21 अक्टूबर 1943 भारत की अस्थायी सरकार का गठन , बोस का अखंड भारत का स्वप्न

– प्रो. (डाॅ.) सुभाष चंद्र थलेडी

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनेक महापुरुषों के त्याग, बलिदान और दृढ़ संकल्प की गाथा है। इनमें एक ऐसा नाम है जो आज भी करोड़ों भारतीयों के हृदय में साहस, संगठन क्षमता और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक बनकर जीवित है – नेताजी सुभाष चंद्र बोस। 21 अक्टूबर 1943 का दिन स्वतंत्रता संग्राम की ऐतिहासिक तिथि है जब विदेश में भारत की अस्थायी सरकार आरजी हुकूमत-ए-आज़ाद हिंद का गठन हुआ। सिंगापुर से नेताजी ने घोषणा की थी कि भारत अब स्वतंत्र है। यह केवल भाषण नहीं था, बल्कि दासता के विरुद्ध स्वतंत्रता का उद्घोष और अखंड भारत के निर्माण का संकल्प था।

सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक में हुआ। उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा जैसी प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में पूर्ण समर्पण दिया। गांधीजी के अहिंसात्मक मार्ग से भिन्न, बोस का विश्वास था कि स्वतंत्रता केवल मांगी नहीं जाती, बल्कि अर्जित करनी पड़ती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता का मार्ग सशस्त्र संघर्ष से ही संभव है। 1921 में उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी छोड़ दी और 1930 के दशक में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अग्रगामी नेता बनकर उभरे। 1938 में हरिपुरा अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए और 1939 में पुनः निर्वाचित हुए, परंतु गांधीजी के विचारों से मतभेद के कारण अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

बोस का दृष्टिकोण स्पष्ट था कि भारतीय स्वतंत्रता केवल सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने युवाओं में यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान करना पवित्र कर्तव्य है। उनकी सोच ने युवा वर्ग को विशेष रूप से प्रभावित किया और उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लेने के लिए प्रेरित किया।

1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने ब्रिटिश सेना के कई भारतीय सैनिकों को बंदी बना लिया। इन सैनिकों ने रास बिहारी बोस के नेतृत्व में इंडियन नेशनल आर्मी का गठन किया। बाद में रास बिहारी बोस ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को संगठन की कमान सौंप दी। नेताजी ने इसे नया रूप और उत्साह दिया और इसका नाम आज़ाद हिंद फौज रखा। उन्होंने युवाओं को दिल्ली की ओर बढ़ने का प्रेरक नारा दिया।

21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में बोस ने औपचारिक रूप से भारत की अस्थायी सरकार आरजी हुकूमत-ए-आज़ाद हिंद की स्थापना की। उन्होंने स्वयं प्रधानमंत्री, युद्ध मंत्री और विदेश मंत्री का पद संभाला। कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन को महिला संगठन मंत्री, एस. ए. अय्यर को प्रचार और प्रसारण मंत्री और ले. कर्नल ए. सी. चटर्जी को वित्त मंत्री बनाया। इसके अलावा 16 सदस्यीय मंत्रिमंडल का गठन किया गया। सरकार ने अपने झंडे, डाक टिकट, मुद्रा और बैंक तक की व्यवस्था की। जापान ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह इस सरकार को सौंपे, जिन्हें नेताजी ने क्रमशः शहीद और स्वराज द्वीप नाम दिए।

आज़ाद हिंद सरकार को लगभग 11 देशों ने मान्यता दी, जिनमें जापान, जर्मनी, इटली, क्रोएशिया, थाईलैंड, फिलीपींस, बर्मा, मंचूरिया, कोरिया, आयरलैंड और चीन शामिल थे। यह किसी उपनिवेश से स्वतंत्र होने वाली निर्वासित सरकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने का अद्वितीय उदाहरण था। इस मान्यता ने भारत की स्वतंत्रता की मांग को वैश्विक वैधता प्रदान की।

नेताजी ने भारतीय युवाओं को प्रेरित करते हुए अपने सैनिकों को दिल्ली की ओर बढ़ने का आदेश दिया। मार्च 1944 में आज़ाद हिंद फौज बर्मा के अराकान क्षेत्र से आगे बढ़ी और कोहिमा तथा इम्फाल तक पहुँची। कई भारतीयों ने इन्हें खुले दिल से सहयोग दिया। हालांकि जापान की हार और आपूर्ति की कमी के कारण अभियान आगे नहीं बढ़ सका। लेकिन आईएनए ने भारतीय सैनिकों और जनता में विद्रोह की ज्वाला जलाई और ब्रिटिश शासन के प्रति मनोबल कमजोर किया।

नेताजी की दृष्टि में भारत केवल ब्रिटिश भारत तक सीमित नहीं था। उनके अनुसार भारत में बर्मा, श्रीलंका, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और नेपाल की सांस्कृतिक एकता भी शामिल थी। उनका उद्देश्य केवल ब्रिटिश शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली, आत्मनिर्भर और एकजुट भारत का निर्माण था।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लंबे समय तक उपेक्षित किया गया। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार ने उनके योगदान को सम्मान देने के कई कदम उठाए। रॉस द्वीप का नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप रखा गया। नेताजी के नाम पर नई मूर्तियां और संग्रहालय बनाए गए। उनके जन्मदिन 23 जनवरी को पराक्रम दिवस घोषित किया गया और पराक्रम सप्ताह मनाने की परंपरा शुरू की गई। 21 अक्टूबर 2018 को लाल किले पर झंडा फहराकर आज़ाद हिंद सरकार की 75वीं वर्षगांठ राष्ट्रीय स्तर पर मनाई गई।

इन पहलों ने नेताजी की ऐतिहासिक भूमिका को पुनर्स्थापित किया और नई पीढ़ी को उनकी वीरता, राष्ट्रभक्ति और दूरदर्शिता से जोड़ने का अवसर प्रदान किया। 21 अक्टूबर केवल इतिहास की तिथि नहीं है, बल्कि भारतीय आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का प्रतीक भी है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आत्मबल, आत्मसम्मान और आत्मनिर्णय का नाम है।

नेताजी ने उस अखंड भारत की कल्पना की थी जो जाति, धर्म, भाषा या प्रांत से ऊपर उठकर एकता पर आधारित हो। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि स्वराज्य केवल अधिकार नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। 21 अक्टूबर 1943 की घोषणा ने यह दिखाया कि भारत केवल स्वतंत्रता का सपना देखने वाला देश नहीं, बल्कि इसे प्राप्त करने और संरक्षित करने की क्षमता रखने वाला राष्ट्र है।

नेताजी की आज़ाद हिंद सरकार ने 1943 में उस स्वप्न को आकार दिया जो 1947 में साकार हुआ। उनका योगदान भारत की आज़ादी और राष्ट्रवाद में अमिट छाप छोड़ गया। आज जब भारत आत्मनिर्भरता और एकजुटता की ओर बढ़ रहा है, तो नेताजी के शब्द और कर्म और भी सार्थक प्रतीत होते हैं। स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं, बल्कि अर्जित किया जाने वाला अधिकार है और नेताजी ने इसे बलिदान और साहस से सिद्ध किया।

(लेखक मीडिया स्टडीज के प्रोफेसर और रेडियो-टीवी के वरिष्ठ प्रसारक हैं)

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