उपाय नौकरी और व्यापार में उन्नति, धन लाभ और जीवन में स्थिरता लाने के लिए विशेष रूप से प्रभावी माना गया है।
सुहाग की सामग्री करें अर्पित
माता कात्यायनी को विवाह की बाधाएं दूर करने वाली देवी माना जाता है। यदि विवाह में देरी हो रही हो या दांपत्य जीवन में समस्याएं हों तो यह उपाय अत्यंत फलदायी है। नवरात्रि के छठवें दिन माता को सुहाग की सामग्री जैसे सिंदूर, मेहंदी, चूड़ियां और पीले वस्त्र अर्पित करें। पूजा स्थल पर माता की प्रतिमा के सामने एक जल से भरा कलश रखें और उस पर आम के पत्ते और नारियल स्थापित करें। माता के मंत्र ‘कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरी। नन्दगोपसुतं देवी पति मे कुरु ते नमः।’ का 108 बार जाप करें। पूजा के बाद सुहाग की सामग्री किसी सुहागिन स्त्री को दान करें। यह उपाय शीघ्र विवाह, प्रेम संबंधों में सफलता और दांपत्य जीवन में सुख-शांति के लिए अत्यंत प्रभावी है।
28 सितंबर को ग्रहों की स्थिति से जो योग बन रहे हैं वह कई राशियों के लिए शुभ हैं. यह समय कुछ लोगों के लिए बेहद अच्छा होगा & 28 सितंबर 2025 को आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी और सप्तमी तिथि रहेगी. नक्षत्र ज्येष्ठा, आयुष्मान योग, करण तैतिल, गर और वणिज रहेगा. इसके अलावा कल बुध ग्रह का नक्षत्र गोचर होगा. ग्रहों के राजकुमार बुध 28 सितंबर 2025 की रात को 11 बजकर 9 मिनट पर हस्त नक्षत्र से निकलकर चित्रा नक्षत्र में आएंगे. बुध ग्रह को बुद्धि, संवाद, तर्क, गणित, ज्ञान, त्वचा, व्यापार, और करियर का कारक माना जाता है.

नवरात्रि के छठें दिन मां दुर्गा के षष्ठम स्वरूप माता कात्यायनी की पूजा का विधान
या देवी सर्वभूतेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
नवरात्रि के छठें दिन मां दुर्गा के षष्ठम स्वरूप माता कात्यायनी ( Maa Katyayani) की पूजा का विधान है। पांचवें दिन शुक्रवार को मां स्कंदमाता की आराधना की गयी। महर्षि कात्यायन द्वारा सर्वप्रथम पूजे जाने के कारण देवी दुर्गा के इस स्वरूप का नाम देवी कात्यायनी पड़ा। महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी इच्छानुसार उनके यहां पुत्री के रूप में कात्यायनी पैदा हुई थीं। महर्षि ने इनका पालन-पोषण किया था।
देवी कात्यायनी अमोद्य फलदायिनी हैं। इनकी पूजा अर्चना द्वारा सभी संकटों का नाश होता है। मां कात्यायनी दानवों तथा पापियों का नाश करने वाली हैं। देवी कात्यायनी जी के पूजन से भक्त के भीतर अद्भुत शक्ति का संचार होता है। इस दिन साधक का मन ‘आज्ञा चक्र’ में स्थित रहता है। योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होने पर उसे सहजभाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त होते हैं। साधक इस लोक में रहते हुए अलौकिक तेज से युक्त रहता है।
मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यन्त दिव्य और स्वर्ण के समान चमकीला है। यह अपनी प्रिय सवारी सिंह पर विराजमान रहती हैं। इनकी चार भुजायें भक्तों को वरदान देती हैं। इनका एक हाथ अभय मुद्रा में है, तो दूसरा हाथ वरदमुद्रा में है। अन्य हाथों में तलवार तथा कमल का फूल है।
ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नंदगोपसुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नम:॥
देवी कात्यायनी की आरती
जय जय अम्बे, जय कात्यायनी।
जय जगमाता, जग की महारानी।
बैजनाथ स्थान तुम्हारा।
वहां वरदाती नाम पुकारा।
कई नाम हैं, कई धाम हैं।
यह स्थान भी तो सुखधाम है।
हर मंदिर में जोत तुम्हारी।
कहीं योगेश्वरी महिमा न्यारी।
हर जगह उत्सव होते रहते।
हर मंदिर में भक्त हैं कहते।
कात्यायनी रक्षक काया की।
ग्रंथि काटे मोह माया की।
झूठे मोह से छुड़ाने वाली।
अपना नाम जपाने वाली।
बृहस्पतिवार को पूजा करियो।
ध्यान कात्यायनी का धरियो।
हर संकट को दूर करेगी।
भंडारे भरपूर करेगी।
जो भी मां को भक्त पुकारे।
कात्यायनी सब कष्ट निवारे।
माता कात्यायनी का स्वरूप स्वर्णिम आभा वाला है, जो चार भुजाओं से सुशोभित है। उनके एक हाथ में तलवार, दूसरे में कमल का फूल, तीसरा अभय मुद्रा और चौथा वरदमुद्रा में होता है। वे सिंह पर सवार होती हैं, जो निर्भीकता का प्रतीक है। मान्यता है कि माता कात्यायनी की पूजा से विवाह में बाधाएं, स्वास्थ्य समस्याएं, शत्रु भय और आर्थिक कठिनाइयां दूर होती हैं।
नवरात्रि का छठवां दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दिन साहस, आत्मविश्वास और प्रेम संबंधों में सफलता के लिए जाना जाता है। ‘दुर्गा सप्तशती’ के अनुसार माता कात्यायनी ने महिषासुर का वध कर देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। इस कारण वे अधर्म और नकारात्मकता का नाश करने वाली मानी जाती हैं। उनकी पूजा से भक्तों को रोग, शोक और भय से मुक्ति मिलती है।
माता कात्यायनी के मंत्र
- मुख्य मंत्र: ॐ देवी कात्यायन्यै नमः
- प्रार्थना मंत्र: चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी।
- विवाह मंत्र: कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरी। नन्दगोपसुतं देवी पति मे कुरु ते नमः।
- स्तुति मंत्र: या देवी सर्वभूतेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। इन मंत्रों का जाप श्रद्धा और नियमितता से करने से माता की कृपा से सभी समस्याएं हल होती हैं।
29 SEP 2025 सातवें दिन कालरात्रि की पूजा
या देवी सर्वभूतेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
वासंतिक नवरात्र के सातवें दिन मां दुर्गा के सप्तम् स्वरूप माता कालरात्रि (Maa Kalratri) की पूजा होती है। छठे दिन शनिवार-रविवार को देवी कात्यायनी की आराधना की गयी। मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है। इनका वर्ण अंधकार की भांति काला है। केश बिखरे हुए हैं और कंठ में विद्युत की चमक वाली माला है। देवी कालरात्रि के तीन नेत्र ब्रह्माण्ड की तरह विशाल व गोल हैं, जिनमें से बिजली की भांति किरणें निकलती रहती हैं। इनकी नासिका से श्वास तथा निःश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं। मां का यह भय उत्पन्न करने वाला स्वरूप केवल पापियों का नाश करने के लिए है। माता कालरात्रि अपने भक्तों को सदैव शुभ फल प्रदान करती हैं। इस कारण इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है। दुर्गा पूजा के सप्तम दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में अवस्थित होता है।
चैत्र नवरात्रि की सप्तमी तिथि मां कालरात्रि को प्रसन्न करने के लिए उन्हें गुड़ और हलवा का भाग लगाना चाहिए। यह भोग मां कालरात्रि का अति प्रिय है। माता रानी इससे बेहद प्रसन्न होती हैं और अपने भक्त की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।
देवी कालरात्रि का वर्ण काजल के समान काले रंग का है जो अमावस की रात्रि से भी अधिक काला है। मां कालरात्रि अपने तीनों बड़े बड़े उभरे हुए नेत्रों से भक्तों पर अनुकम्पा की दृष्टि रखती हैं। देवी की चार भुजाएं हैं। दायीं ओर की ऊपरी भुजा से महामाया भक्तों को वरदान दे रही हैं और नीचे की भुजा से अभय का आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं। बायीं भुजा में क्रमशः तलवार और खड्ग धारण किया है। देवी कालरात्रि के बाल खुले हुए हैं और हवाओं में लहरा रहे हैं। देवी कालरात्रि गर्दभ पर सवार हैं। मां का वर्ण काला होने पर भी कांतिमय और अद्भुत दिखाई देता है।
देवी का यह रूप ऋद्धि सिद्धि प्रदान करने वाला है। दुर्गा पूजा का सातवां दिन तांत्रिक क्रिया की साधना करने वाले भक्तों के लिए अति महत्वपूर्ण होता है। सप्तमी पूजा के दिन तंत्र साधना करने वाले साधक मध्य रात्रि में देवी की तांत्रिक विधि से पूजा करते हैं। इस दिन मां की आंखें खुलती हैं। सप्तमी की रात्रि ‘सिद्धियों’ की रात भी कही जाती है। कुण्डलिनी जागरण के लिए जो साधक साधना में लगे होते हैं इस दिन सहस्त्रसार चक्र का भेदन करते हैं। सप्तमी को देवी की पूजा के बाद शिव और ब्रह्मा जी की पूजा भी अवश्य करनी चाहिए।