15 नवंबर 2025, शनिवार,  मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि उत्पन्ना एकादशी 

15 नवंबर 2025 को मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है। इस तिथि पर उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र और विष्कुम्भ योग का संयोग बन रहा है। दिन के शुभ मुहूर्त की बात करें शनिवार को अभिजीत मुहूर्त 11:44-12:27 मिनट तक रहेगा। राहुकाल सुबह 09:25-10:45मिनट तक रहेगा। BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI 9412932030

15 नवंबर 2025 को मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है। इस तिथि पर उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र और विष्कुम्भ योग का संयोग बन रहा है। दिन के शुभ मुहूर्त की बात करें शनिवार को अभिजीत मुहूर्त 11:44-12:27 मिनट तक रहेगा। राहुकाल सुबह 09:25-10:45मिनट तक रहेगा।

सूर्योदय का समय : 06: 44 ए एम
सूर्यास्त का समय : 05: 27 पी एम
चंद्रोदय का समय: 03:08 ए एम, नवम्बर 16
चंद्रास्त का समय : 02:37 पी एम

 हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को विशेष महत्व माना गया है और इस दिन जगत के पालनहार श्रीहरि विष्णु का पूजन किया जाता है. हिंदी कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक माह दो एकादशी व्रत आते हैं और मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है. इस दिन व्रत रखने व ​भगवान विष्णु का पूजन करने से जीवन में आ रहे कष्टों से मुक्ति मिलती है और सफलता के रास्ते खुलते हैं. आइए जानते हैं इस बार कब है उत्पन्ना एकादशी व्रत.

वैदिक पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 15 नवंबर को सुबह 12 बजकर 49 मिनट पर शुरू होगी और 16 नवंबर को तड़के 2 बजकर 37 मिनट पर समाप्त होगी. ऐसे मेंं उदयातिथि के अनुसार इस बार उत्पन्ना एकादशी व्रत 15 नवंबर 2025, शनिवार को रखा जाएगा. इस व्रत का पारण अगले दिन 16 नवंबर को किया जाएगा और पारण का समय दोपहर 12 बजकर 38 मिनट से लेकर दोपहर 2 बजकर 49 मिनट तक रहेगा.

उत्पन्ना एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें और मंदिर को गंगाजल से शुद्ध करें. इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प करें और एक चौकी पर पीले रंग का कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करें. फिर भगवान विष्णु को पीला चंदन, अक्षत, पुष्प, तुलसी दल, तुलसी की माला और फल अर्पित करें. इसके बाद घी का दीपक जलाएं और भोग अर्पित करें. लेकिन ध्यान रखें कि विष्णु जी के भोग में तुलसी दल अवश्य होना चाहिए. इसके बाद ॐ वासुदेवाय नमः मंत्र का जाप करें और दिनभर व्रत रखने के बाद अगले दिन व्रत का पारण करें. बता दें कि एकादशी के व्रत अन्न का सेवन वर्जित होता है और इसलिए शाम के समय फलाहार ही लिया जाता है.

 हिंदू धर्म में एकदाशी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है. मार्गशीर्ष माह की पहली एकादशी उत्पन्ना एकादशी का व्रत आज यानि 15 नवंबर के दिन रखा जा रहा है. इस व्रत को तभी पूर्ण माना जाता है, जब इस व्रत को रखने के साख व्रत की कथा भी की जाए. यह व्रत मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है. यह पढ़ें एकादशी व्रत की संपूर्ण कथा.

पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग में एक राक्षस था जिसका नाम नाड़ीजंघ और उसके पुत्र का नाम मुर था. मुर एक बहुत ही शक्तिशाली राक्षस था, जिसने अपने पराक्रम के बल पर इंद्र से लेकर यम और अन्य सभी देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली थी. इस समस्या से मुक्ति पाने के लिए सभी देवतागण शिव जी की शरण में पहुंचे और उन्हें अपनी सारी व्यथा सुनाई. भगवान शंकर ने देवताओं को इस मुश्किल का हल ढूंढने के लिए विष्णु जी के पास जाने के लिए कहा. इसके बाद सभी देवता अपनी श्री हरि की शरण में पहुंचे और विस्तार से उन्हें सारी बात बताई.

देवताओं को इस समस्या निकालने के लिए भगवान विष्णु मुर को पराजित करने के लिए रणभूमि में पहुंच, जहां मुर देवताओं से युद्ध कर रहा था. भगवान विष्णु जी को देखते ही मुर ने उन पर भी प्रहार किया. माना जाता है कि मुर और भगवान विष्णु का युद्ध 10 हजार वर्षों तक चला. विष्णु जी ने अनेकों प्रहार के बाद भी दैत्य मुर नहीं हारा था.

युद्ध करते हुए जब भगवान विष्णु थक गए, तो वह बद्रिकाश्रम गुफा में जाकर विश्राम करने लगे. इसपर दैत्य मुर भी उनका पीछा करते हुए उस गुफा में पहुंच गया. इसके पश्चात जब उसने श्री हरि पर वार करने के लिए हथियार उठाया, तभी भगवान विष्णु के शरीर से एक कांतिमय रूप वाली देवी प्रकट हुईं और उन्होंने मुर राक्षस का वध कर दिया. मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को जन्म होने के कारण इन देवी का नाम एकादशी पड़ गया. इसके साथ ही एकादशी के दिन उत्पन्न होने के कारण इन देवी को उत्पन्ना एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. कहते हैं कि एकादशी व्रत कथा का पाठ करने से सभी समस्याओं का अंत होता है और श्री हरि विष्णु की कृपा प्राप्त होती है.

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