#सीएम की पहल पर ही पीके को उत्तराखंड के इलेक्शन मैनेजमेंट की कमान सौंपी # अपनी उपेक्षा पर कांग्रेस संगठन हतप्रभ रह गया # पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते विस चुनाव में किशोर उपाध्याय की भूमिका सबसे अहम हैं# सीएम के बाद वही हैं, जिनके राजनीतिक भविष्य चुनावी नतीजों से तय होना हैं#संगठन में वह उतने ही ताकतवर हैं, जितने सरकार में मुख्यमंत्री#मुख्यमंत्री कांग्रेस हाईकमान के सामने यह तथ्य रखने में कामयाब रहे हैं कि कांग्रेस की चुनावी वैतरणी वही पार लगा सकते हैं#किस सीट पर कौन प्रत्याशी होगा, ये तय करने में उनकी राय बेहद अहम है#चुनाव प्रचार में वह सबसे डिमांडेबल स्टार कंपेनर हैं# एक्सक्लूसिव रिपोर्ट- हिमालयायूके न्यूज पोर्टल के लिए – चन्द्रशेखर जोशी सम्पादक की विशेष रिपोर्ट-
#मुख्यमंत्री हरीश रावत अब कांग्रेस के मुख्य रणनीतिकार की भूमिका में आ गए#मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कांग्रेस संगठन को बिना विश्वास में लिये दो बडे बयान दिये#पार्टी ने 50 सीटों पर टिकट फाइनल कर दिए हैं#शेष 20 टिकटों पर पार्टी रणनीतिक रूप से सभी संभावनाओं को तलाश रही है#कांग्रेस पीडीएफ के कुछ सदस्यों को चुनाव में समर्थन देने के लिए उनकी सीटों पर प्रत्य़ाशी खड़े नहीं करेगी#इसके अलावा सिटिंग-गेटिंग के फार्मूले को मुख्यमंत्री टालते नजर आये#शायद इसके पीछे उनके कई रिश्तेदारों को टिकट दिये जाने की रणनीति है#महिलाओं को भी टिकटों में ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलेगा# ज्ञात हाेे कि अपनी सुपुत्री को भी हरिद्वार ग्रामीण से तथा पुत्र को कुमायूं की किसी सीट से टिकट दिये जाने के इच्छुक है# मुख्यमंत्री ने इशारों में यह भी साफ कर दिया कि पार्टी सभी 70 सीटों पर प्रत्याशी खड़े करने के मूड में नहीं है# हिमालयायूके की रिपोर्ट
#इस तरह हरीश रावत ने उत्तराखण्ड कांग्रेस के मुखिया को पूरी तरह साइड लाइने की मजबूत रणनीति तैयार की है, ज्ञात हो कि कुछ माह पूर्व किेशोर उपाधयाय को पद से हटाने की भी रणनीतिक योजना अंतिम चरण पर थी#हिमालयायूके की रिपोर्ट
वही कांग्रेस हाईकमान के करीबी इलेक्शन मैनेजमेंट गुरू पीके को उत्तराखण्ड में लाया जाना हरीश रावत की एक बडी रणनीति है, यूपी से चुनावी रथ आये तो केवल मुख्यमंत्री के पोस्टर लगे हुए- इससे उत्तराखण्ड कांग्रेस केे माथे पर सलवटे जरूर पडी परन्तु कांग्रेस संगठन के कुछ बडे नेताओं को सत्ता की मलाई दिये जाने का इतना तो लाभ मिला कि आक्रोश दब कर रह गया वही सफल रणनीतिक योजना के तहत इलेक्शन मैनेजमेंट गुरू प्रशांत कुमार को उत्तराखंड में भी कांग्रेस को सत्ता में लाने का ठेका दे दिया गया है, उत्तराखंड में सत्तारुढ़ कांग्रेस में मुख्यमंत्री का चेहरा हरीश रावत स्वयं का एकमात्र मान कर चल रहे हैं, चुनावी रथ को विजय पथ पर ले जाने का दंर्भ भी वह भर रहे हैं। यह उनकी सफल रणनीति रही है कि कांग्रेस पर आये सियासी संकट के बाद उनके प्रतिद्वंद्वी किरदार कम हो गए हैं। कभी कांग्रेस कद्दावर नेताओं का कुनबा होता था, जिसमें से सतपाल महाराज, विजय बहुगुणा और डॉ. हरक सिंह रावत सरीखे बड़े नेता कांग्रेस छोडकर भाग चुके हैं। मगर जो बड़े नाम बचे हैं, वह भी हरीश रावत की कुशल रणनीति के सामने ठहर सकेगे, कहा नही जा सकता; फिलहाल हरीश रावत को बडा खतरा किेशाेेर उपाध्याय से है। कांग्रेस हाईकमान के करीबी किशोर उपाध्याय के सितारे भी करवट बदल सकते हैं और कांग्रेस जीती कांग्रेस हाईकमान की नजरों में किेशोर उपाध्याय भी एक चेहरा साबित हो सकते हैं; हिमालयायूके न्यूज पोर्टल की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट- में आगे कहा गया है –
रणनीतिक योजना के तहत उत्तराखण्ड कांग्रेस संगठन के मुखिया को बिना विश्वास मे लिये इलेक्शन मैनेजमेंट गुरू प्रशांत कुमार को उत्तराखंड में भी कांग्रेस को सत्ता में लाने का ठेका दे दिया गया है और चुनावी रथ बनकर देहरादून भी आ गये, कांग्रेस संगठन के मुखिया को भनक तक नही लगने दी। मीडिया रिपोटो के अनुसार पिछले कई दिनों से सियासी हवाओं में उनकी मुख्यमंत्री से गुपचुप मुलाकातों की चर्चा थी। सीएम की पहल पर ही पीके को उत्तराखंड के इलेक्शन मैनेजमेंट की कमान सौंपी गई है। कमान संभालते ही पीके की टीम मैदान में उतर चुकी है।
पीके टीम के सदस्य कांग्रेस भवन पहुंचे जहां उन्होंने संगठन नेताओं से चर्चा की। पीके टीम के अचानक पार्टी कार्यालय पहुंचने पर कांग्रेस पार्टी नेताओं में खलबली मच गई। पार्टी के भीतर एक बड़ा खेमा पीके को इलेक्शन मैनेजमेंट का ठेका दिये जाने के पक्ष में नहीं है। लेकिन राजनीति के कुशल खिलाडी हरीश रावत ने मामला उच्च स्तर पर तय करवाया था, लिहाजा कांग्रेस संगठन केे मुंह पर ताले लग गये।
समाचाार पत्रों में प्रकाशित रिपोटो के अनुसार यूपी में आजमाये जा रहे पीके के प्रयोगों से राज्य के कांग्रेसी बहुत ज्यादा प्रभावित नजर नहीं आ रहे। उनकी मानें तो जितनी बड़ी रकम टीम पीके को प्रचार मैनेजमेंट के लिये दी जा रही है, उसकी आधी भी पार्टी संगठन पर लगा दी जाती तो नतीजे कुछ और होते। मगर पार्टी में ही कुछ लोग प्रशांत कुमार को मैदान में उतारे जाने के पक्ष में हैं। उनकी मानें तो हाल ही में पार्टी ने नान सीरीयस दावेदारों को कम करने के लिये पोलिंग बूथ स्तर पर पांच-पांच नाम भेजने का जो फार्मूला बनाया था, दरअसल वह टीम पीके का ही प्रयोग है। कांग्रेस भवन पहुंची टीम पीके यही डाटा जुटाने पहुंची थी।
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