वट सावित्री व्रत की कथा & प्रसिद्ध आरती क्या है? 

 25 MAY 2025 वट सावित्री व्रत BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI SENIOR JOURNALIST Mob 9412932030

JEष्ठ महीने की अमावस्या को सुहागिन महिलाएं वट सावित्री व्रत रखती हैं साथ ही वट पेड़ की पूजा भी करती हैं। मान्यता है कि वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा जी तनों में भगवान विष्णु व पत्तियों में भगवान शिव का वास होता है। ऐसे में यदि वट सावित्री व्रत के दिन वट वृक्ष की पूजा की जाए तो अनंत फल मिलता है। महिलाएं इस दिन व्रत रख कथा भी पढ़ती हैं। बता दें सावित्री और सत्यवान की कथा को पढ़कर यह व्रत सफल होता है। 

पौराणिक कथा के अनुसार, भद्र देश के एक राजा हुआ करते थे, जिनका नाम अश्वपति था। उनके कोई संतान नहीं थी इसलिए वे बेहद दुखी रहते थे। उन्होंने संतान सुख प्राप्त करने के लिए मंत्र उच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुति दी। ऐसा वे 18 वर्षों तक करते रहे। इसके बाद उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर सावित्री देवी प्रकट हुईं और उन्हें वर दिया कि तुम्हें एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी। राजा ने उसका नाम सावित्री रखा।

जब कन्या बड़ी हुई तो वह बेहद ही रूपवान हुई। उसके योग्य जब कोई वर ना मिला तो पिता बेहद दुखी हुए। उन्होंने कन्या को स्वयं ही वर तलाशने के लिए भेज दिया। सावित्री भटकने लगी। वहां साल्व देश के राजा था द्युमत्सेन। हालांकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। लेकिन उनके पुत्र सत्यवान पर सावित्री का मन आ गया और सावित्री ने उनका वरण कर लिया। नारद जी को जब ये बात पता चली तो वह अश्वपति के पास पहुंचे। और कहा कि सत्यवान गुणवान है बलवान है धर्मात्मा है पर उसकी आयु छोटी है वह अल्पायु है। एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। 

ऐसे में राजा बेहद चिंता में आ गए। राजा ने अपनी पुत्री को सारी बात बता दी। पर सावित्री ने कहा कि कन्या अपने पति का एक बार वरण करती है। ऐसे में सावित्री ने हठ लगा ली कि मैं सत्यवान से ही विवाह करूंगी इसलिए अश्वपति ने अपने पुत्री का विवाह सत्यवान से करवा दिया। सावित्री जब अपने ससुराल गई तो उसने अपने सांस ससूर की खूब सेवा की। समय बीतता गया। नारद मुनि ने सावित्री को पहले सत्यवान की मृत्यु के बारे में बता दिया था। ऐसे में सावित्री भी अधीर होने लगी। 

सावित्री ने तीन दिन पहले ही उपवास शुरू कर दिया। नारद मुनि द्वारा बताई गई तिथि पर पितरों का भोजन किया। उस दिन सत्यवान लकड़ी काटने जंगल गए तो उनके साथ सावित्री भी गई। जब दोनों जंगल पहुंचे तो वह पेड़ पर चढ़ गया। थोड़ी देर बाद सिर में तेज दर्द होने लगा। फिर वो नीचे उतरे और सावित्री समझ गई। सावित्री ने सिर को गोद में रखकर सहलाने लगी। तभी वहां यमराज आए और सत्यवान को ले जाने लगे। 

सावित्री भी पीछे-पीछे चल दी। यमराज बोले ये जग की रीत है पर सावित्री नहीं मानीं। युवराज पतिपरायणता को देखकर बेहद प्रसन्न हुए और बोले कि तुम वरदान मांगो तो सावित्री ने कहा कि मेरे सास ससुर वनवासी और अंधे भी ऐसे में उनके लिए दिव्य ज्योति मांगती हूं। यमराज ने वर दे दिया। परंतु सावित्री नहीं फिर भी पीछे-पीछे चलने लगी। 

यमराज ने दूसरा वर मांगने के लिए कहा तो सावित्री ने कहा कि मेरे ससुर का राज्य छिन गया है उन्हें दोबारा मिल जाए। यमराज ने ये वर भी दे दिया पर सावित्री फिर भी पीछे चलने लगी।  तभी यमराज ने तीसरा वर मांगने के लिए कहा तो इस पर सावित्री ने कहा कि मेरे संतान हो और मैं सौभाग्यवती हो जाऊं। यमराज ने ये वर भी दे दिया।  फिर सावित्री यमराज से बोलीं कि मैं एक पतिव्रता स्त्री हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद भी दिया है ऐसे में अब आप मेरे पति के प्राण नहीं ले जा सकते।  ऐसे में यमराज ने सत्यवान के प्राण छोड़ दिए और वे अंतर्ध्यान हो गए। तब सावित्री दोबारा उसी वट वृक्ष के पास आ गईं जहां पर सत्यवान का मृत शरीर पड़ा था। ऐसे में सत्यवान को जीवनदान मिल गया। ऐसे में दोनों खुशी खुशी रहने लगे। 

SECOND STORY;’ BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI CHIEF EDITOR

भद्र देश के एक राजा थे, जिनका नाम अश्वपति था। भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी।

उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दीं। अठारह वर्षों तक यह क्रम जारी रहा

इसके बाद सावित्रीदेवी ने प्रकट होकर वर दिया कि: राजन तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी। सावित्रीदेवी की कृपा से जन्म लेने के कारण से कन्या का नाम सावित्री रखा गया।

कन्या बड़ी होकर बेहद रूपवान हुई। योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुःखी थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा।

सावित्री तपोवन में भटकने लगी। वहाँ साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे, क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया।

ऋषिराज नारद को जब यह बात पता चली तो वह राजा अश्वपति के पास पहुंचे और कहा कि हे राजन! यह क्या कर रहे हैं आप? सत्यवान गुणवान हैं, धर्मात्मा हैं और बलवान भी हैं, पर उसकी आयु बहुत छोटी है, वह अल्पायु हैं। एक वर्ष के बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी।

ऋषिराज नारद की बात सुनकर राजा अश्वपति घोर चिंता में डूब गए। सावित्री ने उनसे कारण पूछा, तो राजा ने कहा, पुत्री तुमने जिस राजकुमार को अपने वर के रूप में चुना है वह अल्पायु हैं। तुम्हे किसी और को अपना जीवन साथी बनाना चाहिए।

इस पर सावित्री ने कहा कि पिताजी, आर्य कन्याएं अपने पति का एक बार ही वरण करती हैं, राजा एक बार ही आज्ञा देता है और पंडित एक बार ही प्रतिज्ञा करते हैं और कन्यादान भी एक ही बार किया जाता है।

सावित्री हठ करने लगीं और बोलीं मैं सत्यवान से ही विवाह करूंगी। राजा अश्वपति ने सावित्री का विवाह सत्यवान से कर दिया।

सावित्री अपने ससुराल पहुंचते ही सास-ससुर की सेवा करने लगी। समय बीतता चला गया। नारद मुनि ने सावित्री को पहले ही सत्यवान की मृत्यु के दिन के बारे में बता दिया था। वह दिन जैसे-जैसे करीब आने लगा, सावित्री अधीर होने लगीं। उन्होंने तीन दिन पहले से ही उपवास शुरू कर दिया। नारद मुनि द्वारा कथित निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया।

हर दिन की तरह सत्यवान उस दिन भी लकड़ी काटने जंगल चले गये साथ में सावित्री भी गईं। जंगल में पहुंचकर सत्यवान लकड़ी काटने के लिए एक पेड़ पर चढ़ गये। तभी उसके सिर में तेज दर्द होने लगा, दर्द से व्याकुल सत्यवान पेड़ से नीचे उतर गये। सावित्री अपना भविष्य समझ गईं।

सत्यवान के सिर को गोद में रखकर सावित्री सत्यवान का सिर सहलाने लगीं। तभी वहां यमराज आते दिखे। यमराज अपने साथ सत्यवान को ले जाने लगे। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं।

यमराज ने सावित्री को समझाने की कोशिश की कि यही विधि का विधान है। लेकिन सावित्री नहीं मानी।

सावित्री की निष्ठा और पतिपरायणता को देख कर यमराज ने सावित्री से कहा कि हे देवी, तुम धन्य हो। तुम मुझसे कोई भी वरदान मांगो।

1) सावित्री ने कहा कि मेरे सास-ससुर वनवासी और अंधे हैं, उन्हें आप दिव्य ज्योति प्रदान करें। यमराज ने कहा ऐसा ही होगा। जाओ अब लौट जाओ।
लेकिन सावित्री अपने पति सत्यवान के पीछे-पीछे चलती रहीं। यमराज ने कहा देवी तुम वापस जाओ। सावित्री ने कहा भगवन मुझे अपने पतिदेव के पीछे-पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है। पति के पीछे चलना मेरा कर्तव्य है। यह सुनकर उन्होने फिर से उसे एक और वर मांगने के लिए कहा।

2) सावित्री बोलीं हमारे ससुर का राज्य छिन गया है, उसे पुन: वापस दिला दें।
यमराज ने सावित्री को यह वरदान भी दे दिया और कहा अब तुम लौट जाओ। लेकिन सावित्री पीछे-पीछे चलती रहीं।

यमराज ने सावित्री को तीसरा वरदान मांगने को कहा।
3) इस पर सावित्री ने 100 संतानों और सौभाग्य का वरदान मांगा। यमराज ने इसका वरदान भी सावित्री को दे दिया।

सावित्री ने यमराज से कहा कि प्रभु मैं एक पतिव्रता पत्नी हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है। यह सुनकर यमराज को सत्यवान के प्राण छोड़ने पड़े। यमराज अंतध्यान हो गए और सावित्री उसी वट वृक्ष के पास आ गई जहां उसके पति का मृत शरीर पड़ा था।

सत्यवान जीवंत हो गया और दोनों खुशी-खुशी अपने राज्य की ओर चल पड़े। दोनों जब घर पहुंचे तो देखा कि माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है। इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक राज्य सुख भोगते रहे।

अतः पतिव्रता सावित्री के अनुरूप ही, प्रथम अपने सास-ससुर का उचित पूजन करने के साथ ही अन्य विधियों को प्रारंभ करें। वट सावित्री व्रत करने और इस कथा को सुनने से उपवासक के वैवाहिक जीवन या जीवन साथी की आयु पर किसी प्रकार का कोई संकट आया भी हो तो वो टल जाता है।

वट सावित्री  के दिन गाई जाने वाली   प्रसिद्ध आरती।

आरती वट सावित्री और वट वट वृक्ष की।
अश्वपती पुसता झाला।। नारद सागंताती तयाला।।
अल्पायुषी सत्यवंत।। सावित्री ने कां प्रणीला।।
आणखी वर वरी बाळे।। मनी निश्चय जो केला।।
आरती वडराजा।।1।।

दयावंत यमदूजा। सत्यवंत ही सावित्री।
भावे करीन मी पूजा। आरती वडराजा ।।धृ।।
ज्येष्ठमास त्रयोदशी। करिती पूजन वडाशी ।।
त्रिरात व्रत करूनीया। जिंकी तू सत्यवंताशी।
आरती वडराजा ।।2।।

स्वर्गावारी जाऊनिया। अग्निखांब कचळीला।।
धर्मराजा उचकला। हत्या घालिल जीवाला।
येश्र गे पतिव्रते। पती नेई गे आपुला।।
आरती वडराजा ।।3।।

जाऊनिया यमापाशी। मागतसे आपुला पती। चारी वर देऊनिया।
दयावंता द्यावा पती।
आरती वडराजा ।।4।।

पतिव्रते तुझी कीर्ती। ऐकुनि ज्या नारी।।
तुझे व्रत आचरती। तुझी भुवने पावती।।
आरती वडराजा ।।5।।

पतिव्रते तुझी स्तुती। त्रिभुवनी ज्या करिती।। स्वर्गी पुष्पवृष्टी करूनिया।
आणिलासी आपुला पती।। अभय देऊनिया। पतिव्रते तारी त्यासी।।

आरती का पाठ:

ॐ जय सावित्री माता, ॐ जय सावित्री माता।
सावित्री माता, सावित्री माता।
सत्यवान को जीवन दान दीया,
सब जग में है तेरा नाम. 

अंतर्मन से सुमिर लो, सुने वो तभी पुकार।
भक्तों का दुख भंजन, रक्षा करें आठों याम।
दिव्य ज्योति तुम्हारी, रहें सदा अविराम। 

ऋषि मुनि योगी सारे, गुणगान तुम्हारा करें।
हृदय विराजो हे मां, भटक न जाऊ किसी ओर।
ॐ जय सावित्री माता, ॐ जय सावित्री माता। 

यह आरती सावित्री माता की भक्ति और पति की दीर्घायु की प्रार्थना के लिए की जाती है।

जय अम्बे गौरी,
मैया जय श्यामा गौरी ।
तुमको निशदिन ध्यावत,
हरि ब्रह्मा शिवरी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥

मांग सिंदूर विराजत,
टीको मृगमद को ।
उज्ज्वल से दोउ नैना,
चंद्रवदन नीको ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥

कनक समान कलेवर,
रक्ताम्बर राजै ।
रक्तपुष्प गल माला,
कंठन पर साजै ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥

केहरि वाहन राजत,
खड्ग खप्पर धारी ।
सुर-नर-मुनिजन सेवत,
तिनके दुखहारी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥

कानन कुण्डल शोभित,
नासाग्रे मोती ।
कोटिक चंद्र दिवाकर,
सम राजत ज्योती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥

शुंभ-निशुंभ बिदारे,
महिषासुर घाती ।
धूम्र विलोचन नैना,
निशदिन मदमाती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥

चण्ड-मुण्ड संहारे,
शोणित बीज हरे ।
मधु-कैटभ दोउ मारे,
सुर भयहीन करे ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥

ब्रह्माणी, रूद्राणी,
तुम कमला रानी ।
आगम निगम बखानी,
तुम शिव पटरानी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥

चौंसठ योगिनी मंगल गावत,
नृत्य करत भैरों ।
बाजत ताल मृदंगा,
अरू बाजत डमरू ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥

तुम ही जग की माता,
तुम ही हो भरता,
भक्तन की दुख हरता ।
सुख संपति करता ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥

भुजा चार अति शोभित,
वर मुद्रा धारी । [खड्ग खप्पर धारी]
मनवांछित फल पावत,
सेवत नर नारी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥

कंचन थाल विराजत,
अगर कपूर बाती ।
श्रीमालकेतु में राजत,
कोटि रतन ज्योती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥

श्री अंबेजी की आरति,
जो कोइ नर गावे ।
कहत शिवानंद स्वामी,
सुख-संपति पावे ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥

जय अम्बे गौरी,
मैया जय श्यामा गौरी ।

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