सूरज नयाल ने साल 2024 में अपने भाई के साथ मिलकर ‘रिवर्स माइग्रेशन’ की शुरुआत की. आपको जानकर ताज्जुब होगा कि पलायन की मार झेल रहे उनके गांव में अब केवल 17 परिवार ही रह गए हैं
भागदौड़ भरी जिंदगी में थकना लाजमी है. यही वजह है कि लोग शहरी जिंदगी से ऊब रहे हैं और गांवों या पहाड़ों की तरफ तेजी से रूख कर रहे हैं. आम लोगों में तो कई सारे लोग आपको दिख जाएंगे. मगर कुछ ऐसे खिलाड़ी भी हैं जो करियर खत्म होने के बाद पहाड़ों की तरफ जा रहे हैं. इन्हीं खिलाड़ियों में एक नाम सूरज नयाल का भी है. दिल्ली में पले-बढ़े सूरज ने करीब 18 से 19 साल तक क्रिकेट के मैदान में जलवा बिखेरा. मगर जब उनका खेल धीरे-धीरे नीचे जाने लगा तो वह राजधानी की चकाचौंध को छोड़ वापस उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित अपने मैगड़ी गांव में लौट गए और अब वहीं पर ज्यादातर समय गुजार रहे हैं.
सूरज नयाल ने साल 2024 में अपने भाई के साथ मिलकर ‘रिवर्स माइग्रेशन’ की शुरुआत की. आपको जानकर ताज्जुब होगा कि पलायन की मार झेल रहे उनके गांव में अब केवल 17 परिवार ही रह गए हैं. यहीं नहीं उनके गांव में मूलभूत सुविधाओं का काफी आभाव है. शायद एक वजह यह भी है कि लोग गांव को छोड़कर तेजी से शहर की तरफ रूख कर रहे हैं.
दोनों भाइयों ने बंजर भूमि को बनाया उपजाऊ
सूरज और उनके भाई ने गांव में जाकर पहले बंजर भूमि पर जीतोड़ मेहनत किया. जिसका परिणाम यह रहा कि वहीं भूमि अब उपजाऊ बन गई है. मगर इसके लिए उन्होंने एक, दो नहीं बल्कि कुल पांच से छह महीने का अथक प्रयास किया. तब जाकर वह भूमि कृषि के लायक बन पाई.
सूरज और उनके भाई ने उद्यान विभाग की ‘कीवी मिशन’ योजना के तहत आठ नाली भूमि में पहले 50 कीवी के पौधे लगाए. उसके बाद ‘एप्पल मिशन’ के अंतर्गत 10 नाली भूमि में 500 सेबों के पौधे लगाए.