10 जुलाई 26 आषाढ़ माह ;कृष्ण पक्ष दशमी तिथि, 8:58AM & आरती के दौरान बजने वाली घंटी, शंख और ताली की संयुक्त ध्वनि वातावरण को सात्विक बनाती है & गोल और लंबी बाती, पूजा में कब क्या प्रयोग ?

10 जुलाई 2026, शुक्रवार आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि सुबह 08:58 तक है, उसके बाद एकादशी तिथि (योगिनी एकादशी) शुरू होगी। & 10 जुलाई को आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि है। इस तिथि पर भरणी नक्षत्र और धृति योग का विशेष संयोग बनेगा। इस तिथि पर चंद्रमा का गोचर मेष राशि में होगा, जिसके स्वामी मंगल होते हैं।  सूर्योदय 5:15 AM पर तथा सूर्यास्त 6:53 PM पर होगा। अभिजीत मुहूर्त 11:37 AM से 12:31 PM तक रहेगा।.

आरती के दौरान बजने वाली घंटी, शंख और ताली की संयुक्त ध्वनि वातावरण को सात्विक बनाती है & गोल और लंबी बाती, पूजा में कब क्या प्रयोग 

10 जुलाई 2026  शुक्रवार का दिन है और पंचांग के अनुसार कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि रहेगी। साथ ही आज योगिनी एकादशी और मासिक कार्तिगाई का भी विशेष संयोग &  कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि सुबह 8:17 AM तक रहेगी। इसके बाद एकादशी तिथि प्रारंभ होगी। दशमी तिथि को अधूरे कार्यों को पूरा करने, धार्मिक तैयारी करने तथा संयमपूर्वक दिनचर्या अपनाने के लिए उपयुक्त माना जाता है। आज शुक्रवार है, जो माता लक्ष्मी और देवी संतोषी की उपासना के लिए विशेष माना जाता है। धन, सुख-समृद्धि, पारिवारिक सौहार्द और सौभाग्य की कामना से जुड़े धार्मिक कार्य इस दिन किए जाते हैं।

 पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास तथा अमांत पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास प्रभावी है। दोनों परंपराओं के अनुसार धार्मिक तिथियों की गणना की जाती है। आज विक्रम संवत 2083 (सिद्धार्थ) और शक संवत 1948 (प्रभाउ) चल रहे हैं। भारतीय पंचांग की कालगणना में इन संवतों का विशेष स्थान है और व्रत, पर्व एवं धार्मिक अनुष्ठानों में इनका उपयोग किया जाता है। ग्रीष्म ऋतु विद्यमान है। मौसम में गर्मी के साथ वर्षा ऋतु की शुरुआत के संकेत भी धीरे-धीरे दिखाई देने लगते हैं।

आज भी उत्तरायण काल प्रभावी है। धार्मिक दृष्टि से उत्तरायण को शुभ कर्म, पूजा-पाठ और आध्यात्मिक उन्नति का अनुकूल समय माना जाता है।

सावन का पवित्र महीना 30 जुलाई से शुरू होने वाला है ,जिसमें कई ग्रहों के संयोग के कारण योग का निर्माण हुआ है। ऐसे में सावन का महीना कुछ राशि वालों के लिए बहुत ही खास और पवित्र माना जाएगा।

 भारतीय सनातन परंपरा में ताली बजाना केवल उत्साह व्यक्त करने का माध्यम नहीं होता है। इसे आरती, भजन और कीर्तन के दौरान ईश्वर के प्रति आनंद, श्रद्धा और पूर्ण सहभागिता का प्रतीक माना गया है। जब भक्त ताली बजाते हुए भगवान का गुणगान करते हैं, तब उनका मन, वाणी और शरीर एक साथ उपासना में लग जाते हैं। इसीलिए सामूहिक भजन से लेकर आरती तक में ताली बजाने का विशेष महत्व होता है।

भगवान शिव को ध्यान, मौन और समाधि का देवता माना गया है। साथ ही, वो नटराज के रूप में सृष्टि की दिव्य लय और नाद के भी अधिष्ठाता हैं। ऐसे में भोलेनाथ की आराधना में ध्वनि का अपना अलग स्थान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आरती के दौरान बजने वाली घंटी, शंख और ताली की संयुक्त ध्वनि वातावरण को सात्विक बनाती है। साथ ही, यह भक्त के मन को एकाग्र करने में भी सहायक मानी गई है। शिवलिंग के सामने ताली बजाना का उद्देशय भगवान को जगाना नहीं है, बल्कि अपने भीतर सोई हुई भक्ति, जागरूकता और सकारात्मक चेतना को जगाना है।

लोकपरंपराओं में तीन तालियों का प्रतीकात्मक उल्लेख मिलता है। अगर किसी मंदिर या परंपरा में शांत भाव के साथ ध्यान किया जाता है, तो वहां उसी मर्यादा का पालन करना उचित माना गया है। तीन ताली का अर्थ पहली ताली : मन के अहंकार, क्रोध और नकारात्मक विचारों को भगवान के चरणों में समर्पित करने का भाव। दूसरी ताली : भगवान शिव के प्रति पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और आत्मसमर्पण का प्रतीक। तीसरी ताली : अपने परिवार, समाज और समस्त सृष्टि के सुख, शांति और कल्याण की मंगलकामना।

अगर आप इससे कम या अधिक ताली भी बजाते हैं, तो भी पूजा की फल प्राप्ति संख्या नहीं, बल्कि श्रद्धा और भावना से जुड़ी मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग के सामने ताली बजाने से पूजा और आरती में मन अधिक एकाग्र होता है। भक्ति, उत्साह और सकारात्मक भाव का संचार होता है। आसपास सात्त्विक वातावरण बनने में सहायता मिलती है। भक्त का ध्यान भगवान शिव पर अधिक केंद्रित होता है।

गोल और लंबी बाती, पूजा में कब क्या प्रयोग 

 पूजा में लंबी और गोल बाती प्रयोग करने का अलग-अलग महत्व होता है। मान्यता है कि इन्हें सही प्रकार इस्तेमाल करने से घर में सुख-समृद्धि आकर्षित होती है। साथ ही, माता लक्ष्मी का वास बना रहता है। ऐसे में आइए विस्तार से जानें की गोल और लंबी बाती को किन-किन भगवानों की पूजा में प्रयोग करना चाहिए, इनका क्या महत्व है और पूजा के जरूरी नियम।

दीपक के लिए बाजार दो प्रकार की बाती मिलती है एक गोल और एक लंबी।  बाती का आकार बताता है कि पूजा में जातक को कैसा फल प्राप्त होता है। घर की पूजा में गोल और लंबी बाती दोनों का ही अलग-अलग महत्व बताया गया है। साथ ही, बाती को सही दिशा में जलाना भी बहुत आवश्यक होता है। ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि आकर्षित होती है और परिवार का माहौल खुशनुमा बना रहता है। गोली और लंबी बाती के दीपक को किन भगवानों की पूजा में प्रयोग करना चाहिए,

मान्यता है कि लंबी बाती के दीपक का इस्तेमाल माता लक्ष्मी, देवी दुर्गा, सरस्वती मां और अन्य सभी देवियों की पूजा में करना चाहिए। ऐसा करने से देवी की कृपा परिवार के सदस्यों पर बनी रहती है। इसके अलावा, पितरों की पूजा में भी लंबी बाती को प्रयोग करने का महत्व बताया जाता है। यह घर के माहौल को सकारात्मक बनाए रखती है।

गोल बाती को फूल बाती के नाम से भी जाना जाता है।  ये बाती मानसिक शांति और स्थिरता को आकर्षित करती है। इसे प्रयोग करते समय एक बात ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि इसका मुख ऊपर की ओर यानी आकाश की तरफ हो। ताकि दिव्य ऊर्जा प्रवेश कर सके और आसपास का माहौल सकारात्मक बना रहे। साथ ही, इससे नकारात्मकता भी दूर होती है।

गोल बाती वाले दीपक का प्रयोग भगवान विष्णु, शिवजी, हनुमानजी, भगवान कृष्ण और अन्य देवताओं की पूजा में करना चाहिए। मान्यता है कि देवताओं की पूजा में गोल बाती के दीपक का प्रयोग करना उत्तम होता है। इसे लेकर कहा जाता है कि यह बाती आत्मा की शुद्धि और ज्ञान का प्रतीक होती है।

  • पूजा करते समय शुद्ध घी का प्रयोग करते हैं, तो ऐसे में गोल बाती का दीपक प्रयोग करना चाहिए।
  • तिल या सरसों के तेल का इस्तेमाल पूजा में करते हैं, लंबी बाती का दीपक जलाना उत्तम माना जाता है।
  • मान्यता है कि कभी भी पितरों की पूजा या दीपदान में गोल बाती का प्रयोग नहीं करना चाहिए। वास्तु अनुसार, इससे घर में वास्तु दोष उत्पन्न हो सकता है और तरक्की में बाधा का सामना करना पड़ सकता है

FOR YR CONTRIBUTION;

HIMALAYAUK NEWS BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI 9412932030

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