30 अप्रैल, गुरुवार; भगवान विष्णु और बृहस्पति देव को समर्पित ,उग्र और तांत्रिक देवी छिन्नमस्ता जयंती पूजा घर में नहीं, श्री नृसिंह जयंती व व्रत, श्री आद्य शंकराचार्य कैलाश गमन, गुरु अमरदास जयंती

30 अप्रैल 2026, गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और बृहस्पति देव को समर्पित & ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह दिन ज्ञान, धर्म, गुरु कृपा और समृद्धि का प्रतीक होता है। इस दिन किए गए कार्यों में स्थिरता और शुभ परिणाम मिलने की संभावना अधिक & चैत्र शुक्ल द्वादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व है & गुरुवार को भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की पूजा करना शुभ माना जाता है यह दिन ज्ञान, धर्म और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनुकूल होता है दान-पुण्य और सेवा करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है & “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें & पीले वस्त्र चने की दाल का दान करें & केले के पेड़ की पूजा करें

By Chandra Shekhar Joshi Chief Editor & President : Maa Dasham Vidhya Bagla Mukhi 9412932030

हिंदू धर्म में नृसिंह जयंती का विशेष महत्व माना जाता है. मान्यताओं के अनुसार, नृसिंह भगवान विष्णु के दस अवतारों में से चौथे अवतार हैं. हर साल वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को नृसिंह जयंती मनाई जाती है. & भद्रा रात्रि 9-13 से प्रारम्भ, छिन्नमस्ता जयंती, श्री नृसिंह जयंती व व्रत, श्री आद्य शंकराचार्य कैलाश गमन, गुरु अमरदास जयंती ( प्रा.मत से), विवाह मुहूर्त्त चित्रा नक्षत्र में, by chandra shekhar joshi chief editor m 9412932030

मां छिन्नमस्ता (दस महाविद्याओं में से एक) अत्यंत उग्र और तांत्रिक देवी हैं, इसलिए उनकी पूजा सामान्यतः घर में नहीं, बल्कि श्मशान या सिद्ध तांत्रिकों द्वारा की जाती है। उनका स्वरूप भयंकर है, जो अहंकार के विनाश का प्रतीक है। घर पर उनकी पूजा करने से मानसिक अशांति या तांत्रिक दोष लग सकते हैं, इसलिए मना किया जाता है। पूजा सामान्यतः घर में नहीं  माँ छिन्नमस्ता का स्वरूप बहुत भयंकर है, जिसमें वे अपना सिर काटकर अपने ही हाथों में धारण करती हैं।

30 अप्रैल 2026 का पंचांग ज्ञान, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देता है। भगवान विष्णु की कृपा से आज का दिन शुभ और फलदायी रह सकता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार एक बार मां पार्वती अपनी दो योगिनी सहचरियों जया (डाकिनी) और विजया (वर्णिनी) के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं. मान्यता है कि नदी में स्नान करते हुए उन्हें समय गुजरने का ध्यान नहीं रहा. लंबा समय बीतने के बाद जब उनकी सहचरी जया और विजया भूख और प्यास से तड़पने लगीं. तब देवी ने उन्हें धैर्य रखने के लिए कहा. इस पर सहचरियों ने उनसे प्रार्थना की हे देवी मां तो हमेशा अपनी संतान की तुरंत भूख मिटाती हैं.

सहचरियों की इस करुण पुकार को सुनते माता पार्वती ने तलवार से अपना सिर काट दिया. जिसके बाद उनकी गर्दन से रक्त की तीन धाराए निकल पड़ीं. जिसमें से निकलने वाली दो रक्त धारा का पान जया और विजया ने किया तो वहीं तीसरी धारा से निकले वाले रक्त की धारा का पान स्वयं देवी छिन्नमस्ता ने किया. इ

आज का पंचांग गुरुवार 30 अप्रैल, 2026 |

  • विक्रम संवत् – 2083
  • संवत्सर नाम – रौद्र
  • शक संवत् – 1948
  • हिजरी सन् – 1447
  • मु. मास – 12 जिल्काद
  • अयन – उत्तरायण
  • ऋतु – ग्रीष्म ऋतु
  • मास – वैशाख
  • पक्ष – शुक्ल

नृसिंह जयंती 2026 कब है?

वैदिक पंचांग के अनुसार, चतुर्दशी तिथि 29 अप्रैल 2026 को शाम 7:51 बजे से शुरू होकर 30 अप्रैल 2026 को रात 9:12 बजे तक रहेगी. हिंदू परंपरा में उदयातिथि को महत्व दिया जाता है, इसलिए इस वर्ष नृसिंह जयंती 30 अप्रैल, गुरुवार को मनाई जाएगी. नृसिंह जयंती पूजा का शुभ मुहूर्त

नृसिंह भगवान का प्राकट्य प्रदोष काल में हुआ था, इसलिए शाम का समय पूजा के लिए सबसे शुभ माना जाता है. इस दिन शाम 4:17 बजे से 6:56 बजे तक पूजा करना अत्यंत फलदायी रहेगा. नृसिंह जयंती पूजा विधि  

  • सबसे पहले सुबह जल्दी उठकर स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें. 
  • इसके बाद पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर लें.
  • एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान नृसिंह की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें. 
  • भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं और चंदन, कुमकुम, फूल, तुलसी, फल और मिठाई अर्पित करें.
  • भगवान नृसिंह के मंत्रों का जाप करें.
  • इसके बाद प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप की कथा सुनें या पढ़ें. अंत में भगवान की आरती करें और प्रसाद बांटें.

नृसिंह सुरक्षा मंत्र

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युं मृत्युं नमाम्यहम्॥
नृसिंह गायत्री मंत्र

ॐ वज्र-नखाय विद्महे, तीक्ष्ण-द्रंष्टाय धीमहि।
तन्नो नारसिंह: प्रचोदयात्।।

30 अप्रैल को वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि और गुरुवार का दिन है। चतुर्दशी तिथि गुरुवार रात 9 बजकर 13 मिनट तक रहेगी। वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को श्री नृसिंह जयंती मनाने का विधान है। इसके अलावा 30 अप्रैल को दस महाविद्याओं में से एक देवी छिन्नमस्ता की जयंती भी मनाई जायेगी। गुरुवार देर रात 2 बजकर 17 मिनट तक चित्रा नक्षत्र रहेगा।

30 अप्रैल 2026 का पंचांग (30 April 2026 Panchang)

  • वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि- 30अप्रैल 2026 को रात 9 बजकर 13 मिनट तक
  • चित्रा नक्षत्र- 30 अप्रैल 2026 को देर रात 2 बजकर 17 मिनट तक
  • रवि योग- 30 अप्रैल 2026 को सुबह 6 बजकर 11 मिनट से देर रात 2 बजकर 16 मिनट तक रहेगा
  • 30 अप्रैल 2026 व्रत-त्यौहार-  छिन्नमस्ता की जयंती, श्री नृसिंह जयंती

30 अप्रैल 2026 के शुभ मुहूर्त

निशिता मुहूर्त- 12:13 ए एम, मई 01 से 12:58 ए एम, मई 01 

ब्रह्म मुहूर्त- 04:42 ए एम से 05:26 ए एम

अभिजित मुहूर्त- 12:10 पी एम से 01:01 पी एम

विजय मुहूर्त- 02:44 पी एम से 03:35 पी एम

गोधूलि मुहूर्त- 06:59 पी एम से 07:22 पी एम

अमृत काल – 07:20 पी एम से 09:04 पी एम

देवी छिन्नमस्ता की जयंती 2026 में 30 अप्रैल (गुरुवार) को मनाई जाएगी। यह पावन पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है, जो 10 महाविद्याओं में से छठी देवी का अवतार दिवस है। इस दिन माता की विशेष पूजा, व्रत और उनके 108 नामों का पाठ करने से शत्रुओं का नाश, नकारात्मकता दूर और राहु से जुड़े कष्टों से मुक्ति मिलती है

 माता छिन्नमस्ता का स्वरूप बिना सिर वाला (छिन्नमस्तिका) है, जो अपनी ही योगिनियों- डाकिनी और शाकिनी (अजया और विजया) की रक्त प्यास शांत करने के लिए अपना मस्तक काटकर रक्त पिलाती हैं। असम की कामाख्या के बाद इसे दूसरा सबसे बड़ा तांत्रिक शक्तिपीठ माना जाता है। माता के मंत्र “ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा” का जाप करने से मनोकामनाएं पूरी

मां छिन्नमस्ता का अद्भुत स्वरूप

मां छिन्नमस्ता का स्वरूप अत्यंत विलक्षण है. वे स्वयं अपना कटा हुआ सिर हाथ में धारण करती हैं और दूसरे हाथ में तलवार रखती हैं. उनकी गर्दन से निकलती रक्त की तीन धाराओं में से एक को देवी स्वयं ग्रहण करती हैं, जबकि अन्य दो धाराएं उनकी सहचरियां पीती हैं. यह रूप आत्मबलिदान, जीवन ऊर्जा और ब्रह्मांडीय शक्ति के प्रवाह का प्रतीक माना जाता है.

साधना और उपासना का महत्व

मां छिन्नमस्ता को दस महाविद्याओं में छठा स्थान प्राप्त है. उनका स्वरूप उग्र और भयानक होने के कारण उनकी पूजा मुख्यतः तांत्रिक, अघोरी, योगी और नाथ संप्रदाय के साधक करते हैं. यह साधना सामान्य पूजा से भिन्न होती है और विशेष विधि-विधान के साथ की जाती है.

पूजा से मिलने वाले लाभ

शास्त्रों के अनुसार मां छिन्नमस्ता की उपासना से व्यक्ति के मन से भय समाप्त होता है. यह साधना आत्मबल को बढ़ाती है और जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति देती है. इसके अलावा उनकी कृपा से शारीरिक कष्टों से राहत मिलती है और साधक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

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