शाही शादी और नोटबंदी से उपजे सवाल

शाही शादी और नोटबंदी से उपजे सवाल
-ललित गर्ग – (www.himalayauk.org) Leading Digital Newsportal

एक तरफ जहां लाखों लोग एटीएम और बैंकों की लाइनों में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर कर्नाटक के पूर्व मंत्री और रईस कारोबारी माइनिंग किंग अपनी बेटी ब्रह्माणी की पांच दिन चलने वाली शादी में 5 अरब रुपए खर्च करने जा रहे हैं। सोने का पानी चढ़ा निमंत्रण और बॉलीवुड सितारों की परफॉर्मेंस से पैसे की बेशर्म नुमाइश तो हो ही रही है, भ्रष्टाचार एवं कालेधन के खिलाफ चल रही जंग पर भी करारा तमाचा जड़ा है। बीजेपी के नेताओं का इसमें शामिल होना भी पार्टी के दांवों की पोल खोल रहा है। भ्रष्टाचार-आर्थिक अपराध का राजनीति से चोली दामन जैसा संबंध है और बीजेपी इससे मुक्त नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इसके लिये सबसे पहले अपने ही दल की आर्थिक गंदगी को दूर करना होगा। भ्रष्टाचार एवं कालेधन की समस्या राजनीति से ज्यादा जुड़ी है। मैं जहां तक अनुभव करता हूँ भारतीय राजनीति की यह सबसे बड़ी कमजोरी रही है। शेक्सपीयर ने कहा था- ‘दुर्बलता! तेरा नाम स्त्री है।’ पर आज अगर शेक्सपीयर होते तो इस परिप्रेक्ष्य में कहते ‘दुर्बलता! तेरा नाम भारतीय राजनीति है।’
आदर्श सदैव ऊपर से आते हैं। पर शीर्ष पर आज इसका अभाव है। वहां मूल्य बन ही नहीं रहे हैं, फलस्वरूप नीचे तक, साधारण से साधारण संस्थाएं, संगठनों और मंचों तक स्वार्थ सिद्धि और नफा-नुकसान छाया हुआ है। सोच का मापदण्ड मूल्यों से हटकर निजी हितों पर ठहरा हुआ है।
राष्ट्रीय चरित्र निर्माण की कहीं कोई आवाज उठती भी है तो ऐसा लगने लगता है कि यह विजातीय तत्व है जो हमारे जीवन में घुस रहा है। जिस नैतिकता, प्रामाणिकता, राजनीतिक शुचिता, ईमानदारी और सत्य आचरण पर हमारी संस्कृति जीती रही, सामाजिक व्यवस्था बनी रही, जीवन व्यवहार चलता रहा वे आज लुप्त हो गये हैं। उस वस्त्र को जो राष्ट्रीय जीवन को ढके हुए था आज हमने उसे तार-तारकर खूंटी पर टांग दिया है। मानों वह हमारे पुरखों की चीज थी, जो अब इतिहास की चीज हो गई।
500-1000 के नोटो की बंदी के वक्त में, जब आम आदमी लंबी-लंबी लाइनों में लगकर दो वक्त रोटी का जुगाड़ करने जितने पैसे अपने बैंक अकाउंट से नहीं निकाल पा रही है, ऐसे नाजुक दौर में इस भव्य शादी समारोह और उसमें होने वाले पैसों की बेहूदा फिजूल खर्ची पर यदि सवाल उठ रहे हैं तो उनका उठना जरूरी है। ऐसे सवालों के जबाव भी हमें ही तलाशने होंगे। प्रसिद्ध तिरुमाला मंदिर से 8 पंडितों को, 50,000 लोगों को जिनमें कई बड़े नेता, सेलिब्रिटी, शामिल है, 3000 सिक्योरिटी गार्ड्स को सुरक्षा के लिए तैनात किया जाना, कई सेट कई चर्चित जगहों जैसे हंपी का बिट्ठल टेम्पल, चेन्नई का कॉल बाजार की नकल के रूप में निर्मित किया जाना, दुल्हन ब्रह्माणी और दूल्हा राजीव रेड्डी के घरों की नकल भी सेट के रूप में तैयार किया जाना, डाइनिंग एरिया को रेड्डी के होमटाउन विलेज की तरह बनाया जाना, लगभग 40 बैलगाड़ियों का इंतजाम मेहमानों को एंट्रेंस से वेडिंग हॉल तक ले जाने के लिए किया जाना- ऐसे सैकड़ों चैंकाने वाले इंतजाम है जो पैसे की बर्बादी के साथ-साथ सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों की बेहूदगी का शर्मनाक प्रदर्शन है। ऐसे हैरान करने वाली शादी से जुड़े रेड्डी पर सीबीआई और ईडी अभी भी जांच कर रही हैं। शायद राजनीति से जुड़ी ताकत ने ही उन्हें ऐसे संवेदनशील समय में एक अलोकतांत्रिक एवं गैरकानूनी खर्चीली शादी करने का हौसला दिया है। इसी शादी से उठे सवालों में एक सवाल यह भी है काले धने के खिलाफ प्रधानमंत्री के अभियान में ऐसे रईस लोग शामिल हैं या नहीं?
अभी मोदी सरकार के कालेधन को बाहर लाने के लिए इरादे पर संदेह करना उचित नहीं होगा। लेकिन इस मजबूत कदम ने किस तरह राजनीतिज्ञों के चेहरे से नकाब उठा दिये हैं उसे देखकर आम आदमी दांतों तले अंगुली दबाने पर मजबूर इसलिए हो रहा है कि जो लोग कल तक भ्रष्टाचार से संग्रह किये गये कालेधन के खिलाफ और राजनीति को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए ऊंची आवाज में चिल्लाया करते थे, वे इस अचानक उठाये गये सुविचारित कदम से बुरी तरह बौखला गये। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वे अपने ही बनाये गये ‘मायाजाल’ में फंसने के अंदेशे से इस कदर घबरा गये कि उन्हें पुराने नोटों में अपनी जान फंसी हुई दिखने लगी है। यह देश साझा है। सभी का है चाहे कोई पक्ष में हो या विपक्ष में। बेशक फैसला ‘कड़क’ हो सकता है मगर कभी-कभी घाव को ठीक करने के लिये फौडे़ पर चीरा लगाना ही पड़ता है।
एक पौराणिक कथा पढ़ी थी कि भगवान ने आदमी को दो पुड़िया दी और कहा- एक पुड़िया में पैसा है और दूसरे में ईमान। रास्ते में पैसा बिखेरते जाना और ईमान बटोरते चलना। आदमी ने पुड़िया पकड़ते हुए भगवान की बात तो सुनी पर हार्द नहीं समझा। इसलिए उसने क्रम बदल दिया। वह पैसे बटोरने लगा और ईमान बिखेरने लगा। परिणाम आया- आदमी पैसे का गुलाम बन गया। मानवीय जीवन-मूल्यों का ह्रास होने लगा।
जीवन के दो रूप सामने आए- एक ओर अमीरों की ऊंची अट्टालिकाएं, दूसरी ओर फुटपाथों पर रेंगती गरीबी। एक ओर वैभव ने व्यक्ति को विलासिता दी और विलासिता ने व्यक्ति के भीतर क्रूरता जगाई, तो दूसरी ओर गरीबी तथा अभावों की त्रासदी ने उसके भीतर विद्रोह की आग जला दी। रेड्डी का शादी का तरीका भी गरीब एवं अभाव में जीने वाले आदमी को कहीं एक नये विद्रोह की ओर न ढकेल दें, इस पर चिन्तन जरूरी है।
ऐसे ही विद्रोह से आतंकवाद जनमा, नक्सलवाद पनपा, हिंसा एवं नफरत का वातावरण बना। आदमी-आदमी से असुरक्षित हो गया। हिंसा, झूठ, चोरी, बलात्कार, संग्रह जैसे निषेधात्मक अपराधों ने मनुष्य को पकड़ लिया। राजनीति में भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधीकरण बढ़ा। चेहरे ही नहीं चरित्र तक अपनी पहचान खोने लगे। नीति और निष्ठा के केन्द्र बदलने लगे। आस्था की नींव कमजोर पड़ने लगी। अर्थ की अंधी दौड़ से समस्या सामने आई- पदार्थ कम, उपभोक्ता ज्यादा। काला धन जमा होने लगा, कालाबाजारी बढ़ी। व्यक्तिवादी मनोवृत्ति जागी। स्वार्थों के संघर्ष में अन्याय और शोषण होने लगा। हर व्यक्ति अकेला पड़ गया। जीवन आदर्श थम से गए। इन्हीं स्थितियों ने नोटबंदी को लागू करने की स्थितियां पैदा की है।
सचमुच! पैसे का नशा जब, यहां, जिसके भी चढ़ता है वह इंसान शैतान बन जाता है। आदमी खुदगर्ज बन जाता है। अप्राप्त की प्राप्ति, प्राप्त की सुरक्षा का अंतहीन भटकाव शुरू होता है। व्यक्ति स्वयं को प्रतिष्ठित करने के लिए औरों के अस्तित्व को नकारता है। आवश्यकता से ज्यादा संग्रह की प्रतिस्पर्धा होती है। व्यक्ति पैसों की चकाचैंध में झूठे प्रदर्शन करता है।
रेड्डी के यहां की शादी और नोटबंदी ने जिन स्थितियों को बेनकाब किया है, उनमें भारत के लोगों के समक्ष यह सनद खुद-ब-खुद जाहिर हो गई है कि इस देश की राजनीति में ‘शेर’ की खाल ओढ़ कर कौन-कौन ‘भेडिया’ लोगों को मूर्ख बनाता रहा है? जिस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम चलाने की नाव पर सवार होकर अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली के लोगों को भरमाया। मायावती-मुलायम- लालू की हकीकत सिर्फ पुराने नोटों का चलन बन्द करने के फैसले से ही बाहर आ गई। लेकिन अफसोस इस बात का है कि देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस भी दिवालियेपन के कगार पर खड़ी हो गई है। जिस प्रकार युद्ध में सबसे पहले घायल होने वाला सैनिक नहीं, सत्य होता है, ठीक उसी प्रकार प्रदर्शन और नेतृत्व के दोहरे किरदार से जो सबसे ज्यादा घायल होता है, वह है लोकतांत्रिक मूल्य और समाज की व्यवस्था।

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(ललित गर्ग)
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