1857 के आन्दोलन में उत्तर प्रदेश-राजस्थान का योगदान

18571857 के आन्दोलन में उत्तर प्रदेश का योगदान विशेष लेख- राजस्थान का स्वाधीनता आन्दोलन

सम्पूर्ण भारतवर्ष की तरह राजस्थान में भी दासता से मुक्ति के प्रयास 19वीं शताब्दी से ही प्रारम्भ हो गये थे। यहां की जनता पर अंग्रेजों की हुकूमत की बेड़ियां तो थी ही, साथ ही उन्हें यहां के शासकों एवं जागीरदारों के दमनकारी कृत्यों से भी जूझना पड़ता था। इस दोहरी मार के फलस्वरूप ऐसे अनेक आंदोलन हुए जिनका प्रभाव स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई पर भी स्पष्ट दिखाई दिया। किसान आंदोलन- राजस्थान में अहिंसक असहयोग आंदोलन की शुरुआत बिजोलिया के किसान आंदोलन से हुई।

देश के स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन के समय उत्तर प्रदेश को संयुक्त प्रांत कहा जाता था। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में इस प्रांत की भूमिका काफी अहम मानी जाती है। भौगोलिक स्थिति के अनुसार उत्तर प्रदेश देश का एक मुख्य राज्य है और इसकी देश के स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका रही है। 1857 का विद्रोह हो या गांधीजी के नेतृत्व में चला स्वतंत्रता संग्राम, इन आंदोलनों को प्रदेश में भरपूर समर्थन मिला।

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-जयकिशन परिहार/प्रशांत कक्कड़  —–प्रज्ञा/आशीष/गिरधारी/यशोदा –

देश के स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन के समय उत्तर प्रदेश को संयुक्त प्रांत कहा जाता था। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में इस प्रांत की भूमिका काफी अहम मानी जाती है। भौगोलिक स्थिति के अनुसार उत्तर प्रदेश देश का एक मुख्य राज्य है और इसकी देश के स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका रही है। 1857 का विद्रोह हो या गांधीजी के नेतृत्व में चला स्वतंत्रता संग्राम, इन आंदोलनों को प्रदेश में भरपूर समर्थन मिला।

1857 के विद्रोह ने अंग्रेजों के मन में भय पैदा कर दिया था। इस विद्रोह के शुरू होने के कई कारण थे। जैसा कि अंग्रेजों के द्वारा सहायक संधि प्रणाली का आरंभ करना। इस संधि के अंतर्गत राजा को अपने खर्चे पर अंग्रेजों की सेना अपने राज्य में रखनी होती थी। राज्य के दिन-प्रतिदिन के कार्य में भी सेना का हस्तक्षेप होता था। गोद प्रथा की समाप्ति ने निसंतान राजाओं को बच्चा गोद लेने की प्रथा पर रोक लगा दी थी। 1856 में अवध राज्य का धोखे से विलय होने से संबंधित अंग्रेज सरकार के कदम ने आम जनता और अन्य राजघरानों को चिंता में डाल दिया था। अंग्रेजों के द्वारा सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक क्षेत्रों में किए गए कार्यों ने आम जनमानस को व्यथित कर दिया था। जनता इन सब कार्यों को अपनी जिंदगी में हस्तक्षेप मानने लगी। तात्कालिक कारणों में 29 मार्च, 1857 को बैरकपुर में बलिया के सैनिक मंगल पांडे द्वारा किया गया विद्रोह था, जब सैनिक छावनी में इस बात की खबर फैली कि कारतूसों में गाय-सुअर की चर्बी मिली हुई है। इस बात ने वहां उपस्थित सैनिको में रोष उत्पन्न कर दिया। भारतीय सैनिकों ने बैरक में अंग्रेज अधिकारियों को मारकर कब्जा करने की असफल कोशिश की। इसके लिए मंगल पांडे को दोषी मानते हुए उन्हें आठ अप्रैल 1857 को फांसी की सजा दे दी गई। इस घटना ने पूरे देश में रोष उत्पन्न कर दिया। 10 मई 1857 को मेरठ में सैनिकों के विद्रोह ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध जनता के मन में पनप रहे आक्रोश को और अधिक भड़का दिया। जे.सी.विल्सन के शब्दों में “ प्राप्त प्रमाणों से मुझे पूर्ण रूप से विश्वास हो चुका है कि एक साथ विद्रोह करने के लिए 31 मई 1857 का दिन चुना गया था, यह संभव है कि कुछ क्षेत्रों में विद्रोह का सूत्रपात निश्चित समय के बाद हुआ हो, किंतु इस आधार पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि 1857 की क्रांति के सूत्रपात के लिए कोई निश्चित समय निर्धारित नहीं किया गया था। उस समय देश में विद्रोह के कई कारक पूरी तरह से मौजूद थे। बैरकपुर की घटना ने उसे चिंगारी का रूप दे दिया, वहीं मेरठ की घटना ने उसे ज्वाला का रूप दिया।

1857 के पूर्व बरेली में 1816 ई. में स्थानीय अंग्रेज अधिकारियों द्वारा चौकीदार को आरोपित करने पर हुई सख्ती ने हिंसक विद्रोह का रूप धारण कर लिया। इस विद्रोह का नेतृत्व मुफ्ती मोहम्मद एवाज ने किया, जो 1817 ई. में आगरा प्रांत के अंतर्गत अलीगढ़ के किसान, जमींदार व सैनिक कम्पनी के प्रशासनिक फेरबदल से क्रोधित थे। इसके साथ ही मालगुजारी बढ़ाने के निर्णय ने विद्रोह का रूप अख्तियार कर लिया। इसके नेतृत्वकर्ता हाथरस के दयाराम और मुरसान के भगवंत सिंह रहे।

1857 के विद्रोह में मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में विद्रोह आरंभ हुआ। जफर के अत्याधिक वृद्ध होने पर उनके सैन्य दल का नेतृत्व बरेली के बख्त खां ने किया। बख्त खां के नेतृत्व वाला 10 सदस्यीय दल सार्वजनिक मुद्दों पर सम्राट के नाम से सुनवाई करता था।

कानपुर के अंतिम पेशवा बाजी राव द्वितीय के दत्तक पुत्र धोंधू पंत, जो कि नाना साहब के नाम से प्रसिद्ध थे, ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर भारत के सम्राट बहादुर शाह जफर को गर्वनर के रूप में मान्यता दी। नाना साहब ने अंग्रेजों का बखूबी सामना किया। बाद में वे पराजित होकर नेपाल चले गए और वहां से आजीवन वो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते रहे। नाना साहब ने अंग्रेजों को चुनौती देते हुए कहा “कि जबतक मेरे शरीर में प्राण है, मेरे और अंग्रेजों के बीच जंग जारी रहेगी। चाहे मुझे मार दिया जाए, या फिर कैद कर लिया जाए, या फांसी पर लटका दिया जाए, पर मैं हर बात का जवाब तलवार से दूंगा’’।

लखनऊ में बेगम हजरत महल ने विद्रोह को अपना नेतृत्व प्रदान किया और लखनऊ में ब्रिटिश रेजीडेंसी पर आक्रमण किया। बाद में वे पराजित होकर नेपाल चली गई, जहां गुमनामी में उनका इंतकाल हो गया।

झांसी में रानी लक्ष्मीबाई ने 4 जून, 1857 को विद्रोह प्रारंभ किया, जहां वे अपने राज्य के पतन तक लड़ती रही। जहां से वह ग्वालियर चली गई और तात्या टोपे के साथ विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया। अनेक युद्धों को जीतने के बाद 17 जून 1858 को जनरल ह्यूरोज से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गई। खुद जनरल ह्यूज ने लक्ष्मीबाई के बारे में कहा “कि भारतीय क्रांतिकारियों में यह सोयी हुई औरत अकेली मर्द है’’।

फैजाबाद में मौलवी अहमदुल्ला ने विद्रोह का झंडा बुलंद किया और आह्वान किया “कि सारे लोग अंग्रेज काफिर के विरुद्ध खड़े हो जाओ और उसे भारत से बाहर खदेड़ दो’’। उनकी गतिविधियों से परेशान होकर अंग्रेज सरकार ने उन पर 50 हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया था। उन्हें पांच जून 1858 को पोवायां (रुहेलखंड) में गोली मार दी गई। अंग्रेजों ने मौलवी अहमदुल्ला के बारे में कहा “कि अहमदुल्ला साहस से परिपूर्ण और दृढ़ संकल्प वाले व्यक्ति तथा विद्रोहियों में सर्वोत्तम सैनिक है’’।

रुहेलखंड में खान बहादुर खान ने विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया। मुगल सम्राट, बहादुर शाह जफर ने इन्हें सूबेदार नियुक्त किया। इलाहाबाद में लियाकत अली, गोरखपुर में गजाधर सिंह, फर्रूखाबाद में तफज्जल हुसैन, सुल्तानपुर में शहीद हसन, मथुरा में देवी सिंह और मेरठ में कदम सिंह सहित अन्य कई लोगों ने विद्रोह को गति प्रदान की।

हालांकि यह विद्रोह अपने मंतव्य में सफल नहीं रहा, क्योंकि इसमें एकता, संगठन की कमी, उपर्युक्त सैन्य नेतृत्व का अभाव इत्यादि था। लेकिन 1857 के विद्रोह ने लोगों में देश प्रेम की भावना को बल प्रदान किया और लोगों में यह विश्वास उत्पन्न कर दिया कि वे भी अंग्रेजों से टक्कर ले सकते हैं। 90 साल बाद 1947 में अंग्रेजों की भारत से विदाई के लिए इस कारक को बड़ा अहम माना जाता है।

*लेखक द्वय पत्र सूचना कार्यालय,वाराणसी में सूचना सहायक हैं

#################राजस्थान का स्वाधीनता आन्दोलन

-प्रज्ञा पालीवाल गौड़

सम्पूर्ण भारतवर्ष की तरह राजस्थान में भी दासता से मुक्ति के प्रयास 19वीं शताब्दी से ही प्रारम्भ हो गये थे। यहां की जनता पर अंग्रेजों की हुकूमत की बेड़ियां तो थी ही, साथ ही उन्हें यहां के शासकों एवं जागीरदारों के दमनकारी कृत्यों से भी जूझना पड़ता था। इस दोहरी मार के फलस्वरूप ऐसे अनेक आंदोलन हुए जिनका प्रभाव स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई पर भी स्पष्ट दिखाई दिया।

किसान आंदोलन

राजस्थान में अहिंसक असहयोग आंदोलन की शुरुआत बिजोलिया के किसान आंदोलन से हुई। राजस्थान के शासकों ने 19वीं शताब्दी के आरम्भ में अंग्रेजों से संधि कर ली थी, जिससे उन्हें बाहरी आक्रमणों एवं मराठों के आतंक से मुक्ति मिल गई थी। निर्भय हो जाने के कारण इन राजाओं ने आम जनता पर नए-नए करों का बोझ डालना प्रारम्भ कर दिया। इससे जनता में असंतोष बढ़ता गया और पहला विस्‍फोट हुआ सन 1997 में मेवाड़ की जागीर क्षेत्र बिजोलिया में। विभिन्‍न लगानों के विरूद्ध बिजोलिया के किसानों ने 2-3 छोटे आंदोलन किए। वर्ष 1916 में राजस्‍थान के महान सपूत श्री विजय सिंह पथिक ने आंदोलन की बागडोर संभाली और असहयोग आंदोलन प्रांरभ किया। उनके आह्वान पर जनता ने लगान तथा अन्‍य प्रकार के कर देना बंद कर दिया। इसके कारण बड़ी संख्‍या में किसान दमन के शिकार हुए और जेल गए। अधिकांश बड़े नेता या तो निर्वासित किए गए या जेल भेजे गए। यह आंदोलन 1941 में किसानों की जीत के साथ समाप्‍त हुआ।

बजोलिया के किसान आंदोलन का प्रभाव मेवाड तथा आसपास की रियासतों पर भी पड़ा। बेगूं के किसानों ने भी लगान के विरुद्ध एक संगठित आंदोलन शुरू किया। इसके लिए सरकार ने बल प्रयोग किया जिसमें रूपाजी और करमाजी नामक दो किसान शहीद हुए। इसके साथ ही बूंदी, सिरोही,अलवर, भोमठ, सीकर और दुधवारिया में भी किसान आंदोलन हुए जिसमें अन्ततः विजय किसानों की हुई।

भोमठ और सिरोही के भील बहुल क्षेत्र में किसानों पर की गई गोलीबारी में लगभग 2 हजार किसान मारे गए। इस आंदोलन का नेतृत्व ”मेवाड के गांधी” के नाम से प्रसिद्ध श्री मोती लाल तेजावत ने किया।

राजस्थान में 1857 की लड़ाई

हालांकि राजस्थान के कई राजाओं ने 1857 की क्रान्ति में अंग्रेजों की मदद की थी लेकिन, कुछ क्षेत्रों में बगावत भी हुई। 21 अगस्त, 1857 में जोधपुर राज्य में स्थित एरिनपुरा छावनी में ब्रिटिश फौज के कुछ भारतीयों ने बगावत कर दिल्ली की ओर कूच किया। रास्ते में वे बागी सैनिक आउवा पर ठहरे जहां के ठाकुर कुशलसिंह चापावत उनके नेता बने। आसपास के अन्य ठाकुर भी अपनी सेना लेकर उनके साथ हो गए।

अजमेर के चीफ कमिश्‍नर सर पैट्रिक लारेन्स ने जोधपुर के महाराजा से सेना भेजने की प्रार्थना की। उन्होंने जो सेना भेजी वह बागी सैनिकों से हार गई। उसके बाद सर पैट्रिक लारेन्स और जोधपुर का राजनीतिक एजेंट मेसन सशैत्‍य आउवा पहुंचे। दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ जिसमें अंग्रेजी सेना हार गई।

गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग को जब पता चला तो उसने जनवरी 1858 को पालनपुर और नसीराबाद से एक बड़ी सेना आउवा भेजी। क्रांतिकारी इस सेना का सामना नहीं कर पाए और उन्हें जानमाल की भारी क्षति हुई।

इस प्रकार कोटा एवं अजमेर-मेरवाडा की नसीराबाद स्थित सेना के सैनिकों ने भी मेरठ में सैनिक विद्रोह के समाचार सुनकर विद्रोह कर दिया।

राजस्थान में सशस्‍त्र क्रान्ति का प्रारम्भ शाहपुरा के सरी सिंह बारहठ ने किया। उन्होंने अर्जुनलाल सेठी एवं खरवा राव गोपालसिंह के साथ एक क्रान्तिकारी संगठन ”अभिनव भारत समिति” की स्थापना की। उन्होंने एक विद्यालय भी खोला जहां युवकों को प्रशिक्षण दिया जाता था। इनमें से कुछ युवकों को प्रशिक्षण के लिए रास बिहारी बोस के साथी मास्टर अमीचन्द के पास दिल्ली भेजा जाता था। दिल्ली में के सरी सिंह बारहठ के भाई जोरावरसिंह एवं पुत्र प्रतापसिंह रास बिहारी बोस के नेतृत्व में गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिग्स पर फैंके गए बम की घटना में सम्मिलित हुए।

प्रजा मण्डल

राज्यों के प्रति कांग्रेस की नीति महात्मा गांधी द्वारा 1920 में बनाई गई। 1938 में हरिपुरा कांग्रेस ने राज्यों को भारत का अभिन्न अंग मानते हुए इन राज्यों में अपने-अपने संगठन स्थापित करने तथा स्वतंत्रता आंदोलन चलाने का प्रस्ताव पारित किया। इसके बाद प्रजा मण्डलों की स्थापना हुई ।

अप्रैल 1938 में श्री माणिक्यलाल वर्मा ने अपने कुछ साथियों के सहयोग से उदयपुर के मेवाड़ प्रजा मण्डल की स्थापना की। इसके अध्यक्ष श्री बलवन्त सिंह मेहता थे। संस्था को प्रारम्भ से ही गैर कानूनी घोषित कर दिया गया। सरकार ने प्रजा मण्डल पर जो पाबन्दी लगाई हुई थी उसको हटाने की मांग करते हुए 4 अक्टूबर, 1938 को सत्याग्रह आंदोलन किया गया। मेवाड़ सरकार द्वारा सितम्बर 1941 में प्रजा मण्डल पर से पाबन्दी हटा दी गई।

हालांकि जयपुर में प्रजा मण्डल की स्थापना 1931 में हो गई थी, लेकिन इसकी गतिविधियां1938 में सेठ जमना लाल बजाज के नेतृत्व सम्भालने के बाद ही शुरू हो पाई। सरकार ने सेठ जमना लाल बजाज के जयपुर प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया, लेकिन उन्‍होंने इन आदेशों की अवहेलना कर, उन्‍होंने एक फरवरी 1939 को जयपुर में प्रवेश किया। उनकी गिरफ्तारी हुई और राज्य में सत्याग्रह शुरू हुआ। यह सत्याग्रह 18 मार्च, 1939 तक चला और इसी वर्ष अगस्त में एक समझौते के बाद श्री जमना लाल बजाज व उनके साथियों को रिहा किया गया।

कोटा प्रजा मण्डल की स्थापना 1936 में की गई। इस संस्था द्वारा साक्षरता, दवाईयों की आपूर्ति, सिंचाई के लिए जल की आपूर्ति आदि कुछ अन्य प्रस्ताव भी पारित किए गए। कोटा प्रजा मण्डल ने उत्तरदायी शासन के लिए हड़ताल व सत्याग्रह भी किए। अलवर एवं भरतपुर में 1938 में प्रजा मण्डलों की स्थापना की गई। बीकानेर में 1936 और 1942 में प्रजामण्डलों की स्थापना के प्रयास किए गए लेकिन वे राज्य की नीतियों के कारण असफल हो गए।

जैसलमेर में महारावल की दमनकारी नीतियों के कारण वहां तो कोई संगठन बनाना अत्यन्त कठिन कार्य था। सागर मल गोपा ने अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए आवाज उठाई। जब 1939में प्रजामण्डल की स्थापना हुई तो उस पर पाबन्दी लगाई गई। 1941 में सागर मल गोपा को गिरफ्तार किया गया। जेल में जुल्मों को सहन करते हुए उनकी 3 अप्रैल, 1946 को मृत्यु हो गई।

राज्य के कोने-कोने में स्थापित प्रजा मण्डलों ने राजस्थान में स्वाधीनता आंदोलन को सही दिशा प्रदान की।

*लेखिका पत्र सूचना कार्यालय, जयपुर में निदेशक हैं।

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प्रज्ञा/आशीष/गिरधारी/यशोदा –

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