भगवत् गीता के आठवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से आध्यात्म के संबंध मे बताते हुए कहते हैं:”परमं स्वभावोऽध्यात्ममुचते” स्वयं के स्वभाव का अध्ययन ही अध्यात्म होता है।

हमारी आत्मा ही हमारा सत्य है, वही हमारे होने का प्रमाण है। हर व्यक्ति के शरीर में आत्मा का वास है जिसका नाश करना, जिसे समाप्त करना पूरी तरह असंभव है। मृत्यु केवल आपके शरीर का अंत है, आपकी आत्मा तो हमेशा जीवित है। इसलिए मृत्यु को अंत कहना केवल एक भ्रामक तथ्य है।

आध्यात्मिक जीवन का अर्थ है, जीवन को एक उच्च उद्देश्य के साथ जीना, जिसमें अपने भीतर की चेतना और परमात्मा के साथ संबंध स्थापित करना शामिल है। यह जीवनशैली धार्मिक मान्यताओं से परे है और इसमें आत्म-जागरूकता, प्रेम, शांति और आनंद की खोज शामिल है। आध्यात्मिक जीवन जीने का अर्थ है, अपने कर्मों के प्रति जागरूक रहना, दूसरों की सेवा करना, और अपने जीवन को एक उच्च उद्देश्य के लिए समर्पित करना।

आध्यात्मिक होना कुछ अलग होना नहीं होता है। हम सभी परमात्मा से जुड़े हुए हैं। आवश्यक इतना ही है कि इस भागती दौड़ती जीवन यात्रा में अपने आप को खोजलें!
आध्यत्मिक जीवन करना सभी मानव का कर्तव्य है। आध्यात्मिक का मतलब यह नही होता की संसार को त्याग करके सन्यासी बनना। आप संसार में रहते ही जनक महाराज की तरह मुक्ति पा सकते हो। आध्यत्मिक एक मानसिक स्थिति है जिसमे सबसे पहला होता है कि सत्य को स्वीकार करना। लगता है ये छोटीसी बात है। करने मे असल बात है। आप आध्यात्मिक बनना चाहते तो पहला सत्य को स्वीकार करना है और उसको ढूंढना है। आप प्रश्न लेना है और अपने आप जवाब की तलाश भी। यह शास्त्रों से सहमत है। वेदों में भगवान को और सत्य को पाने के लिए एक मंत्र साबित किया गए है। यह है “नेति नेति”।
इसका भाव यह है कि यह नही ये नही। इसका मतलब होता है कि खुद ढूंढना। और एक और बात है कि किसीभी परिस्थिति में आप अपने आप को धोखा मत देना। अगर आप पाप क्रिया करे तो ठीक है पर आप इस क्रिया को मनस मे समर्थ न करे। पाप कार्य को संचित कर्म होता है। वो अलग बात है। पर अगर आप अपने आप से निष्कपट होना है। यह है पहला कदम अधयातम होने केलिए

और सब प्राणियों से आत्मा को दर्शन करना। दर्शन का मतलब यह नही होता कि आप भूत को देखना चाहिए। इसका अर्थ है कि सभी जीवों को भाव होता है यह मानना। अगर आप यह मानते तो आप दयामूर्ति बन जाता है। आप किसी भी प्रकार में निष्कारण हिंसा नही करते है। हिंसा तो होता है कुछ चीजों में। पर निष्कारण हिंसा बहुत पाप है।
अध्यात्मिकता एक ऐसी विधा है जिसमें व्यक्ति अपने आप को साध लेता है।आध्यात्मिक व्यक्ति के द्वारा जीवन में कोई गलत कदम नहीं उठाया जाते। वह लोगों को प्यार करता है दूसरों को दुखी देखकर उनकी सहायता के लिए तत्पर होता है।आध्यात्मिक व्यक्ति ईश्वर से प्रेम करता है वह ईश्वर के बनाए हुए विधान के अनुसार वह अपने जीवन के समस्त क्रियाकलापों को करता है। अपने जीवन के समस्त कार्य संपूर्ण समर्पण के साथ करता है। आध्यात्मिक उन्नति जीवन की उन्नति है। मानव जीवन के लिए आध्यात्मिक होना। जीवन में समस्त दुखों का निवारण हो जाता है आध्यात्मिक व्यक्ति अपने आप में मस्त रहता है वह समस्त दुनिया को इस तरीके से देखता है कि जैसे कि वह स्वयं हो।

आध्यात्मिकता का किसी धर्म, संप्रदाय या मत से कोई संबंध नहीं है। आप अपने अंदर से कैसे हैं, आध्यात्मिकता इसके बारे में है। आध्यात्मिक होने का मतलब है, भौतिकता से परे जीवन का अनुभव कर पाना। अगर आप सृष्टि के सभी प्राणियों में भी उसी परम-सत्ता के अंश को देखते हैं, जो आपमें है, तो आप आध्यात्मिक हैं। अगर आपको बोध है कि आपके दुख, आपके क्रोध, आपके क्लेश के लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है, बल्कि आप खुद इनके निर्माता हैं, तो आप आध्यात्मिक मार्ग पर हैं। आप जो भी कार्य करते हैं, अगर उसमें सभी की भलाई निहित है, तो आप आध्यात्मिक हैं। अगर आप अपने अहंकार, क्रोध, नाराजगी, लालच, ईष्र्या और पूर्वाग्रहों को गला चुके हैं, तो आप आध्यात्मिक हैं। बाहरी परिस्थितियां चाहे जैसी हों, उनके बावजूद भी अगर आप अपने अंदर से हमेशा प्रसन्न और आनंद में रहते हैं, तो आप आध्यात्मिक हैं। अगर आपको इस सृष्टि की विशालता के सामने खुद की स्थिति का एहसास बना रहता है तो आप आध्यात्मिक हैं। आपके अंदर अगर सृष्टि के सभी प्राणियों के लिए करुणा फूट रही है, तो आप आध्यात्मिक हैं।

आध्यात्मिक होने का अर्थ है कि आप अपने अनुभव के धरातल पर जानते हैं कि मैं स्वयं ही अपने आनंद का स्रोत हूं। आध्यात्मिकता मंदिर, मस्जिद या चर्च में नहीं, बल्कि आपके अंदर ही घटित हो सकती है। यह अपने अंदर तलाशने के बारे में है। यह तो खुद के रूपांतरण के लिए है। यह उनके लिए है, जो जीवन के हर आयाम को पूरी जीवंतता के साथ जीना चाहते हैं। अस्तित्व में एकात्मकता व एकरूपता है और हर इंसान अपने आप में अनूठा है। इसे पहचानना और इसका आनंद लेना आध्यात्मिकता का सार है । अगर आप किसी भी काम में पूरी तन्मयता से डूब जाते हैं, तो आध्यात्मिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है, चाहे वह काम झाड़ू लगाना ही क्यों न हो। किसी भी चीज को गहराई तक जानना आध्यात्मिकता है।
आज के समय में आध्यात्म और विज्ञान को अलग अलग करके देखा जाता है | लेकिन आध्यात्म और विज्ञान एक ही है | आध्यात्म वो विज्ञान है जिसमे ईश्वर के अस्तिव्त को जोड़ दिया जाता है जिसका आधार यह है की यह जीवन बिना ईश्वर के अधुरा है | जीवन के परम आनंद को प्राप्त करने के लिए ईश्वर की आराधना अनिवार्य है | और मेरा यह मानना है की जब तक आज का विज्ञान आध्यात्म को स्वीकार नहीं करेगा तब तक आज का विज्ञान सदा अधुरा रहेगा और न कभी किसी भी समस्या का सही व् स्थिर समाधान निकाल पायेगा | उदाहरण – आयुर्वेद एक ऐसा विज्ञान है जिसमे व्यक्ति की बीमारी का इलाज संभव है साथ साथ जीवन भर दवा नही खानी पड़ती बल्कि allopathy में किसी भी समस्या की दवा जीवन भर चलती है और नुकसान भी करती है | , मन्त्र विज्ञान , योग विज्ञान , ज्योतिष, ध्यान विज्ञान, कर्म विज्ञान आदि यह सब आध्यात्म से ही जुड़े है |
भारत में यह नियम बहुत पहले था की जो भी व्यक्ति ज्ञानी बनना चाहता हो उसे सबसे पहले ध्यान व् योग शक्ति से खुद को आध्यात्मिक बनाना होगा , सत्य का ज्ञान हासिल करना होगा | तब वह वास्तव में ज्ञानी बन सकता है | इसका मुख्य कारण यह है की जब व्यक्ति लोभ व् माया से मुक्त होगा तो ऐसे विज्ञान की खोज करेगा जिसमे कम लागत हो , लोगो की हानि कम हो , धन भी खर्च हो , व्यक्ति सुकून में रह भी सके व् आध्यात्म के प्रति उसकी आस्था भी लगी रहे |
आप देख सकते है की आज जो allopathy विज्ञान है उसके लोगो के पैसे कितने अधिक खर्च होते है उसके साथ साथ दवा भी नुकसान करती है और जीवन भर खाना होता है इसका कारण यह है की यह विज्ञान की खोज लोभी लोगो ने की है जिसमे पैसे का मूल्य अधिक है इसलिए वह हर तरह से धन कमाने के लिए नई नयी दवा बनाते है और आज तक कैंसर और अन्य बीमारी की दवा नही निकाल सके क्यूंकि अगर दवा निकल गयी तो कमाई बंद हो जाएगी |
और ईश्वर ने भी इसका न्याय किया आज भारत से अधिक विकसित देश भी कोरोना जैसी महामारी से हार गये क्यूंकि लोभ और माया स्वयं को मार डालती है और भारत जैसा देख जो विकसित देशो की गिनती में पीछे है वह कोरोना से जीत रहा है और लोग स्वत: ही ठीक हो रहे है |
आध्यात्म सिखाता है लोभ और मोह से बाहर रहने वाला व्यक्ति ही परम आनंद को प्राप्त होता है |
चलिए समझने की कोशिश करते है की आखिर आध्यात्म विज्ञान श्रेस्ठ क्यों है !
लोभ और मोह से बाहर रहने वाला व्यक्ति परेशान नही रहता है उसका ध्यान सदा दुसरो की सेवा रक्षा, सहायता में लगा रहता है ऐसा व्यक्ति दुसरो के धन , परिश्रम, प्रेम का आदर करता है इसलिए सदा ऐसा मार्ग खोजने का प्रयास करता है जिससे लोगो का भला आसानी से हो सकते | लेकिन लोभ में फसा व्यक्ति सदा ही पहले यह देखता है की धन कैसे कमाया जाय | उसके जीवन हर आधार धन होता है इसलिए वह कोई भी विज्ञान धन प्राप्त करने हेतु बनाता है | जिसे श्रीमद्भागवत में सकाम कर्म योग कहते है |
आपको जान कर हैरानी होगी की भारत में विवाह की परंपरा ही भारत व् आध्यात्म के सफलता की सबसे बड़ी नीव है |
- जो विवाह करते है वह सदा दुसरो के दुःख को समझते है जीवन में संतोष करने का ज्ञान व्यक्ति को विवाह से ही प्राप्त होता है | सबके साथ खुश रहना सबका ध्यान रखने की चिंता व्यक्ति को समझौता करने की शक्ति भी इसी से प्राप्त होती है | परिस्थिति से लड़ने की शक्ति जब व्यक्ति के अंदर आती है तो उसका इम्यून अपने आप स्ट्रोंग हो जाता है जो व्यक्ति के अंदर किसी भी रोग से लड़ने की शक्ति पैदा करता है | लेकिन जो लोग लोभी व् मोहि होते है उनका इम्यून बिल्कुल स्ट्रोंग नही होता है क्यूंकि वो समझौता नही करते |
- रिश्ते निभाने के लिए व्यक्ति के अन्दर प्रेम व् दया होना आवश्यक है | और रिश्ते में नही निभाते है व् रिश्ते में धोखा देते है आप अगर उनका इम्यून देखेगे तो वो सदा बीमार व् मौसम से जल्दी प्रभावित होने वाले लोग होंगे | ऐसे लोग हमेशा आराम के लिए जीवन जीना पसंद करते है और स्वार्थी होते है | इनके जीवन का केंद्र कोई न कोई लोभ होता है जैसे पैसा , पद, मद, लोभ, भयंकर अपेक्षा, निर्दयी, कामी आदि |
- आध्यात्म हमे प्रेम, दया, ईर्ष्या से मुक्त रहना, मदद करने वाला, निष्कामी , सरल, निस्वार्थी, विवेक आदि होने का उपदेश देता है |
सदा ध्यान रहे लोभी व्यक्ति की इक्षा यह पृथ्वी भी पूरा नही कर सकती ऐसे लोग दुसरे ग्रह को प