27 अक्टूबर 2025, शिव जी को समर्पित सोमवार के उपाय & छठ पूजा और स्कन्द षष्ठी. 1 नवंबर देवउठनी एकादशी

 28 अक्टूबर से शुक्र ग्रह चित्रा नक्षत्र में प्रवेश करने वाले हैं. इस गोचर से 3 राशि के जातकों की किस्मत चमकने के योग & ब्रह्म मुहूर्त – 04:47 ए एम से 05:38 ए एम & गोधूलि मुहूर्त – 05:40 पी एम से 06:06 पी एम

27 अक्टूबर सोमवार का दिन है। कार्तिक माह (Kartik Month) की कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी , नक्षत्र मूल 01:27 PM तक उपरांत पूर्वाषाढ़ा , अतिगण्ड योग 07:26 तक, उसके बाद सुकर्मा योग , करण कौलव 07:06 PM तक, बाद तैतिल & बुध देव अनुराधा नक्षत्र, मंगल देव वृश्चिक राशि और चंद्र देव पूर्वाषाढा नक्षत्र में गोचर करेंगे

1 नवंबर से 15 दिसंबर तक विवाह के कई शुभ मुहूर्त हैं. इसके बाद 15 दिसंबर से 14 जनवरी तक मलमास रहेगा, जिसमें कोई भी विवाह मुहूर्त नहीं होगा. नवंबर– 1 (देवउठनी एकादशी), 2, 22, 23, 24, 25, 27, 29 और 30 को शुभ मुहुर्त है. दिसंबर- 4, 5, 6 और 11 का शुभ मुहुर्त है. इसके बाद 2026 के लिए श्रेष्ठ विवाह मुहूर्त जनवरी-22, 23, 25 और 28 को है. फरवरी- 5, 6, 8, 10, 12, 14, 19, 20, 21, 24, 25, 26 को शुभ मुहुर्त है. इसके बाद मार्च में- 1, 3, 4, 7, 8, 9, 11, 13 को शुभ मुहुर्त है. अप्रैल में-15, 20, 21, 25, 27, 28, 29 को शुभ मुहुर्त है. मई में- 6, 13, 23, 25, 26, 28, 29 को शुभ मुहुर्त है. जून में- 1, 2, 4, 5, 11, 19, 21, 28 को शुभ मुहुर्त है. जुलाई में- 1, 6, 7, 11 को शुभ मुहुर्त है. इसके बाद विराम- 11 जुलाई 2026 को देवशयनी एकादशी के बाद अगले 4 महीने के लिए देव सो जाएंगे, जिससे विवाह पर विराम लग जाएगा.

छठ पूजा को सूर्य षष्ठी, छठ, छठी, डाला पूजा और डाला छठ के नाम से भी जाना जाता है, जो इस पर्व की विविधता और महत्व को दर्शाता है। इस पूजा के माध्यम से भक्त भगवान सूर्य से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और अपने जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।

मंगलवार 28 अक्टूबर, 2025 को सुबह 05:17 AM बजे शुक्र ग्रह निकलकर चित्रा नक्षत्र में गोचर करेंगे. द्रिक पंचांग के अनुसार, सुख-वैभव के दाता अभी हस्त नक्षत्र में विराजमान हैं. ज्योतिषाचार्य हर्षवर्धन शांडिल्य के अनुसार, चित्रा नक्षत्र के अधिपति मंगल ग्रह हैं और यह नक्षत्र ब्रह्मांड की ‘सौंदर्य और व्यवस्था’ की भावना के प्रतिनिधि हैं. वहीं, शुक्र भी सौंदर्य के कारक ग्रह हैं. जब वे इस नक्षत्र में गोचर करते हैं, तो जातकों में विलासिता, सजावट, फैशन, आभूषण आदि की ओर आकर्षण बढ़ता है. ज्योतिषाचार्य के अनुसार, चित्रा नक्षत्र में शुक्र गोचर कलाकारों, डिजाइनरों, आर्किटेक्ट्स, फैशन इंडस्ट्री के लोगों के लिए बहुत अनुकूल साबित होगा. वहीं, नई कलात्मक परियोजनाएं शुरू करने का समय उत्तम है. यूं तो शुक्र के इस गोचर का असर सभी राशियों पर होगा, लेकिन 3 राशियों के जातकों के लिए यह लॉटरी लगने जैसा सिद्ध होने के योग बना रहा है. 

छठ पूजा 2025 के लिए कब है नहाय-खाय, खरना, संध्या और उषा अर्घ्य? 

छठ पूजा एक चार-दिवसीय महापर्व है। इस वर्ष छठ पूजा 25 अक्टूबर से 28 अक्टूबर, 2025 तक मनाई जाएगी।

छठ पूजा की शुरुआत नहाय खाय के साथ होती है। इस साल यह 25 अक्टूबर, शनिवार को है। इस दिन, भक्त किसी नदी या तालाब में स्नान करते हैं और फिर एक साधारण, शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं। घर की साफ़-सफ़ाई की जाती है, और पूजा के लिए आवश्यक फल तथा दीये (मिट्टी के दीपक) खरीदे जाते हैं। पूजा में उपयोग होने वाले फल फसल के मौसम के प्रतीक होते हैं।

छठ पूजा का दूसरा दिन खरना कहलाता है, जो 26 अक्टूबर, रविवार को पड़ रहा है। इस दिन, व्रती पूरे दिन का उपवास रखते हैं और सूर्यास्त के बाद पूजा करके अपना उपवास तोड़ते हैं। इस अवसर पर छठी मैया को प्रसाद चढ़ाया जाता है, जिसे बाद में रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ साझा किया जाता है।

छठ पूजा के तीसरे दिन का मुख्य अनुष्ठान संध्या अर्घ्य कहलाता है, जो 27 अक्टूबर, सोमवार को मनाया जाएगा। इस दिन, भक्त सूर्यास्त से पहले नदी या तालाब के किनारे जमा होते हैं। वे कमर तक पानी में खड़े होकर अस्तगामी सूर्य यानी डूबते हुए सूर्य को जल-अर्घ्य अर्पित करते हैं। यह दिन सोमवार को पड़ रहा है। रात में, भक्त छठ व्रत कथा सुनते हैं और भक्ति गीत गाते हैं। 27 अक्टूबर को सूर्यास्त का समय: शाम 5:40 बजे

छठ पूजा का अंतिम दिन उषा यानी सुबह का अर्घ्य का होता है, जो इस साल 28 अक्टूबर, मंगलवार को है। इस दिन, उगते हुए सूर्य को दूध से अर्घ्य दिया जाता है। उषा को सूर्य देव की पत्नी माना जाता है। अर्घ्य देने के बाद ही व्रती 36 घंटे का कठिन निर्जला उपवास (बिना पानी का उपवास) तोड़ते हैं और इस महाव्रत का समापन करते हैं। 28 अक्टूबर को सूर्योदय का समय: सुबह 6:30 बजे

छठ महापर्व मनाया जा रहा है. छठ महाापर्व की शुरुआत 25 अक्टूबर को नहाय खाय के साथ हुई जिसका समापन उषा अर्घ्य के साथ 28 अक्टूबर को होगा. आप इस दौरान छठी मैया को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इन उपायों को कर सकते हैं. मान्यताओं के अनुसार, छठ पूजा का व्रत संतान प्राप्ति, संतान की सलामती, सुख-समृद्धि और उनकी लंबी उम्र के लिए रखा जाता है.

छठ महापर्व पर गुड़ की खीर का प्रसाद बनाने का विधान है. आपको खीर का प्रसाद बनाना चाहिए और छठी मैया को इसका भोग लगाना चाहिए. इसके अलावा गुड़ और चावल को बहते पानी में प्रवाहित करें. सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद आपको यह उपाय करना चाहिए. इससे सूर्य देव प्रसन्न होते हैं.

छठ पूजा पर आपको सूर्य देव की पूजा करनी चाहिए. सूर्य देव की पूजा करने से सभी दुख-संकट दूर होते हैं. आप पूर्व दिशा में सूर्य देव की प्रतिमा लगाएं और गंगा जल से स्नान कराएं इसके बाद वस्त्र, चावल, धूप और दीप अर्पित करें. इसके साथ ही गुड़ का भोग लगाएं.

रुद्राक्ष माला जाप

छठी मैया को प्रसन्न करने के लिए आपको सूर्य को अर्घ्य देने के बाद सूर्य देव का स्मरण कर रुद्राक्ष माला से सुर्य देव के मंत्रों का जाप करना चाहिए. ऐसा करने से आपकी हर मनोकामना पूर्ण होगी.

जल प्रवाहित करें ये चीजें

छठ पूजा के दौरान आपको छठी मैया को प्रसन्न करने के लिए लाल कपड़े में गेहूं और गुड़ को बांधकर दान करना चाहिए. इसके साथ ही छठ पूजा के दिन तांबे का सिक्का या तांबे का चौकोर टुकड़े को बहते जल में प्रवाहित करना चाहिए.

छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला एक महापर्व है जो भगवान सूर्य और उनकी बहन षष्ठी (छठी) मैया को समर्पित है. हिन्दू धर्म में सूर्यदेव जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य के प्रतीक हैं. छठ व्रत को करने वाले व्रती सूर्य को अर्घ्य देकर उनसे परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की दीर्घायु और आरोग्य की कामना करते हैं.

महाभारत काल में सूर्य उपासना और छठ पूजा का एक विशेष उल्लेख मिलता है. कथा के अनुसार कर्ण, जो स्वयं सूर्यदेव के पुत्र थे, हर दिन सुबह में जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे और इसके बाद दान करते थे. उनकी तपस्या और श्रद्धा के कारण उन्हें ‘दानवीर कर्’ की उपाधि मिली. बिहार के अंग प्रदेश, आज का भागलपुर, में शुरू हुई उनकी यह परंपरा आगे चलकर लोकआस्था का पर्व बन गई.

द्रौपदी और पांडवों का छठ व्रत

एक दूसरी कथा के अनुसार, पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने भी सूर्य षष्ठी व्रत किया था. जब पांडव अपना राजपाट खोकर वनवास में थे, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखकर सूर्यदेव से अपने परिवार की रक्षा और समृद्धि की कामना की थी. कहते हैं कि इस व्रत के प्रभाव से पांडवों को बाद में उनका राज्य वापस मिला.

मां सीता ने शुरू की छठ पूजा

छठ पूजा की परंपरा त्रेता युग से जुड़ी मानी जाती है. जब भगवान राम और माता सीता 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे, तब माता सीता ने मुद्गल ऋषि के निर्देश पर सूर्यदेव की उपासना उनके ही आश्रम की थी. उन्होंने 6 दिनों तक व्रत रखकर सप्तमी को उगते सूर्य को अर्घ्य दिया. ऐसा माना जाता है कि तभी से यह सूर्य उपासना की परंपरा ‘छठ’ के रूप में प्रचलित हुई.

वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्व

छठ पूजा सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. सूर्य की पहली किरण शरीर को विटामिन D प्रदान करती है, जो प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाती है. वहीं, सूर्य की तेज किरणें रोगाणु-कीटाणु को नष्ट करती हैं. यह पर्व प्रकृति, जल और सूर्य के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है.

वास्तव में, छठ पूजा भारत की उन परंपराओं में से एक है, जो श्रद्धा, अनुशासन और पवित्रता का अद्भुत संगम है. चाहे माता सीता का सूर्य व्रत हो, कर्ण की सूर्य भक्ति हो या द्रौपदी का तप, इन सभी कथाओं में एक ही संदेश छिपा है: ‘सूर्य ही जीवन का आधार हैं, और उनकी उपासना आत्मबल और समृद्धि का मार्ग.

 वैदिक पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर देवउठनी एकादशी (Dev Uthani Ekadashi 2025 Date) व्रत किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को करने से साधक को सभी पापों से छुटकारा मिलता है। साथ ही जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।

देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागृत होते हैं और चातुर्मास का समापन होता है। इसी दिन से शुभ और मांगलिक कामों की शुरुआत होती है। वैदिक पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की तिथि की शुरुआत 01 नवंबर को सुबह 09 बजकर 11 मिनट पर हो रही है। वहीं, इस तिथि का समापन 02 नवंबर को सुबह 07 बजकर 31 मिनट पर होगा। ऐसे में देवउठनी एकादशी व्रत 01 नवंबर 

विष्णु मंत्र


1. शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्

विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।

लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्

वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥

2. ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:

अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय

त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप

श्री धनवंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥

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