01 अक्टूबर ;बुध देव और गणेश जी की कृपा से अति शुभ & नवरात्रि की नवमी तिथि, मां सिद्धिदात्री की सिद्धियां -भगवान शिव ‘अर्द्धनारीश्वर’ हुए, सिद्धिदात्री मंत्र ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नमः, सिद्धिदात्री की कृपा से ग्रह केतु अनुकूल होते हैं।

माँ सिद्धिदात्री की कृपा से ग्रह अनुकूल होते हैं। ज्योतिष के अनुसार, देवी सिद्धिदात्री का संबंध ग्रह केतु से है। उनकी पूजा करने से केतु के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं और यह ग्रह शांत होता है।

मां सिद्धिदात्री दुर्गा माता का नौवां और अंतिम रूप हैं, जो सभी सिद्धियों (अलौकिक शक्तियों) को देने वाली हैं. उन्हें “सिद्धि” (अलौकिक शक्ति) और “धात्री” (देने वाली) कहा जाता है. नवरात्र पूजन के नौवें दिन उनकी उपासना की जाती है, जिससे साधक को सभी सिद्धियाँ और मोक्ष की प्राप्ति होती है. 

  • देवताओं के महिषासुर के अत्याचारों से परेशान होकर भगवान शिव और विष्णु के पास पहुंचने पर, उनके तेज से मां सिद्धिदात्री प्रकट हुईं. 
  • अष्ट सिद्धिओं की प्राप्ति: भगवान शिव ने मां सिद्धिदात्री की आराधना करके अष्ट सिद्धियाँ (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) प्राप्त की थीं. 
  • अर्धनारीश्वर रूप: मां की कृपा से ही भगवान शंकर का आधा शरीर देवी का हो गया था, और वे अर्धनारीश्वर कहलाए. 
  • सृष्टि का निर्माण: मां सिद्धिदात्री की कृपा से ही सृष्टि की रचना हुई और जीवन की विभिन्न प्रजातियाँ अस्तित्व में आईं. 

देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था और मां सिद्धिदात्री की कृपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। जिस कारण वे लोक में ‘अर्द्धनारीश्वर’ नाम से प्रसिद्ध हुए, उनकी पूजा करने से व्यक्ति को आठों सिद्धियाँ और मोक्ष प्राप्त होते हैं. 

इनकी आराधना से भक्त को अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व एवम् वशित्व यह अष्ट सिद्धियां, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकाया प्रवेश, वाकसिद्धि, अमरत्व भावना सिद्धि आदि विद्याओंकी और समस्त निधियों की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है कि यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है। माँ की आराधना के लिए इस श्लोक का प्रयोग होता है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करने का नियम है।

मां सिद्धिदात्री का भोग; हलवा, पूड़ी, मौसमी फल, चने, खीर और नारियल का भोग

मां सिद्धिदात्री मंत्र
सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि,
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।
.
वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्,
कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्।

01 अक्तूबर 2025 को अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि & पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र और अतिगंदा योग का संयोग & बुधवार को अभिजीत मुहूर्त नहीं रहेगा& राहुकाल दोपहर 12:07 − 13:35 मिनट तक रहेगा & नवरात्रि की नवमी तिथि शाम 7 बजकर 1 मिनट तक रहेगी। इसके बाद दशमी तिथि &  नवमी पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 06:29 से शाम 06:27 बजे तक &  नवरात्रि की नवमी 1 अक्टूबर 2025, बुधवार को मनाई जाएगी। इस दिन भक्त मां सिद्धिदात्री की पूजा के साथ हवन पूजन भी करते हैं और साथ ही कन्या पूजन भी किया जाता है। नवरात्रि की नवमी को कहीं महानवमी तो कहीं दुर्गा नवमी के नाम से मनाया जाता है। इस दिन सरस्वती बलिदान आयुध पूजा ), दुर्गा बलिदान इत्यादि पर्व भी मनाए जाते हैं।  & नवरात्रि की नवमी 1 अक्टूबर 2025 को मनाई जाएगी। इस दिन नवमी तिथि शाम 7 बजे तक रहेगी। नवमी पर कन्या पूजन के बाद व्रत खोल सकते हैं।

 नवरात्रि व्रत का पारण समय 2 अक्टूबर 2025 की सुबह 06:15 के बाद का है।

महा नवमी, सरस्वती बलिदान, आयुध पूजा, दुर्गा बलिदान और दक्षिण सरस्वती पूजा आदि पर्व & कन्या पूजन का शुभ मुहूर्त सुबह 06:29 से शाम 06:27 बजे तक & हवन पूजन का शुभ मुहूर्त सुबह 06:29 से शाम 06:27 बजे तक &  राहुकाल 12:10 पी एम से 01:40 पी एम तक रहेगा। आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान राम ने राक्षस रावण का वध किया था। इसलिए हर साल इस दिन को दशहरा और विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है।

नवरात्रि का समापन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा से होता है। इस बार नवमी 1 अक्टूबर, 2025, बुधवार को मनाई जाएगी। इस दिन भक्त मां सिद्धिदात्री की आराधना के साथ हवन और कन्या पूजन करने का विधान है। महानवमी के दौरान हवन करना अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है है। खासकर अष्टमी और नवमी के दिन सही विधि के साथ हवन पूजन से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।

 प्रभु राम ने आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक मां दुर्गा की आराधना की थी। इसके बाद दशमी को उन्होंने रावण का अंत किया था। आखिरी दिन भगवान राम ने दस सिर वाले रावण का वध किया और न्याय और धर्म की स्थापना की। विजयादशमी मनाने के पीछे यह प्रमुख वजह मानी जाती है। 

मां दुर्गा ने राक्षस महिषासुर का मर्दन किया था। दोनों के बीच पूरे नौ दिनों तक भयानक युद्ध हुआ था। आखिरकार दसवें दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर का अंत करके संसार क उसके अत्याचारों से मुक्ति दी थी। यही वजह है कि आश्विन माह की दशमी तिथि को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है। 

दशहरा के दिन रावण दहन प्रदोष काल में किया जाता है। प्रदोष काल का समय सूर्यास्त के बाद शुरू होता है और इस दिन सूर्यास्त का समय शाम 6 बजकर 26 मिनट का है और इसी के बाद से रावण दहन भी शुरू हो जाएगा।

रावण दहने के बाद  माथे पर लाल या काला टीका लगाया जाता है। इस दिन की शक्ति से लाभ उठाने के लिए विभिन्न प्रकार के हवन और मंत्रों का जाप किया जाता है, जो न केवल शत्रुओं से मुक्ति दिलाते हैं बल्कि व्यक्तिगत जीवन में सफलता, प्यार और कल्याण भी लाते हैं। 

दुर्गा सप्तशती में दिये देवी मां के इस विशेष मंत्र का जप करना चाहिए |

देवी मां के इस महामारी नाश के विशेष मंत्र का जप करना चाहिए |
मन्त्र:
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते।

मन्त्र:
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिम शेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्य दुःख भय हारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकार करणाय सदा ‌र्द्रचित्ता॥

सिद्धकुंजिका स्तोत्र में दिये इस विशेष मंत्र का जप करना चाहिए |
मन्त्र:
नमस्ते रुद्ररुपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि।।

सिद्धकुंजिका स्तोत्र में दिये इस विशेष मंत्र का जप करना चाहिए |
मन्त्र:
नमस्ते शुम्भ हन्त्रयै च निशुम्भासुर घातिनि।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धिं कुरुष्व मे।

सिद्धकुंजिका स्तोत्र में दिये इस विशेष मंत्र का जप करना चाहिए |
मन्त्र:
ऐंकारी सृष्टी रूपायै हृींकारी प्रतिपालिका।
क्लींकारी काम रूपिण्यै बीजरूपे नमोऽतु ते।

सिद्धकुंजिका स्तोत्र में दिये इस विशेष मंत्र का जप करना चाहिए |
मन्त्र:
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरू।

सिद्धकुंजिका स्तोत्र में दिये इस विशेष मंत्र का जप करना चाहिए |
मन्त्र:
हुं हुं हुंकार रूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भू्रं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः।

 सिद्धकुंजिका स्तोत्र में दिये इस विशेष मंत्र का जप करना चाहिए |
मन्त्र:
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धीजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरू कुरू स्वाहा।

दुर्गा सप्तशती में दिये इस विशेष मंत्र का जप भी करना चाहिए।
मन्त्र:
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च।

नवमी हवन मंत्र

  • सबसे पहले ओम आग्नेय नम: स्वाहा मंत्र का जप करें।
  • इसके बाद ओम गणेशाय नम: स्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • इसके बाद ओम गौरियाय नम: स्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • ओम नवग्रहाय नम: स्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • ओम दुर्गाय नम: स्वाहा स्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • ओम महाकालिकाय नम: स्वाहा बोलकर आहुति दें
  • ओम हनुमते नम: स्वाहा स्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • ओम भैरवाय नम: स्वाहा स्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • ओम कुल देवताय नम: स्वाहा स्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • ओम स्थान देवताय नम: स्वाहास्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • ओम ब्रह्माय नम: स्वाहा स्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • ओम विष्णुवे नम: स्वाहा स्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • ओम शिवाय नम: स्वाहा स्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • ओम जयंती मंगलाकाली, भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा स्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • स्वधा नमस्तुति स्वाहा स्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • ओम ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी भानु: शशि भूमि सुतो बुधश्च: गुरुश्च शुक्र शनि राहु केतव सर्वे ग्रहा शांति करा भवंतु स्वाहास्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • ओम गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवा महेश्वर: गुरु साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम: स्वाहा स्वाहा कहते हुए आहुति दें।
  • अंत में ओम शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे, सर्व स्थार्ति हरे देवि नारायणी नमस्तुते।

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