12 जून 2026……विभिन्न ग्रहों की स्थिति……&भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए प्रदोष व्रत सायंकाल, गोधूलि बेला में करने का विधान

प्रदोष भगवान शिव को प्रसन्न कर जीवन में सुख-समृद्धि, लक्ष्मी प्राप्त करने का स्वर्णिम अवसर है। भारतीय संस्कृति में अधिकांश व्रत-पूजन प्रातःकाल में ही किए जाते हैं, किन्तु भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए प्रदोष व्रत सायंकाल, गोधूलि बेला में करने का विधान है। व्रतोपवास की दृष्टि से भगवान शिव की आराधना में वारों में सोमवार और तिथियों में त्रयोदशी (प्रदोष) का विशेष महत्व माना जाता है।

by Chandra Shekhar Joshi Chief Editor; Himalayauk.org (Leading Newsportal & Daily Newspaper & youtube Chennel) MOB 9412932030

“प्रदोष” का भगवान शिव के साथ अन्योन्याश्रित संबंध है। ’प्रदोषो रजनीमुखम‘ रात्रि के प्रारंभ की बेला प्रदोष नाम से संबोधित की जाती है, रात्रि शिव को विशेष प्रिय है। मुख्यतर प्रदोष का अर्थ है, रात्रि का प्रारंभ। प्रदोष काल में शिव तांडव स्तोत्र का पाठ अत्यन्त लाभदायक है। जो व्यक्ति प्रदोष काल में शिव जी की पूजा के समय रावण द्वारा रचित शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करता है, उनको भगवान शंकर जी अचल सम्पति प्रदान करते हैं। शिव तांडव स्तोत्र का अंतिम सत्रहवां श्लोक इस बात की पुष्टि करता है,

12 जून 2026 को ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि है。 यह दिन शुक्रवार है और इस दौरान अश्विनी नक्षत्र और अतिगण्ड योग का संयोग &  12 जून शुक्रवार जो देवी लक्ष्मी को समर्पित है। और यह अधिक मास की अंतिम द्वादशी तिथि भी होगी। जिसमें शुक्र के साथ गुरु का गोचर कर्क राशि में होगा जिससे गजलक्ष्मी योग का शुभ संयोग बनेगा। और तो और कल यानी 12 जून के दिन चंद्र मंगल युति भी मेष राशि में रहेगी जो एक उत्तम संयोग है। इस पर कल बुध का गोचर मिथुन राशि मे होने से भद्र राजयोग भी प्रभावी रहेगा & 12 जून चंद्रमा का गोचर अश्विनी उपरांत भरणी नक्षत्र से मेष राशि में होगा। चंद्रमा का यह गोचर बहुत ही शुभ फलदायी रहने वाला है क्योंक चंद्रमा से द्वितीय भाव में सूर्य स्थित हैं और चंद्रमा के साथ मंगल युति कर रहे हैं जिससे चंद्र मंगल योग भी बन रहा है। इस पर कल दिन के स्वामी ग्रह शुक्र का गोचर कर्क राशि मे गुरु के साथ हो रहा है जिससे उत्तम राजयोग बना है। और बुध मिथुन राशि में संचार करके हुए भद्र योग बना रहे हैं। ऐसे में 12 जून का दिन मेष, मिथुन, कर्क, मकर समेत कई राशियों के लिए बहुत ही शुभ फलदायी और भाग्यशाली

सायंकाल शिव पूजन का विशेष महत्व है। प्रदोषकाल में शिव पूजन अत्यन्त लाभदायक होता है। लंकापति रावण शिव जी का परम भक्त था, रावण के पास जितनी भी धन-सम्पदा थी, वह सब शिव कृपा का ही प्रताप था। रावण प्रदोष काल में शिव को प्रसन्न कर, सिद्धियाँ प्राप्त करता था।

प्रदोष भगवान शिव को प्रसन्न कर जीवन में सुख-समृद्धि, लक्ष्मी प्राप्त करने का स्वर्णिम अवसर है। भारतीय संस्कृति में अधिकांश व्रत-पूजन प्रातःकाल में ही किए जाते हैं, किन्तु भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए प्रदोष व्रत सायंकाल, गोधूलि बेला में करने का विधान है। व्रतोपवास की दृष्टि से भगवान शिव की आराधना में वारों में सोमवार और तिथियों में त्रयोदशी (प्रदोष) का विशेष महत्व माना जाता है।

“प्रदोष” का भगवान शिव के साथ अन्योन्याश्रित संबंध है। ’प्रदोषो रजनीमुखम‘ रात्रि के प्रारंभ की बेला प्रदोष नाम से संबोधित की जाती है, रात्रि शिव को विशेष प्रिय है। मुख्यतर प्रदोष का अर्थ है, रात्रि का प्रारंभ। प्रदोष काल में शिव तांडव स्तोत्र का पाठ अत्यन्त लाभदायक है। जो व्यक्ति प्रदोष काल में शिव जी की पूजा के समय रावण द्वारा रचित शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करता है, उनको भगवान शंकर जी अचल सम्पति प्रदान करते हैं। शिव तांडव स्तोत्र का अंतिम सत्रहवां श्लोक इस बात की पुष्टि करता है,

प्रदोष भगवान शिव को प्रसन्न कर जीवन में सुख-समृद्धि, लक्ष्मी प्राप्त करने का स्वर्णिम अवसर है। भारतीय संस्कृति में अधिकांश व्रत-पूजन प्रातःकाल में ही किए जाते हैं, किन्तु भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए प्रदोष व्रत सायंकाल, गोधूलि बेला में करने का विधान है। व्रतोपवास की दृष्टि से भगवान शिव की आराधना में वारों में सोमवार और तिथियों में त्रयोदशी (प्रदोष) का विशेष महत्व माना जाता है।

“प्रदोष” का भगवान शिव के साथ अन्योन्याश्रित संबंध है। ’प्रदोषो रजनीमुखम‘ रात्रि के प्रारंभ की बेला प्रदोष नाम से संबोधित की जाती है, रात्रि शिव को विशेष प्रिय है। मुख्यतर प्रदोष का अर्थ है, रात्रि का प्रारंभ। प्रदोष काल में शिव तांडव स्तोत्र का पाठ अत्यन्त लाभदायक है। जो व्यक्ति प्रदोष काल में शिव जी की पूजा के समय रावण द्वारा रचित शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करता है, उनको भगवान शंकर जी अचल सम्पति प्रदान करते हैं। शिव तांडव स्तोत्र का अंतिम सत्रहवां श्लोक इस बात की पुष्टि करता है,

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनमिदं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः।।

 धर्मशास्त्रानुसार प्रदोष अथवा त्रयोदशी का व्रत मनुष्य को संतोषी एवं सुखी बनाता है। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से सुहागन स्त्रियों का सुहाग अटल रहता है। जो स्त्री-पुरुष जिस कामना को लेकर इस व्रत को करते हैं, उनकी सभी कामनाऐं कैलाशपति शंकर पूरी करते हैं। सूत जी के कथानुसार त्रयोदशी का व्रत करने वाले को सौ गाय-दान करने का फल प्राप्त होता है। इस व्रत को जो विधि-विधान और तन-मन-धन से करता है, उसके सभी दुःख दूर हो जाते हैं।

प्रदोषकाल में पूजा करके रावण कृत शिव ताण्डव स्तोत्र,
जो पढ़ता है भाव भक्ति से, वह होता विजयी सर्वत्र।।
शिव शंकर शुभ लक्ष्मी देते सुख सम्पत्ति, धन अपरम्पार।
महिमा शिव की बड़ी निराली, नहीं किसी ने पाया पार।।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *