17 जुलाई 2026  विनायक चतुर्थी & आषाढ़ (गुप्त) नवरात्रि का 3 और चौथा दिन ;देवी भुवनेश्वरी और त्रिपुर भैरवी ;गुप्त नवरात्रि में अपार आध्यात्मिक शक्ति और रहस्यमय ऊर्जा समाहित

17 जुलाई  & 17 जुलाई 2026 (शुक्रवार) को आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि है。 इस दिन मघा नक्षत्र, व्यतीपात योग और चंद्रमा का संचार मुख्य रूप से रहेगा。 राहुकाल का समय सुबह 10:44 से दोपहर 12:27 तक रहेगा。इस दिन विनायक चतुर्थी होने के कारण भगवान गणेश की पूजा के लिए दोपहर का समय सबसे उत्तम माना जाता है:  सूर्योदय 5:19 AM पर तथा सूर्यास्त 6:51 PM पर होगा। 17 जुलाई को विशेष रूप से देवी भुवनेश्वरी और त्रिपुर भैरवी की साधना की जाती है।

आषाढ़ नवरात्रि एक महत्वपूर्ण और शक्तिशाली अवधि है जो शक्ति देवताओं की पूजा के लिए जानी जाती है, जिसके परिणामस्वरूप हमारे जीवन में जबरदस्त प्रगति, आध्यात्मिक और आर्थिक सफलता प्राप्त हो सकती है। आषाढ़ गुप्त नवरात्रि नौ दिनों का एक पवित्र त्योहार है जो आषाढ़ महीने (जून-जुलाई) में  शुक्ल पक्ष (चंद्रमा के घटते चरण) के दौरान मनाया जाता है। गुप्त नवरात्रि इसे  गुप्त रूप से या एकांत में मनाया जाता है , मुख्य रूप से  तांत्रिक साधकों, आध्यात्मिक खोजकर्ताओं और देवी माँ के भक्तों द्वारा ।  इस अवधि के दौरान ऊर्जाएँ आंतरिक परिवर्तन, आध्यात्मिक जागृति और दिव्य मिलन के लिए अनुकूल होती हैं।

अभिजित मुहूर्त (सामान्य शुभ कार्य): दोपहर 11:59 से 12:54 तक। विनायक चतुर्थी गणेश पूजा मुहूर्त: सुबह 11:03 से दोपहर 01:46 तक (इस बीच पूजा करना अत्यंत फलदायी है)। ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:12 से 04:53 तक।

विनायक चतुर्थी का व्रत रखने वाले जातकों को आज चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए & 17 जुलाई 2026 का पंचांग दिन की धार्मिक, ज्योतिषीय और समय संबंधी महत्वपूर्ण जानकारियों का संपूर्ण विवरण प्रस्तुत करता है। आज शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि है और विनायक चतुर्थी का पर्व भी मनाया जाएगा। साथ ही सूर्य के कर्क राशि में प्रवेश के बाद अब दक्षिणायन और वर्षा ऋतु का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

 17 जुलाई 2026 (शुक्रवार) को आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि सुबह 6:28 बजे तक है। इसके बाद चतुर्थी तिथि लग जाएगी। विनायक चतुर्थी लगने के कारण इस दिन भगवान गणेश (अनिरुद्ध विनायक) और माता पार्वती की पूजा करना अत्यंत लाभकारी होगा। इस दिन सुबह 5:55 बजे सूर्योदय और शाम 7:11 बजे सूर्यास्त होगा। वहीं, सुबह 8:44 बजे चन्द्रोदय और रात 9:39 बजे चन्द्रास्त होगा।

पंचांग के अनुसार, 17 जुलाई 2026 को सूर्य पुनर्वसु नक्षत्र में गोचर करेगा, जबकि चंद्रमा शाम 6:34 बजे तक मघा नक्षत्र में संचार करेगा। वहीं, 17 जुलाई 2026 (शुक्रवार) को हर्षण योग प्रभावी नहीं रहेगा। इस दिन ‘व्यतीपात’ योग है। शुक्रवार को अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:06 बजे से लेकर 12:59 बजे तक रहेगा। यह दिन का सबसे शुभ समय माना जाता है।

मान्यता है कि इस दौरान बिना किसी राहुकाल या अन्य अशुभ समय की चिंता किए कोई भी महत्वपूर्ण कार्य, पूजा या व्यापार शुरू किया जा सकता है। वहीं, राहुकाल सुबह 10:44 से दोपहर 12:27 बजे कर रहेगा, गुलिक काल सुबह 7:00 बजे से 8:42 बजे तक रहेगा। यमगंड काल दोपहर 3:52 से 5:31 बजे तक रहेगा। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, इन समयों में नए कार्य शुरू करने से बचना चाहिए क्योंकि इनको अशुभ समय माना जाता है। वहीं, 17 जुलाई को सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करेंगे, जबकि चंद्रमा भी मुख्य रूप से सिंह राशि में स्थित रहेगा। 17 जुलाई 2026 (शुक्रवार) को पश्चिम दिशा में दिशाशूल रहेगा। ज्योतिष और वास्तु के मुताबिक, इस दिशा में यात्रा करने से बचना चाहिए। यदि यात्रा करना अनिवार्य हो, तो कुछ विशेष ज्योतिषीय उपायों को अपनाकर प्रस्थान किया जा सकता है।

शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि सुबह 6:29 AM तक रहेगी। इसके पश्चात अगली तिथि आरंभ होगी। तृतीया को परंपरागत रूप से रचनात्मक कार्यों, नए प्रयासों और पारिवारिक गतिविधियों के लिए शुभ माना जाता है। 

 शुक्रवार है, जो माता लक्ष्मी और शुक्र ग्रह से संबंधित माना जाता है। यह दिन सौंदर्य, कला, सुख-सुविधाओं, आर्थिक मामलों तथा पारिवारिक सामंजस्य से जुड़े कार्यों के लिए विशेष महत्व रखता है। आवश्यक खरीदारी, सामाजिक मेल-जोल और सौम्य व्यवहार की दृष्टि से भी यह दिन अच्छा माना जाता है।

आज अमांत और पूर्णिमांत दोनों परंपराओं के अनुसार आषाढ़ मास चल रहा है। यह महीना धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और अनेक महत्वपूर्ण पर्वों के कारण विशेष स्थान रखता है।

आज विक्रम संवत 2083 (सिद्धार्थ) तथा शक संवत 1948 (प्रभाउ) प्रभावी हैं। भारतीय पंचांग की परंपरा में इन संवतों का उपयोग तिथि, पर्व और धार्मिक आयोजनों के निर्धारण में किया जाता है। वर्षा ऋतु का प्रभाव प्रमुख रूप से अनुभव किया जाता है। मौसम में नमी बढ़ने के साथ प्रकृति भी नए स्वरूप में दिखाई देने लगती है। इस समय स्वास्थ्य और दिनचर्या में संतुलन बनाए रखना भी लाभकारी माना जाता है।

अयन की दृष्टि से अब दक्षिणायन प्रारंभ हो चुका है। भारतीय परंपरा में यह काल आध्यात्मिक साधना, संयम और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

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