देशी गाय का गोबर मोबाइल रेडिएशन प्रूफ

देशी गाय के गोबर को मोबाइल रेडिएशन प्रूफ

देशी गाय के गोबर को मोबाइल रेडिएशन प्रूफ पाया गया

आरएसएस के अखिल भारतीय गौ सेवा प्रमुख शंकर लाल का मानना है कि गाय के गोबर से मोबाइल का रेडिएशन रोका जा सकता है। उन्‍होंने कहा कि मोबाइल पर गोबर लगा देने से उसके रेडिशन का प्रभाव नहीं पड़ता है। अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्‍सप्रेस से एक बातचीत में कहा कि अगर गाय के गोबर से कैंसर का इलाज हो सकता है तो वह हमें मोबाइल रेडिएशन से भी बचा सकता है। शंकर लाल ने कहा कि गुजरात के जूनागढ़ में वैज्ञानिक ने गाय की पेशाब में बहुत मूल्‍यवान तत्‍व पाए हैं। शंकर लाल ने कहा कि वह अपने मोबाइल में हर सप्‍ताह ताजा गोबर लगाते हैं। उन्‍होंने कहा कि उनकी टीम के महिला, युवा सहित सभी सदस्‍य अपने मोबाइल में गाय का गोबर लगाते हैं। शंकर लाल ने कहा कि फोन की हानिकारक किरणें शरीर की ऊर्जा को शोषित कर लेती हैं। मोबाइल पर गोबर लगाकर आदमी अपनी ऊर्जा बचा सकता है।

हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है : –

या लक्ष्मीः सर्वभूतानां सर्वदेवष्ववस्थिता।

धेनरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु।

नमो गोभ्यः श्रीमतीभ्यः सौरभेयीभ्य एव च।

नमो ब्रह्मसुताभ्यश्च पवित्रोभ्यो ममो नमः।

अर्थात जो सब प्रकार की भूति, लक्ष्मी है, जो सभी देवताओं में विद्यमान है, वह गौ रूपिणी देवी हमारे पापों को दूर करे। जो सभी प्रकार पवित्र है, उन लक्ष्मी रुपी सुरभि कामधेनु की संतान तथा ब्रह्मपुत्री गौओं को मेरा बार बार नमस्कार। वेदों में पृथ्वी को भी गाय रूपा माना गया है। गौ के श्रंगों के मध्य में ब्रह्मा, ललाट में भगवान शंकर, दोनों कानो में अश्विनी कुमार, नेत्रों में चन्द्रमा और सूर्य,तथा कक्ष में साध्य देवता, ग्रीवा में पार्वती, पीठ पर नक्षत्र गण, ककुद् में आकाश,गोबर में अष्टैश्वर्य संपन्न तथा स्तनों में जल से परिपूर्ण चारों समुद्रनिवास करने की बात कही गयी है। वाल्मीकीय रामायण के अनुसार भी गाय को समृद्धि, धन-धान्य एवं सृष्टाति सृष्ट भोज्य पदार्थों की प्रदाता बताया गया है।

तो ये कुछ कारण हैं जिसकी वजह से गाय को हिंदू धर्म में एक पवित्र पशु माना जाता है।

 माना जाता है कि देसी गाय के गोबर और मूत्र में कई तरह के औषधीय गुण पाए जाते हैं। देसी गाय का गोबर अब आपको खतरनाक रेडिएशन से भी बचाने का काम करेगा।  मोबाइल से निकलने वाली खतरनाक रेडिएशन से अब आपको देशी गाय का गोबर बचा सकता है। प्रदेश उद्योग विभाग एक सोसायटी के माध्यम से हैदराबाद यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों के सहयोग गाय के गोबर से बनने वाली एक चिप तैयार करवा है।  ये चिप रेडिएशन को 90 फीसदी तक कर देगी। शुरुआती परीक्षण में इसका प्रयोग सफल रहा है। अंतिम चरण के कुछ तकनीकी परीक्षणों के बाद इसे सस्ती दरों पर बाजार में उतारने की तैयारी है।

गाय के बारे में कुछ वैज्ञानिक तथ्य जो दुनिया भर के वैज्ञानिको ने तथा भारत में गायत्री परिवार हरिद्वार एवं आर्य समाज व् कई विदेशी और स्वदेशी वैज्ञानिकों ने खोज निकाले हैं:- गाय के गौ मूत्र में 24 तत्व होते हैं जिनसे हर तरह के रोगों का इलाज संभव है |इस में १.४ एम्पेयर का करंट होता है जिससे आप सही तरह से प्रयोग करके बिजली बना सकते हैं या बल्ब जला सकते हैं | गाय के गौमूत्र में कारबोलिक एसिड होता जिस से बहुत ही अच्छा कीटनाशक मुफ्त में बनाया जा सकता है जिससे आप विषैले कीटनाशक के प्रयोग से बचेंगे जिससे फसल जहरीली हो जाती है | गाय के गौमूत्र में कई रोगों का इलाज करने की अदभुत क्षमता है यह वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध हो चुका है तथा भारत में कई जगह इसके द्वारा इलाज किया जाता है |

गाय के गोबर से लिपे हुए घर में रेडिएशन असर नहीं करती तथा कैंसर के खतरे से बचते हैं | इसमे से निकलने वाली मीथेन को बिजली के तौर पर उपयोग किया जा सकता है तथा गोबर गैस को सिलिंडर में भरकर गाड़ियाँ भी चलाई जा सकती हैं | गाय के गोबर के प्रयोग से सबसे अच्छी जैविक खाद मुफ्त में बनाई जा सकती है जिससे हम जहरीले रसायनों के प्रयोग से बचेंगे तथा सुरक्षित भोजन प्राप्त कर सकेंगे तथा निरोगी रहेंगे |

देसी गाय के दूध के सेवन से हड्डियाँ मजबूत होती हैं |

देसी गाय के घी के सेवन से बवासीर इत्यादि में लाभ होता है | नेशनल रिसर्च इंस्टिट्यूट, करनाल (हरियाणा) से प्रकाशित एक आलेख में गाय के घी का वैज्ञानिक विश्लेषण बताया गया है जिसके अनुसार इस घी में वैक्सीन एसिड, ब्युटिक एसिड, वीटा कैरोटीन जैसे तत्व पाये जाते हैं जो शरीर में पैदा होने वाले कैंसरीय तत्वों से लड़ने की क्षमता रखते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा यह भी माना गया कि गाय के १० ग्राम घी को दीपक में जलाने, गोबर के जलते उपलों पर डालने अथवा यज्ञ में आहुति डालने से लगभग एक टन प्राण वायु उत्पन्न होती है तथा उससे वायुमंडल में एटोमिक रेडिएशन का प्रभाव काम हो जाता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण भोपाल में 1984 में यूनियन कार्बाइड कारखाने से गैस रिसाव के समय देखने को मिला। जिन घरों में गाय के गोबर, मूत्र, दूध व घी का प्रयोग था वहां गैस का प्रभाव कम पाया गया था।

सभी जीव- जन्तुओं तथा दुग्धधारी पशुओं में केवल गाय ही एक ऐसा पशु है जिसकी 180 फुट लम्बी आँत होती है। जो गाय द्वारा खाए गए भोजन को पचाने में सहायक होता है। गाय की रीढ़ की हड्डी के भीतर सूर्यकेतु नामक नाड़ी होती है जिस पर सूर्य की किरण के स्पर्श से स्वर्ण तत्व का निर्माण होता है गाय के एक क्वंटल (१०० किलोग्राम) दूध में एक माशा स्वर्ण पाया जाता है। गाय के दूध व घी का रंग पीला होने का भी यही कारण है। यह पीलापन कैरोटीन तत्व के कारण होता है। कैरोटीन तत्व की शरीर में कमी होने पर ही मुख, फेफड़े तथा मूत्राशय में कैंसर होने के अवसर ज्यादा होते हैं। यह कैरोटीन तत्व गाय के दूध में भैंस के दूध से 10 गुणा ज्यादा होते हैं। एक बात और जिसे वैज्ञानिकों से शोध किया कि भैंस के दूध को गर्म करने पर पौष्टिक तत्व ख़त्म हो जाते हैं जबकि गाय के दूध को गर्म करने पर वह ख़त्म नहीं होते ।

 पुराने मेमोरी कार्ड के आकार की इस  चिप में देशी गायब का गोबर भरा जाएगा।  चिप को इस तरह से डिजाइन किया जा रहा है कि इसमें गोबर भरने के बाद दुर्गंध नहीं आएगी। इसे मोबाइल फोन के पीछे लगाया जाएगा। चिप पर काम कर रहे विशेषज्ञों की मानें तो अब तक हुए शोध में देशी गाय के गोबर को मोबाइल रेडिएशन के प्रभाव को रोकने में कारगर पाया गया है। 
 उद्योग विभाग के महाप्रबंधक ज्ञान चंद चौहान ने बताया कि गोवंश अपशिष्ट से उपयोगी सामान तैयार किया जा रहा है। यह चिप भी इसी कड़ी का हिस्सा है। प्रोजेक्ट से जुड़े लघु उद्योग संघ बिलासपुर के महासचिव दीप चंद नड्डा का कहना है कि मोबाइल की सबसे प्रबल रेडिएशन कम सिग्नल या फिर कॉल करते समय निकलती हैं। यह चिप मोबाइल रेडिएशन को लेकर सुरक्षा कवच प्रदान करेगी। प्रोजेक्ट के कुछ चरण शेष हैं। गोबर की चिप को तैयार करवा रहे व्यास नंदिनी सोसाइटी के सदस्य दीप चंद नड्डा का कहना है कि हैदराबाद विश्वविद्यालय में कराए गए टेस्ट में देशी गाय के गोबर को मोबाइल रेडिएशन प्रूफ पाया गया है। इसी को आधार बनाकर चिप तैयार की जा रही है।चिप में गोबर भरा जाएगा जो एक हफ्ते तक रेडिएशन से बचाएगा। इसके बाद गोबर को बदलना पड़ेगा। चिप में कुछ बदलाव किए जाने हैं। बेहद सस्ती दर पर जल्द ही इसे मार्केट में उतारा जाएगा।

गोबर शब्द का प्रयोग गाय, बैल, भैंस या भैंसा के मल के लिये प्राय: होता है। घास, भूसा, खली आदि जो कुछ चौपायों द्वारा खाया जाता है उसके पाचन में कितने ही रासायनिक परिवर्तन होते हैं तथा जो पदार्थ अपचित रह जाते हैं वे शरीर के अन्य अपद्रव्यों के साथ गोबर के रूप में बाहर निकल जाते हैं। यह साधारणत: नम, अर्द्ध ठोस होता है, पर पशु के भोजन के अनुसार इसमें परिवर्तन भी होते रहते हैं। केवल हरी घास या अधिक खली पर निर्भर रहनेवाले पशुओं का गोबर पतला होता है। इसका रंग कुछ पीला एवं गाढ़ा भूरा होता है। इसमें घास, भूसे, अन्न के दानों के टुकड़े आदि विद्यमान रहते हैं और सरलता से पहचाने जा सकते हैं। सूखने पर यह कड़े पिंड में बदल जाता है।

गोबर में उपस्थित पदार्थ एवं गुण कई बातों पर निर्भर करते हैं, जैसे पशु की जाति, अवस्था, चारा, दिनचर्या आदि। चरनेवाले या काम करनेवाले पशुओं का गोबर एक स्थान पर बँधे रहनेवालों से भिन्न रहता है। दूध पीनेवाले बच्चों या बछवों का गोबर मनुष्यों के मल से कुछ कुछ मिलता जुलता है। अधिक भूसा एवं कम खली खाने वाले पशुओं के गोबर में नाइट्रोजनयुक्त पदार्थ एंव वसा की मात्रा कम तथा सैलूलोज जैसी वस्तुएँ अधिक रहती हैं, किंतु अधिक खली खानेवाले पशुओं के गोबर में इसके विपरीत नाइट्रोजनवाले पदार्थ एवं वसा की मात्रा अधिक रहती है। गायों के गोबर में भी बच्चे के पेट में आने की अवस्था से लेकर दूध देने की अवस्था तक परिवर्तन होते रहते हैं। युवा पशु लगभग 70 प्रतिशत खाद्य शरीर में पचाता है, परंतु दूध देनेवाली गाय केवल 25 प्रतिशत ही पचा पाती है। शेष गोबर एव मूत्र में निकल जाता है। अन्न के दाने प्राय: मूल अवस्था में गोबर में विद्यमान रहते हैं; किंतु टूटे हुए, या पिसे हुए, अन्न के भाग पाचन क्रिया से प्रभावित हा जाते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ द्रव भी गोबर में रहता है। कहा जाता है कि यह द्रव कीटाणुनाशक होता है। गाय के गोबर में 86 प्रतिशत तक द्रव पाया जाता है। गोबर में खनिजों की भी मात्रा कम नहीं होती। इसमें फास्फोरस, नाइट्रोजन, चूना, पोटाश, मैंगनीज़, लोहा, सिलिकन, ऐल्यूमिनियम, गंधक आदि कुछ अधिक मात्रा में विद्यमान रहते हैं तथा आयोडीन, कोबल्ट, मोलिबडिनम आदि भी थोड़ी थोड़ी मात्रा में रहते हैं। अस्तु, गोबर खाद के रूप में, अधिकांश खनिजों के कारण, मिट्टी को उपजाऊ बनाता है। पौधों की मुख्य आवश्यकता नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटासियम की होती है। वे वस्तुएँ गोबर में क्रमश: 0.3- 0.4, 0.1- 0.15 तथा 0.15- 0.2 प्रतिशत तक विद्यमान रहती हैं। मिट्टी के संपर्क में आने से गोबर के विभिन्न तत्व मिट्टी के कणों को आपस में बाँधते हैं, किंतु अगर ये कण एक दूसरे के अत्यधिक समीप या जुड़े होते हैं तो वे तत्व उन्हें दूर दूर कर देते हैं, जिससे मिट्टी में हवा का प्रवेश होता है और पौधों की जड़ें सरलता से उसमें साँस ले पाती हैं। गोबर का समुचित लाभ खाद के रूप में ही प्रयोग करके पाया जा सकता है। गोबर का सबसे लाभप्रद उपयोग खाद के रूप में ही हो सकता है, किंतु भारत में जलाने की लकड़ियों का अभाव होने से इसका अधिक उपयोग ईंधन के रूप में ही होता है। ईंधन के लिये इसके गोहरे या कंडे बनाकर सुखा लिए जाते हैं। सूखे गोहरे अच्छे जलते हैं और उनपर बना भोजन, मधुर आँच पर पकने के कारण, स्वादिष्ट होता है। किंतु गोबर का उचित एवं लाभप्रद उपयोग, जैसा कहा जा चुका है, खाद के रूप में ही है। सभी समृद्ध देशों में, जहाँ कहीं गोबर देनेवाले पशु होते हैं, गोबर से खाद बना ली जाती है और उससे खेत उपजाऊ बनाए जाते हैं।

मोबाइल से रेडिएशन होता है. ये वाली खबर खूब सुनने को मिलती है. गांव में तो लोग मोबाइल ऊपर वाली जेब में नहीं रखते. बोलते हैं कि इससे तरंगे निकलकर सीधे दिल में घुस जाती है और आदमी मर जाता है.

लेकिन अब डरने की जरूरत नहीं है. जुगाड़ू देश के वासियों ने इसका भी तोड़ खोज लिया है. बस सुनकर उल्टी मत करिएगा. मोबाइल का नया कवरइजाद किया गया है, जो इससे निकलने वाली तरंगों से आपको बचाएगा. ये है गोबर कवर. मतलब मोबाइल के पीछे गाय का ताज़ा गोबर चिपका दीजिए. भूत-पिशाच, रेडिएशन कुछ भी निकट नहीं आ पाएगा.

ये वाला ज्ञान हमको मिला है आरएसएस के अखिल भारतीय गौ सेवा प्रमुख शंकर लाल से, जिन्होंने अपने फोन के पीछे भी गोबर चिपका रखा है.  द इंडियन एक्सप्रेस ने गौ सेवा प्रमुख के इस बयान को प्रमुखता से छापा है.

उन्होंने कहा कि मेरे फोन के पीछे जो यह ताजा गोबर चिपका है, ये मुझे मोबाइल के हार्मफुल रेडिएशन से बचाता है. गाय का गोबर और गौमूत्र अमृत होते हैं. वो आदमी को हर तरह की बीमारी से बचा सकता है. अगर गोबर से कैंसर का इलाज हो सकता है. तो ये तरंगें किस खेत की मूली हैं. शंकर लाल ने कहा कि ऐसा होता है, आप विश्वास कीजिए. उन्होंने कहा कि आपने जूनागढ़ के सांइटिस्टों ने जो खोज की है उसके बारे में नहीं सुना? उन्होंने गौमूत्र में सोने की खोज की है.

उन्होंने अपने आस-पास बैठे सारे लोगों के फोन पर चिपका गोबर दिखाया. उन्होंने कहा कि मेरी टीम के सारे लोग, चाहे वो बच्चे हो. बूढ़े हो या जवान सभी अपने फोन पर गोबर लगाते हैं. और उन्हें पता है गोबर कि चमत्कारी शक्तियां, ना लगाने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता.

उनसे ये पूछे जाने पर कि आप इस चमत्कारी शक्ति को प्रूव कर सकते हैं, तो उन्होंने वहीं पर करके दिखा दिया. उन्होंने एक पेंडूलम आरएसएस कार्यकर्ता के हाथ पर रखा और कहा कि देखो ये हिल रहा है. उन्होंने हाथ से ही उसे थोड़ा सा झटका दे दिया था. फिर कहा देखो ये हिल रहा है क्योंकि इसके अंदर एनर्जी है. फिर हाथ में मोबाइल पकड़ाकर पेंडूलम रखा. अब देखो पंडूलम नहीं हिल रहा. ये इसलिए कि फोन की तरंगों ने सारी एनर्जी को सोख लिया है. फिर फोन पर गोबर लगाया तो पेंडूलम फिर हिलने लगा. मतलब गोबर ने तरंगों से बचा लिया.

शंकर लाल की उम्र 76 साल है. वो कहते हैं कि इस उम्र में गोबर का रस और गौमूत्र के सेवन से ही वो इतने स्वस्थ हैं. वो प्रेग्नेंट महिलाओं को गोबर और गौमूत्र का सेवन करवाते हैं ताकि उनकी डिलीवरी नॉर्मल हो. वो कहते हैं कि गोबर और गौमूत्र से कैसे भी लाइलाज रोग को ठीक कर सकते हैं. बशर्ते वो सिर्फ भारतीय गाय हो. विदेशी गायों का दूध और गोबर जहरीला होता है.

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