बुरी आत्माओं का साया ; क्रूर ग्रहों की दृष्टि होती है -नकारात्मक शक्तियां उस पर हावी होने लगती है 46% अमेरिकी नागरिक यह मानते हैं कि वास्तव में भूत प्रेत होते हैं; Presents BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI Mob. 9412932030

आत्माएं कमजोर शरीर को तलाशती हैं धर्माचार्यों के अनुसार, जो व्यक्ति पवित्रता का पालन नहीं करता है या ईश्वर की उपासना नहीं करता है। हमेशा पाप कर्म करता है, उस पर भूत या बुरी आत्मा का साया आसानी से पड़ सकता है। जो लोग निशाचर प्रवृत्ति के होते हैं, उन पर भूतों का साया आसानी से पड़ सकता है। ज्योतिष शास्त्र में भी इस सन्दर्भ में बताया गया है कि जब राहु विशेष स्थिति में होता है। तब भी भूत पीड़ा से ग्रस्त होने का भय बना रहता है। जैसे राहु यदि लग्न भाव में या कुंडली के अष्टम भाव में होता है तो उस पर सभी अन्य क्रूर ग्रहों की दृष्टि होती है। जिसके कारण जातक पर भी इसका प्रभाव पड़ता है और नकारात्मक शक्तियां उस पर हावी होने लगती है। न केवल अध्यात्मिक देश भारत में बल्कि अमेरिका जैसे विकसित देश में भी बुरी आत्माओं और भूत-प्रेतों पर विश्वास किया जाता है। 2019 में हुए Ipsos Poll के अनुसार, 46% अमेरिकी नागरिक यह मानते हैं कि वास्तव में भूत प्रेत होते हैं। इसके साथ यहां कई ऐसे संगठन भी हैं जो इन रहस्यों पर छानबीन कर रहे हैं। वर्तमान समय में वैज्ञानिक ऐसा आधुनिक उपकरण नहीं बना पाए हैं, जिससे भूत या बुरी आत्माओं से संपर्क साधा जा सके। लेकिन इस पर छानबीन आज भी जारी है।
शास्त्रों में यह विदित है कि तीन प्रकार की आत्माएं होती है। एक जीवात्मा, दूसरा प्रेत आत्मा और अंतिम सूक्ष्मात्मा। जो हमारे शरीर में वास करती है वह जीवात्मा कहलाता है। लेकिन जब जीवात्मा में वासना या कामनाएं निवास करती है तो उसे प्रेतात्मा कहते हैं और जब यह आत्माएं सूक्ष्मतम शरीर में वास करती है तो उसे सूक्ष्मात्मा कहा जाता है। प्रश्न यह उठता है कि कौन बनते हैं भूत?
मेहंदीपुर बालाजी का मंदिर जो राजस्थान के दौसा जिले में मौजूद है। यहां पर बुरी आत्माएं या भूत-पिशाच से ग्रसित लोगों का इलाज किया जाता है। मान्यता है कि यहां पर चढ़ाए गए प्रसाद को घर नहीं ले जाना चाहिए। इससे भूत प्रेतों का साया साथ जाने का डर बना रहता है। भारत के दक्षिण में बेताला मंदिर है जो उड़ीसा के भुवनेश्वर में स्थित है। बेतला मंदिर में मां चामुंडा की मूर्ति विराजमान है और यहां तांत्रिक शक्तियों से भूत बाधाओं का उपचार किया जाता है। इस स्थान पर जब इस प्रक्रिया को किया जाता है, तब लोगों बहुत डर लगता है। इसके साथ पश्चिम बंगाल के कोलकाता में काली घाट मंदिर में भी भूत-पिशाच की बाधा से परेशान लोगों का इलाज किया जाता है। इस मंदिर में चल रही क्रियाओं को देखकर भी कई लोगों को डर लगता है और यहां वही लोग आते हैं, जिन पर भूत या प्रेत का साया रहता है।
शास्त्रों में इसका भी वर्णन मिलता है कि जो मनुष्य अपने जीवन में भूख, प्यास, रोग, क्रोध, वासना, इत्यादि की इच्छाओं के साथ मृत्यु को पाता है, उसे मृत्युलोक में भूत बनकर भटकना पड़ता है। इसके साथ ऐसा भी कहा गया है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु समय से पूर्व हुई हो अर्थात दुर्घटना में, हत्या के कारण या आत्महत्या के द्वारा तो उसकी आत्मा भी इस लोक भटकती रहती है। इसके साथ जिन आत्माओं का श्राद्ध कर्म, तर्पण इत्यादि नहीं किया जाता है। उनकी आत्मा भी मृत्युलोक में अपनी इच्छा पूर्ति के लिए भटकती रहती है।
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, जिन पितरों का श्राद्ध या तर्पण स्वजन द्वार नहीं किया जाता है। वह आत्मा अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए बुरी आत्मा का आवेश धारण कर परिवार के लोगों को या अन्य लोगों को परेशान करते हैं। इसीलिये हिंदू धर्म में श्राद्ध एवं तर्पण को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। पितृ पक्ष में या अमावस्या तिथि के दिन श्राद्ध अथवा तर्पण आदि कर्म का विशेष महत्व है। इसके साथ धर्माचार्य यह भी बताते हैं कि जिन लोगों को जानबूझकर तड़पाया या सताया जाता है, वह भी मृत्यु के बाद बुरी आत्मा के रूप में व्यक्ति को या उसके परिवारजनों को परेशान करते हैं।
योग और ज्योतिष, दोनों शास्त्र मिलकर मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक विकास की संपूर्ण प्रक्रिया को दर्शाते हैं। प्राचीन ऋषि-महर्षियों ने इस सम्बन्ध को आत्मसात कर साधना से सिद्धि प्राप्त करने की राह को आसान बनाया। सिद्धि प्राप्त करने के बाद भौतिक जीवन में ऐसी कोई कामना नहीं है, जिसकी पूर्ति न हो सके।
सूर्य को प्राणवायु और चन्द्रमा को अपानवायु माना गया है, जो योग विद्या के मूल आधार हैं। प्राचीन ज्योतिषशास्त्र में जैसे जन्मकुंडली के विभिन्न भावों के माध्यम से स्वास्थ्य का मूल्यांकन किया जाता है, उसी प्रकार योग में पहला सोपान ही स्वास्थ्य के प्रति सजग रहना है। चन्द्रमा को मन का कारक माना जाता है, जो मानसिक स्थितियों में उतार-चढ़ाव का कारण बनता है। योगी अपने चंचल मन को स्थिर करने के लिए प्राण और अपानवायु का संतुलन साधने का प्रयास करता है। यही संतुलन, शरीर, मन और आत्मा को स्थिर करके योगी को परम पद की ओर ले जाता है।
एक योगी का मन सबल और तन स्वस्थ होना चाहिए, तभी वह अपने शिष्यों को इस विद्या में निपुण बना सकता है। मन सबल के लिए चन्द्रमा मजबूत होना चाहिए और तन सबल के लिए एक योगी की लग्न मजबूत होनी चाहिए। जन्मकुण्डली में लग्न का स्वामी लग्नेश उच्च का होने पर अथवा लग्नेश के साथ उच्च राशि का चन्द्रमा अथवा स्वराशि का चन्द्रमा उच्च कोटि के साधकों की जन्मपत्री में देखा गया है। जब योगी सूर्य और चन्द्र नाड़ियों को बंद कर सुषुम्ना नाड़ी में मन को स्थिर करता है, तब ब्रह्मनाड़ी का द्वार खुलता है और प्राणवायु का ऊर्ध्वगमन प्रारम्भ होता है, इससे कुण्डलिनी शक्ति जागृत होकर चक्रों को भेदती है। सूर्य से चन्द्रमा प्रकाशित होता है, वैसे ही आत्मा को प्रकाशित करने हेतु ग्रहों के संतुलन की आवश्यकता होती है।