संयुक्त राष्ट्र ने चेताया ;हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे, हिमालयी ग्लेशियर बाढ़ कुछ घंटों में तबाही ला सकती है, खतरा शुरू हो चुका है

संयुक्त राष्ट्र ने चेताया है कि मुंबई और कोलकाता समेत दक्षिण एशिया में 1.4 करोड़ से अधिक लोग स्थायी जलभराव के चलते घर खोने के तत्काल जोखिम में हैं. जलवायु संकट अब सीधे घर, पानी, बिजली, खेती और जिंदगी पर दस्तक दे रहा है. मुंबई भारत के सबसे बड़े तटीय महानगरों में से एक है और समुद्र के बेहद करीब बसा हुआ है. वहीं कोलकाता गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना डेल्टा क्षेत्र के संवेदनशील हिस्से में आता है. संयुक्त राष्ट्र समुद्र के बढ़ते स्तर को पर्यावरण का मुद्दा ही नहीं, बल्कि मानवाधिकार, अर्थव्यवस्था और विकास का संकट मान रहा है. हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट और बिजली नेटवर्क को भी भविष्य की बाढ़ को ध्यान में रखकर ज्यादा मजबूत बनाना होगा. हिमालयी क्षेत्रों को तय करना होगा कि खतरनाक ग्लेशियर झीलों की निगरानी कैसे होगी, चेतावनी कितनी जल्दी लोगों तक पहुंचेगी और नदी किनारे बसे लोगों को सुरक्षित कैसे किया जाएगा.

हिमालय में खतरा कई बार कुछ घंटों में पूरी घाटी की तस्वीर बदल सकता है. हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. इससे ग्लेशियरों से जुड़ी झीलों में पानी जमा हो सकता है और प्राकृतिक बर्फ या मलबे से बांध पर दबाव बढ़ सकता है. यह खतरा इसलिए भी बड़ा है क्योंकि हिमालय से निकलने वाली नदियों पर पीने के पानी के साथ ही खेती, बिजली और रोजगार से जुड़े करोड़ों लोगों आश्रित हैं. समुद्र का बढ़ता स्तर धीरे-धीरे सामने आता है. हिमालयी ग्लेशियर बाढ़ कुछ घंटों में तबाही ला सकती है. हिमालय से मुंबई, कोलकाता और पूरे दक्षिण एशिया में संदेश स्पष्ट है कि खतरा आने वाला नहीं है, खतरा शुरू हो चुका है

समुद्र का स्तर बढ़ने पर इन इलाकों में तटीय बाढ़ का खतरा बढ़ता है. साथ ही कई तटीय इलाकों में जमीन भी धीरे-धीरे नीचे बैठ रही है. यानी इन इलाकों में जमीन धंस रही है. एक तरफ समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ जमीन धंस रही है. ऐसे में बाढ़ का खतरा और बड़ा हो रहा है.

संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि भारत के समुद्र तटीय महानगरों मुंबई और कोलकाता के साथ ढाका और दक्षिण एशिया के निचले डेल्टा क्षेत्रों में 1.4 करोड़ से ज्यादा लोग स्थायी जलभराव के कारण अपने घर खोने के तत्काल जोखिम में हैं. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर यह जिक्र किया गया है कि इसका असर आज दिखाई देने लगा है और आने वाले दशकों में यह जलभराव तेजी से बढ़ सकता है. सबसे बड़ी चिंता दक्षिण एशिया के उन शहरों और इलाकों को लेकर जताई गई है जहां बड़ी आबादी समुद्र के बेहद करीब और निचले इलाकों में रहती है.

दरअसल, एक तरफ दुनिया के महासागर गर्म हो रहे हैं और समुद्र का स्तर लगातार ऊपर जा रहा है. दूसरी तरफ हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, ग्लेशियर झीलों पर दबाव बढ़ रहा है और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा गंभीर होता जा रहा है. समुद्र का खारा पानी जब जमीन के अंदर मौजूद मीठे पानी के स्रोतों तक पहुंचेगा तब भूजल में नमक की मात्रा बढ़ जाएगी. इसे सैनिलाइजेशन या लवणीकरण या आसान शब्दों में खारेपन का बढ़ना कहा जाता है.

इसका सीधा असर पीने के पानी पर पड़ेगा. तो अगर तटीय इलाकों के कुओं और जमीन के अंदर मौजूद पानी में समुद्री पानी घुसता है तो लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना मुश्किल हो सकता है. इसका असर खेती पर भी पड़ेगा. मिट्टी में नमक बढ़ने से कृषि उत्पादकता घट सकती है. सिंचाई प्रभावित हो सकती है और भूजल पर निर्भर पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंच सकता है. यानी समुद्र का बढ़ता स्तर एक साथ पानी, खेती और भोजन की सुरक्षा सभी को प्रभावित कर सकता है.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक समुद्र का बढ़ता स्तर सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर चुनौती पैदा कर सकता है. तटीय स्वास्थ्य और सैनिटेशन इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचने से जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. बाढ़ के कारण चोट और मौत का जोखिम बढ़ सकता है. सीवेज सिस्टम प्रभावित होने से स्वच्छता की समस्या पैदा हो सकती है. इसके अलावा बार-बार घर, जमीन और रोजगार खोने का डर लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है.

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