सही समय पर सही पल का आनंद लें क्योंकि वो पल फिर नही आएगा !
7 नवंबर 2025 को मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि है। इस तिथि पर रोहिणी नक्षत्र और परिध योग का संयोग & शुक्रवार को अभिजीत मुहूर्त 11:42-12:26 मिनट तक रहेगा। राहुकाल दोपहर 10:43-12:04 मिनट तक रहेगा। & 7 नवंबर 2025 को शुक्रवार है. शुक्रवार के दिन पर शुक्र ग्रह और माता लक्ष्मी का अमल होता है.
पंचांग का निर्धारण, ब्रम्हांड की गति पर निर्भर है. इसलिए जैसे जैसे पृथ्वी भ्रमण करती है, पंचांग समय क्षेत्र के अनुसार बदलता दिखाई देता है. इसलिए एक ही पंचांग अलग अलग क्षेत्रों के लिए अलग अलग हो सकता है. इसलिए सही पंचांग का समय निर्धारण के लिए, क्षेत्र को चुनना अति महत्वपूर्ण है.
7 नवंबर दिन शुक्रवार मास मार्गशीर्ष द्वितीया तिथि सुबह 11:05 बजे तक रहेगी इसके उपरांत तृतीया तिथि शुरू हो जाएगी । आज सूर्य तुला राशि पर है और चंद्रमा पूरा दिन रात वृषभ राशि पर संचार करेगा । नक्षत्र रोहिणी 12:33 AM तक उपरांत म्रृगशीर्षा,परिघ योग रात 10:27 बजे तक, उसके बाद शिव योग , करण गर सुबह 11:05 बजे तक, बाद वणिज रात 09:16 बजे तक रहेगा इसके बाद विष्टि रहेगा । ब्रह्म मुहूर्त 4 बजकर 52 मिनट से सुबह 5 बजकर 44 मिनट तक। विजय मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 54 मिनट तक इसके बाद 2 बजकर 38 मिनट तक रहेगा । निशिथ काल रात में 11 बजकर 39 मिनट से 12 बजकर 31 मिनट तक। गोधूलि बेला शाम में 5 बजकर 32 मिनट से 5 बजकर 59 मिनट तक । सुबह में 9 बजे से 10 बजकर 30 मिनट तक गुलिक काल रहेगा । सुबह में 6 बजे से 7 बजकर 30 मिनट तक यमगंड रहेगा। अमृत काल का समय सुबह में 6 बजकर 36 मिनट से 7 बजकर 58 मिनट तक है ।
& गणाधिप संकष्टी चतुर्थी व्रत 8 नवंबर 2025 & मार्गशीर्ष यानि अगहन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणाधित संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है और इस दिन भगवान गणेश की उपासना की जाती है. कहते हैं कि इस दिन व्रत रखने से गणेश जी की कृपा मिलती है और कार्यों में आ रही बाधाएं दूर होती हैं. गणाधिप संकष्टी चतुर्थी व्रत 8 नवंबर 2025 को रखा जाएगा. इस दिन चंद्र दर्शन का शुभ समय रात 8 बजकर 1 मिनट है. 8 नवंबर को संकष्टी चतुर्थी के दिन शिव और सिद्ध योग बन रहे हैं जिन्हें बहुत ही शुभ व फलदायी माना जाता हैे.

चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित होती है और गणाधिप संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश का ध्यान रखकर व्रत रखा जाता है. इस दिन सुबह उठकर स्नान आदि कर हाथ में जल लें और व्रत का संकल्प करें. इसके बाद मंदिर को स्वच्छ करें और चौकी पर पीले रंग का कपड़ा बिछाकर गणेश जी की मूर्ति स्थापित करें. इसके बाद गणेश जी को चंदन व सिंदूर का तिलक लगाएं और फल, फूल व दूर्वा अर्पित करें. फिर मोदक का भोग लगाएं और घी का दीपक जलाएं. गणाधिप संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा पढ़ें व सुनें. इसके बाद दिनभर व्रत रखें और रात्रि के समय चंद्रमा के दर्शन करके अर्घ्य दें और व्रत का पारण करें.
मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष द्वितीया, कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), कार्तिक | द्वितीया तिथि 11:05 AM तक उपरांत तृतीया | नक्षत्र रोहिणी 12:33 AM तक उपरांत म्रृगशीर्षा | परिघ योग 10:27 PM तक, उसके बाद शिव योग | करण गर 11:05 AM तक, बाद वणिज 09:16 PM तक, बाद विष्टि |
नक्षत्र \ रोहिणी – Nov 07 03:27 AM – Nov 08 12:33 AM म्रृगशीर्षा – Nov 08 12:33 AM – Nov 08 10:02 PM
ज्योतिष के अनुसार आज का पंचांग दैनिक हिंदू कैलेंडर ही है जो आज की तिथि के बारे में बताता है, और इसके बीच शुभ और अशुभ समय की जानकारी देता है। यह विजय विश्व पंचांग पर आधारित है, जो पंचांग में सबसे दुर्लभ है, जिसका उपयोग विशेषज्ञ ज्योतिषियों द्वारा सैकड़ों वर्षों से किया जा रहा है। दैनिक पंचांग के माध्यम से, आप एक शुभ कार्य या एक नया उद्यम शुरू करने के लिए सबसे उपयुक्त समय निर्धारित करने के लिए समय, तिथि और दिन के बारे में सभी तरह की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और सभी नकारात्मक प्रभावों और अनावश्यक परेशानियों को दूर कर सकते हैं।
पंचांग या पंचागम् हिन्दू कैलेंडर है जो भारतीय वैदिक ज्योतिष में दर्शाया गया है। पंचांग मुख्य रूप से 5 अवयवों का गठन होता है, अर्थात् तिथि, वार, नक्षत्र, योग एवं करण। पंचांग मुख्य रूप से सूर्य और चन्द्रमा की गति को दर्शाता है। हिन्दू धर्म में हिन्दी पंचांग के परामर्श के बिना शुभ कार्य जैसे शादी, नागरिक सम्बन्ध, महत्वपूर्ण कार्यक्रम, उद्घाटन समारोह, परीक्षा, साक्षात्कार, नया व्यवसाय या अन्य किसी तरह के शुभ कार्य नहीं किये जाते ।
ज्योतिष में नौ ग्रहों में सूर्य ग्रह
ग्रहो में प्रथम स्थान एवं ग्रहों मे सूर्य को राजा भी कहा जाता है, वो पुरे ग्रह मंडल में प्रमुख है. संसार के सारे ग्रह या तारों को सूर्य से ऊर्जा एवं आत्मबल की प्राप्ति होती है. इसीलिए सूर्य को आत्मबल का कारक माना जाता है. जन्म के समय आकाश में सूर्य का स्थान जातक पर अपना प्रभाव निश्चित करता है.
सूर्य नारंगी रंग का शुष्क, गर्म, आग्नेय और पौरुष प्रवृत्ति वाला ग्रह है.
सूर्य का कारकत्व :
वैदिक ज्योतिष में सूर्य आत्मबल, साहस, पराक्रम, तेजस्वी, समूह का प्रमुख, राजनेता, सभी प्रकार के राजा, आत्मसन्मान, शासन या सरकारी व्यवस्था, मानसन्मान, मनुष्य का ह्रदय, तांबा और सोना, नारंगी रंग, पूर्व दिशा आदि का कारक माना जाता है.
सूर्य ग्रह का फल :
ज्योतिष में सूर्य की स्वराशि सिंह है, तथा सूर्य मेष राशि में उच्च के और तुला राशि में वे नीच के हो जाते है. सूर्य अपने मित्र ग्रहोंकी राशि में सकारत्मक फल देते है.
बलि यानि उच्च या मित्र ग्रहों की राशि में स्थित सूर्य के कारन जातक का जीवन की और देखने का नजरिया या सोच सकारात्मक होती है. इनका जीवन आशावादी बना रहता है. दूसरों के प्रति इनका भाव दयालु होता है. इन जातक के पास भरपूर मात्रा में आत्मविश्वास होता है. यह लोग हमेश समूह का नेतृत्व करने मे सक्षम होते है. सूर्य के प्रभाव वाले व्यक्ति दूसरों को बहुत जल्दी प्रभावित करते है.
कुंडली में पीड़ित सूर्य अगर अष्टम भाव, बारवे भाव, शनि, राहु से दृष्ट या युक्त हो, शत्रु या नीच राशि में हो, तो जातक में आत्मविश्वास की कमी होती है, आत्मविश्वास की कमी के कारन इनके बड़े बड़े कार्य अधूरे रहते है, या यह जातक अपने कार्य को अंजाम नहीं दे पाते है. सूर्य को जीवन और आरोग्य का कारक माना जाता है, ऐसे में सूर्य पाप ग्रह के साथ युति में बैठ जाए तो जातक आत्महत्या, अल्पायु या बीमारियों से घिरा हुआ होता है. पीड़ित सूर्य महत्वाकांक्षी, आत्म केंद्रित, ईर्ष्यालु, क्रोधी बनाता है.
कुंडली में पीड़ित सूर्य अगर लग्न भाव में विराजित हो, तो जातक अहंकारी, उच्च या नीच को माननेवाला, अपनों से निचले वर्ग पर अन्याय करने वाला, अपने अति आत्मविश्वास के कारन पराजित होने वाला, अपमानित होने वाला, निर्दयी राजा के समान होता है.
सूर्य के अधिकार क्षेत्र :
सूर्य आरोग्य या जीवन का कारक माना जाता है, इसलिए दवाई, मेडिकल, डॉक्टर्स इनका भी सूर्य कारक माना जाता है, सूर्य राजनेता, सभी प्रकार के राजाओं का कारक माना जाता है. सरकारी व्यवस्था या नौकरी सूर्य से ही देखि जाती है, समूह का नेतृत्व करने वाले सूर्य लोग सूर्य से ही देखे जाते है. जीवन में सभी प्रकार के मान सन्मान सूर्य से ही देखे जाते है.
सरकारी देनदारी, स्वर्ण, रिज़र्व बैंक, शेयर बाज़ार आदि पर सूर्य का प्रभाव होता है.
सूर्य के रत्न : सूर्य का रत्न माणिक्य है.
सूर्य के रंग : सूर्य का रंग नारंगी है.
सूर्य के वार : सूर्य का वार इतवार है.
सूर्य ग्रह का वैदिक मंत्र :
ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।।
सूर्य ग्रह का तांत्रिक मंत्र :
ॐ घृणि सूर्याय नम :
सूर्य ग्रह का बीज मंत्र :
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः
राहु और केतु का वो सच जो आपने शायद कभी नही सुना होगा,
दोनों आकाश में विरुद्ध दिशा के दो अदृश्य बिंदु कहे जाते है. लेकिन ज्योतिष में इन दोनों बिंदुओं को ग्रहों का दर्जा दिया गया है. राहु और केतु को मिलाकर ज्योतिष में नौ ग्रह माने जाते है. चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और रवि जैसे ग्रह संसार का एक पहलू दिखाते है, जो आप और हम रोज के जीवन में देख पाते है. तथा राहु और केतु संसार के उस पहलू को दर्शाते है, जो मृत्यु पश्चात् शायद ही कोई देख पाता है.
रहस्यमई केतु की सच्चाई
केतु संसार का आध्यात्मिक रूप से वो बिंदु है, जो हर कदम व्यक्ति को मुक्ति की तरफ ले जाता है, केतु हर विषय को रहस्यमई बनाये रखने में माहिर है, तथा यही जीवन का ज्ञान है, जो मृत्यु पश्चात ही उसका ज्ञान होता है. केतु वो बिंदु है जो अपने आप को रहस्यमई बनाये रखता है, इसके बावजूद किसीने अपने ज्ञान की सिमा लांघकर इस रहस्य का ज्ञान प्राप्त किया तो वो इंसान उस बिंदु तक पहुँच पाता है, जहा संसार भी ख़त्म होता है, और आत्मा को मुक्ति मिल जाती है, और आखिर में जातक के लिए केतु एक आभासी रूप में ही ख़तम हो जाता है. इसी का अर्थ, केतु नया उत्पन्न होने नहीं देता है, केतु जातक को आध्यात्मिक ज्ञान में रूचि देता है. सारे धार्मिक विधान, ज्ञान की बाते, रहस्यमयी ज्ञान या खोज, साधु, देवालय, धार्मिक रीती रिवाज, धार्मिक कानून, संत इन पर केतु का प्रभाव होता है. बिना केतु के जातक को मुक्ति या या मुक्ति के करीब ले जानेवाला ज्ञान कभी प्राप्त नहीं हो सकता.
शब्द निशुल्क होते है.
लेकिन हमेशा शब्दों के प्रयोग
पर यह निर्भर होता है.
की उसका सही मूल्य मिलेगा
या मूल्य चुकाना पड़ेगा
राहु की वो सच्चाई
केतु और राहु एक दूसरे से १८० कोण में होते है. केतु आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ावा देता है, राहु का स्वभाव केतु से एकदम भिन्न है. राहु संसार के भौतिक सुखोंका, वो बिंदु है, जो व्यक्ति को मुक्ति से दूर ले जाता है. राहु धार्मिक रीती – रिवाज, नियमों का पालन करने वाला ग्रह बिलकुल नहीं है. राहु पाप पुण्य को बिलकुल नहीं मानता. बड़े गुन्हेगार, झूठे वचनो में फ़साने वाले इंसान, इनपर राहु का प्राबल्य होता है. भ्रम की निर्मिति स्वयं राहु ही करवाता है. जुआ, मटका, दारू के अड्डे, कसाई खाने इनपर राहु का प्राबल्य होता है. किसी भी व्यसन की अधीनता राहु के अधीन होती है. राहु असल में भौतिक जीवन का आनंद उपभोगता है, वो भी किसी भी सामाजिक बंधन में रहे बिना, राहु प्रभावित जातक सिर्फ आनंद नहीं लेता तो किसी का हक़ छीनकर, जबरदस्ती धमकाकर, दुसरों पर अन्याय कर के जीवन का आनंद उपभोगता है. यही राहु की निति होती है.
राहु अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ता
यदि कुंडली में राहु अच्छी स्थिति में है, तो ऊपर दिए कर्मो से जातक को लाभ मिलता है, जैसे राहु के अच्छे प्रभाव से जातक स्वयं की दारू की दुकान होने पर भी वो व्यवसनाधीन नहीं हो पाता है. राहु के अच्छे प्रभाव के कारन दूसरोंको कर्ज देने से लाभ मिलता है. भ्रमित करनेवाले कामों में राहु सफलता दिलाता है. लेकिन कुंडली में राहु कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर जातक पर राहु का प्रभाव हो, चाहे वो अच्छा हो या बुरा, वो जातक को कभी धर्म ज्ञान, मुक्ति ज्ञान जैसे विषयों मे रूचि नहीं लेने देता. यहाँ तक की, वो जातक को किसी भी नियम में बंधने की अनुमति नहीं देता. राहु अपने नैसर्गिक स्वभाव को हमेशा बरकार रखता है.
सुख का मतलब क्या है ?
बीते दिन का कोई गम न होना.
आज के दिन अपने मर्जी से
जीना और आने वाले कल की
कोई चिंता न करना…
राहु – केतु संसार के संतुलन को बनाये रक्खने वाले दो बिंदू
राहु और केतु के प्रभाव को देखा जाए, तो यही दो बिंदु या ज्योतिष के ग्रह है, जो संसार को चलाते है. एक (केतु) आध्यात्मिक ज्ञान की बढ़ोतरी कर मुक्ति की तरफ ले जाता है, तो दूसरा (राहु) मुक्ति से और दूर भौतिक जीवन का आनंद लेने के लिए प्रोत्साहित करता है. राहु और केतु के कारन ही संसार का संतुलन अभीतक बना हुआ है, इसी कारण संसार पर ना पाप हावी हो पाता है, और नाही पुण्य संसार को जित पाता है, क्यूंकि जब हर किसी को यह ज्ञान हो जायेगा तो, संसार का कोई मोल नहीं रहेगा.
जो मनुष्य दूसरों के चहरे पर हमेशा
हँसी निर्माण करने की क्षमता रखता है.
ईश्वर उसकी जीवन में भोगने वाली
यातनाये उतनी ही कम करता है.