4 अक्तूबर 2025 को अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि & धनिष्ठा नक्षत्र और शूल योग का संयोग & शनिवार को अभिजीत मुहूर्त 11:46-12:33 & राहुकाल प्रातः 09:13-10:41 मिनट तक & 04 अक्टूबर 2025, शनिवार का दिन है. आज आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि है और इस दिन एकादशी व्रत का पारण, सूर्योदय का समय : 06: 16 ए एम
सूर्यास्त का समय : 06: 03 पी एम BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI CHIEF EDITOR; HIMALAYAUK.ORG (Leading Newsportal & youtube channel & Daily Newspaper) Mob. 9412932030
4 अक्टूबर 2025 का दिन कई राशियों के लिए नई उम्मीदें लेकर आएगा

शनिवार यानी 4 तारीख को आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी और त्रयोदशी तिथि रहेगी. साथ ही धनिष्ठा नक्षत्र, शतभिषा नक्षत्र, शूल योग, गण्ड योग, बालव करण और कौलव करण का निर्माण हो रहा है. हालांकि, शनि देव को समर्पित शनिवार के दिन किसी भी ग्रह का राशि गोचर नहीं हो रहा है, लेकिन राशियों पर कुछ न कुछ प्रभाव जरूर पड़ेगा
सूर्य और चंद्र दोनों ही शुभ ग्रह हैं. जब भी ये दोनों ग्रह किसी राशि में साथ में विराजमान होते हैं, तो कुछ राशियों को लाभ जरूर पहुंचाते हैं. इस बार भी दिवाली के दौरान सूर्य-चंद्र की युति बनेगी, जिससे कुछ राशियों को लाभ होगा.
ज्योतिष दृष्टि से दिवाली से पहले और बाद का समय कई मायनों में खास है क्योंकि इस दौरान कई प्रभावशाली ग्रहों का गोचर हो रहा है. साथ ही समय-समय पर युति बन रही है. द्रिक पंचांग के अनुसार, वर्ष 2025 में 20 अक्टूबर को दिवाली का पर्व मनाया जाएगा. इस बार दिवाली से अगले दिन सूर्य और चंद्र ग्रह की युति बन रही है. 17 अक्टूबर को दोपहर 1 बजकर 53 मिनट पर ग्रहों के राजा सूर्य तुला राशि में गोचर करेंगे, जिसके 4 दिन बाद 21 अक्टूबर को सुबह 9 बजकर 35 मिनट पर चंद्र देव भी तुला राशि में गोचर करेंगे. चंद्र देव तुला राशि में 23 अक्टूबर की रात तक रहेंगे. वहीं, सूर्य करीब एक महीने तक तुला राशि में रहने वाले हैं.
ऐसे में 21 अक्टूबर 2025 को तुला राशि में आत्मा, मान-सम्मान, पिता, शक्ति, नेतृत्व क्षमता, तेज और ऊर्जा के दाता सूर्य की मन, मानसिक स्थिति, सुख, वाणी और माता के प्रतिनिधित्व ग्रह चंद्र से युति बनेगी
शास्त्रों में हर एक ग्रह के बारे में विस्तार से बताया गया है. प्रत्येक ग्रह की अपनी खासियत होती है. साथ ही इनकी कोई न कोई प्रिय राशि भी होती है, जिसके जातकों को वो विशेष फल प्रदान करते हैं. इसके अलावा ग्रह आपस में दोस्त व शत्रु भी होते हैं. मंगल और शनि को भी एक-दूसरे का शत्रु माना जाता है. जब भी ये दोनों ग्रह साथ में आते हैं, तो राशियों को लाभ व नुकसान पहुंचाते हैं. इसी के साथ अलग-अलग योग और दृष्टि भी बनाते हैं. इस बार भी अक्टूबर माह में मंगल और शनि के एक-दूसरे से 120° पर स्थित होकर पंचम दृष्टि योग बना रहे हैं, जिसे पंचम दृष्टि और पंचम योग के नाम से जाना जाता है.
एक माह में तीस तिथियां होती हैं और ये तिथियां दो पक्षों में विभाजित होती हैं। शुक्ल पक्ष की आखिरी तिथि को पूर्णिमा और कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि अमावस्या कहलाती है। तिथि के नाम – प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या/पूर्णिमा।

पंचांग के पांच अंग तिथि
नक्षत्र
आकाश मंडल में एक तारा समूह को कहा जाता है। 27 नक्षत्र जिसमे होते हैं। और इन 27 नक्षत्रों का स्वामित्व नौ ग्रहों को प्राप्त है। 27 नक्षत्रों के नाम कृत्तिका नक्षत्र, रोहिणी नक्षत्र, मृगशिरा नक्षत्र, अश्विन नक्षत्र, भरणी नक्षत्र, आर्द्रा नक्षत्र, पुनर्वसु नक्षत्र, पुष्य नक्षत्र, आश्लेषा नक्षत्र, हस्त नक्षत्र, चित्रा नक्षत्र, स्वाति नक्षत्र, विशाखा नक्षत्र, मघा नक्षत्र, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, रेवती नक्षत्र, अनुराधा नक्षत्र, ज्येष्ठा नक्षत्र, श्रवण नक्षत्र, घनिष्ठा नक्षत्र, शतभिषा नक्षत्र, मूल नक्षत्र, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र, उत्तराषाढ़ा नक्षत्र।
वार
वार से मतलब दिन से है। 1 एक सप्ताह सात वार / दिन होते हैं। ग्रहों के नाम से ये सात वार / दिन रखे गए हैं, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार और रविवार।
योग
योग भी नक्षत्र की तरह ही 27 प्रकार के होते हैं। योग सूर्य-चंद्र (Sun-Moon) की विशेष दूरियों की स्थितियों को कहा जाता है। दूरियों के आधार पर बनने वाले 27 योगों के नाम शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, विष्कुम्भ, प्रीति, व्याघात, हर्षण, वज्र, आयुष्मान, सौभाग्य, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, सिद्धि, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इन्द्र और वैधृति, व्यातीपात, वरीयान, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य।
करण
दो करण 1 तिथि में होते हैं। कुल मिलाकर 11 करण होते हैं। जिनके नाम कुछ इस प्रकार हैं गर, वणिज, चतुष्पाद, बालव, कौलव, तैतिल, नाग और किस्तुघ्न, बव, विष्टि, शकुनि। करण को भद्रा विष्टि कहते हैं। व शुभ कार्य करना भद्रा में वर्जित माने गए हैं।