16 May 2026 शनिवार ^ शनि जयंती और वट सावित्री का व्रत ^ ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि & शनि जयंती 16 मई 2026 को है। इस बार शनिवार के दिन शनि जयंती होने से इसको बेहद शुभ संयोग माना जा रहा है। यही वजह है कि साढ़ेसाती और ढैय्या से पीड़ित 5 राशियों के लिए यह दिन ‘गोल्डन डे’ की तरह रहेगा। शनि जयंती का दिन मेष, सिंह, धनु, कुंभ और मीन के लिए बहुत शुभ साबित हो सकता है। वर्तमान में सिंह और धनु शनि की ढैय्या के चपेट में हैं वहीं मेष, कुंभ और मीन पर शनि की साढ़ेसाती है। इसलिए शनि जयंती और शनिश्चरी अमावस्या के शुभ संयोग में 4 कार्य से इनके जीवन की सभी परेशानियों का अंत हो सकता है।

BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI CHIEF EDITOR & PRESIDENT & SADHAK ; MAHA MAI BAGLA MUKHI PEETH DEHRADUN Mob. 9412932030

जीवन की सभी परेशानियों का अंत हो सकता है। हनुमान चालीसा का कम से कम 7 बार पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से इन पर शनि ग्रह का बुरा असर दूर होगा शनि जयंती के दिन छाया दान करना भी बेहद शुभ माना जाएगा। शनि जयंती और शनिश्चरी अमावस्या के शुभ संयोग में अगर आप छाया दान करते हैं तो आपके जीवन के सभी कष्ट दूर हो सकते हैं। छाया दान, लोहे के बर्तन में सरसों का तेल डालकर और फिर उस तेल में खुद की परछाई देखकर उस तेल के दान को कहा जाता है। शनि जयंती का यह उपाय आपको बंद किस्मत के ताले खोलने वाला माना गया है। शनि ग्रह के मंत्र ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ का 108 बार जप करना चाहिए। शनि जयंती के दिन पीपल के पेड़ की पूजा करना भी बेहद शुभ फलदायक माना जाता है। ऐसा करने से शनि ग्रह के दुष्प्रभाव दूर होते हैं, साढ़ेसाती और ढैय्या के बुरे असर से भी आप बचते हैं। इसके साथ ही पीपल के पेड़ की पूजा करने से शनि देव के साथ ही पितरों का आशीर्वाद भी आपको बरसता है।

16 मई को ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि और शनिवार का दिन है। अमावस्या तिथि शनिवार देर रात 1 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। 16 मई को सुबह 10 बजकर 26 मिनट तक सौभाग्य योग रहेगा, उसके बाद शोभन योग लग जाएगा। साथ ही शनिवार शाम 5 बजकर 31 मिनट तक भरणी नक्षत्र रहेगा। 16 मई को स्नान-दान आदि की अमावस्या है। साथ ही शनिवार को वट सावित्री का भी व्रत किया जाएगा। 16 मई को शनि जयंती भी मनाई जाएगी।

- ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि- 16 मई 2026 को देर रात 1 बजकर 31 मिनट तक
- सौभाग्य योग- 16 मई 2026 को सुबह 10 बजकर 26 मिनट तक सौभाग्य योग रहेगा, उसके बाद शोभन योग लग जाएगा।
- भरणी नक्षत्र- 16 मई 2026 को शाम 5 बजकर 31 मिनट तक
- 16 मई 2026 व्रत-त्यौहार- ज्येष्ठ अमावस्या, शनि जयंती, वट सावित्री व्रत
- ब्रह्म मुहूर्त- 04:36 ए एम से 05:20 ए एम
- अभिजित मुहूर्त- 12:09 पी एम से 01:01 पी एम
- विजय मुहूर्त- 02:45 पी एम से 03:38 पी एम
- गोधूलि मुहूर्त- 07:05 पी एम से 07:27 पी एम
- अमृत काल- 01:15 पी एम से 02:40 पी एम
- सूर्योदय- सुबह 5:28 बजे
- सूर्यास्त- शाम 7: 04 बजे
हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत की बड़ी महिमा बताई जाती है। कहते हैं इस व्रत को रखने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। ये व्रत साल में दो बार आता है। एक बार ज्येष्ठ अमावस्या पर तो दूसरी बार ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन। लेकिन ज्येष्ठ अमावस्या वाला वट सावित्री व्रत ज्यादा लोकप्रिय है जो इस बार 16 मई 2026, शनिवार को पड़ रहा है।
- वट सावित्री व्रत के दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और लाल, पीले या हरे रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- इस दिन सुहागिन महिलाएं को सोलह शृंगार जरूर करना चाहिए।
- सजने संवरने के बाद व्रत का संकल्प लें।
- फिर सभी पूजा सामग्री को लेकर बरगद के पेड़ पर जाएं और वहां जाकर सबसे पहले बेड़ की जड़ में पानी डालें।
- पेड़ के नीचे सावित्री और सत्यवान की प्रतिमा स्थापित करें।
- बांस की एक टोकरी में सात प्रकार के अनाज जरूर रखें।
- रोली, अक्षत, फूल और कुमकुम से वृक्ष और देवी-देवताओं की पूजा करें।
- भोग में भीगे हुए चने और गुड़ जरूर रखें।
- बांस के पंखे से सावित्री-सत्यवान और वट वृक्ष को हवा झलें।
- इसके बाद वट वृक्ष की 7, 11 या 21 बार परिक्रमा करते हुए उस पर कलावा या कच्चा सूत लपेटें।
- परिक्रमा करते समय अपने पति की लंबी आयु की कामना करें।
- परिक्रमा के बाद पेड़ के नीचे बैठकर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें या पढ़ें।
- कथा के अंत में धूप-दीप से आरती करें और पूजा में हुई भूल-चूक की क्षमा मांगें।
- पूजा समाप्त होने के बाद सुहाग की सामग्री और दक्षिणा किसी ब्राह्मण या सुहागिन महिला को दान कर दें।
- इसके बाद अपने घर के बड़ों और पति का पैर छूकर उनका आशीर्वाद जरूर प्राप्त करें।
- इसके बाद प्रसाद में चढ़ाई गई चीजों को खाकर अपना व्रत खोल लें।
- व्रत पूजा के बाद कभी भी खोला जा सकता है।
- वैसे कई क्षेत्रों में महिलाएं वट सावित्री व्रत का पारण 7, 11 या 21 भीगे चने निगलकर करती हैं। इसके बाद आप सात्विक भोजन ग्रहण कर सकते हैं।
- इस बात का ध्यान रखें कि पूजा से पहले अन्न भूलकर भी ग्रहण नहीं करना है। हालांकि आप फलाहारी भोजन ले सकते हैं।
वट सावित्री व्रत का पारण पूजा के बाद कभी भी किया जा सकता है। जैसे अगर आपने सुबह 11 बजे के करीब पूजा कर ली है तो इसके बाद आप अपना व्रत खोल सकती हैं। जो महिलाएं शाम में पूजा करती हैं तो वो शाम में ही व्रत खोलती हैं।
शनि जयंती का पर्व 16 मई 2026, शनिवार को मनाया जा रहा है। इस बार शनि जयंती का महत्व इसलिए और बढ़ गया है, क्योंकि 13 साल बाद अदुभुत संयोग बन रहा है। ज्योतिष के अनुसार, ज्येष्ठ अमावस्या पर आने वाले इस पर्व पर कई शुभ योग भी बन रहे हैं।
ज्योतिष के अनुसार, यह दुर्लभ संयोग करीब 13 साल बाद बन रहा है। सूर्य और बुध की युति से बुद्धादित्य योग का निर्माण हो रहा है। वहीं, गजकेसरी योग, शश महापुरुष योग और सौभाग्य योग का संयोग भी इस दिन को बेहद शुभ बना रहा है।
4 बाती वाला सरसों तेल का दीया
शाम को शनिदेव की प्रतिमा के पास और पीपल के पेड़ (रवी वृक्ष) के नीचे चार मुख वाला सरसों के तेल का दीपक जलाना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे शनि के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और शनि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
2. काले तिल, उड़द का दान
जरूरतमंद लोगों को काला तिल, काला कंबल, उड़द दाल या लोहे की वस्तुओं का दान करना शुभ फलदायी होता है।
3. हनुमान चालीसा का पाठ
शनि दोष से राहत पाने के लिए हनुमान जी की पूजा बेहद प्रभावी मानी जाती है। शनि जयंती पर हनुमान चालीसा पाठ करने से सकारात्मक ऊर्जा बढ़ेगी।
4. पश्चिम दिशा का महत्व
पश्चिम दिशा को शनि की दिशा माना गया है। ऐसे में पूजा या मंत्र जाप करते समय पश्चिम दिशा की ओर मुख करना शुभ होता है।
5. अच्छे कर्म
शनिदेव कर्मों के आधार पर न्याय करते हैं। इसलिए इस दिन झूठ, छल और गलत कार्यों से दूर रहने का संकल्प लेना चाहिए। ईमानदारी और अच्छे कर्मों से शनिदेव की कृपा बनी रहती है।
पूजा में रखें इन बातों का ध्यान
- शनि पूजा से पहले स्नान करके काले या नीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है।
- पूजा के दौरान तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए।
- शनिदेव की प्रतिमा के ठीक सामने खड़े होकर दर्शन करने की बजाय थोड़ा किनारे से दर्शन करना चाहिए।
- शनि जयंती पर पीपल के पेड़ की पूजा का विशेष महत्व है। पीपल के पेड़ की 7 परिक्रमा करने और सरसों तेल का दीपक जलाने से नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में सुख-शांति आती है।
- सूर्योदय से पहले या सूर्यास्त के बाद शनि पूजा शुभ होती है। संध्या काल में शनि की पूजा करना विशेष लाभकारी मानी गई है।